शनिवार, 5 सितंबर 2026

Bihar : शिक्षक दिवस पर सवाल: सरकारी स्कूलों में शिक्षक और संसाधनों की जंग कब खत्म होगी

 शिक्षक दिवस पर सवाल: सरकारी स्कूलों में शिक्षक और संसाधनों की जंग कब खत्म होगी?


पटना।
हर साल 5 सितंबर को देश में शिक्षक दिवस मनाया जाता है। डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जयंती के अवसर पर शिक्षक समाज के प्रति सम्मान व्यक्त किया जाता है। स्कूलों में कार्यक्रम होते हैं, विद्यार्थी अपने शिक्षकों को शुभकामनाएं देते हैं और शिक्षक के महत्व पर भाषण दिए जाते हैं। लेकिन इस सम्मान के बीच एक बड़ा सवाल अक्सर पीछे छूट जाता है—क्या हमारे सरकारी स्कूल शिक्षकों को वह वातावरण और संसाधन उपलब्ध करा रहे हैं, जिनके सहारे वे बच्चों का भविष्य बेहतर बना सकें?

शिक्षक केवल किताब पढ़ाने वाला व्यक्ति नहीं होता। वह बच्चे के ज्ञान, सोच, अनुशासन, आत्मविश्वास और भविष्य की नींव तैयार करता है। लेकिन जब उसी शिक्षक के सामने बड़ी कक्षाएं, संसाधनों की कमी, प्रशासनिक जिम्मेदारियां और अलग-अलग स्तर के विद्यार्थियों को एक साथ पढ़ाने की चुनौती हो, तो गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का लक्ष्य मुश्किल हो जाता है।

शिक्षक हैं, लेकिन पढ़ाने के लिए पर्याप्त समय कितना?

सरकारी विद्यालयों में शिक्षक की जिम्मेदारी केवल कक्षा में पढ़ाने तक सीमित नहीं रहती। कई बार उन्हें विभिन्न प्रशासनिक और गैर-शैक्षणिक कार्यों से भी जुड़ना पड़ता है। चुनाव संबंधी जिम्मेदारियां, सर्वेक्षण, सरकारी योजनाओं से जुड़े कार्य, रिकॉर्ड तैयार करना और अलग-अलग प्रकार की रिपोर्टिंग जैसी जिम्मेदारियां शिक्षकों के समय को प्रभावित कर सकती हैं।

यह सवाल शिक्षकों की कार्यक्षमता पर सवाल उठाने का नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की प्राथमिकताओं पर सवाल उठाने का है।

यदि शिक्षक का महत्वपूर्ण समय कक्षा के बाहर के कामों में चला जाए, तो कमजोर विद्यार्थियों के लिए अतिरिक्त समय कौन निकालेगा? जिन बच्चों को पढ़ने या लिखने में कठिनाई है, उनकी पहचान और सहायता कैसे होगी? प्रत्येक विद्यार्थी की प्रगति पर व्यक्तिगत ध्यान कैसे दिया जाएगा?

शिक्षक से बेहतर परिणाम की अपेक्षा जरूर होनी चाहिए, लेकिन उसके लिए पढ़ाने का पर्याप्त समय भी सुनिश्चित करना होगा।

संसाधनों की कमी से शिक्षा की गुणवत्ता पर असर

आज शिक्षा केवल ब्लैकबोर्ड और पाठ्यपुस्तक तक सीमित नहीं है। कंप्यूटर, इंटरनेट, डिजिटल सामग्री, विज्ञान प्रयोगशाला, पुस्तकालय, खेल सामग्री और बेहतर कक्षा-कक्ष आधुनिक शिक्षा व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके हैं।

लेकिन सभी सरकारी विद्यालयों में इन सुविधाओं की स्थिति समान नहीं है। कहीं विद्यालय भवन है, लेकिन पर्याप्त कमरे नहीं हैं। कहीं कमरे हैं तो फर्नीचर की कमी दिखाई देती है। कहीं कंप्यूटर उपलब्ध हैं, लेकिन उनके नियमित उपयोग के लिए तकनीकी सहायता या इंटरनेट की समस्या सामने आती है। कई विद्यालयों में पुस्तकालय मौजूद होने के बावजूद बच्चों तक पुस्तकों की नियमित पहुंच सुनिश्चित करना चुनौती बना रहता है।

सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि कितने संसाधन उपलब्ध कराए गए। असली सवाल यह है कि वे संसाधन जमीन पर कितने प्रभावी ढंग से काम कर रहे हैं।

अगर किसी स्कूल में कंप्यूटर है लेकिन बिजली या इंटरनेट की सुविधा नियमित नहीं है, तो डिजिटल शिक्षा का उद्देश्य कितना पूरा होगा? यदि विज्ञान प्रयोगशाला है लेकिन प्रयोग कराने के लिए पर्याप्त सामग्री नहीं है, तो बच्चे किताबी ज्ञान से आगे कैसे बढ़ेंगे?

शिक्षक दिवस पर बच्चों की आवाज भी सुनी जानी चाहिए

शिक्षक दिवस केवल शिक्षकों के सम्मान का दिन नहीं होना चाहिए। यह शिक्षा व्यवस्था की समीक्षा का अवसर भी बन सकता है।

एक सरकारी स्कूल का विद्यार्थी क्या चाहता है?

