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शनिवार, 22 अगस्त 2026

Bihar : दिव्यांग संतान का हक पिता की मौत का इंतजार क्यों करे?

 

दिव्यांग संतान का हक पिता की मौत का इंतजार क्यों करे? पटना हाईकोर्ट का फैसला सिर्फ पेंशन नहीं, संवेदना का दस्तावेज

 किसी दिव्यांग बच्चे के अधिकार के लिए उसके पिता की मृत्यु का इंतजार करना पड़े—क्या इससे अधिक असंवेदनशील व्यवस्था की कल्पना की जा सकती है? जिस बच्चे को जीवनभर अभिभावक के सहारे की जरूरत है, उसे उसी अभिभावक के जीवित रहते सरकारी रिकॉर्ड में उसका अधिकार क्यों नहीं मिलना चाहिए?

पटना हाईकोर्ट का हालिया फैसला इसी बुनियादी सवाल को व्यवस्था के सामने खड़ा करता है। यह फैसला केवल पेंशन भुगतान आदेश यानी PPO में नाम जोड़ने की प्रशासनिक प्रक्रिया का मामला नहीं है, बल्कि उस सोच को चुनौती देता है जिसमें कागज नियम से बड़ा और इंसान नियम से छोटा हो जाता है।

पटना हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि पेंशनर पिता के जीवनकाल में ही उसके दिव्यांग आश्रित बच्चे का नाम पेंशन भुगतान आदेश में शामिल किया जा सकता है। अदालत ने यह भी साफ किया कि PPO में नाम दर्ज करना तत्काल पारिवारिक पेंशन देने के बराबर नहीं है। यह भविष्य में मिलने वाले अधिकार को सुरक्षित करने की प्रशासनिक व्यवस्था है। यानी सरकार को आज कोई अतिरिक्त पेंशन नहीं देनी है, लेकिन दिव्यांग संतान के भविष्य के अधिकार को आज ही सरकारी रिकॉर्ड में सुरक्षित किया जा सकता है।

मामला सोनपुर, सारण निवासी सेवानिवृत्त चपरासी रामानंद राय और उनके 50 प्रतिशत लोकोमोटर दिव्यांगता से पीड़ित बेटे दीपक कुमार पुष्पेन्द्र से जुड़ा था। रामानंद राय ने अपने बेटे का नाम PPO में दर्ज कराने की मांग की थी। लेकिन वित्त विभाग और महालेखाकार कार्यालय की ओर से यह तर्क सामने आया कि नियमानुसार दिव्यांग संतान का दावा माता-पिता की मृत्यु के बाद ही सामने आता है।

यहीं से इस मामले का असली सवाल पैदा होता है—क्या किसी दिव्यांग व्यक्ति के अधिकार को सुनिश्चित करने के लिए उसके माता-पिता की मृत्यु जरूरी है?

पटना हाईकोर्ट की एकल पीठ ने इस दृष्टिकोण को स्वीकार नहीं किया। न्यायमूर्ति पूर्णेन्दु सिंह ने प्रक्रियात्मक देरी और नाम दर्ज करने से इनकार को दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 की भावना के विपरीत माना।

अदालत की चिंता बेहद स्वाभाविक है। सरकारी कर्मचारी के सेवानिवृत्त होने के बाद आम तौर पर परिवार की आर्थिक स्थिति पहले जैसी नहीं रहती। दूसरी तरफ उम्र बढ़ने के साथ चिकित्सा, दवा और देखभाल का खर्च बढ़ता जाता है। ऐसे परिवार में यदि कोई दिव्यांग संतान है तो उसके भविष्य की चिंता और अधिक गंभीर हो जाती है।

पेंशनर पिता अपनी जिंदगी में ही यह सुनिश्चित करना चाहता है कि उसके बाद उसके बच्चे को सरकारी कार्यालयों के चक्कर न लगाने पड़ें। यह मांग किसी अतिरिक्त सुविधा की मांग नहीं है। यह उस भविष्य की सुरक्षा की मांग है जब परिवार का सबसे बड़ा सहारा मौजूद नहीं होगा।

व्यवस्था को यह समझना होगा कि कानून का उद्देश्य केवल कागजों पर प्रक्रिया पूरी करना नहीं, बल्कि नागरिक के अधिकार को सुरक्षित करना है। अगर किसी अधिकार को हासिल करने के लिए उस व्यक्ति के सहारे को ही खत्म होने का इंतजार करना पड़े, तो ऐसी प्रक्रिया पर पुनर्विचार होना चाहिए।

दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 ने दिव्यांग व्यक्तियों को सम्मान, समानता और सामाजिक सुरक्षा के व्यापक अधिकारों से जोड़ा है। ऐसे में सरकारी नियमों की व्याख्या भी उसी मानवीय दृष्टिकोण के अनुरूप होनी चाहिए। नियम यदि अधिकार की राह आसान बनाते हैं तो वे कल्याणकारी शासन का माध्यम हैं; लेकिन यदि वही नियम अधिकार को टालने का कारण बन जाएं तो उनमें सुधार की जरूरत है।

