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India : आवाज अक्सर इन संस्थाओं के माध्यम से सामने आती है

 


कानूनी शिकंजे के साए में सिमटते एनजीओ: क्या एफआईआर के डर से सामाजिक सरोकार पीछे छूट रहे हैं?

क्या सामाजिक काम करने वाला संगठन अब किसी कार्यक्रम से पहले यह सोचने को मजबूर है कि उसकी गतिविधि कहीं कानूनी विवाद का कारण तो नहीं बन जाएगी? अगर ऐसा डर बढ़ रहा है, तो इसका असर केवल एनजीओ पर नहीं, बल्कि समाज के उन लोगों पर भी पड़ सकता है जिनकी आवाज अक्सर इन संस्थाओं के माध्यम से सामने आती है।

गैर-सरकारी संगठन यानी एनजीओ लंबे समय से समाज के विभिन्न क्षेत्रों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सशक्तीकरण, बाल अधिकार, ग्रामीण विकास, पर्यावरण, रोजगार, साक्षरता और सामाजिक जागरूकता जैसे क्षेत्रों में अनेक संस्थाएं सरकार और आम नागरिकों के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी का काम करती हैं।

लेकिन पिछले कुछ समय से सामाजिक क्षेत्र में यह सवाल चर्चा का विषय बनता रहा है कि क्या कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रियाओं का बढ़ता दबाव कुछ संगठनों की सार्वजनिक गतिविधियों को प्रभावित कर रहा है? क्या किसी कार्यक्रम, अभियान या सार्वजनिक वक्तव्य को लेकर एफआईआर या जांच की आशंका सामाजिक संस्थाओं को अपने कदम पीछे खींचने के लिए मजबूर कर सकती है?

इस सवाल को समझने के लिए भावनाओं के बजाय संतुलित दृष्टिकोण जरूरी है।

साक्षरता दिवस और विनोबा जयंती का संदेश

8 सितंबर को अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस मनाया जाता है। इसका उद्देश्य शिक्षा और साक्षरता के महत्व के प्रति समाज में जागरूकता बढ़ाना है। ग्रामीण और वंचित समुदायों के बीच शिक्षा को लेकर काम करने वाले संगठनों के लिए यह दिन जनजागरूकता का अवसर बन सकता है।

इसी तरह 11 सितंबर को आचार्य विनोबा भावे की जयंती मनाई जाती है। भूदान आंदोलन, ग्राम स्वराज, अहिंसा और सामाजिक समरसता से जुड़े उनके विचार आज भी सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं।

ऐसे अवसरों पर एनजीओ जागरूकता कार्यक्रम, शिक्षा शिविर, विचार गोष्ठी, बच्चों के लिए गतिविधियां और ग्रामीण संवाद आयोजित कर सकते हैं। लेकिन किसी संस्था का इन अवसरों पर कार्यक्रम नहीं करना अपने आप में इस बात का प्रमाण नहीं है कि वह कानूनी कार्रवाई से डर रही है।

किसी संगठन की प्राथमिकताएं उसके उद्देश्य, बजट, कर्मचारियों और कार्यक्षेत्र के आधार पर अलग-अलग हो सकती हैं।

हर चुप्पी को डर से जोड़ना सही नहीं

यह समझना जरूरी है कि कोई सामान्य कानूनी नियम एनजीओ को साक्षरता दिवस या विनोबा भावे की जयंती मनाने के लिए बाध्य नहीं करता। इसलिए किसी संस्था द्वारा कार्यक्रम नहीं करने को सीधे एफआईआर के भय से जोड़ना उचित निष्कर्ष नहीं होगा।

कई छोटे संगठन सीमित संसाधनों के कारण बड़े सार्वजनिक कार्यक्रम आयोजित नहीं कर पाते। कुछ संस्थाएं केवल शिक्षा, स्वास्थ्य या किसी विशेष सामाजिक मुद्दे पर काम करती हैं। कुछ का कार्यक्षेत्र इतना सीमित होता है कि वे राष्ट्रीय या अंतर्राष्ट्रीय दिवसों पर अलग कार्यक्रम आयोजित करने के बजाय अपनी नियमित गतिविधियों को ही प्राथमिकता देती हैं।

इसलिए सामाजिक संगठनों की निष्क्रियता के हर उदाहरण के पीछे कानूनी भय को कारण मानना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा।

लेकिन कानूनी दबाव की चिंता को नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता

दूसरी तरफ यह भी सच है कि एनजीओ को अनेक कानूनी और प्रशासनिक नियमों का पालन करना पड़ता है। वित्तीय रिकॉर्ड, ऑडिट, रिपोर्टिंग, आय-व्यय का हिसाब, पंजीकरण और जहां लागू हो वहां विदेशी अंशदान से जुड़े नियमों का पालन करना संस्था की जिम्मेदारी है।

विशेष रूप से विदेशी स्रोतों से धन प्राप्त करने वाले संगठनों के लिए एफसीआरए यानी Foreign Contribution Regulation Act के तहत निर्धारित नियमों का पालन आवश्यक है। नियमों का उल्लंघन होने पर जांच या कानूनी कार्रवाई होना व्यवस्था का हिस्सा है।

समस्या तब पैदा हो सकती है जब नियमों की जटिलता और कार्रवाई की आशंका ईमानदारी से काम करने वाले छोटे संगठनों में भी इतनी अधिक चिंता पैदा कर दे कि वे सार्वजनिक गतिविधियों से दूरी बनाने लगें।

