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शुक्रवार, 28 अगस्त 2026

Bihar : बिहार के सरकारी स्कूलों में पढ़ाई की गुणवत्ता पर असली सवाल

 बिहार के सरकारी स्कूलों में पढ़ाई की गुणवत्ता पर असली सवाल: बच्चे स्कूल पहुंच रहे हैं, लेकिन कितना सीख रहे हैं?


बिहार में शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए सरकार की ओर से लगातार योजनाएं चलाई जा रही हैं। स्कूल भवनों के निर्माण और मरम्मत से लेकर शिक्षकों की नियुक्ति, किताबें, पोशाक, छात्रवृत्ति, मध्याह्न भोजन और डिजिटल सुविधाओं तक पर जोर दिया जा रहा है। लेकिन इन तमाम प्रयासों के बीच एक बुनियादी सवाल आज भी अपनी जगह खड़ा है—क्या बिहार के सरकारी स्कूलों में बच्चों को वास्तव में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल रही है?

यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि शिक्षा व्यवस्था की सफलता का पैमाना केवल यह नहीं हो सकता कि कितने स्कूलों की इमारतें बनीं, कितने बच्चों को किताबें मिलीं या कितने शिक्षकों की नियुक्ति हुई। असली सवाल यह है कि स्कूल पहुंचने के बाद बच्चा कितना सीख रहा है, क्या समझ रहा है और उस ज्ञान का इस्तेमाल अपने जीवन में कितना कर पा रहा है।

किसी भी सरकारी स्कूल की सफलता का सबसे बड़ा प्रमाण उसकी कक्षा के भीतर दिखाई देना चाहिए। यदि प्राथमिक कक्षा का बच्चा सामान्य पाठ पढ़ने में कठिनाई महसूस करता है, साधारण जोड़-घटाव या गुणा-भाग में उलझ जाता है, अपनी बात लिखकर व्यक्त नहीं कर पाता या पढ़ी हुई चीज को समझाने में परेशानी महसूस करता है, तो केवल स्कूल की बेहतर इमारत को शिक्षा की सफलता नहीं माना जा सकता।

सरकारी स्कूल गरीब परिवारों की सबसे बड़ी उम्मीद

बिहार के सरकारी विद्यालयों में बड़ी संख्या ऐसे बच्चों की है, जिनके परिवार निजी स्कूलों की महंगी फीस, परिवहन और अन्य खर्च वहन करने की स्थिति में नहीं हैं। उनके लिए सरकारी स्कूल केवल पढ़ाई की जगह नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक बदलाव का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम हैं।

एक गरीब परिवार अपने बच्चे को सरकारी स्कूल भेजकर यह उम्मीद करता है कि शिक्षा उसके बच्चे को भविष्य में बेहतर रोजगार और सम्मानजनक जीवन का अवसर देगी। इसलिए सरकारी विद्यालयों की शिक्षा की गुणवत्ता कमजोर होना केवल शिक्षा विभाग की समस्या नहीं है। इसका सीधा संबंध गरीबी, बेरोजगारी और सामाजिक असमानता से भी है।

शिक्षक हैं जरूरी, लेकिन सिर्फ संख्या काफी नहीं

शिक्षा की चर्चा होते ही अक्सर शिक्षकों की संख्या और उनकी उपस्थिति का सवाल सामने आता है। यह निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है, लेकिन शिक्षक की मौजूदगी और अच्छी शिक्षा—दोनों एक ही बात नहीं हैं।

शिक्षक नियमित रूप से स्कूल में मौजूद हों, कक्षाएं भी चलें, लेकिन यदि बच्चों की अलग-अलग सीखने की क्षमता के अनुसार पढ़ाने की व्यवस्था नहीं है तो अपेक्षित परिणाम हासिल करना मुश्किल होगा। एक ही कक्षा में अलग स्तर के बच्चे होते हैं। किसी बच्चे को पाठ जल्दी समझ में आता है तो किसी को बार-बार अभ्यास की आवश्यकता होती है।

