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बुधवार, 27 मई 2026

India : पंडित नेहरू का 62वां महाप्रयाण दिवस

 

भारत के इतिहास में 27 मई एक अत्यंत भावुक, ऐतिहासिक और चिंतनशील दिन के रूप में दर्ज है। यह केवल एक तारीख नहीं, बल्कि आधुनिक भारत के निर्माण, लोकतांत्रिक मूल्यों और राष्ट्रीय विकास की उस विरासत की याद दिलाती है, जिसे देश के प्रथम प्रधानमंत्री Jawaharlal Nehru ने अपने दूरदर्शी नेतृत्व से आकार दिया। वर्ष 1964 में इसी दिन पंडित नेहरू का निधन हुआ था और इस वर्ष उनका 62वां महाप्रयाण दिवस मनाया जा रहा है।

27 मई भारतीय राजनीति, समाज और इतिहास के लिए एक ऐसा मोड़ था, जिसने पूरे राष्ट्र को शोक में डुबो दिया। स्वतंत्र भारत के निर्माण में जिस व्यक्ति ने अपने विचार, संघर्ष और नेतृत्व से देश की दिशा तय की, उसके अचानक चले जाने से देश स्वयं को अनाथ महसूस कर रहा था। उस समय रेडियो पर जब यह समाचार प्रसारित हुआ कि पंडित नेहरू अब नहीं रहे, तब गांवों से लेकर महानगरों तक लोगों की आंखें नम हो गई थीं।

नेहरू जी केवल एक प्रधानमंत्री नहीं थे, बल्कि आधुनिक भारत के शिल्पकार थे। उन्होंने ऐसे भारत की कल्पना की थी जो वैज्ञानिक सोच, लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक समानता के रास्ते पर आगे बढ़े। स्वतंत्रता के बाद भारत अनेक चुनौतियों से घिरा हुआ था—गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी, सांप्रदायिक तनाव और आर्थिक कमजोरी। ऐसे कठिन दौर में नेहरू जी ने लोकतंत्र को मजबूत करने का साहसिक निर्णय लिया। दुनिया के कई देशों को यह विश्वास नहीं था कि इतना विशाल और विविधताओं से भरा देश लोकतंत्र को सफलतापूर्वक चला पाएगा, लेकिन नेहरू जी ने भारतीय लोकतंत्र की मजबूत नींव रखी।                            

उन्होंने संसद, न्यायपालिका, चुनाव आयोग और स्वतंत्र प्रेस जैसी संस्थाओं को मजबूती प्रदान की। आज भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहलाता है तो उसकी आधारशिला रखने वालों में नेहरू जी का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है।

पंडित नेहरू विज्ञान और तकनीक को देश के विकास का सबसे बड़ा साधन मानते थे। उन्होंने कहा था कि “विज्ञान ही भविष्य का मार्ग है।” यही कारण था कि उनके कार्यकाल में अनेक राष्ट्रीय संस्थानों की स्थापना हुई। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान यानी IIT, अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान AIIMS, भाखड़ा-नांगल जैसे विशाल बांध, भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र और अंतरिक्ष अनुसंधान की शुरुआती संस्थाएं उनके विजन का परिणाम थीं।

आज भारत जिस वैज्ञानिक और तकनीकी शक्ति के रूप में दुनिया में पहचान बना रहा है, उसकी नींव नेहरू युग में ही रखी गई थी। बड़े बांधों को उन्होंने “आधुनिक भारत के मंदिर” कहा था, क्योंकि वे देश के औद्योगिक और कृषि विकास का आधार बन रहे थे।

विदेश नीति के क्षेत्र में भी नेहरू जी ने भारत को नई पहचान दिलाई। उस समय दुनिया शीतयुद्ध की राजनीति में बंटी हुई थी। एक ओर अमेरिका था तो दूसरी ओर सोवियत संघ। ऐसे दौर में नेहरू जी ने भारत को किसी एक गुट का हिस्सा बनाने के बजाय स्वतंत्र विदेश नीति अपनाई। उन्होंने Non-Aligned Movement यानी गुटनिरपेक्ष आंदोलन की नींव रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसका उद्देश्य था कि भारत अपनी विदेश नीति अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार तय करे और किसी महाशक्ति के दबाव में न आए।

नेहरू जी बच्चों से अत्यधिक प्रेम करते थे। बच्चे उन्हें प्यार से “चाचा नेहरू” कहते थे। उनका मानना था कि देश का भविष्य बच्चों के हाथों में है। यही कारण है कि उनके जन्मदिन 14 नवंबर को भारत में बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है।

27 मई का दिन केवल शोक का अवसर नहीं, बल्कि आत्ममंथन का भी दिन है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि राष्ट्र निर्माण केवल राजनीतिक सत्ता से नहीं होता, बल्कि मजबूत संस्थाओं, वैज्ञानिक सोच, शिक्षा और लोकतांत्रिक मूल्यों से होता है।

आज जब भारत तेजी से बदलती दुनिया में आगे बढ़ रहा है, तब नेहरू जी की कई नीतियां और विचार अब भी प्रासंगिक दिखाई देते हैं। लोकतंत्र की मजबूती, शिक्षा का विस्तार, विज्ञान का विकास और विश्व मंच पर स्वतंत्र पहचान—ये सभी उनके दूरदर्शी नेतृत्व की देन हैं।

हर वर्ष 27 मई को देशभर में विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। दिल्ली स्थित उनकी समाधि “शांतिवन” पर राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और अनेक नेता श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। स्कूलों, कॉलेजों और सामाजिक संस्थाओं में भी उनके योगदान को याद किया जाता है।

इतिहास के झरोखे से देखें तो 27 मई हमें यह संदेश देता है कि महान व्यक्तित्व भले ही शारीरिक रूप से इस दुनिया से चले जाएं, लेकिन उनके विचार और कार्य सदियों तक राष्ट्र का मार्गदर्शन करते रहते हैं। पंडित जवाहरलाल नेहरू का जीवन और उनका योगदान भारत के इतिहास में सदैव अमर रहेगा।


आलोक कुमार


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