बयान ने स्वाभाविक रूप से राजनीतिक हलकों में तीखी प्रतिक्रिया पैदा की
आज का प्रसंग सचमुच “गजब” इसलिए लगा क्योंकि इसमें सिर्फ एक एंकर की भावुकता नहीं, बल्कि हमारे समय के मीडिया और राजनीति का पूरा चेहरा झलकता है। अशोक श्रीवास्तव द्वारा लाइव डिबेट में राहुल गांधी को “चप्पल की धूल के कण” से भी छोटा बताना महज एक वाक्य नहीं, बल्कि उस गिरते स्तर का संकेत है जहाँ बहस तर्क से हटकर व्यक्तिगत अपमान में बदल जाती है। इस बयान ने स्वाभाविक रूप से राजनीतिक हलकों में तीखी प्रतिक्रिया पैदा की—कांग्रेस समर्थकों का आक्रोश, विरोध प्रदर्शन और सोशल मीडिया पर उबाल—सब कुछ इस बात का प्रमाण है कि भाषा का प्रभाव कितना व्यापक होता है।
इस पूरे विवाद के केंद्र में एक और बड़ा नाम है—विनायक दामोदर सावरकर। सावरकर भारतीय इतिहास के उन जटिल व्यक्तित्वों में से हैं, जिन्हें एक ही रंग में नहीं देखा जा सकता। एक ओर वे क्रांतिकारी थे, जिन्होंने ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष किया, काला पानी की सजा झेली और कठिन यातनाओं का सामना किया। दूसरी ओर, उनकी “हिंदुत्व” की विचारधारा और ब्रिटिश शासन के दौरान लिखे गए क्षमायाचना पत्र उन्हें विवादों के घेरे में भी रखते हैं। समर्थकों के लिए वे “वीर” हैं, राष्ट्रभक्ति के प्रतीक हैं; आलोचकों के लिए वे समझौतावादी और वैचारिक रूप से विभाजनकारी भी माने जाते हैं। यही द्वंद्व आज भी भारतीय राजनीति और समाज में दिखाई देता है।
ऐसे में जब कोई एंकर सावरकर के पक्ष में बोलते-बोलते इस हद तक भावुक हो जाए कि वह एक प्रमुख विपक्षी नेता का सार्वजनिक अपमान कर बैठे, तो यह सिर्फ व्यक्तिगत गलती नहीं रह जाती। यह उस प्रवृत्ति का हिस्सा बन जाती है, जहाँ मीडिया निष्पक्ष मंच के बजाय विचारधारा का अखाड़ा बनता जा रहा है। विशेष रूप से तब, जब यह मंच दूरदर्शन जैसा सरकारी चैनल हो, जिसकी जिम्मेदारी निजी चैनलों से कहीं अधिक है।दूरदर्शन जनता के टैक्स के पैसे से चलता है। इसका मूल उद्देश्य सूचना देना, शिक्षित करना और संतुलित दृष्टिकोण प्रस्तुत करना है। लेकिन जब इसी मंच पर भाषा का स्तर गिरता है, तो सवाल उठना लाजिमी है—क्या यह वही पत्रकारिता है जिसकी अपेक्षा एक लोकतांत्रिक समाज करता है? अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार जरूर है, लेकिन उसके साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी होती है। खासकर तब, जब आप लाखों दर्शकों के सामने बोल रहे हों।
इस घटना ने एक और महत्वपूर्ण सवाल खड़ा किया है—क्या आज के एंकर सिर्फ “मॉडरेटर” रह गए हैं या खुद “खिलाड़ी” बन गए हैं? पहले पत्रकार का काम था सवाल पूछना, तथ्यों को सामने रखना और बहस को संतुलित रखना। लेकिन आज कई एंकर खुद ही निर्णायक बन बैठते हैं। वे बहस को दिशा देने के बजाय उसे नियंत्रित करते हैं, अपनी राय को अंतिम सत्य की तरह पेश करते हैं और विरोधी विचारों को दबाने की कोशिश करते हैं। इससे दर्शक को निष्पक्ष जानकारी नहीं, बल्कि एक पक्षीय दृष्टिकोण मिलता है।
