रविवार, 26 अक्टूबर 2025

“खरना” छठ महापर्व का दूसरा और अत्यंत पवित्र दिन

 पटना.“खरना” छठ महापर्व का दूसरा और अत्यंत पवित्र दिन आस्था का आलोक : जब घर-आंगन में उतरता है ‘खरना’ का उजासरविवार की सांझ है.आसमान पर हल्की केसरिया आभा फैली हुई है.दिनभर की भागदौड़, बाजार की रौनक, घाटों की तैयारियां और घरों में उत्साह की हलचल—सब कुछ एक अदृश्य आस्था की डोर से बंधा प्रतीत होता है. आज खरना है—छठ महापर्व का दूसरा दिन. वही दिन जब सूर्यास्त के साथ व्रती अपने निर्जला व्रत की शुरुआत करती हैं.

     मैं खड़ा हूँ पटना के दीघा घाट की ओर जाने वाली एक गली में. हर घर से धुएँ की


पतली लकीरें उठ रही हैं.धूप, कपूर, अरवा चावल और गुड़ की सुगंध से पूरा वातावरण आध्यात्मिक हो उठा है. लगता है जैसे पूरा शहर श्रद्धा में डूब गया हो—हर चेहरा, हर दीया, हर अर्घ्य पात्र सूर्यदेव की प्रतीक्षा में शांत और विनम्र है. खरना : आस्था का अनुशासन, शुद्धता का पर्वछठ महापर्व के चार दिन होते हैं—नहाय-खाय, खरना, संध्या अर्घ्य और उषा अर्घ्य.खरना इन चारों में सबसे संयमित और अनुशासित दिन है. यह दिन भक्ति की शुरुआत नहीं, बल्कि भक्ति के परिपक्व रूप का उद्घोष है. व्रती सुबह से जल भी ग्रहण नहीं करते.पूरे दिन बिना अन्न-जल के रहते हैं और संध्या बेला में शुद्ध प्रसाद—गुड़ की खीर, रोटी और केला—से पूजा करते हैं.

   लेकिन ‘खरना’ सिर्फ व्रत का नियम नहीं है; यह मन की शुद्धि का विधान है.यह वह क्षण है जब व्यक्ति अपने भीतर की अशुद्धियों को त्याग कर आत्मा के स्वच्छ जल में स्नान करता है. सूर्य अस्त होते हैं, पर भीतर एक नया सूरज उगता है—आत्मबल का, धैर्य का, समर्पण का.आंखों देखी दृश्यावली : एक संध्या का साक्षात्कारघड़ी में शाम के पाँच बजे हैं.व्रती महिलाएँ पीत वस्त्र धारण कर चुकी हैं. कुछ के माथे पर सिंदूर की लकीर मांग के पार तक खिंची हुई है.रसोई में तांबे की हांडी में दूध उबल रहा है.उस पर रखी है काठ की कलछी—जो हल्की भाप से चमक रही है.

रसोई में प्रवेश करने वाला कोई भी व्यक्ति जूता-चप्पल बाहर ही उतार देता है. यह रसोई अब पूजा स्थल है.एक ओर लकड़ी की आंच पर चावल पक रहा है—अरवा चावल, जो बिना नमक और बिना मसाले के.दूसरी ओर गुड़ की खीर बन रही है—कद्दू की मिठास और दूध की गाढ़ी लहरों से भरी.कहीं- कहीं केले के पत्तों पर प्रसाद रखा जा रहा है, तो कहीं मिट्टी के चूल्हे पर अंतिम आंच में चपाती सेंकी जा रही है—रोटी नहीं, “ठेकुआ” की तरह गोल, परंतु स्वाद में साधना से भरी.बाहर आंगन में बच्चे दीये सजा रहे हैं.एक बुजुर्ग महिला धूपबत्ती में आग लगाते हुए कहती हैं—“खरना के रात अइसन होखेला जइसे धरती पे सुरज के किरन उतर आइल हो.”

उनके शब्दों में जो चमक है, वह किसी ग्रंथ की पवित्रता से कम नहीं.सूर्यदेव की प्रतीक्षा : अस्त होते सूरज की ओर निहारती आंखेंसंध्या करीब आती है.घरों की छतों से लोग पश्चिम की ओर निहारने लगते हैं.गंगा किनारे व्रती अपने थाल सजाकर बैठी हैं.पीत वस्त्रों में, माथे पर हल्का चंदन और हाथों में दूध का अर्घ्य.अस्ताचलगामी सूर्य जैसे धरती से विदा नहीं ले रहा, बल्कि व्रती के आस्था के दीप में स्वयं समा रहा है.

