"रोड नहीं तो वोट नहीं"—गाँव की चीख़
दरभंगा .आज़ादी के 78 वर्ष पूरे हो गए, लेकिन देश के कई हिस्सों में अब भी विकास केवल भाषण और घोषणाओं तक सीमित है.दरभंगा जिले के कुशेश्वरस्थान पूर्वी प्रखंड के सुघराईन पंचायत की स्थिति इसका ज्वलंत उदाहरण है.यहाँ के लोग आज भी बारहमासी सड़क जैसी मूलभूत सुविधा से वंचित हैं.
हर साल बाढ़ और बारिश के दिनों में कच्ची सड़कें कीचड़ और गड्ढों में तब्दील हो जाती हैं.गांव के रास्ते जलमग्न होकर पूरी तरह से अवरुद्ध हो जाते हैं.परिणामस्वरूप, बच्चों की पढ़ाई, किसानों की खेती-बाड़ी, रोज़मर्रा की ज़रूरतें और सबसे महत्वपूर्ण—मरीजों को अस्पताल तक ले जाना—सब ठप पड़ जाता है. विकास के कारणों और योजनाओं की चमक-दमक इन ग्रामीणों के लिए केवल एक छलावा साबित हुई है.
इसी पीड़ा ने जन्म दिया "रोड नहीं तो वोट नहीं" आंदोलन को. 8 नवम्बर 2024 से शुरू हुआ यह आंदोलन अब गाँव की सामूहिक प्रतिज्ञा बन चुका है.पंचायत वासियों ने स्पष्ट कर दिया है कि जब तक सड़क नहीं बनेगी, तब तक आने वाले विधानसभा चुनाव 2025 में वोट का बहिष्कार होगा. हाल ही में 21 सितम्बर 2025 को पूरे पंचायत में मानव-श्रृंखला बनाकर लोगों ने अपनी एकजुटता का प्रदर्शन किया. इसमें पुरुष, महिला, युवा, बच्चे और बुजुर्ग सभी शामिल हुए.ग्रामीणों का आक्रोश सिर्फ सड़कों की दुर्दशा तक सीमित नहीं है. उनका गुस्सा नेताओं और प्रशासन की उस पुरानी चाल पर भी है जिसमें चुनाव से पूर्व केवल योजना का बोर्ड लगाकर कार्य पूर्ण होने का भ्रम फैलाया जाता है.गोडेपुरा-सुघराईन प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना इसका सबसे बड़ा प्रमाण है—दस साल पहले इसका बोर्ड लगा था, लेकिन आज तक सड़क धरातल पर नहीं उतरी.
ग्रामीणों की यह आवाज़ लोकतंत्र की चेतावनी है. यदि मूलभूत सुविधाएं ही उपलब्ध नहीं कराई जा सकती, तो लोकतंत्र का उत्सव—चुनाव—कैसे सार्थक होगा? सड़क सिर्फ़ आवागमन का साधन नहीं, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सम्मानजनक जीवन का आधार है.
सरकार और जनप्रतिनिधियों को यह समझना होगा कि अब जनता केवल वादों और खोखली घोषणाओं से संतुष्ट नहीं होगी. यदि विकास धरातल पर नहीं उतरेगा, तो "रोड नहीं तो वोट नहीं" जैसे आंदोलन लोकतंत्र की दिशा बदलने की क्षमता रखते हैं.
सवाल यह है कि क्या सरकार और प्रशासन सुघराईन पंचायत की इस चेतावनी को गंभीरता से लेगा, या फिर यह आंदोलन भी चुनावी कोलाहल में कहीं दबकर रह जाएगा?
आलोक कुमार
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