भाजपा की जमीन तैयार करने वाले खुद नीतीश कुमार?
बिहार की राजनीति के पिछले दो दशकों को अगर ध्यान से देखें, तो एक दिलचस्प और कुछ हद तक विडंबनापूर्ण सच्चाई सामने आती है—Nitish Kumar ने सिर्फ अपनी राजनीति नहीं बनाई, बल्कि अनजाने में Bharatiya Janata Party की बिहार में मजबूत नींव भी रख दी। यह दावा पहली नजर में चौंकाने वाला लग सकता है, लेकिन राजनीतिक घटनाक्रम इसकी पुष्टि करते दिखते हैं।
दो सीटों से सत्ता के केंद्र तक
एक समय था जब बिहार में भाजपा की स्थिति बेहद सीमित थी—
विधानसभा में गिनती की सीटें
सीमित जनाधार
सत्ता से दूरी
लेकिन 2005 के बाद, जब नीतीश कुमार ने सत्ता संभाली और भाजपा के साथ गठबंधन किया, यहीं से कहानी बदलनी शुरू हुई।
गठबंधन: राजनीति से ज्यादा एक प्रयोग
नीतीश कुमार और भाजपा का गठबंधन सिर्फ सरकार बनाने का फार्मूला नहीं था, बल्कि एक दीर्घकालिक राजनीतिक प्रयोग था।
इस गठबंधन से भाजपा को मिला:सत्ता में भागीदारी
प्रशासनिक अनुभव
गांव-गांव तक पहुंच
सामाजिक स्वीकार्यता
नीतीश कुमार के “सुशासन” मॉडल ने एक स्थिर माहौल दिया, जिसमें भाजपा ने अपने संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत किया।
पलटते गठबंधन, लेकिन बढ़ती भाजपा
नीतीश कुमार की राजनीति का सबसे चर्चित पहलू रहा है उनका गठबंधन बदलना:
2015: Rashtriya Janata Dal के साथ महागठबंधन
2017: फिर NDA में वापसी
2022: फिर महागठबंधन
फिर वापसी NDA
लेकिन हर बदलाव में एक चीज कॉमन रही—
भाजपा लगातार मजबूत होती गई।
सत्ता और विपक्ष—दोनों में फायदा
यह भाजपा की रणनीतिक सफलता भी रही:
सत्ता में रहकर: प्रशासनिक पकड़ मजबूत की
विपक्ष में रहकर: संगठन को विस्तार दिया
इस दोहरी रणनीति ने भाजपा को आज बिहार में मुख्य शक्ति बना दिया।
क्या यह राजनीतिक विडंबना है?
आज 2026 में स्थिति यह है कि:
भाजपा खुद मुख्यमंत्री बनाने की स्थिति में है
और यह वही राज्य है, जहां वह कभी हाशिए पर थी
सवाल उठता है:
क्या यह भाजपा की जीत है, या नीतीश कुमार की बनाई जमीन का परिणाम?
नीतीश मॉडल: भाजपा के लिए चुनौती
अगर भाजपा सत्ता में आती है, तो सबसे बड़ी चुनौती होगी:
“सुशासन” की छवि बनाए रखना
रोजगार और उद्योग पर ठोस काम
जातीय संतुलन साधना
नीतीश कुमार ने जिस सामाजिक इंजीनियरिंग को साधा, वही भाजपा के लिए अग्निपरीक्षा बनेगी।
निष्कर्ष: निर्माता या अनजाने में निर्माता?
बिहार की राजनीति का यह सबसे बड़ा सवाल बन चुका है—
क्या Nitish Kumar भाजपा के सहयोगी थे?
या फिर वे अनजाने में उसके सबसे बड़े “राजनीतिक निर्माता” बन गए?
सच्चाई शायद इन दोनों के बीच कहीं है।
लेकिन इतना तय है—
बिहार में भाजपा के उदय की कहानी, नीतीश कुमार के बिना अधूरी है।
आलोक कुमार
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