   अर्घ्य देते वक्त वह दृश्य अवर्णनीय होता है—

जब व्रती के नेत्रों में गंगा का जल झिलमिलाता है और होंठों पर एक ही प्रार्थना होती है:

 “सूर्यदेव, हमारे घर-आंगन में शांति, सुख और स्वच्छता बनी रहे.”

   उस क्षण लगता है जैसे मनुष्य और प्रकृति के बीच कोई संवाद पुनः स्थापित हो गया हो.

गंगा की लहरें धीमे-धीमे उस संवाद की लय पर नाच उठती हैं.प्रसाद : स्वाद से अधिक भावनाखरना का प्रसाद—गुड़ की खीर, रोटी और केला—साधारण दिखता है, पर इसका अर्थ असाधारण है.

इसमें स्वाद नहीं, तप है; मिठास नहीं, समर्पण है.

जब प्रसाद बनता है, तब घर का हर सदस्य अपनी सांस रोक लेता है कि कोई अशुद्धि न हो जाए.

इस दौरान बोलचाल भी धीमी हो जाती है, जैसे किसी मंदिर में मौन साधना चल रही हो.

   रात के आठ बजे व्रती पूजा संपन्न कर प्रसाद ग्रहण करती हैं.पहला निवाला सूर्यदेव को अर्पित होता है, दूसरा जल को, और तीसरा—वह स्वयं ग्रहण करती हैं.

यह पहला अन्न का कौर उस व्रत का आरंभ है जो अगले दो दिनों तक निरंतर चलेगा—बिना जल, बिना अन्न.

    इसके बाद यही प्रसाद परिवार और पड़ोस में बांटा जाता है.बच्चे दौड़ते हैं, महिलाएँ ‘जय छठी मइया’ का जयघोष करती हैं, और पूरा मोहल्ला प्रसाद की मिठास में डूब जाता है.यह बाँटने का भाव ही तो छठ की आत्मा है—अपने सुख को दूसरों के साथ साझा करने का अनुष्ठान.रात का उजास : जब दीपों में बहती है श्रद्धा की नदिया रात उतर आई है.दीघा, सोनपुर, आरा, समस्तीपुर—हर जगह से एक जैसी झिलमिलाहट उठती है.घरों की छतों पर दीपों की कतारें हैं.गंगा के घाट पर जलते दीप जैसे तारों की परछाई बन गए हों.

  हवा में लोबान की खुशबू है, और आसमान में चांदनी का कोमल प्रकाश.हर किसी के मन में संतोष है कि व्रत का सबसे कठिन दिन सफलतापूर्वक पूरा हुआ.कुछ महिलाएँ अपने बच्चों के माथे पर हाथ रखती हैं और कहती हैं—“छठी मइया सबके घर सुख-शांति देइथु।”इन शब्दों में न आडंबर है, न आग्रह—बस आस्था की सादगी है. सांस्कृतिक अर्थ : खरना का सामाजिक विज्ञानखरना केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक अनुशासन का प्रतीक है.

यह दिन हमें सिखाता है कि शुद्धता केवल बाहरी नहीं, भीतर की भी होती है.

जब हम प्रसाद बनाते समय अपने विचारों को संयमित रखते हैं, तब वह क्रिया ध्यान बन जाती है.यह व्रत हमें सिखाता है—संतुलन: भूख और संयम का समन्वय.समानता: हर घर में एक जैसा प्रसाद, एक जैसी थाली, एक जैसी प्रार्थना.साझेदारी: प्रसाद का वितरण सामाजिक एकता की मिसाल है.खरना का प्रसाद हर जाति, वर्ग और धर्म के लोगों में बाँटा जाता है.यह वह क्षण होता है जब समाज के कृत्रिम विभाजन मिट जाते हैं.हर किसी के हाथ में वही खीर, वही रोटी—और वही आशीर्वाद. प्रकृति के साथ संवाद : छठ का पर्यावरणीय संदेशआज जब दुनिया पर्यावरण संकट से जूझ रही है, छठ का खरना हमें बताता है कि प्रकृति की पूजा ही जीवन की रक्षा है.खरना में मिट्टी के चूल्हे, केले के पत्ते, पीतल या कांसे के बर्तन, और गंगाजल का उपयोग—सब पर्यावरण-संवेदनशील हैं.यह पर्व सिखाता है कि पूजा का अर्थ भव्यता नहीं, बल्कि सामंजस्य है.जब व्रती जल में खड़ी होकर सूर्य को नमन करती है, तब वह केवल देवता को नहीं, बल्कि प्रकृति को धन्यवाद देती है—उस सूर्य को जो ऊर्जा देता है, उस जल को जो जीवन देता है, और उस धरती को जो अन्न देती है.व्यक्तिगत अनुभूति : एक दर्शक की चेतनाखरना की रात में जब मैं घाट से लौट रहा था, गली के मोड़ पर एक बूढ़ी अम्मा मिलीं।

