जल, जंगल और जमीन के सवाल को राष्ट्रीय बहस का विषय बनाने में भी इस संगठन की महत्वपूर्ण भूमिका रही है
बिहार में भूमि और आवास का सवाल कोई नया मुद्दा नहीं है। यह केवल जमीन के एक टुकड़े का मामला नहीं, बल्कि सम्मान, सुरक्षा और जीवन के बुनियादी अधिकार से जुड़ा प्रश्न है। दशकों से हजारों परिवार ऐसे हैं जिनके पास रहने के लिए अपनी जमीन नहीं है। वे सरकारी जमीन, परती भूमि, सड़क किनारे या दूसरों की जमीन पर अस्थायी आशियाना बनाकर जीवन गुजारने को मजबूर हैं। ऐसे लोगों के अधिकारों की लड़ाई को लेकर जन संगठन एकता परिषद लंबे समय से संघर्ष करता रहा है। जल, जंगल और जमीन के सवाल को राष्ट्रीय बहस का विषय बनाने में भी इस संगठन की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
इसी कड़ी में एकता परिषद बिहार के कार्यकर्ताओं ने राज्य के सभी 38 जिलों में आवासीय भूमिहीन परिवारों का सर्वेक्षण कराया। सर्वे के आधार पर हजारों परिवारों की सूची तैयार कर संबंधित प्रखंडों के अंचल कार्यालयों में आवेदन जमा किए गए। संगठन का दावा है कि इन आवेदनों पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई और अधिकांश मामलों में भूमिहीन परिवार आज भी सरकारी सहायता की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
हाल के दिनों में इस मुद्दे ने एक बार फिर राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में चर्चा पैदा कर दी है। राज्य के नए भू-सुधार एवं राजस्व मंत्री डॉ. दिलीप कुमार जायसवाल ने पदभार संभालने के बाद भूमिहीनों से जुड़े मामलों की समीक्षा की है। बताया जा रहा है कि उन्होंने अंचल अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे अपने-अपने क्षेत्रों में वास्तविक स्थिति का सर्वेक्षण कर यह सुनिश्चित करें कि कोई भी गलत जानकारी सरकार तक न पहुंचे। साथ ही अंचल अधिकारियों को यह भी स्पष्ट रूप से बताने को कहा गया है कि उनके क्षेत्र में कोई आवासीय भूमिहीन परिवार बचा है या नहीं।
सरकार की दृष्टि से देखें तो यह निर्देश पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने का प्रयास माना जा सकता है। यदि किसी क्षेत्र में वास्तव में भूमिहीन परिवार हैं तो उनकी पहचान कर उन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाना प्रशासन की जिम्मेदारी है। वहीं यदि गलत आंकड़े प्रस्तुत किए जाते हैं तो इससे नीति निर्माण प्रभावित हो सकता है। इसलिए सरकार जमीनी स्तर पर सत्यापन की प्रक्रिया को मजबूत करना चाहती है।
लेकिन एकता परिषद के वरिष्ठ कार्यकर्ता विजय गोरैया इस पूरे घटनाक्रम को अलग नजरिए से देखते हैं। उनका आरोप है कि यह आदेश आवासीय भूमिहीनों के खिलाफ एक गहरी साजिश का हिस्सा हो सकता है। उनका कहना है कि जब पहले से ही संगठन द्वारा व्यापक सर्वेक्षण कर भूमिहीन परिवारों की सूची प्रशासन को सौंपी जा चुकी है, तब यह कहना कि किसी अंचल में एक भी भूमिहीन नहीं है, वास्तविक स्थिति को छिपाने का प्रयास हो सकता है। उन्होंने संगठन के कार्यकर्ताओं से अपील की है कि वे पहले दिए गए आवेदनों और सर्वेक्षण रिपोर्टों को फिर से अंचल अधिकारियों तथा मंत्री तक पहुंचाएं और अपने क्षेत्रों के भूमिहीन परिवारों की अद्यतन जानकारी लिखित रूप में भेजें।
बिहार में आवासीय भूमिहीनों की वास्तविक संख्या को लेकर अलग-अलग आंकड़े सामने आते रहे हैं। आधिकारिक सरकारी आंकड़ों के अनुसार प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण की प्रतीक्षा सूची में लगभग 20 हजार से अधिक ऐसे परिवार चिन्हित किए गए हैं जिनके पास रहने के लिए अपना घर नहीं है। हालांकि सामाजिक संगठनों और गैर-सरकारी सर्वेक्षणों का मानना है कि वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक हो सकती है। कई परिवार ऐसे हैं जो विभिन्न कारणों से सरकारी सूची में शामिल नहीं हो पाते और योजनाओं के लाभ से वंचित रह जाते हैं।राज्य सरकार ने इस समस्या के समाधान के लिए कई योजनाएं लागू की हैं। मुख्यमंत्री वास स्थल क्रय सहायता योजना उनमें प्रमुख है। इस योजना के तहत भूमिहीन और वास-स्थल विहीन परिवारों को जमीन खरीदने के लिए आर्थिक सहायता प्रदान की जाती है। पहले यह सहायता राशि 60 हजार रुपये थी, जिसे बढ़ाकर अब एक लाख रुपये प्रति लाभार्थी कर दिया गया है। इसके अलावा जिन क्षेत्रों में सरकारी भूमि उपलब्ध है, वहां राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग द्वारा भूमि बंदोबस्ती और पर्चा वितरण की प्रक्रिया भी चलाई जाती है।
फिर भी सवाल यह है कि यदि योजनाएं मौजूद हैं तो हजारों परिवार आज भी भूमि और आवास से वंचित क्यों हैं?इसका उत्तर प्रशासनिक प्रक्रियाओं की जटिलता, जमीन की उपलब्धता, सर्वेक्षण की खामियों और स्थानीय स्तर पर होने वाली देरी में छिपा हुआ है। कई बार पात्र परिवारों का नाम सूची में नहीं जुड़ पाता, तो कई बार कागजी प्रक्रिया इतनी लंबी हो जाती है कि लोग वर्षों तक इंतजार करते रहते हैं।
आज जरूरत आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़कर वास्तविक समाधान खोजने की है। सरकार, प्रशासन और सामाजिक संगठनों को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि कोई भी परिवार केवल इसलिए बेघर न रहे क्योंकि उसका नाम किसी सूची में नहीं है या उसका आवेदन किसी कार्यालय की फाइलों में दबा पड़ा है।
भूमिहीनों का सवाल केवल एक सरकारी योजना का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और संवैधानिक अधिकार का प्रश्न है। यदि बिहार को समावेशी विकास की दिशा में आगे बढ़ना है तो हर परिवार को रहने के लिए सुरक्षित जमीन और सम्मानजनक आवास उपलब्ध कराना होगा। यही किसी भी कल्याणकारी राज्य की सबसे बड़ी पहचान होती है।
आलोक कुमार
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