पटना हाईकोर्ट का फैसला इसी दिशा में महत्वपूर्ण संदेश देता है। अदालत ने बिहार के मुख्य सचिव को यह भी सलाह दी कि जरूरत पड़ने पर बिहार पेंशन नियमावली में संशोधन किया जाए, ताकि दिव्यांगजनों के अधिकारों की बेहतर सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।

यह टिप्पणी अपने आप में महत्वपूर्ण है। इसका मतलब है कि मामला सिर्फ एक व्यक्ति की याचिका तक सीमित नहीं रहना चाहिए। सरकार को यह देखना चाहिए कि राज्य के कितने ऐसे पेंशनर हैं जिनकी दिव्यांग संतान है और जिनके नाम अभी PPO में दर्ज नहीं हैं। यदि ऐसी कोई प्रशासनिक बाधा मौजूद है तो उसे दूर करने के लिए स्पष्ट, सरल और समयबद्ध व्यवस्था बनाई जानी चाहिए।

सरकार चाहे तो इसके लिए एक पारदर्शी प्रक्रिया बना सकती है। पेंशनर को सेवा या सेवानिवृत्ति के समय ही आश्रित दिव्यांग संतान का विवरण दर्ज कराने की सुविधा दी जा सकती है। आवश्यक प्रमाणपत्रों का सत्यापन एक निर्धारित समय में हो और PPO में नाम दर्ज होने की सूचना संबंधित परिवार को दी जाए। इससे भविष्य में मृत्यु के बाद शुरू होने वाली लंबी कागजी प्रक्रिया काफी हद तक समाप्त हो सकती है।

यह व्यवस्था केवल दिव्यांग बच्चों के हित में नहीं होगी, बल्कि उन बुजुर्ग माता-पिताओं के लिए भी राहत होगी जो जीवन के अंतिम पड़ाव में सबसे अधिक इसी चिंता से घिरे रहते हैं कि उनके बाद उनके आश्रित बच्चे की देखभाल कौन करेगा और उसका आर्थिक भविष्य कैसे सुरक्षित होगा।

ऐसे माता-पिता के लिए सबसे बड़ा सवाल अक्सर यह नहीं होता कि आज उनका बच्चा कैसे जी रहा है, बल्कि यह होता है कि कल उनके नहीं रहने पर उसका क्या होगा?

यही कारण है कि इस फैसले को केवल कानूनी जीत के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। यह शासन की संवेदनशीलता की परीक्षा भी है। अदालत ने रास्ता दिखाया है, अब सरकार की जिम्मेदारी है कि उस रास्ते को स्थायी व्यवस्था में बदले।

बिहार सरकार के सामने अब अवसर है कि वह पेंशन व्यवस्था की समीक्षा करे और ऐसी प्रक्रिया तैयार करे जिसमें पात्र दिव्यांग आश्रितों के नाम पहले से दर्ज किए जा सकें। इससे न केवल परिवारों का भरोसा बढ़ेगा, बल्कि सरकारी कार्यालयों में मृत्यु के बाद होने वाली अनावश्यक भागदौड़ और विवाद भी कम होंगे।

यह भी जरूरी है कि ऐसे मामलों में प्रशासनिक अधिकारी केवल नियम की भाषा न देखें, बल्कि नियम के पीछे मौजूद सामाजिक उद्देश्य को भी समझें। कल्याणकारी राज्य में कानून का अंतिम लक्ष्य नागरिक को राहत, सुरक्षा और सम्मान देना है।

किसी दिव्यांग संतान को अपने अधिकार के लिए पिता की मृत्यु का इंतजार न करना पड़े—इससे अधिक मानवीय व्यवस्था क्या हो सकती है? पेंशन की रकम बाद में मिले या नियम के अनुसार मिले, लेकिन अधिकार का भरोसा आज मिलना चाहिए।

क्योंकि अधिकार मृत्यु के बाद पैदा नहीं होते। अधिकार पहले से मौजूद होते हैं; व्यवस्था का काम उन्हें समय रहते सुरक्षित करना है।

पटना हाईकोर्ट का यह फैसला इसी बुनियादी मानवीय सिद्धांत की याद दिलाता है। अब जरूरत है कि बिहार सरकार इसे एक मिसाल बनाकर पेंशन नियमावली, प्रशासनिक प्रक्रिया और सरकारी सोच—तीनों में ऐसा बदलाव करे, जिससे किसी दिव्यांग आश्रित को अपने भविष्य की सुरक्षा के लिए अपने माता-पिता के चले जाने का इंतजार न करना पड़े।

यह सिर्फ एक PPO में नाम जोड़ने का सवाल नहीं है। यह उस भरोसे का सवाल है जो एक पिता अपने राज्य से करता है—मेरे बाद मेरे बच्चे को अकेला मत छोड़ना।


आलोक कुमार

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