उन्होंने पूछा—“बाबू, अर्घ्य देखलु?”

मैंने कहा—“हां अम्मा, देख लिया।”

वह मुस्कुराईं और बोलीं—

 “देखा ना बाबू, छठी मइया सबके दिल में बसली हैं—करे वाला भी खुश, देखे वाला भी धन्य.”


उनके ये शब्द मुझे भीतर तक छू गए.वाकई, छठ का आकर्षण यही है कि यह केवल व्रती का पर्व नहीं, बल्कि समाज का उत्सव है.

हर व्यक्ति, चाहे वह श्रद्धालु हो या दर्शक, किसी न किसी रूप में इससे जुड़ जाता है.

 सूर्य के प्रतीक में जीवन का दर्शनछठ में सूर्य केवल देवता नहीं, बल्कि जीवन का तार्किक प्रतीक हैं.खरना की बेला में अस्त सूर्य को अर्घ्य देना हमें सिखाता है कि जीवन का हर अंत एक नई शुरुआत है.जैसे सूर्य डूबता है पर लौटता भी है, वैसे ही हर कठिनाई के बाद प्रकाश आता है.यह पर्व धैर्य की शिक्षा देता है—कि अंधेरा चाहे जितना गहरा हो, अगर मन में श्रद्धा का दीप जलता रहे, तो भोर निश्चित है.और खरना वही दीप है—जो रात की शुरुआत में उम्मीद की लौ जलाता है. अंतिम आलोक : जब भक्ति और विज्ञान मिलते हैंखरना में जो संयम है, वह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि शरीर और मन के संतुलन का वैज्ञानिक रूप है.

दिनभर का उपवास शरीर को शुद्ध करता है, और सूर्यास्त के बाद शुद्ध अन्न से ऊर्जा मिलती है.

यह व्रत डिटॉक्सिफिकेशन और मेडिटेशन का पारंपरिक भारतीय संस्करण है.व्रती महिलाएँ जब गंगा में उतरती हैं, तो उनका ध्यान सूर्य पर नहीं, अपने भीतर के आलोक पर होता है.यह आत्म-चिंतन का क्षण है—जहां धर्म और विज्ञान, दोनों एक सूत्र में बंध जाते हैं उपसंहार : खरना की रात, आत्मा की शांतिरात गहराती जा रही है.दीघा घाट की लहरों पर दीप तैर रहे हैं.उनकी लौ कभी थरथराती है, कभी स्थिर हो जाती है.यह लौ, व्रती के हृदय में जलती उस अग्नि का प्रतीक है, जो अगले दो दिन तक अडिग रहेगी.खरना की रात के बाद जब सुबह होती है, तो सूर्य थोड़ा और उजला लगता है.मानो उसने भी व्रती की श्रद्धा से नया तेज पा लिया हो.छठ का खरना हमें याद दिलाता है—

कि आस्था केवल पूजा नहीं, जीवन जीने की शैली है.यह दिन हमें संयम, शुद्धता, अनुशासन और साझेदारी की उस परंपरा से जोड़ता है, जिसने सदियों से भारतीय संस्कृति को जीवित रखा है.आज जब आधुनिकता के शोर में आत्मा की आवाज़ दबने लगी है, तब भी खरना का यह मौन व्रत हमें भीतर झांकने की प्रेरणा देता है।

यह कहता है—“जहाँ शुद्धता है, वहीं देवत्व है; जहाँ संयम है, वहीं सूर्य का प्रकाश है.”

 समापन पंक्तिखरना की इस आंखों देखी रात ने एक बार फिर सिद्ध कर दिया कि

आस्था केवल प्रार्थना नहीं, बल्कि अनुभव है —

और जब अनुभव में प्रेम, अनुशासन और शुद्धता मिल जाती है,

तभी धरती पर सूर्य उतर आता है.


आलोक कुमार

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