इसलिए शिक्षण व्यवस्था में केवल पाठ्यक्रम पूरा करने के बजाय यह देखना जरूरी है कि हर बच्चा वास्तव में कितना समझ पाया।

गैर-शैक्षणिक जिम्मेदारियां भी चुनौती

सरकारी स्कूलों के शिक्षकों पर समय-समय पर विभिन्न गैर-शैक्षणिक जिम्मेदारियां भी आती हैं। चुनाव संबंधी कार्य, सर्वेक्षण, सरकारी योजनाओं से जुड़े कार्य और अन्य प्रशासनिक जिम्मेदारियां शिक्षक के समय और ऊर्जा को प्रभावित कर सकती हैं।

शिक्षक का मुख्य दायित्व बच्चों को पढ़ाना और उनकी सीखने की क्षमता विकसित करना होना चाहिए। प्रशासनिक जरूरतें अपनी जगह महत्वपूर्ण हैं, लेकिन ऐसी व्यवस्था बनाई जानी चाहिए जिसमें शिक्षक का अधिकतम समय कक्षा में बच्चों के साथ बीते।

हालांकि शिक्षकों को हर समस्या के लिए जिम्मेदार ठहराना भी उचित नहीं है। बेहतर शिक्षा के लिए पर्याप्त संसाधन, प्रशिक्षण, शिक्षण सामग्री और सकारात्मक कार्य वातावरण भी जरूरी है।

डिजिटल शिक्षा से आगे बढ़कर समझ की शिक्षा

आज शिक्षा का स्वरूप बदल रहा है। केवल किताब पढ़कर और प्रश्नों के उत्तर याद करके बच्चे भविष्य की चुनौतियों का सामना नहीं कर सकते। उन्हें सवाल पूछने, तर्क करने, समस्या का समाधान खोजने और अपनी बात स्पष्ट रूप से रखने की क्षमता भी चाहिए।

डिजिटल उपकरण और स्मार्ट क्लास उपयोगी हो सकते हैं, लेकिन तकनीक अपने आप शिक्षा की गुणवत्ता नहीं बढ़ाती। महत्वपूर्ण यह है कि तकनीक का इस्तेमाल किस तरह किया जा रहा है। गतिविधि आधारित शिक्षण, प्रयोग, स्थानीय उदाहरण और बच्चों की भागीदारी वाली कक्षाएं सीखने को अधिक प्रभावी बना सकती हैं।

इसके लिए शिक्षकों को केवल औपचारिक प्रशिक्षण नहीं, बल्कि नियमित और व्यावहारिक प्रशिक्षण की जरूरत है।

स्कूल से बच्चे क्यों दूर होते हैं?

बच्चों की सीखने की क्षमता पर उनकी नियमित उपस्थिति का भी सीधा असर पड़ता है। गरीब परिवारों में कई बच्चे घरेलू काम, मजदूरी, खेती या दूसरी पारिवारिक परिस्थितियों के कारण नियमित रूप से स्कूल नहीं पहुंच पाते।

लड़कियों के सामने भी परिवार और समाज से जुड़ी अलग चुनौतियां हो सकती हैं। ऐसे मामलों में केवल अनुपस्थित बच्चों की सूची तैयार कर लेना पर्याप्त नहीं है। स्कूल और स्थानीय प्रशासन को यह समझना होगा कि बच्चा स्कूल से क्यों दूर है और उसे वापस शिक्षा की मुख्यधारा में लाने के लिए क्या किया जा सकता है।

भोजन जरूरी है, लेकिन शिक्षा उससे भी जरूरी

मध्याह्न भोजन जैसी योजनाओं ने बच्चों को स्कूल से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। लेकिन बच्चों को स्कूल तक पहुंचाना पहला कदम है। उन्हें स्कूल में बनाए रखना और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना उससे बड़ा काम है।

