बेतिया नगर निगम की राजनीति में हाल ही में हुए सशक्त स्थायी समिति के चुनाव ने एक नया राजनीतिक अध्याय खोल दिया है। यह चुनाव केवल सात सदस्यों के चयन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने नगर निगम के भीतर बदलते राजनीतिक समीकरणों और सत्ता संतुलन की वास्तविक तस्वीर भी सामने रख दी। चुनाव परिणामों ने यह स्पष्ट कर दिया कि नगर निगम के अधिकांश पार्षद अब मेयर गरिमा देवी सिकारिया के नेतृत्व से संतुष्ट नहीं हैं। परिणामस्वरूप, समिति की सातों सीटों पर विपक्षी खेमे के उम्मीदवारों ने जीत दर्ज कर ली और मेयर समर्थक एक भी उम्मीदवार चुनाव नहीं जीत सका। इसे नगर निगम के इतिहास में मेयर की सबसे बड़ी राजनीतिक पराजयों में से एक माना जा रहा है।
सशक्त स्थायी समिति नगर निगम की सबसे महत्वपूर्ण निर्णय लेने वाली संस्था होती है। नगर निगम के बजट, विकास योजनाओं, निर्माण कार्यों, निविदाओं की स्वीकृति और विभिन्न प्रशासनिक प्रस्तावों पर अंतिम निर्णय लेने में इस समिति की प्रमुख भूमिका होती है। ऐसे में समिति में बहुमत होना किसी भी मेयर के लिए राजनीतिक और प्रशासनिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। लेकिन इस चुनाव में जो परिणाम सामने आए, उन्होंने मेयर खेमे को पूरी तरह झकझोर कर रख दिया।
चुनाव से पहले नगर निगम के गलियारों में काफी हलचल थी। दोनों पक्ष अपने-अपने उम्मीदवारों को जिताने के लिए सक्रिय थे। मेयर खेमे को विश्वास था कि उनके प्रभाव और पद की शक्ति के कारण पर्याप्त समर्थन मिलेगा। वहीं विपक्ष पिछले कई महीनों से लगातार संगठनात्मक मजबूती पर काम कर रहा था। विपक्षी पार्षदों ने मेयर की कार्यशैली, विकास योजनाओं के क्रियान्वयन में कथित देरी तथा पार्षदों की उपेक्षा जैसे मुद्दों को लेकर एकजुटता दिखाई।जब मतदान के बाद परिणाम घोषित हुए तो राजनीतिक पर्यवेक्षकों के साथ-साथ नगर निगम के कई अनुभवी सदस्यों के लिए भी यह अप्रत्याशित था। सातों सीटों पर विपक्ष समर्थित उम्मीदवारों की जीत ने यह संदेश दे दिया कि निगम के भीतर सत्ता का वास्तविक केंद्र बदल चुका है। सबसे बड़ी बात यह रही कि मेयर के करीबी माने जाने वाले उम्मीदवार भी हार गए। इससे यह संकेत मिला कि चुनाव में केवल विपक्ष की मजबूती ही नहीं, बल्कि मेयर खेमे के भीतर भी गंभीर असंतोष मौजूद था।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार इस हार के पीछे कई कारण रहे। सबसे पहला कारण पार्षदों के साथ संवाद की कमी को माना जा रहा है। कई वार्ड पार्षद लंबे समय से यह शिकायत करते रहे थे कि उनके सुझावों और समस्याओं को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जा रहा था। विकास कार्यों के वितरण में भी पक्षपात के आरोप समय-समय पर लगते रहे। इससे कई ऐसे पार्षद भी नाराज हो गए जो पहले तटस्थ माने जाते थे।
दूसरा बड़ा कारण अति-आत्मविश्वास बताया जा रहा है। सत्ता में होने के कारण मेयर खेमा यह मानकर चल रहा था कि उनके पास पर्याप्त समर्थन है। लेकिन उन्होंने विपक्ष की रणनीति और पार्षदों के भीतर बढ़ती नाराजगी को गंभीरता से नहीं लिया। यही कारण रहा कि मतदान के समय उनका पूरा गणित बिगड़ गया।
