मंगलवार, 23 सितंबर 2025

कैथोलिक समुदाय के लिए नई उम्मीद और धार्मिक गतिविधियों में मजबूती का संकेत है

 

दुमका.झारखंड का दुमका धर्मप्रांत संथाल परगना के सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक परिदृश्य का महत्वपूर्ण हिस्सा है. इस धर्मप्रांत का नेतृत्व बिशप जूलियस मरांडी कर रहे हैं और हाल ही में फादर सोनातन किस्कू को सहायक बिशप के रूप में नियुक्त किया गया है.यह नियुक्ति संथाल समाज और कैथोलिक समुदाय के लिए नई उम्मीद और धार्मिक गतिविधियों में मजबूती का संकेत है.

     दुमका धर्मप्रांत की विशेषता यह है कि इसके अंतर्गत आने वाले चार विधानसभा क्षेत्र—दुमका, जामा, जामताड़ा और सारठ—राजनीतिक रूप से सक्रिय तो हैं, लेकिन इनमें से किसी भी क्षेत्र से अब तक कोई कैथोलिक प्रतिनिधि निर्वाचित नहीं हुआ. वर्तमान समय में आलोक कुमार सोरेन, बसंत सोरेन, श्रीमती लोइस मरांडी और देवेंद्र कुंवर यहां की राजनीति में जनप्रतिनिधि के रूप में सक्रिय हैं. यह तथ्य ध्यान खींचता है कि 4,542,658 की कुल जनसंख्या (2023) में 207,336 कैथोलिक होने के बावजूद उनकी राजनीतिक भागीदारी नगण्य है.संथाल, बंगाली, पहाड़िया, उरांव, मुस्लिम और हिंदू जातीय समूहों से मिलकर बने इस क्षेत्र में भाषाई विविधता भी स्पष्ट है. हिंदी, बंगाली, पहाड़िया और उरांव जैसी भाषाएँ यहां की सामाजिक पहचान को और गहरा बनाती हैं. फिर भी कैथोलिक समुदाय की आवाज़ राजनीतिक मंचों पर लगभग गुम ही है.

     लोकसभा की 14 सीटों वाले झारखंड में दुमका एक अहम संसदीय क्षेत्र है, परंतु यहां से किसी भी कैथोलिक उम्मीदवार ने चुनावी दावेदारी तक नहीं की.वर्तमान सांसद नलिन सोरेन हैं, जिनका राजनीतिक प्रभाव स्पष्ट है.झारखंड की राजनीति मूलतः क्षेत्रीय दलों और आदिवासी नेतृत्व के इर्द-गिर्द घूमती रही है.झारखंड मुक्ति मोर्चा, वनांचल कांग्रेस और मार्क्सवादी समन्वय समिति जैसे दल यहां का आधार तय करते हैं. इस समय मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा राज्य की बागडोर संभाले हुए हैं.

     संवैधानिक ढांचे के तहत राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा होती है, लेकिन वास्तविक सत्ता मुख्यमंत्री और मंत्रिमंडल के हाथों में रहती है.इन तमाम परिस्थितियों के बीच सवाल यह है कि क्या झारखंड के कैथोलिक समुदाय को राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिलेगा? सामाजिक, शैक्षणिक और धार्मिक क्षेत्र में सक्रिय यह समुदाय राजनीतिक रूप से अब तक उपेक्षित रहा है. भविष्य की राजनीति में अगर इनकी भागीदारी बढ़े, तो यह न केवल समुदाय की पहचान को सशक्त करेगा, बल्कि राज्य की बहुलतावादी लोकतांत्रिक संरचना को भी मजबूती देगा.दुमका धर्मप्रांत की स्थिति हमें यह सोचने पर विवश करती है कि धर्म और संस्कृति से जुड़े समुदायों की सहभागिता केवल प्रार्थना और आस्था तक सीमित न रहे, बल्कि लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व में भी अपना स्थान सुनिश्चित करे.

आलोक कुमार

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