आर्चबिशप थॉमस डिसूजाअपने 50वें वर्ष यानी स्वर्ण जयंती की ओर अग्रसर हैं। 25 मई 2027 को उनके पुरोहिताभिषेक की 50वीं वर्षगांठ मनाई जाएगी, जिसे कैथोलिक समुदाय और कलकत्ता आर्चडायोसीज़ द्वारा विशेष रूप से मनाए जाने की संभावना है।
इसी धार्मिक विरासत के अंतर्गत Diocese of Mangalore का विशेष महत्व है। यह कर्नाटक का एक प्रमुख लैटिन कैथोलिक धर्मप्रांत है, जो मुख्यतः दक्षिण कन्नड़ जिले को कवर करता है। यह धर्मप्रांत Archdiocese of Bangalore के अधीन आता है और 1953 से बैंगलोर प्रांत का हिस्सा रहा है। इस क्षेत्र ने कई प्रतिष्ठित धार्मिक नेताओं को जन्म दिया है, जिनमें एक प्रमुख नाम है थॉमस डिसूजा।
आर्चबिशप थॉमस डिसूजा का जन्म 26 अगस्त 1950 को मंगलौर में हुआ था। वे किसी विशेष धार्मिक संगठन (Congregation) से जुड़े नहीं थे, बल्कि एक डायोसीज़न पुरोहित के रूप में अपनी सेवा की शुरुआत की। उनकी प्रारंभिक धार्मिक शिक्षा और प्रशिक्षण ने उन्हें एक अनुशासित और समर्पित पादरी के रूप में विकसित किया। उनका पुरोहिताभिषेक 16 अप्रैल 1977 को Darjeeling Diocese में हुआ, जो उनके आध्यात्मिक जीवन की औपचारिक शुरुआत थी।
उन्होंने अपने प्रारंभिक वर्षों में दार्जिलिंग में सेवा की और धीरे-धीरे अपनी नेतृत्व क्षमता के कारण चर्च प्रशासन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने लगे। 1994 से 1997 तक वे दार्जिलिंग डायोसीज़ के प्रशासक रहे। इसके बाद 14 जून 1997 को उन्हें बागडोगरा के बिशप के रूप में नियुक्त किया गया और 25 जनवरी 1998 को उन्होंने यह पद संभाला। यह उनके नेतृत्व का पहला बड़ा चरण था, जहाँ उन्होंने स्थानीय समुदाय के विकास और आध्यात्मिक उन्नति पर विशेष ध्यान दिया।
उनकी योग्यता और समर्पण को देखते हुए 12 मार्च 2011 को उन्हें Archdiocese of Calcutta का कोएडज्यूटर आर्चबिशप नियुक्त किया गया। इसके बाद 23 फरवरी 2012 को उन्होंने कलकत्ता के आर्चबिशप के रूप में पदभार संभाला। लगभग 15 वर्षों तक उन्होंने इस महत्वपूर्ण आर्चडायोसीज़ का नेतृत्व किया और इसे आध्यात्मिक, शैक्षिक और सामाजिक क्षेत्रों में नई दिशा दी।
सितंबर 2025 में, 75 वर्ष की आयु पूरी करने के बाद, उन्होंने वेटिकन के नियमों के अनुसार आर्चबिशप पद से सेवानिवृत्ति ले ली। उनके बाद एलियास फ्रैंक ने कलकत्ता आर्चडायोसीज़ का कार्यभार संभाला। हालांकि सेवानिवृत्ति के बाद भी उनका जीवन सेवा से दूर नहीं हुआ। उन्होंने एक सादगीपूर्ण लेकिन सक्रिय जीवन को चुना और वर्तमान में बारासात स्थित Our Lady of Lourdes Parish में सहायक पैरिश पुजारी के रूप में कार्य कर रहे हैं।
यह परिवर्तन उनके व्यक्तित्व की विनम्रता को दर्शाता है। एक उच्च पद से हटकर साधारण पुजारी के रूप में सेवा करना उनके आध्यात्मिक समर्पण और मानवता के प्रति उनके दृष्टिकोण को उजागर करता है। यहाँ वे प्रतिदिन मिस्सा अर्पित करते हैं, लोगों से मिलते हैं और उन्हें आध्यात्मिक मार्गदर्शन प्रदान करते हैं। यह उनके जीवन के उस चरण को दर्शाता है, जहाँ पद की अपेक्षा सेवा अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है।
आज 2026 में, उनके पुरोहित जीवन के 49 वर्ष पूरे हो चुके हैं। यह एक लंबी और प्रेरणादायक यात्रा है, जो समर्पण, अनुशासन और सेवा के मूल्यों पर आधारित है। अब वे अपने 50वें वर्ष यानी स्वर्ण जयंती की ओर अग्रसर हैं। 25 मई 2027 को उनके पुरोहिताभिषेक की 50वीं वर्षगांठ मनाई जाएगी, जिसे कैथोलिक समुदाय और कलकत्ता आर्चडायोसीज़ द्वारा विशेष रूप से मनाए जाने की संभावना है।
यह स्वर्ण जयंती केवल एक व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि उस आध्यात्मिक यात्रा का उत्सव होगी, जो दार्जिलिंग के एक साधारण पादरी से शुरू होकर कलकत्ता के आर्चबिशप तक पहुँची। यह यात्रा दर्शाती है कि सच्ची सेवा, समर्पण और विनम्रता के साथ व्यक्ति किस प्रकार समाज और धर्म दोनों में गहरा प्रभाव छोड़ सकता है।
समग्र रूप से, आर्चबिशप थॉमस डिसूजा का जीवन एक प्रेरणा है—न केवल धार्मिक समुदाय के लिए, बल्कि उन सभी के लिए जो सेवा, समर्पण और मानवता के मूल्यों में विश्वास रखते हैं।
आलोक कुमार


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