पोप लियो ने जैसे ही जन्मदिन का केक काटा
वाटिकन . संत पॉल महागिरजाघर की संध्या—जहाँ शहीदों की स्मृतियों अभी-अभी श्रद्धा की लौ में झिलमिला रही थीं—अचानक उल्लास और प्रार्थना की गूंज से भर उठी. पोप लियो ने जैसे ही जन्मदिन का केक काटा और उपस्थितों ने "हैप्पी बर्थडे" का गीत छेड़ा, वहाँ एक अनोखा संगम जन्मा—श्रद्धा और सरल मानवीय आनंद का.कार्डिनलों की गोष्ठी और विश्वासियों की उपस्थिति में पोप ने उस क्षण को साधारण उत्सव से कहीं आगे बढ़ा दिया. जब उन्होंने कहा—“मेरी इच्छा नहीं, प्रभु, केवल आपकी इच्छा पूरी हो”—तो लगा मानो जन्मदिन की मोमबत्तियाँ केवल उनकी उम्र का नहीं, बल्कि उनकी आस्था का भी प्रतीक बनकर जल रही हों.क्रूस विजय पर्व की पृष्ठभूमि में यह जश्न और भी गहरा हो उठा. यहाँ जन्मदिन केवल उम्र का पड़ाव नहीं था, यह उस पुकार की याद थी जो जीवन को ईश्वर की योजना के हाथों सौंपने से शुरू होती है.जब संत पापा महागिरजाघर से बाहर निकले और भीड़ का अभिवादन किया, तो वह क्षण एक दीपशिखा-सा था—आस्था की ज्वाला और मानवीय उल्लास का संगम। वास्तव में, यह केवल उत्सव नहीं, बल्कि एक शम्मा था—जो अंधेरे में रोशनी और थके मन को सांत्वना देती है.
आलोक कुमार

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