यहाँ यह भी समझना जरूरी है कि आलोचना और अपमान में फर्क होता है। राहुल गांधी की नीतियों, बयानों या राजनीतिक रणनीतियों पर सवाल उठाना पूरी तरह वैध है। वे एक बड़े राजनीतिक दल के नेता हैं और लोकतंत्र में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण है। लेकिन उन्हें “चप्पल की धूल” कहना न तो आलोचना है, न ही वैचारिक असहमति—यह सिर्फ व्यक्तिगत हमला है। इससे न तो सावरकर की महानता बढ़ती है और न ही बहस का स्तर ऊँचा होता है।
दूसरी तरफ, सावरकर के आलोचकों को भी आत्ममंथन करना चाहिए। किसी ऐतिहासिक व्यक्तित्व को एक ही पहलू के आधार पर खारिज कर देना भी उचित नहीं। इतिहास बहुआयामी होता है, और उसमें व्यक्तियों के योगदान और विवाद दोनों को समझना जरूरी है। सावरकर के योगदान को पूरी तरह नकारना उतना ही गलत है, जितना उन्हें बिना आलोचना के महिमामंडित करना।
मीडिया के इस ध्रुवीकरण का असर सिर्फ टीवी स्टूडियो तक सीमित नहीं रहता। यह समाज में भी विभाजन को गहरा करता है। दर्शक अपने-अपने “पसंदीदा” चैनल चुन लेते हैं, जहाँ उनकी सोच को ही सही ठहराया जाता है। नतीजा यह होता है कि संवाद की जगह टकराव ले लेता है। जब हर पक्ष खुद को ही सही मानने लगे और दूसरे को पूरी तरह खारिज कर दे, तो लोकतंत्र की बुनियाद कमजोर होने लगती है।
इस संदर्भ में अंतरराष्ट्रीय उदाहरण भी अक्सर दिए जाते हैं, जहाँ मीडिया की भूमिका ने समाज को प्रभावित किया है। हालांकि हर देश का संदर्भ अलग होता है, लेकिन एक बात सार्वभौमिक है—मीडिया अगर जिम्मेदारी से काम न करे, तो उसका असर खतरनाक हो सकता है। इसलिए जरूरी है कि पत्रकारिता को फिर से उसके मूल उद्देश्य की ओर लौटाया जाए—सत्य की खोज और समाज को जागरूक करना।
इस पूरे घटनाक्रम से कुछ स्पष्ट सीख मिलती हैं। पहली, सार्वजनिक मंच पर भाषा की मर्यादा बनाए रखना अनिवार्य है। दूसरी, मीडिया को अपनी निष्पक्षता और विश्वसनीयता को प्राथमिकता देनी चाहिए। तीसरी, दर्शकों को भी सजग होना होगा—वे क्या देख रहे हैं, क्यों देख रहे हैं और उस पर कैसे प्रतिक्रिया दे रहे हैं। लोकतंत्र सिर्फ नेताओं या पत्रकारों से नहीं चलता, बल्कि जागरूक नागरिकों से भी चलता है।
अंततः, यह घटना एक चेतावनी की तरह है। यह बताती है कि अगर बहस का स्तर इसी तरह गिरता रहा, तो हम मुद्दों से भटककर सिर्फ व्यक्तियों पर आ जाएंगे। असहमति लोकतंत्र की ताकत है, लेकिन जब वह असहमति अपमान में बदल जाती है, तो वही ताकत कमजोरी बन जाती है। इसलिए जरूरी है कि सभी पक्ष—मीडिया, राजनीति और जनता—अपनी-अपनी जिम्मेदारी को समझें और संवाद को गरिमा के साथ आगे बढ़ाएं।
आलोक कुमार
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