वह चाहता है कि शिक्षक नियमित रूप से कक्षा में हों। उसे समझने वाला शिक्षक मिले। किताब के साथ प्रयोग करने का अवसर मिले। स्कूल में साफ पानी, शौचालय, बिजली, सुरक्षित भवन और बैठने की उचित व्यवस्था हो। सबसे महत्वपूर्ण, उसे ऐसा वातावरण मिले जहां सवाल पूछने पर उसे हतोत्साहित न किया जाए।

बच्चों की सीखने की क्षमता केवल पाठ्यपुस्तक पूरी करने से तय नहीं होती। उन्हें सवाल पूछने, अपनी बात रखने, गतिविधियों में भाग लेने और अपनी गलतियों से सीखने का अवसर भी चाहिए।

यदि इन बुनियादी जरूरतों को पूरा करने में व्यवस्था कमजोर रहती है, तो केवल शिक्षक को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा।

केवल शिक्षक दिवस पर सम्मान काफी नहीं

शिक्षकों को एक दिन सम्मानित करने से शिक्षा व्यवस्था मजबूत नहीं होगी। शिक्षक का वास्तविक सम्मान तब होगा, जब उसे पढ़ाने के लिए पर्याप्त समय, जरूरी संसाधन, प्रशिक्षण और सम्मानजनक कार्य वातावरण मिले।

इसी तरह बच्चों का सम्मान तब होगा, जब सरकारी स्कूल में उन्हें ऐसी शिक्षा मिले, जो उन्हें भविष्य में आगे बढ़ने के समान अवसर दे।

सरकारी विद्यालयों को मजबूत करना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि आर्थिक रूप से कमजोर और ग्रामीण परिवारों की बड़ी संख्या अपने बच्चों की शिक्षा के लिए इन्हीं विद्यालयों पर निर्भर करती है। सरकारी स्कूल मजबूत होंगे तो इसका सीधा लाभ उन परिवारों को मिलेगा, जिनके पास निजी स्कूलों की फीस, परिवहन और अन्य खर्च उठाने की सीमित क्षमता है।

शिक्षक और व्यवस्था आमने-सामने नहीं, साथ-साथ

बेहतर शिक्षा के लिए शिक्षक और शिक्षा विभाग को एक-दूसरे के विरोधी के रूप में देखना समाधान नहीं है। शिक्षक, अभिभावक, विद्यार्थी, विद्यालय प्रबंधन और प्रशासन—सभी की भूमिका महत्वपूर्ण है।

शिक्षकों की जवाबदेही निश्चित रूप से होनी चाहिए। विद्यार्थियों की उपस्थिति, पढ़ाई की गुणवत्ता और सीखने के परिणामों की नियमित समीक्षा जरूरी है। लेकिन जवाबदेही के साथ संसाधन, प्रशिक्षण और संस्थागत सहयोग भी मिलना चाहिए।

यदि किसी शिक्षक को पर्याप्त प्रशिक्षण मिले, कक्षा में विद्यार्थियों की संख्या संतुलित हो, गैर-शैक्षणिक कार्यों का बोझ नियंत्रित हो और विद्यालय की बुनियादी सुविधाएं बेहतर हों, तो उससे बेहतर परिणाम की अपेक्षा अधिक व्यावहारिक होगी।

सरकारी स्कूलों में सुधार की जरूरत कहां है?

शिक्षक दिवस के अवसर पर सरकार और शिक्षा विभाग के सामने कुछ बुनियादी सवाल रखे जाने चाहिए।

क्या हर सरकारी स्कूल में विषय के अनुसार पर्याप्त शिक्षक उपलब्ध हैं?

क्या हर कक्षा में बच्चों के बैठने की उचित व्यवस्था है?

क्या स्कूलों में पुस्तकालय और प्रयोगशालाएं केवल कागज पर नहीं, बल्कि नियमित रूप से उपयोग में भी हैं?

क्या डिजिटल संसाधनों का इस्तेमाल बच्चों की पढ़ाई बेहतर बनाने के लिए हो रहा है?

क्या शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक कार्यों से अनावश्यक रूप से बचाया जा रहा है?

क्या ग्रामीण और शहरी सरकारी विद्यालयों के बीच संसाधनों की खाई लगातार कम हो रही है?

इन सवालों का जवाब केवल आंकड़ों से नहीं, बल्कि स्कूल की वास्तविक स्थिति देखकर मिलना चाहिए।

शिक्षक दिवस का असली संदेश

5 सितंबर को यदि हम वास्तव में शिक्षक का सम्मान करना चाहते हैं, तो बात केवल फूल, माला, प्रमाणपत्र और शुभकामनाओं तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।

शिक्षक का सम्मान उसकी कक्षा में दिखाई देना चाहिए।

जब शिक्षक के पास पढ़ाने का पर्याप्त समय होगा, जब उसके पास आवश्यक शिक्षण सामग्री होगी, जब उसे प्रशिक्षण और तकनीकी सहयोग मिलेगा और जब स्कूल का वातावरण बच्चों के अनुकूल होगा, तभी शिक्षक अपनी भूमिका को और प्रभावी ढंग से निभा सकेगा।

क्योंकि शिक्षक किसी भी राष्ट्र के भविष्य का निर्माता होता है। लेकिन भविष्य गढ़ने वाले हाथों को यदि पर्याप्त औजार ही न दिए जाएं, तो उनसे चमत्कार की उम्मीद कितनी उचित है?

शिक्षक दिवस पर सबसे बड़ा सम्मान यही होगा कि सरकारी स्कूलों में शिक्षक को सम्मान के साथ संसाधन भी मिलें और बच्चों को अधिकार के साथ गुणवत्तापूर्ण शिक्षा भी।

शिक्षक का सम्मान केवल मंच पर नहीं, स्कूल की कक्षा में दिखाई देना चाहिए।


आलोक कुमार

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