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बुधवार, 20 मई 2026

Jharkhand :आदिवासी समाज के भीतर ही मतभेद खुलकर सामने

आदिवासी पहचान जन्म से जुड़ी होती है, धर्म से नहीं

झारखंड की राजनीति और सामाजिक विमर्श में इन दिनों एक बड़ा सवाल चर्चा का विषय बना हुआ है—क्या धर्म परिवर्तन करने के बाद भी कोई व्यक्ति अनुसूचित जनजाति (ST) का लाभ ले सकता है? यह बहस तब और तेज हो गई जब आदिवासी समाज से आने वाली मेघा उरांव ने झारखंड की कृषि मंत्री Shilpi Neha Tirkey के खिलाफ जनहित याचिका दायर कर दी। इस याचिका में मांग की गई है कि यदि कोई व्यक्ति ईसाई धर्म अपना चुका है, तो उसका अनुसूचित जनजाति का जाति प्रमाण पत्र रद्द किया जाना चाहिए।

यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि इसमें आदिवासी समाज के भीतर ही मतभेद खुलकर सामने आ रहे हैं। एक पक्ष मानता है कि धर्म परिवर्तन के बाद व्यक्ति की सामाजिक पहचान बदल जाती है, इसलिए उसे आदिवासी आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए। वहीं दूसरा पक्ष कहता है कि आदिवासी पहचान जन्म से जुड़ी होती है, धर्म से नहीं।

भारत के संविधान में अनुसूचित जनजातियों की पहचान मुख्य रूप से उनकी जनजातीय उत्पत्ति, सामाजिक परंपरा, सांस्कृतिक विशेषताओं और ऐतिहासिक पिछड़ेपन के आधार पर की गई है। संविधान के अनुच्छेद 342 के तहत राष्ट्रपति द्वारा अनुसूचित जनजातियों की सूची अधिसूचित की जाती है। महत्वपूर्ण बात यह है कि अनुसूचित जनजाति के मामले में धर्म को आधार नहीं बनाया गया है।

यही कारण है कि यदि कोई व्यक्ति उरांव, मुंडा, संथाल, हो, खड़िया या किसी अन्य अधिसूचित जनजाति में जन्मा है और बाद में ईसाई धर्म अपना लेता है, तब भी सामान्य रूप से उसकी ST पहचान समाप्त नहीं होती। कानून की मौजूदा व्यवस्था इसी दिशा में संकेत करती है।

यहां अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के बीच अंतर समझना जरूरी है। अनुसूचित जाति के लिए संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 में स्पष्ट प्रावधान है कि केवल हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म के लोग ही SC आरक्षण का लाभ ले सकते हैं। यदि कोई दलित ईसाई या मुस्लिम बन जाता है, तो उसका SC दर्जा समाप्त हो जाता है।

लेकिन ST के लिए ऐसा कोई प्रतिबंध संविधान में नहीं है। यही वजह है कि देशभर में लाखों आदिवासी ईसाई आज भी अनुसूचित जनजाति का लाभ प्राप्त करते हैं। झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा और पूर्वोत्तर राज्यों में यह स्थिति लंबे समय से लागू है।                                                                                    

मेघा उरांव द्वारा दायर जनहित याचिका में कहा गया है कि ईसाई धर्म में जाति व्यवस्था नहीं होती, इसलिए ईसाई बने लोगों को आदिवासी प्रमाण पत्र नहीं मिलना चाहिए। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि मंत्री Shilpi Neha Tirkey ने अपने शपथ पत्र में धर्म के स्थान पर ईसाई तथा जाति के स्थान पर उरांव लिखा है, जो विरोधाभासी है।

याचिका में सुप्रीम कोर्ट के कुछ फैसलों का हवाला भी दिया गया है। विशेष रूप से “सी. सेल्वा रानी बनाम विशेष सचिव सह जिला कलेक्टर” मामले का उल्लेख किया गया है। हालांकि कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि उस फैसले की परिस्थितियां अलग थीं और उसे सीधे ST आरक्षण पर लागू नहीं किया जा सकता।

