अतीत की गहराइयों से — बेतिया से वर्तमान तक
बेतिया.भारत के इतिहास में ऐसे चरित्र कम ही मिलते हैं जिन्होंने अपनी आस्था, विद्वता और मानवता से किसी पूरे समुदाय की नियति बदल दी हो.फादर जोसेफ मैरी बर्निनी उन्हीं विरल हस्तियों में से एक थे। 1709 में लोम्बार्डी (गार्गनानो) में जन्मे बर्निनी ने बेतिया की भूमि पर न केवल मिशनरी कार्य किया, बल्कि एक ऐसा ईसाई समुदाय खड़ा किया जो आज भी जीवंत और सक्रिय है.
बेतिया राज के महाराजा धुरुप सिंह के साथ उनकी मित्रता और महारानी के स्वास्थ्य लाभ की चमत्कारिक घटना ने इस क्षेत्र में ईसाई मिशन की नींव रखी.1742 में पोप बेनेडिक्ट XIV से मिली अनुमति ने इसे वैधता दी और यही वह क्षण था जिसने उत्तर भारत के सबसे पुराने ईसाई समुदाय — बेतिया ईसाईयों को जन्म दिया.
बर्निनी केवल प्रचारक नहीं थे, वे संस्कृत और हिंदुस्तानी के गहरे ज्ञाता, चिकित्सक, अनुवादक और समाज-शास्त्री भी थे.उनकी पांडुलिपियाँ आज भी यूरोप के पुस्तकालयों और संग्रहालयों में सुरक्षित हैं, जो उनके बहुआयामी व्यक्तित्व की गवाही देती हैं.
वर्तमान संदर्भ में
बर्निनी का सपना केवल आस्था तक सीमित नहीं था—उन्होंने मानवता की सेवा और संस्कृतियों के संवाद को ही अपने मिशन का केंद्र बनाया.यही कारण है कि बेतिया का ईसाई समुदाय आज भी स्थानीय समाज के साथ गहराई से रचा-बसा है.उनकी परंपराओं में भारतीय संस्कृति की झलक स्पष्ट दिखाई देती है—यह उनके "भारतीयकरण" के प्रयास का प्रमाण है.
समकालीन महत्व
आज जब दुनिया धर्म और संस्कृति के नाम पर बँटती जा रही है, बर्निनी का जीवन संदेश देता है कि संवाद, सह-अस्तित्व और परस्पर सम्मान ही समाज को स्थायी रूप से मजबूत कर सकते हैं. बेतिया ईसाई समुदाय की मौजूदगी, शिक्षा और सेवा की परंपरा उसी समर्पण की जीवित मिसाल है.
फादर बर्निनी की धरोहर केवल अतीत की कहानी नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए भी दिशा-सूचक है.
आलोक कुमार
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