यदि अभिभावकों को भरोसा हो कि सरकारी स्कूल में उनका बच्चा अच्छी तरह पढ़ रहा है, तो सरकारी विद्यालयों के प्रति समाज का विश्वास स्वतः मजबूत होगा। इसके लिए स्कूलों को केवल कल्याणकारी योजनाओं का केंद्र नहीं, बल्कि वास्तविक सीखने का केंद्र बनाना होगा।

अभिभावकों और समुदाय की भागीदारी जरूरी

स्कूल प्रबंधन समितियां और अभिभावक केवल बैठकों और कागजी कार्यवाही तक सीमित न रहें। उन्हें बच्चों की पढ़ाई, स्कूल में शिक्षण व्यवस्था, शिक्षक की उपलब्धता और सीखने के स्तर पर भी सवाल पूछने का अधिकार और अवसर मिलना चाहिए।

स्थानीय समुदाय की निगरानी शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही बढ़ा सकती है। अभिभावक यह जान सकें कि उनका बच्चा कक्षा के स्तर के अनुरूप पढ़ और समझ पा रहा है या नहीं।

मूल्यांकन का तरीका बदलना होगा

सरकारी स्कूलों का मूल्यांकन केवल भवन, शौचालय, बिजली, किताब, पोशाक या नामांकन के आंकड़ों से नहीं होना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण संकेतक बच्चों की सीखने की क्षमता होनी चाहिए।

कक्षा तीन का बच्चा सामान्य पाठ कितनी सहजता से पढ़ सकता है? कक्षा पांच का विद्यार्थी बुनियादी गणित को कितना समझता है? माध्यमिक स्तर का विद्यार्थी किसी विषय पर अपनी बात कितनी स्पष्टता से लिख और बोल सकता है?

इन सवालों के जवाब ही शिक्षा की वास्तविक तस्वीर सामने ला सकते हैं।

जहां बच्चे अपेक्षित स्तर से पीछे हैं, वहां केवल निरीक्षण और कार्रवाई से समस्या हल नहीं होगी। ऐसे विद्यालयों को शैक्षणिक सहयोग देना होगा। कमजोर बच्चों के लिए अतिरिक्त अभ्यास, भाषा और गणित की बुनियादी शिक्षा तथा व्यक्तिगत सीखने की योजना तैयार करनी होगी।

सवाल बच्चों की क्षमता पर नहीं, व्यवस्था की क्षमता पर होना चाहिए

बिहार का सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाला बच्चा किसी निजी स्कूल के बच्चे से कम प्रतिभाशाली नहीं है। अंतर अक्सर अवसर, संसाधन, मार्गदर्शन और वातावरण का होता है।

इसलिए बिहार की शिक्षा व्यवस्था के सामने सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि कितने बच्चे स्कूल पहुंच रहे हैं। असली सवाल यह है कि स्कूल पहुंचने के बाद वे कितना सीख रहे हैं।

सरकार यदि बिहार को वास्तव में शैक्षणिक रूप से मजबूत बनाना चाहती है तो उसे स्कूलों की संख्या और भवनों से आगे बढ़कर कक्षा के भीतर की पढ़ाई पर ध्यान देना होगा। शिक्षा पर खर्च बढ़ाना जरूरी है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है कि उस खर्च का असर बच्चों की सीखने की क्षमता में दिखाई दे।

सरकारी स्कूल तब सफल माने जाएंगे, जब वहां से निकलने वाला बच्चा केवल प्रमाणपत्र लेकर नहीं, बल्कि ज्ञान, आत्मविश्वास, तर्कशक्ति और अपने भविष्य को बदलने की क्षमता लेकर निकले।

यही बिहार की सरकारी शिक्षा व्यवस्था की असली परीक्षा है—और इस परीक्षा का परिणाम किसी सरकारी रिपोर्ट से ज्यादा बच्चे की आंखों, उसकी किताब और उसके जवाब में दिखाई देगा।

आलोक कुुमार

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