मिशन की ओर उन्मुख बुलाहट : झारखंड-बिहार में नई सुदृढ़ता की सिनॉडल दृष्टि
क्या बुलाहट संवर्धन केवल धार्मिक जीवन में प्रवेश करने वाले युवाओं की संख्या बढ़ाने तक सीमित है, या युवाओं को सुनने, समझने, साथ चलने और मिशन के लिए तैयार करने की व्यापक प्रक्रिया भी है? रांची में आयोजित तीन दिवसीय सेमिनार ने बुलाहट संवर्धन को इसी नई मिशनरी और सिनॉडल दृष्टि से देखने की कोशिश की।
रांची। कलीसिया में बुलाहट यानी Vocation की चर्चा लंबे समय से धर्मगुरुओं, धर्मबहनों और समर्पित धार्मिक जीवन के लिए युवाओं को प्रेरित करने के संदर्भ में होती रही है। लेकिन बदलते सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश में बुलाहट की समझ को भी व्यापक बनाने की आवश्यकता महसूस की जा रही है। अब सवाल केवल यह नहीं है कि कितने युवा धार्मिक जीवन की ओर आकर्षित हो रहे हैं, बल्कि यह भी है कि कलीसिया युवाओं को किस तरह सुन रही है, उनके साथ कैसे चल रही है और उन्हें मिशन में किस प्रकार सहभागी बना रही है।
इसी दिशा में 12 से 14 अगस्त 2026 तक CCBI VSCR Commission की ओर से रांची स्थित Social Development Centre में बिहार-झारखंड क्षेत्र के Vocation Promoters और प्रारंभिक स्तर के Formators के लिए तीन दिवसीय National Zone Seminar-cum-Workshop आयोजित किया गया।
“Strengthening Vocation Promotion through Pastoral Mission Orientation” विषय पर आयोजित इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में 57 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। आयोजन का उद्देश्य केवल बुलाहट संवर्धन की तकनीकों पर चर्चा करना नहीं था, बल्कि इसे एक ऐसी पास्तोरल, मिशनरी और सिनॉडल प्रक्रिया के रूप में समझना था, जिसमें युवा स्वयं कलीसिया की यात्रा के सक्रिय सहभागी बन सकें।
रांची के सहायक धर्माध्यक्ष बिशप आनंद डेविड खलखो ने प्रतिभागियों का स्वागत किया। वहीं CCBI VSCR Commission के Executive Secretary फादर चार्ल्स लियोन ने आज के युवाओं के सामने मौजूद सामाजिक और सांस्कृतिक चुनौतियों को समझने तथा उनके साथ प्रभावी ढंग से चलने की आवश्यकता पर मार्गदर्शन दिया।
सेमिनार से उभरने वाला सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही रहा कि बुलाहट को केवल संख्या बढ़ाने की प्रक्रिया मानना पर्याप्त नहीं है। किसी युवा को धार्मिक जीवन की ओर प्रेरित करने से पहले उसके जीवन को समझना जरूरी है। उसके सपने क्या हैं? उसके संघर्ष क्या हैं? वह किन सामाजिक परिस्थितियों से गुजर रहा है? विश्वास, कलीसिया और अपने भविष्य को लेकर उसके मन में कौन से सवाल हैं?
इन प्रश्नों को सुने बिना बुलाहट संवर्धन अधूरा रह सकता है।
मुख्य वक्ता मोस्ट रेव. विंसेंट ऐंड, रांची के महाधर्माध्यक्ष एवं CCBI के महासचिव, ने अपने संबोधन में इस बात पर जोर दिया कि vocation promotion केवल कुछ नियुक्त व्यक्तियों या संस्थाओं की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरी कलीसिया का मिशन है। इसके केंद्र में सुनना, विवेक करना, साथ देना और मिशनरी पहुंच जैसे तत्व होने चाहिए।
यही दृष्टि आज के समय में विशेष महत्व रखती है। नई पीढ़ी केवल निर्देश सुनना नहीं चाहती; वह संवाद, सम्मान और सहभागिता को भी महत्व देती है। यदि युवा यह महसूस करे कि कलीसिया उसे केवल कुछ बताना नहीं चाहती, बल्कि उसकी बात भी सुनना चाहती है, तो विश्वास और संबंध दोनों अधिक मजबूत हो सकते हैं।
हाशिये के समुदायों तक पहुंच जरूरी
सेमिनार में समाज के हाशिये पर मौजूद समुदायों और प्रवासी आबादी को भी बुलाहट संवर्धन की मुख्यधारा से जोड़ने पर जोर दिया गया। फादर जैसन वडास्सेरी ने इस महत्वपूर्ण पहलू को सामने रखा।
यह विचार इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ईश्वर की बुलाहट किसी एक सामाजिक वर्ग, क्षेत्र या आर्थिक स्थिति तक सीमित नहीं मानी जा सकती। यदि बुलाहट संवर्धन वास्तव में मिशनरी है, तो उसे उन समुदायों तक भी पहुंचना होगा जो सामाजिक और धार्मिक गतिविधियों के केंद्र से अक्सर दूर रह जाते हैं।
