एक कुर्सी, लेकिन दावेदार अनेक
बिहार की राजनीति का इतिहास जितना पुराना है, उतना ही जटिल और बहुस्तरीय भी है। यहां सत्ता की कुर्सी कभी किसी एक व्यक्ति या विचारधारा के पास स्थायी रूप से नहीं रही, बल्कि समय, समाज और परिस्थितियों के साथ बदलती रही है। यही कारण है कि आज बिहार में मुख्यमंत्री की लड़ाई को “हम सब एक पर अनेक” कहना बिल्कुल सटीक प्रतीत होता है—एक कुर्सी, लेकिन दावेदार अनेक।स्वतंत्रता के बाद बिहार के पहले मुख्यमंत्री श्री कृष्ण सिंह ने राज्य की प्रशासनिक और राजनीतिक नींव रखी। उनके बाद दीप नारायण सिंह, बिनोदानंद झा और कृष्ण बल्लभ सहाय जैसे नेताओं ने शासन संभाला। इस दौर में राजनीति अपेक्षाकृत स्थिर थी और वैचारिक टकराव सीमित था, लेकिन धीरे-धीरे सामाजिक परिवर्तन की आहट सुनाई देने लगी।
1960 और 70 के दशक में बिहार की राजनीति ने एक नया मोड़ लिया। महामाया प्रसाद सिन्हा, सतीश प्रसाद सिंह, बी. पी. मंडल और भोला पासवान शास्त्री जैसे नेताओं का उदय हुआ। खासकर मंडल आयोग की सिफारिशों ने भारतीय राजनीति, विशेषकर बिहार की राजनीति को गहराई से प्रभावित किया। इसके बाद राजनीति में जातीय समीकरण निर्णायक भूमिका निभाने लगे।
इसी दौर में कर्पूरी ठाकुर का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा। उन्होंने पिछड़े वर्गों को राजनीतिक मुख्यधारा में लाने का ऐतिहासिक कार्य किया। उनके बाद जगन्नाथ मिश्रा, राम सुंदर दास, चंद्रशेखर सिंह और बिंदेश्वरी दुबे जैसे नेताओं ने सत्ता की बागडोर संभाली।
1990 का दशक बिहार की राजनीति में एक निर्णायक मोड़ लेकर आया, जब लालू प्रसाद यादव सत्ता में आए। उन्होंने सामाजिक न्याय की राजनीति को नई दिशा दी और पिछड़े वर्गों को सशक्त बनाने की कोशिश की। उनके शासन के बाद राबड़ी देवी ने मुख्यमंत्री पद संभाला, जो बिहार की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं। इस दौर में परिवारवाद, सामाजिक समीकरण और सत्ता के नए प्रयोग देखने को मिले।
2005 के बाद नीतीश कुमार का उदय हुआ, जिन्होंने विकास, सुशासन और बुनियादी ढांचे को राजनीति के केंद्र में रखा। उनके नेतृत्व में बिहार ने शिक्षा, सड़क और कानून-व्यवस्था जैसे क्षेत्रों में उल्लेखनीय सुधार देखे। बीच में जीतन राम मांझी भी मुख्यमंत्री बने, जो दलित नेतृत्व के एक महत्वपूर्ण प्रतीक के रूप में उभरे।
वर्तमान समय में, 2025 के बाद की राजनीति और भी अधिक जटिल हो चुकी है। नीतीश कुमार एक बार फिर मुख्यमंत्री हैं, लेकिन उनकी स्थिति पहले जैसी निर्विवाद नहीं रही। अब मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए कई दावेदार खुलकर सामने आ रहे हैं।
भारतीय जनता पार्टी की ओर से सम्राट चौधरी को एक आक्रामक और संगठनात्मक चेहरा माना जा रहा है। वहीं नित्यानंद राय यादव वोट बैंक को साधने की रणनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। सवर्ण मतदाताओं के बीच विजय कुमार सिन्हा की पकड़ मजबूत मानी जाती है, जबकि श्रेयसी सिंह युवा और महिला नेतृत्व के रूप में उभर सकती हैं।
इसी क्रम में रेणु देवी अति पिछड़ा वर्ग का प्रतिनिधित्व करती हैं, जिससे सामाजिक संतुलन साधने में मदद मिल सकती है। अन्य संभावित नामों में डॉ. संजय जायसवाल, संजीव चौरसिया, जनक राम, दिलीप कुमार जायसवाल और मंगल पांडे शामिल हैं। ये सभी नेता अलग-अलग सामाजिक और जातीय वर्गों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिससे स्पष्ट होता है कि भाजपा किसी एक चेहरे पर नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक समीकरण पर दांव खेल रही है।दूसरी ओर, जदयू के भीतर भी नेतृत्व को लेकर हलचल है। निशांत कुमार का नाम पारिवारिक विरासत के आधार पर चर्चा में आता है, हालांकि वे अभी सक्रिय राजनीति में नहीं हैं। वहीं संजय झा को एक संभावित “समझौता उम्मीदवार” के रूप में देखा जा रहा है, जो गठबंधन की राजनीति में संतुलन बना सकते हैं।
इसके अलावा चिराग पासवान और जीतन राम मांझी जैसे नेता भी राजनीतिक समीकरणों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, भले ही वे स्वयं इस दौड़ से दूरी बनाने की बात करते हों।
स्पष्ट है कि बिहार की राजनीति में मुख्यमंत्री की कुर्सी अब केवल एक प्रशासनिक पद नहीं रह गई है, बल्कि यह सामाजिक, जातीय और राजनीतिक संतुलन का प्रतीक बन चुकी है। हर दल और हर नेता इस कुर्सी के माध्यम से अपने-अपने वर्ग को प्रतिनिधित्व देना चाहता है। यही वजह है कि “हम सब एक पर अनेक” की स्थिति उत्पन्न होती है, जहां एक पद के लिए कई दावेदार खड़े हैं।
अंततः, बिहार में मुख्यमंत्री की लड़ाई केवल व्यक्तियों की प्रतिस्पर्धा नहीं है, बल्कि यह विचारधाराओं, सामाजिक न्याय, विकास मॉडल और राजनीतिक रणनीतियों की टकराहट भी है। आने वाले समय में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि इन अनेक दावेदारों में से कौन “एक” बनकर उभरता है और बिहार की राजनीति को नई दिशा देता है।आलोक कुमार
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