घरेलू LPG सिलेंडर की कीमत कई जगह ₹1000 के आसपास
आलोक कुमार
बिहार इस समय एक ऐसी आर्थिक स्थिति से गुजर रहा है, जहाँ आम आदमी पर महंगाई और नीतिगत बदलावों की दोहरी मार साफ दिखाई दे रही है। एक ओर रसोई गैस की बढ़ती कीमतें हैं, तो दूसरी ओर बिजली क्षेत्र में लागू ‘टाइम ऑफ डे’ (ToD) टैरिफ ने घरेलू बजट को नई चुनौती दे दी है। यह स्थिति खासकर गरीब और मध्यम वर्ग के लिए चिंताजनक बन गई है।
सबसे पहले रसोई गैस की बात करें। घरेलू LPG सिलेंडर की कीमत कई जगह ₹1000 के आसपास या उससे ऊपर बनी हुई है। यह स्तर उन परिवारों के लिए भारी पड़ता है, जिनकी मासिक आय सीमित है। पहले प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के तहत मिलने वाली सब्सिडी ने गरीब परिवारों को राहत दी थी, लेकिन अब सब्सिडी का दायरा सीमित होने और कीमतों में उतार-चढ़ाव के कारण यह राहत कम होती दिख रही है। नतीजतन, कई ग्रामीण और निम्न आय वर्ग के परिवार फिर से लकड़ी और कोयले जैसे पारंपरिक ईंधनों की ओर लौटने लगे हैं, जिससे स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों पर प्रतिकूल असर पड़ता है।
अब बात बिजली व्यवस्था की। 1 अप्रैल 2026 से बिहार विद्युत विनियामक आयोग द्वारा लागू ‘टाइम ऑफ डे’ (ToD) टैरिफ का उद्देश्य तकनीकी रूप से सराहनीय है—बिजली की मांग को संतुलित करना और पीक लोड को कम करना। लेकिन व्यवहारिक स्तर पर यह व्यवस्था आम उपभोक्ताओं के लिए चुनौतीपूर्ण साबित हो रही है।
नई प्रणाली के अनुसार दिन के समय बिजली अपेक्षाकृत सस्ती है, जबकि शाम 5 बजे से रात 11 बजे तक—जब अधिकांश लोग घर पर होते हैं—दरें अधिक हैं। यही वह समय है जब घरेलू खपत चरम पर होती है। ऐसे में महंगी दरों का सीधा असर मासिक बिजली बिल पर पड़ रहा है। रात 11 बजे के बाद दरें सामान्य हो जाती हैं, लेकिन उस समय उपयोग सीमित रहता है, जिससे उपभोक्ताओं को अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाता।
इस बदलाव का एक और महत्वपूर्ण पहलू है—स्मार्ट मीटर आधारित बिलिंग और पारंपरिक स्लैब सिस्टम का हटना। तकनीकी रूप से यह पारदर्शिता बढ़ाने की दिशा में कदम है, लेकिन डिजिटल साक्षरता की कमी और प्रणाली की जटिलता के कारण कई उपभोक्ता यह समझ ही नहीं पा रहे कि उनका बिल कैसे तय हो रहा है। इससे असमंजस और असंतोष दोनों बढ़ रहे हैं।
महंगाई की यह दोहरी मार—गैस और बिजली—पहले से बढ़ती खाद्य और ईंधन कीमतों के बीच आम परिवारों के बजट को गंभीर रूप से प्रभावित कर रही है। नतीजतन, लोग अपनी बुनियादी जरूरतों में कटौती करने को मजबूर हो रहे हैं।
हालांकि, कुछ व्यावहारिक उपाय अपनाकर आंशिक राहत मिल सकती है—जैसे भारी बिजली उपकरणों का उपयोग दिन के समय करना, ऊर्जा-कुशल उपकरणों का इस्तेमाल, और गैस की बचत के लिए प्रेशर कुकर या सामूहिक खाना बनाना। लेकिन यह उपाय सीमित प्रभाव वाले हैं और सभी के लिए समान रूप से लागू नहीं हो सकते।
दीर्घकालिक समाधान के लिए नीतिगत हस्तक्षेप अनिवार्य है। गैस सब्सिडी को लक्षित और प्रभावी बनाना, बिजली दरों में कमजोर वर्गों के लिए विशेष राहत देना, और ToD प्रणाली के बारे में व्यापक जन-जागरूकता अभियान चलाना जरूरी है। साथ ही, सौर ऊर्जा जैसे वैकल्पिक स्रोतों को बढ़ावा देना बिहार जैसे राज्य के लिए एक टिकाऊ विकल्प हो सकता है।
अंततः, यह केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक चुनौती भी है। यदि गैस और बिजली जैसी बुनियादी जरूरतें आम आदमी की पहुंच से बाहर होती गईं, तो इसका असर जीवन स्तर, स्वास्थ्य और सामाजिक स्थिरता पर पड़ेगा।इसलिए समय की मांग है कि सरकार, प्रशासन और समाज मिलकर संतुलित और जनहितकारी समाधान खोजें—ताकि विकास का लाभ वास्तव में आम जनता तक पहुँच सके।
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