झारखंड और बिहार के संदर्भ में यह चुनौती और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। ग्रामीण समाज, आदिवासी समुदाय, प्रवासी परिवार, शहरी युवा और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों की परिस्थितियां अलग-अलग हैं। ऐसे में एक ही प्रकार की Vocation Promotion रणनीति हर युवा तक समान प्रभाव से नहीं पहुंच सकती।
डिजिटल दुनिया में बुलाहट की नई राह
इसी क्रम में फादर वैलेरियन लोबो ने डिजिटल माध्यमों और नई तकनीकों के उपयोग की संभावनाओं पर प्रकाश डाला। आज युवाओं का बड़ा हिस्सा सोशल मीडिया, मोबाइल और डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से संवाद करता है। इसलिए कलीसिया के लिए भी जरूरी है कि वह युवाओं तक पहुंचने के लिए केवल पारंपरिक माध्यमों पर निर्भर न रहे।
डिजिटल माध्यमों का उपयोग केवल धार्मिक संदेशों के प्रसार तक सीमित नहीं होना चाहिए। ये युवाओं को सुनने, उनके प्रश्नों का उत्तर देने, विश्वास से जुड़े विषयों पर संवाद करने और व्यक्तिगत संबंध विकसित करने के अवसर भी प्रदान कर सकते हैं।
इस दृष्टि से भविष्य का Vocation Promotion केवल चर्च परिसर, स्कूल या युवा शिविरों तक सीमित नहीं रहेगा। उसे डिजिटल दुनिया में भी अपनी प्रभावी और जिम्मेदार उपस्थिति बनानी होगी।
Mission 2033 और आगे की दिशा
तीन दिवसीय आयोजन का समापन CCBI Mission 2033 Pastoral Plan पर चिंतन के साथ हुआ। प्रतिभागियों ने बुलाहट संवर्धन को अधिक पास्तोरल, मिशनरी और सिनॉडल संस्कृति में आगे बढ़ाने की प्रतिबद्धता दोहराई।
लेकिन यह प्रतिबद्धता केवल कार्यक्रमों की संख्या बढ़ाकर पूरी नहीं होगी। इसके लिए परिवारों, पल्ली समुदायों, विद्यालयों, युवा समूहों और धार्मिक संस्थाओं के बीच निरंतर सहयोग आवश्यक होगा।
वास्तव में आज कलीसिया के सामने सबसे बड़ा प्रश्न केवल यह नहीं है कि कितने युवा सेमिनरी या कॉन्वेंट की ओर जा रहे हैं। इससे बड़ा प्रश्न यह है—क्या कलीसिया युवाओं को सचमुच सुन रही है? क्या वह उनके प्रश्नों और संघर्षों के साथ चल रही है? क्या युवाओं को केवल भविष्य का नेतृत्वकर्ता माना जा रहा है या आज के मिशन का सहभागी भी?
रांची का यह आयोजन इसी बदलाव की ओर संकेत करता है।
बुलाहट की खेती केवल Vocation Camp, सेमिनरी या कॉन्वेंट में नहीं होती। इसकी शुरुआत परिवार में होती है, विद्यालय में होती है, पल्ली समुदाय में होती है और युवा समूहों के बीच होती है। इसलिए बुलाहट संवर्धन को कुछ लोगों या समितियों का काम मानने के बजाय पूरी कलीसिया की साझा जिम्मेदारी बनाना ही सिनॉडल दृष्टि की वास्तविक परीक्षा है।
युवा केवल भविष्य नहीं, वर्तमान के सहभागी
जरूरत इस बात की है कि युवा को केवल “भविष्य का धर्मगुरु” या “भविष्य की धर्मबहन” समझने के बजाय आज के मिशन का सहभागी माना जाए। इससे बुलाहट की अवधारणा व्यापक होगी और कलीसिया तथा युवाओं के बीच संबंध भी मजबूत होंगे।
झारखंड और बिहार जैसे विविध सामाजिक-सांस्कृतिक क्षेत्रों में यह दृष्टिकोण कलीसिया के लिए विशेष महत्व रखता है। यहां अलग-अलग समुदायों, भाषाओं, संस्कृतियों और सामाजिक परिस्थितियों के बीच मिशन को आगे बढ़ाने के लिए ऐसी बुलाहट संवर्धन प्रक्रिया चाहिए जो स्थानीय वास्तविकताओं को समझे और युवाओं को केवल लक्ष्य समूह नहीं, बल्कि मिशन के सहयात्री के रूप में देखे।
रांची में हुआ यह सेमिनार इसी परिवर्तन की दिशा में एक सार्थक कदम माना जा सकता है। इसका संदेश स्पष्ट है—बुलाहट को केवल खोजना नहीं, उसे सुनना है; युवाओं को केवल बुलाना नहीं, उनके साथ चलना है; और कलीसिया के भविष्य की प्रतीक्षा नहीं करनी, बल्कि आज से ही उसके मिशनरी भविष्य का निर्माण करना है।
यही सिनॉडल कलीसिया की पहचान भी है—जहां कोई अकेला नहीं चलता, बल्कि सभी सुनते हैं, समझते हैं, विवेक करते हैं और साथ मिलकर मिशन की राह आगे बढ़ाते हैं।
झारखंड और बिहार में बुलाहट संवर्धन की यह नई दृष्टि यदि परिवार से लेकर पल्ली, विद्यालय, युवा समूह और डिजिटल मंचों तक व्यवहार में उतरती है, तो इसका प्रभाव केवल धार्मिक vocations को मजबूत करने तक सीमित नहीं रहेगा। यह पूरी कलीसिया को अधिक सहभागी, संवेदनशील, संवादशील और मिशनरी बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है।
— आलोक कुमार
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