यहां कानून और भय के बीच अंतर करना जरूरी है।

जवाबदेही जरूरी, लेकिन डर का माहौल नहीं

एनजीओ को जवाबदेही से मुक्त नहीं रखा जा सकता। यदि किसी संस्था में वित्तीय अनियमितता है, धन का दुरुपयोग होता है या कानून का उल्लंघन किया जाता है, तो जांच और कार्रवाई होनी चाहिए।

लेकिन दूसरी तरफ केवल इसलिए सामाजिक गतिविधियों को संदेह की नजर से नहीं देखा जाना चाहिए कि कोई संस्था सरकार की किसी नीति पर सवाल उठा रही है या किसी सामाजिक समस्या को सार्वजनिक मंच पर उठा रही है।

लोकतंत्र में सवाल पूछना और सामाजिक समस्याओं पर संवाद करना नागरिक समाज की महत्वपूर्ण भूमिका है। कानून का उद्देश्य अनियमितताओं को रोकना होना चाहिए, न कि वैध सामाजिक गतिविधियों को हतोत्साहित करना।

एफआईआर का डर कितना प्रभाव डाल सकता है?

एफआईआर स्वयं दोष सिद्ध होने का प्रमाण नहीं होती। किसी शिकायत या आरोप के बाद कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ती है और संबंधित पक्ष को अपना पक्ष रखने का अधिकार होता है।

फिर भी छोटे सामाजिक संगठनों के लिए किसी कानूनी विवाद का सामना करना आसान नहीं होता। सीमित आर्थिक संसाधन, कानूनी सलाह की कमी और प्रशासनिक प्रक्रियाओं की जटिलता उनके लिए अतिरिक्त दबाव पैदा कर सकती है।

यदि किसी सामाजिक कार्यकर्ता को लगे कि सार्वजनिक कार्यक्रम आयोजित करने, लोगों को जागरूक करने या किसी स्थानीय समस्या को उठाने से अनावश्यक विवाद पैदा हो सकता है, तो वह स्वाभाविक रूप से सावधानी बरत सकता है।

यही वह बिंदु है जहां सामाजिक क्षेत्र में विश्वास का वातावरण महत्वपूर्ण हो जाता है।

एनजीओ समाज और सरकार के बीच सेतु

एनजीओ की भूमिका सरकार का विकल्प बनना नहीं है। लेकिन वे उन इलाकों और समुदायों तक पहुंच सकते हैं जहां सरकारी योजनाओं की जानकारी या सेवाएं पूरी तरह नहीं पहुंच पातीं।

एक अच्छा सामाजिक संगठन लोगों को उनके अधिकारों और सरकारी योजनाओं की जानकारी देता है, शिक्षा को बढ़ावा देता है और स्थानीय समस्याओं को सामने लाता है। कई बार यही संस्थाएं प्रशासन और जनता के बीच संवाद का माध्यम भी बनती हैं।

यदि ऐसे संगठनों में लगातार भय का वातावरण पैदा हो, तो इसका असर उनके काम की गति पर पड़ सकता है। इसका नुकसान अंततः गरीब, अशिक्षित, ग्रामीण और वंचित समुदायों को हो सकता है।

जरूरत है भरोसे और पारदर्शिता की

समाधान न तो एनजीओ को कानून से ऊपर रखने में है और न ही हर सामाजिक गतिविधि को संदेह की नजर से देखने में।

जरूरत इस बात की है कि सामाजिक संस्थाओं के लिए नियम स्पष्ट हों, अनुपालन की प्रक्रिया सरल और पारदर्शी हो तथा गलती और जानबूझकर किए गए उल्लंघन के बीच अंतर किया जाए। संस्थाओं को भी अपने वित्तीय रिकॉर्ड, गतिविधियों और प्रशासनिक प्रक्रियाओं में पूरी पारदर्शिता रखनी चाहिए।

सरकार और प्रशासन की ओर से भी यह संदेश स्पष्ट होना चाहिए कि कानून का पालन कराने और वैध सामाजिक गतिविधियों को प्रोत्साहित करने के बीच संतुलन कायम रखा जाएगा।

सामाजिक सरोकार पीछे नहीं छूटने चाहिए

साक्षरता दिवस हो या विनोबा भावे की जयंती—ऐसे अवसर समाज को शिक्षा, समानता, ग्राम विकास और सामाजिक जिम्मेदारी पर सोचने का मौका देते हैं। एनजीओ इन विषयों पर महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं, लेकिन उनकी भूमिका तभी प्रभावी होगी जब कानून और नागरिक समाज के बीच भरोसा बना रहे।

सवाल इसलिए केवल यह नहीं है कि एनजीओ कार्यक्रम क्यों नहीं कर रहे। असली सवाल यह है कि क्या सामाजिक संस्थाओं को नियमों का पालन करते हुए भी निर्भय होकर जनहित के मुद्दे उठाने का पर्याप्त अवसर मिल रहा है?

कानून जरूरी है, पारदर्शिता जरूरी है और जवाबदेही भी जरूरी है। लेकिन सामाजिक सरोकारों के लिए विश्वास, संवाद और जिम्मेदार स्वतंत्रता भी उतनी ही आवश्यक है। यदि डर सामाजिक पहल पर हावी हो गया, तो कमजोर आवाजों को सामने लाने वाला एक महत्वपूर्ण माध्यम धीरे-धीरे कमजोर पड़ सकता है।


आलोक कुमार

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