सामाजिक कार्यकर्ता नागेंद्र सिंह ने इस मुद्दे को केवल जमीन विवाद नहीं, बल्कि “एक व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास को अवरुद्ध करने वाली सरकारी कार्रवाई” बताया है। उनका कहना है कि जब किसी व्यक्ति से उसकी जमीन, घर और मालिकाना अधिकार छीनने की कोशिश होती है, तो उसका आत्मविश्वास और सामाजिक पहचान दोनों प्रभावित होते हैं। भूमि केवल संपत्ति नहीं होती, बल्कि परिवार की मेहनत, इतिहास और भविष्य की सुरक्षा का आधार भी होती है।
इस पूरे विवाद की जड़ में रजिस्टर-2 यानी जमाबंदी पंजी का गायब होना बताया जा रहा है। बिहार में इन दिनों भूमि सर्वेक्षण का कार्य चल रहा है। इसी दौरान दीघा-राजापुल इलाके से लगातार शिकायतें सामने आईं कि पुराने राजस्व रिकॉर्ड के पन्ने गायब हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि जिन जमीनों के दस्तावेज रिकॉर्ड से हटाए गए, उन्हें बाद में सरकारी जमीन यानी “खासमहाल” घोषित कर दिया गया। इससे दशकों से बसे हजारों परिवारों पर बेदखली का खतरा मंडराने लगा है।
स्थानीय रैयतों का कहना है कि उनके पास पुराने कर रसीद, बिजली बिल, मकान कर और अन्य दस्तावेज मौजूद हैं, जो यह साबित करते हैं कि वे लंबे समय से वहां रह रहे हैं। लेकिन जब सरकारी रिकॉर्ड में जमाबंदी ही गायब दिखा दी जाए, तो आम आदमी के लिए अपने अधिकार को साबित करना बेहद कठिन हो जाता है। लोगों का आरोप है कि यह सब किसी बड़ी साजिश का हिस्सा हो सकता है, जिसमें भू-माफिया और कुछ भ्रष्ट अधिकारियों की मिलीभगत शामिल है।
दीघा क्षेत्र का महत्व भी इस विवाद को और गंभीर बनाता है। पटना का यह इलाका तेजी से विकसित हुआ है और यहां जमीन की कीमतें लगातार बढ़ी हैं। ऐसे में भूमि पर कब्जे और मालिकाना अधिकार को लेकर विवाद बढ़ना स्वाभाविक है। लेकिन यदि सरकारी रिकॉर्ड से छेड़छाड़ की बात सही साबित होती है, तो यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि जनता के भरोसे पर बड़ा हमला माना जाएगा।
इस मुद्दे को लेकर कई बार स्थानीय लोगों ने प्रदर्शन किया। महिलाओं, बुजुर्गों और युवाओं ने सड़कों पर उतरकर सरकार के खिलाफ नारे लगाए और निष्पक्ष जांच की मांग की। लोगों का कहना है कि यदि उनके पूर्वजों के समय से बसे होने के बावजूद उन्हें अतिक्रमणकारी कहा जाएगा, तो यह अन्याय होगा। उनका सवाल है कि जब वर्षों तक सरकार उनसे टैक्स और विभिन्न शुल्क लेती रही, तब उनकी जमीन वैध थी, लेकिन अचानक अब उसे सरकारी जमीन कैसे बताया जा सकता है?
हालांकि, बिहार सरकार ने हाल के दिनों में खासमहाल जमीनों को लेकर राहतकारी नीति बनाने की दिशा में कदम उठाए हैं। सरकार इस बात पर विचार कर रही है कि जो लोग 50 से 100 वर्षों से खासमहाल जमीन पर बसे हुए हैं, उन्हें बेदखल करने के बजाय निर्धारित शुल्क लेकर पट्टा या मालिकाना हक दिया जाए। यदि यह नीति पारदर्शी तरीके से लागू होती है, तो हजारों परिवारों को राहत मिल सकती है। लेकिन लोगों का कहना है कि केवल नीति की घोषणा काफी नहीं है, बल्कि जमीन रिकॉर्ड में हुई गड़बड़ियों की निष्पक्ष जांच भी जरूरी है।
इस पूरे मामले में न्यायपालिका की भूमिका भी महत्वपूर्ण बन जाती है। पटना हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि केवल रजिस्टर-2 में नाम दर्ज होना ही मालिकाना हक का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि जमीन का वास्तविक मालिक कौन है, इसका निर्णय दीवानी अदालत करेगी। इसका मतलब यह है कि यदि किसी व्यक्ति के पास अन्य वैध दस्तावेज और प्रमाण हैं, तो वह अदालत में अपने अधिकार की लड़ाई लड़ सकता है।
दीवानी न्यायालय यानी सिविल कोर्ट ऐसे ही नागरिक विवादों का निपटारा करता है। यहां संपत्ति, धन, अनुबंध, विवाह, पारिवारिक अधिकार और व्यक्तिगत अधिकारों से जुड़े मामलों की सुनवाई होती है। इन अदालतों का उद्देश्य किसी को सजा देना नहीं, बल्कि पीड़ित पक्ष के अधिकारों की रक्षा करना और न्याय सुनिश्चित करना होता है। दीघा-राजापुल विवाद में भी अंततः अदालतों की भूमिका अहम रहने वाली है।
लेकिन सवाल केवल कानूनी नहीं, मानवीय भी है। जिन परिवारों ने अपनी पूरी जिंदगी किसी जमीन पर बिताई हो, जिनके बच्चों की पढ़ाई, रोजगार और सामाजिक पहचान उसी घर से जुड़ी हो, उनके सामने अचानक बेघर होने का डर खड़ा हो जाए तो यह स्थिति बेहद पीड़ादायक होती है। विकास और शहरीकरण जरूरी है, लेकिन उसके नाम पर गरीब और मध्यम वर्गीय लोगों के अधिकारों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
सरकार को चाहिए कि वह इस पूरे मामले की पारदर्शी जांच कराए, गायब हुए रजिस्टर-2 के रिकॉर्ड की जिम्मेदारी तय करे और निर्दोष लोगों को परेशान होने से बचाए। साथ ही, जिन परिवारों के पास वैध प्रमाण हैं, उन्हें कानूनी सुरक्षा दी जाए। प्रशासन और जनता के बीच भरोसा तभी कायम रहेगा जब न्याय निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से होता दिखाई देगा।
दीघा से राजापुल तक उठ रही आवाजें केवल जमीन बचाने की लड़ाई नहीं हैं, बल्कि यह नागरिक अधिकार, सम्मान और न्याय की लड़ाई बन चुकी हैं। अगर समय रहते समाधान नहीं निकला, तो यह विवाद और बड़ा सामाजिक आंदोलन बन सकता है।
आलोक कुमार
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