EPS-95 पेंशनरों का गुस्सा अब फूटने वाला है
बात सीधी है—जब किसी को बार-बार नजरअंदाज किया जाता है, उसकी जायज मांगों को सालों तक टाला जाता है, तो आखिरकार गुस्सा फूटता ही है। और आज यही हाल EPS-95 पेंशनरों का है। “खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे”—यह कहावत आज की स्थिति पर बिल्कुल फिट बैठती है। फर्क सिर्फ इतना है कि यहां कोई बेवजह खंभा नहीं नोच रहा, बल्कि 81 लाख बुजुर्ग अपने हक के लिए आवाज उठा रहे हैं।EPS-95 पेंशनधारकों का आंदोलन कोई नया नहीं है। यह 9-12 साल पुरानी लड़ाई है।नेतृत्व कर रही है EPS-95 National Agitation Committee, और इसके राष्ट्रीय अध्यक्ष Commander Ashok Raut लगातार सरकार से मांग कर रहे हैं—लेकिन नतीजा? लगभग शून्य।
₹1,000 में क्या होता है?
आज के समय में ₹1,000 का मतलब क्या है?
एक हफ्ते की दवा भी नहीं आती
बिजली बिल और राशन तो दूर की बात है
एक बुजुर्ग की बुनियादी जरूरतें भी पूरी नहीं हो सकतीं
फिर भी सरकार कहती है—सब ठीक है!
Employees' Pension Scheme 1995 के तहत मिलने वाली यह पेंशन 2014 से जमी हुई है।
इस बीच महंगाई आसमान छू गई, लेकिन पेंशन वहीं की वहीं।
सवाल सीधा है:
क्या यह “पेंशन” है या “मजाक”?
मांग क्या है—और क्या गलत है?
पेंशनरों की मांग कोई असंभव नहीं है:
₹7,500 न्यूनतम पेंशन + DA
परिवार पेंशन में सुधार
मुफ्त इलाज
और कुछ बुनियादी सुविधाएं
क्या यह ज्यादा है?
क्या यह देश के उन लोगों के लिए गलत है जिन्होंने पूरी जिंदगी काम किया?
जंतर-मंतर से उठी आवाज
मार्च 2026 में दिल्ली के
Jantar Mantar
पर हजारों पेंशनर जुटे।
“करो या मरो” का नारा दिया गया।
यह कोई राजनीतिक रैली नहीं थी—यह उन बुजुर्गों की आवाज थी जो अब थक चुके हैं, लेकिन हार मानने को तैयार नहीं।
समिति भी मान रही—पेंशन कम है
दिलचस्प बात यह है कि
Parliamentary Standing Committee on Labour
ने भी साफ कहा:
₹1,000 पेंशन “अपर्याप्त” है
इसे सम्मानजनक स्तर तक बढ़ाना चाहिए
तो फिर सवाल यह है—
जब समिति मान रही है, जनता मांग रही है, तो सरकार क्यों चुप है?
सरकार की दलील—और सच्चाई
सरकार का तर्क है:
फंड पर दबाव पड़ेगा
भविष्य में समस्या होगी
आर्थिक संतुलन बिगड़ सकता है
यह बात अपनी जगह सही हो सकती है।
लेकिन दूसरी सच्चाई भी है—
जब जरूरत होती है, तो बड़े-बड़े पैकेज निकल आते हैं
लेकिन जब बात पेंशनरों की आती है, तो “फंड की चिंता” शुरू हो जाती है
18 अप्रैल 2026—अंतिम चेतावनी
अब मामला साफ है—
अगर 18 अप्रैल 2026 तक कोई फैसला नहीं हुआ, तो:
देशभर में आंदोलन तेज होगा
EPFO दफ्तरों के बाहर प्रदर्शन होगा
और सरकार पर दबाव कई गुना बढ़ेगा
👉 “धुआं-धुआं कर देंगे”—यह सिर्फ गुस्सा नहीं, बल्कि बेबसी की आवाज है।
असली समस्या क्या है?
यह लड़ाई सिर्फ पैसों की नहीं है—यह सम्मान की लड़ाई है।
एक तरफ सरकार है, जो फंड की चिंता कर रही है
दूसरी तरफ 81 लाख बुजुर्ग हैं, जो अपने जीवन की आखिरी पारी खेल रहे हैं
👉 और इसी बीच समाधान अटका हुआ है
समाधान क्या हो सकता है?
अगर सच में सरकार चाहती है कि मामला शांत हो, तो रास्ता है:
पेंशन को धीरे-धीरे बढ़ाया जाए
मेडिकल सुविधा अलग से दी जाए
फंड में सरकार का योगदान बढ़े
यानी न सरकार पर पूरा बोझ पड़े, न पेंशनर परेशान हों
निष्कर्ष:
अब फैसला जरूरी है
अब समय निकल चुका है “विचार करने” का।
अब जरूरत है “निर्णय लेने” की।
EPS-95 पेंशनरों की मांग कोई अहसान नहीं है—यह उनका हक है।
अगर सरकार अब भी नहीं जागी, तो यह आंदोलन और बड़ा होगा।
और तब “खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे” वाली स्थिति सिर्फ कहावत नहीं, हकीकत बन जाएगी।
आलोक कुमार
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