बंगाल के लोकप्रिय स्ट्रीट फूड ‘झालमुड़ी’ का स्वाद पटना पहुंचा
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के दौरान देश की राजनीति में एक दिलचस्प और प्रतीकात्मक दृश्य देखने को मिला, जब नरेंद्र मोदी ने 19 अप्रैल 2026 को झाड़ग्राम में चुनावी प्रचार के बीच एक स्थानीय दुकान पर रुककर बंगाल के लोकप्रिय स्ट्रीट फूड ‘झालमुड़ी’ का स्वाद लिया। यह केवल एक साधारण खान-पान का क्षण नहीं था, बल्कि यह जनसंपर्क और सांस्कृतिक जुड़ाव का एक सशक्त उदाहरण बन गया। ‘झालमुड़ी’ जैसे स्थानीय व्यंजन को अपनाकर प्रधानमंत्री ने यह संदेश दिया कि भारत की विविधता ही उसकी असली ताकत है और स्थानीय संस्कृति के साथ जुड़ाव ही जनभावनाओं को समझने का माध्यम है।
‘झालमुड़ी’ पश्चिम बंगाल का एक प्रसिद्ध स्ट्रीट फूड है, जिसमें मुरमुरा (फूला हुआ चावल), सरसों का तेल, हरी मिर्च, प्याज, चाट मसाला और नींबू का रस मिलाकर तैयार किया जाता है। इसकी सादगी और चटपटे स्वाद के कारण यह आम लोगों के बीच बेहद लोकप्रिय है। जब प्रधानमंत्री जैसे शीर्ष नेता इस प्रकार के आम जनजीवन से जुड़े खाद्य पदार्थ का स्वाद लेते हैं, तो यह एक प्रकार से आम जनता के साथ उनकी निकटता को दर्शाता है।
प्रधानमंत्री के इसी ‘झालमुड़ी’ प्रेम की झलक बिहार की राजधानी पटना में भी देखने को मिली, जहां भारतीय जनता पार्टी के पंचायती राज प्रकोष्ठ, बिहार प्रदेश द्वारा आयोजित एक विशेष कार्यक्रम में अतिथियों का स्वागत ‘पान पराग’ जैसे पारंपरिक तरीके से नहीं, बल्कि ‘झालमुड़ी’ खिलाकर किया गया। यह आयोजन बीआईए (BIA) सभागार में हुआ, जहां महाराणा प्रताप के परम मित्र, शूरवीर और दानवीर भामाशाह की जयंती मनाई गई।इस कार्यक्रम का आयोजन भारतीय जनता पार्टी के पंचायती राज प्रकोष्ठ, बिहार प्रदेश द्वारा किया गया था। आयोजन का उद्देश्य न केवल भामाशाह जी के जीवन और उनके योगदान को याद करना था, बल्कि उनके आदर्शों को वर्तमान पीढ़ी तक पहुंचाना भी था। कार्यक्रम में उपस्थित नेताओं और कार्यकर्ताओं ने भामाशाह के त्याग, समर्पण और राष्ट्रभक्ति को आत्मसात करने का संकल्प लिया।
कार्यक्रम में भाजपा के सह संयोजक संजय राय ने अतिथियों का स्वागत बड़े ही अनोखे तरीके से किया। उन्होंने पारंपरिक स्वागत सामग्री की जगह ‘झालमुड़ी’ परोसी, जो प्रधानमंत्री मोदी के हालिया झारग्राम दौरे से प्रेरित थी। अतिथि भी इस अभिनव स्वागत से प्रभावित हुए और उन्होंने ‘झालमुड़ी’ का आनंद लेते हुए कार्यक्रम की शुरुआत की। यह दृश्य दर्शाता है कि कैसे एक छोटा सा सांस्कृतिक तत्व राजनीतिक और सामाजिक आयोजनों में नई ऊर्जा भर सकता है।
इस कार्यक्रम में बिहार सरकार के पूर्व कृषि मंत्री राम कृपाल यादव सहित कई वरिष्ठ नेता उपस्थित थे। उनके साथ-साथ पूर्व उप मुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा, प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी, शिवेश कुमार, तारकिशोर प्रसाद और प्रमोद कुमार चंद्रवंशी जैसे प्रमुख नेताओं ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। सभी वक्ताओं ने अपने संबोधन में भामाशाह के जीवन के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला।भामाशाह, जो महाराणा प्रताप के घनिष्ठ सहयोगी थे, ने अपने संपूर्ण धन को राष्ट्र और स्वाभिमान की रक्षा के लिए समर्पित कर दिया था। उनका यह त्याग भारतीय इतिहास में अद्वितीय माना जाता है। वक्ताओं ने कहा कि भामाशाह केवल एक दानवीर ही नहीं, बल्कि एक कुशल रणनीतिकार और राष्ट्रभक्त भी थे। उनके जीवन से यह सीख मिलती है कि राष्ट्रहित सर्वोपरि होना चाहिए और इसके लिए किसी भी प्रकार का त्याग करने से पीछे नहीं हटना चाहिए।
कार्यक्रम में यह भी कहा गया कि आज के समय में जब समाज विभिन्न चुनौतियों से जूझ रहा है, तब भामाशाह जैसे महापुरुषों के जीवन से प्रेरणा लेकर राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भागीदारी निभाना आवश्यक है। बिहार के विभिन्न क्षेत्रों से आए लोगों को उनके पदचिह्नों पर चलने के लिए प्रेरित किया गया।
इस पूरे घटनाक्रम में ‘झालमुड़ी’ एक प्रतीक के रूप में उभरकर सामने आया—एक ऐसा प्रतीक जो आम जनजीवन, सादगी और सांस्कृतिक एकता को दर्शाता है। चाहे वह पश्चिम बंगाल के चुनावी मंच पर हो या पटना के सभागार में आयोजित एक सांस्कृतिक कार्यक्रम, ‘झालमुड़ी’ ने यह साबित कर दिया कि भारत की असली पहचान उसकी लोकसंस्कृति में ही निहित है।
अंततः यह कहा जा सकता है कि राजनीति केवल भाषणों और घोषणाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जनभावनाओं, परंपराओं और सांस्कृतिक प्रतीकों के माध्यम से भी व्यक्त होती है। ‘झालमुड़ी’ के माध्यम से जो संदेश दिया गया, वह यह है कि भारत की आत्मा उसकी विविधता में बसती है और उसी विविधता को सम्मान देना ही सच्चा राष्ट्रनिर्माण है।
आलोक कुमार