एक समर्पित, शांत और सेवाभावी व्यक्ति थे जोसेफ फ्रांसिस
युवावस्था से ही जोसेफ फ्रांसिस सामाजिक और धार्मिक गतिविधियों में सक्रिय रहे
पटना के सामाजिक और धार्मिक जीवन में कुछ ऐसे व्यक्तित्व होते हैं, जो किसी पद, पहचान या नाम के मोहताज नहीं होते। ऐसे ही एक समर्पित, शांत और सेवाभावी व्यक्ति थे जोसेफ फ्रांसिस। उनका जीवन इस बात का प्रमाण था कि सच्ची सेवा और निष्ठा के लिए किसी विशेष मंच या प्रचार की आवश्यकता नहीं होती। उन्होंने अपने कर्म, व्यवहार और त्याग से जो पहचान बनाई, वह उन्हें एक विशिष्ट स्थान प्रदान करती है।युवावस्था से ही जोसेफ फ्रांसिस सामाजिक और धार्मिक गतिविधियों में सक्रिय रहे। वे संत मेरी स्कूल में क्रिसमस मिलन समारोह का आयोजन करते थे। यह आयोजन केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि समुदाय को जोड़ने और आपसी प्रेम व भाईचारे को बढ़ाने का माध्यम होता था। उनके नेतृत्व में ये कार्यक्रम अनुशासन, सादगी और समर्पण का उदाहरण बनते थे।
पटना के बांकीपुर क्षेत्र में ईसाई समुदाय के लिए बनी पैरिश थ्रिफ्ट एवं क्रेडिट सोसाइटी में उन्होंने पदेन सचिव के रूप में अपनी जिम्मेदारी निभाई। यह संस्था आर्थिक रूप से कमजोर लोगों की सहायता के लिए कार्य करती थी। जोसेफ फ्रांसिस ने यहां भी पूरी ईमानदारी और पारदर्शिता के साथ सेवा दी। उनका उद्देश्य केवल प्रशासनिक कार्य करना नहीं था, बल्कि जरूरतमंदों की मदद करना और उन्हें आत्मनिर्भर बनाना था।
उनका जुड़ाव संत विंसेंट डी पौल सोसाइटी से भी रहा। जब यह सोसाइटी कोलकाता से पटना आई, तब उन्होंने कुर्जी कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष के रूप में नेतृत्व किया। इसके बाद वे पटना पार्टिकुलर काउंसिल और पटना सेंट्रल काउंसिल के अध्यक्ष बने। उनकी कार्यशैली इतनी प्रभावशाली थी कि उन्हें नेशनल काउंसिल का सदस्य भी बनाया गया। यह उनकी योग्यता, नेतृत्व क्षमता और सेवा भावना का प्रमाण है।जोसेफ फ्रांसिस कैथोलिक रिलीफ सर्विसेज (सीआरएस) पटना में भी कार्यरत थे। यह संस्था गरीबों और जरूरतमंदों के लिए राहत कार्य करती है। यहां उन्होंने पूरी निष्ठा से काम किया, लेकिन परिस्थितियों ने एक कठिन मोड़ ले लिया। जेसुइट फादर रॉबर्ट डानहु के निधन के बाद, जब ब्रदर बर्नड सिंह अध्यक्ष बने, तो उनके कार्यकाल में सीआरएस को बंद कर दिया गया।
इस दौरान जोसेफ फ्रांसिस एक कठिन परिस्थिति में आ गए। वे अपनी नौकरी छोड़ना नहीं चाहते थे, लेकिन उन पर घरेलू जांच की प्रक्रिया चलाने की बात कही गई। अपनी बेदाग छवि को बनाए रखने के लिए उन्होंने इस्तीफा देना ही उचित समझा। यह निर्णय उनके आत्मसम्मान और नैतिकता को दर्शाता है। आर्थिक संकट के बावजूद उन्होंने कभी भी कटु शब्दों का प्रयोग नहीं किया। उन्होंने हर परिस्थिति को धैर्य और विश्वास के साथ स्वीकार किया।
उनका पारिवारिक जीवन भी धार्मिक और सेवाभाव से प्रेरित था। उनके एक पुत्र नेपाल में जेसुइट ब्रदर हैं और एक संतान सिस्टर के रूप में सेवा कर रही हैं। उनकी एक बेटी संत जेवियर हाई स्कूल में शिक्षिका थीं। हालांकि, उनके परिवार को भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, जब उनकी बेटी को एक साजिश के तहत गिरफ्तार करा दिया गया। यह घटना किसी भी परिवार को तोड़ सकती थी, लेकिन जोसेफ फ्रांसिस ने इसे भी धैर्य और विश्वास के साथ सहन किया।उन्होंने अपने जीवन की हर पीड़ा और संघर्ष को प्रभु येसु ख्रीस्त को समर्पित कर दिया। उन्होंने कभी किसी के प्रति शिकायत या आरोप नहीं लगाया। उनका यह विश्वास और धैर्य उन्हें एक आध्यात्मिक ऊंचाई प्रदान करता है।
जीवन के अंतिम दिनों में वे बीमार पड़े, लेकिन एक बार स्वस्थ भी हुए। अंततः लंबी बीमारी के बाद शनिवार को उनका निधन हो गया। उनके निधन की खबर से पूरे समुदाय में शोक की लहर दौड़ गई। वे केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक संस्था के समान थे, जिनकी कमी लंबे समय तक महसूस की जाएगी।
उनकी अंतिम विदाई की तैयारियां भी पूरे सम्मान के साथ की जा रही हैं। राजन क्लेमेंट साह ने जानकारी दी कि 4 मई को दोपहर 3 बजे प्रेरितों की रानी ईश मंदिर में पवित्र मिस्सा अर्पित किया जाएगा। इसके बाद उनका अंतिम संस्कार कुर्जी कब्रिस्तान में किया जाएगा। फिलहाल उनका पार्थिव शरीर कुर्जी मोहल्ला में दर्शनार्थ रखा गया है, जहां लोग उन्हें अंतिम श्रद्धांजलि देने पहुंच रहे हैं।
जोसेफ फ्रांसिस का जीवन हमें सिखाता है कि सच्ची महानता पद या प्रसिद्धि में नहीं, बल्कि सेवा, त्याग और विश्वास में होती है। उन्होंने अपने जीवन से यह सिद्ध किया कि कठिन परिस्थितियों में भी संयम और आस्था बनाए रखना ही सबसे बड़ी शक्ति है। वे भले ही इस दुनिया से चले गए हों, लेकिन उनके आदर्श और उनके कार्य सदैव लोगों के दिलों में जीवित रहेंगे।
आलोक कुमार

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