दरअसल, भारतीय न्यायपालिका कई बार यह स्पष्ट कर चुकी है कि आदिवासी पहचान केवल धार्मिक आस्था से समाप्त नहीं होती। आदिवासी समुदाय की भाषा, संस्कृति, परंपरा, रीति-रिवाज और सामाजिक जीवन उसकी मूल पहचान माने जाते हैं। यदि धर्म परिवर्तन के बाद भी व्यक्ति अपनी जनजातीय संस्कृति और सामाजिक संबंध बनाए रखता है, तो उसकी ST पहचान सामान्य रूप से बनी रहती है।

इस पूरे विवाद में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि Shilpi Neha Tirkey जन्मजात आदिवासी परिवार से आती हैं। वे उरांव जनजाति में पैदा हुई हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार उन्होंने स्वयं धर्म परिवर्तन नहीं किया, बल्कि उनका परिवार पहले से ईसाई धर्म मानता रहा है। इसलिए यह कहना कि उन्होंने धर्मांतरण के बाद ST प्रमाण पत्र लिया, तथ्यात्मक रूप से सही नहीं माना जा रहा।

झारखंड में यह विवाद नया नहीं है। लंबे समय से कुछ आदिवासी संगठन यह मांग करते रहे हैं कि ईसाई धर्म अपनाने वाले लोगों को आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए। उनका तर्क है कि मिशनरी प्रभाव के कारण आदिवासी संस्कृति कमजोर हो रही है और आरक्षण का वास्तविक लाभ पारंपरिक आदिवासियों तक नहीं पहुंच पा रहा।

दूसरी ओर ईसाई आदिवासी समुदाय का कहना है कि धर्म बदलने से उनकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति नहीं बदल जाती। वे आज भी जंगल, जमीन, विस्थापन, गरीबी और सामाजिक उपेक्षा जैसी वही समस्याएं झेलते हैं जो अन्य आदिवासी समुदायों की हैं। इसलिए उन्हें आरक्षण से वंचित करना संविधान की भावना के खिलाफ होगा।

इस विवाद के राजनीतिक मायने भी हैं। झारखंड की राजनीति में आदिवासी और ईसाई समुदाय दोनों महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसे मामलों से राजनीतिक ध्रुवीकरण बढ़ने की संभावना रहती है। कई दल इस मुद्दे को आदिवासी अस्मिता और धार्मिक पहचान से जोड़कर देखते हैं।                    

कानून की वर्तमान स्थिति को देखें तो अभी तक भारत में ऐसा कोई संवैधानिक प्रावधान नहीं है जो ईसाई आदिवासियों से ST का दर्जा छीनता हो। जब तक संसद या सुप्रीम कोर्ट कोई नया स्पष्ट निर्णय नहीं देता, तब तक धर्म परिवर्तन मात्र से अनुसूचित जनजाति का लाभ समाप्त नहीं माना जाएगा।

हालांकि अदालत में दायर इस जनहित याचिका के बाद यह मुद्दा फिर राष्ट्रीय बहस का विषय बन गया है। यदि झारखंड हाईकोर्ट इस मामले में कोई महत्वपूर्ण टिप्पणी करता है, तो उसका असर पूरे देश की आदिवासी राजनीति पर पड़ सकता है।

यह भी सच है कि आदिवासी समाज के भीतर पहचान, धर्म और अधिकारों को लेकर बहस लगातार गहरी होती जा रही है। एक ओर पारंपरिक सरना आस्था को बचाने की चिंता है, तो दूसरी ओर संवैधानिक अधिकारों और समान अवसर की लड़ाई भी है।

आखिरकार यह मामला केवल एक जाति प्रमाण पत्र का नहीं, बल्कि आदिवासी पहचान, धार्मिक स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों के जटिल संबंधों का प्रतीक बन चुका है। आने वाले समय में अदालत का फैसला इस बहस को नई दिशा दे सकता है।

आलोक कुमार

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