तीसरा और सबसे चर्चित कारण भीतरघात या क्रॉस वोटिंग माना जा रहा है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि कुछ ऐसे पार्षदों ने भी विपक्षी उम्मीदवारों का समर्थन किया, जिन्हें मेयर का करीबी माना जाता था। यदि यह सच है तो यह मेयर के लिए राजनीतिक रूप से सबसे बड़ा झटका है, क्योंकि इससे उनके नेतृत्व पर सवाल खड़े होते हैं।
विपक्ष की रणनीति भी इस जीत का महत्वपूर्ण कारण रही। विपक्षी गुट ने व्यक्तिगत मतभेदों को भुलाकर केवल एक लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित किया—सशक्त स्थायी समिति पर कब्जा। जातीय, क्षेत्रीय और राजनीतिक समीकरणों को ध्यान में रखते हुए उम्मीदवारों का चयन किया गया। परिणामस्वरूप विपक्ष पूरी तरह सफल रहा और उसने समिति की सभी सीटों पर कब्जा जमा लिया।
इस चुनाव के बाद नगर निगम में मेयर की स्थिति पहले जैसी मजबूत नहीं रह गई है। अब कोई भी महत्वपूर्ण प्रस्ताव या वित्तीय निर्णय समिति की स्वीकृति के बिना आगे नहीं बढ़ सकता। चूंकि समिति के सभी सात सदस्य विपक्ष से जुड़े हैं, इसलिए मेयर को हर निर्णय के लिए विपक्ष से संवाद और सहयोग करना होगा। यदि दोनों पक्षों के बीच टकराव की स्थिति बनी रहती है तो विकास कार्य प्रभावित हो सकते हैं।
आने वाले समय में नगर निगम की बैठकों में राजनीतिक खींचतान बढ़ने की संभावना भी जताई जा रही है। विपक्ष अब हर प्रस्ताव की गहन समीक्षा करेगा और बिना पर्याप्त संतुष्टि के किसी भी योजना को मंजूरी देने से बच सकता है। इससे प्रशासनिक प्रक्रियाएं धीमी पड़ सकती हैं। दूसरी ओर, यदि विपक्ष जिम्मेदार भूमिका निभाता है और जनहित को प्राथमिकता देता है, तो यह समिति नगर निगम के कामकाज में पारदर्शिता और जवाबदेही भी बढ़ा सकती है।
इस चुनाव ने एक और महत्वपूर्ण संदेश दिया है कि लोकतांत्रिक संस्थाओं में केवल पद का प्रभाव पर्याप्त नहीं होता। जनप्रतिनिधियों का विश्वास बनाए रखना, संवाद कायम रखना और सभी पक्षों को साथ लेकर चलना उतना ही आवश्यक है। नगर निगम के पार्षदों ने अपने मतदान के माध्यम से यह संकेत दिया है कि वे निर्णय प्रक्रिया में सम्मानजनक भागीदारी चाहते हैं।
बेतिया की जनता की नजरें अब मेयर और विपक्ष दोनों पर टिकी हुई हैं। जनता चाहती है कि राजनीतिक संघर्ष विकास कार्यों में बाधा न बने। शहर की सड़कें, सफाई व्यवस्था, जल निकासी, पेयजल और अन्य बुनियादी सुविधाएं पहले से ही कई चुनौतियों का सामना कर रही हैं। ऐसे में राजनीतिक टकराव का खामियाजा आम नागरिकों को भुगतना पड़ सकता है।
कुल मिलाकर, सशक्त स्थायी समिति का यह चुनाव बेतिया नगर निगम की राजनीति में एक निर्णायक मोड़ साबित हुआ है। मेयर गरिमा देवी सिकारिया को मिली यह करारी हार केवल चुनावी पराजय नहीं, बल्कि निगम के भीतर बदलते राजनीतिक विश्वास का संकेत भी है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि मेयर इस चुनौती का सामना किस प्रकार करती हैं और विपक्ष अपनी नई शक्ति का उपयोग जनहित में करता है या केवल राजनीतिक बढ़त बनाए रखने के लिए। आने वाले महीनों में बेतिया नगर निगम की राजनीति और प्रशासन दोनों की दिशा काफी हद तक इसी समीकरण पर निर्भर करेगी।
आलोक कुमार
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