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गुरुवार, 28 मई 2026

India : वर्ष 2024 में गोवा सरकार ने TCP अधिनियम में संशोधन कर इस धारा को जोड़ा

गोवा नगर एवं ग्राम नियोजन अधिनियम यानी Goa Town and Country Planning (TCP) Act की धारा 39A

गोवा इस समय सिर्फ एक पर्यटन स्थल या समुद्री तटों के लिए ही चर्चा में नहीं है, बल्कि वहाँ का पर्यावरण, भूमि और विकास नीति एक बड़े जनआंदोलन का कारण बन चुकी है। विवाद का केंद्र है गोवा नगर एवं ग्राम नियोजन अधिनियम यानी Goa Town and Country Planning (TCP) Act की धारा 39A। यह धारा इतनी विवादित हो चुकी है कि सामाजिक कार्यकर्ता, पर्यावरण प्रेमी, किसान, स्थानीय निवासी और चर्च से जुड़े लोग तक इसके विरोध में सड़क पर उतर आए हैं। आंदोलन के दौरान नेतृत्व कर रहे फादर बोलमैक्स का निधन भी हो गया, लेकिन इसके बावजूद आंदोलन थमा नहीं है। लोगों की मांग आज भी स्पष्ट है—धारा 39A को पूरी तरह समाप्त किया जाए।

सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि धारा 39A आखिर है क्या। वर्ष 2024 में गोवा सरकार ने TCP अधिनियम में संशोधन कर इस धारा को जोड़ा। इस संशोधन के तहत “मुख्य नगर नियोजक” (Chief Town Planner) को अत्यधिक अधिकार दे दिए गए। अब वे किसी भी जमीन के टुकड़े का “लैंड यूज़” यानी उपयोग बदल सकते हैं। उदाहरण के लिए यदि कोई जमीन कृषि क्षेत्र, हरित क्षेत्र (Green Zone) या “नो डेवलपमेंट ज़ोन” में आती है, तब भी उसे व्यावसायिक, होटल, आवासीय या निर्माण क्षेत्र में बदला जा सकता है।

यहीं से विवाद शुरू होता है। पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह अधिकार बहुत व्यापक और खतरनाक है। पहले किसी भी भूमि उपयोग परिवर्तन के लिए सार्वजनिक चर्चा, स्थानीय निकायों की राय और लंबी प्रक्रिया होती थी। लेकिन धारा 39A के बाद यह प्रक्रिया काफी आसान हो गई है। विरोधियों का आरोप है कि इससे बड़े बिल्डर, रिसॉर्ट कंपनियाँ और निजी कारोबारी फायदा उठा रहे हैं। गोवा जैसे छोटे और पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील राज्य में यह बदलाव भविष्य के लिए गंभीर खतरा बन सकता है।

गोवा की पहचान केवल समुद्र तटों से नहीं, बल्कि उसकी हरियाली, खेती, जंगल, पहाड़ और पारंपरिक गांवों से भी है। स्थानीय लोग मानते हैं कि यदि ग्रीन ज़ोन और खेती की जमीन को लगातार निर्माण क्षेत्र में बदला गया, तो गोवा का मूल स्वरूप नष्ट हो जाएगा। इससे भूजल स्तर, जैव विविधता, नदी-तालाब और पर्यावरणीय संतुलन पर गहरा असर पड़ेगा। गोवा पहले से ही अनियंत्रित पर्यटन और निर्माण के दबाव से जूझ रहा है। ऐसे में धारा 39A को “विकास” के नाम पर पर्यावरण विनाश का रास्ता बताया जा रहा है।

आंदोलनकारियों का एक बड़ा आरोप “स्पॉट ज़ोनिंग” को लेकर भी है। इसका मतलब है कि किसी विशेष जमीन के छोटे हिस्से को अचानक अलग श्रेणी में बदल देना। विरोधियों का कहना है कि इससे पारदर्शिता खत्म होती है और प्रभावशाली लोगों को लाभ पहुंचता है। कई मामलों में स्थानीय निवासियों को तब पता चलता है जब निर्माण कार्य शुरू हो जाता है। इससे लोगों के भीतर यह भावना मजबूत हुई है कि निर्णय जनता के हित में नहीं बल्कि निजी पूंजी के हित में लिए जा रहे हैं।

इस आंदोलन में चर्च, सामाजिक संगठन, किसान समूह और युवा भी बड़ी संख्या में शामिल हुए हैं। फादर बोलमैक्स जैसे सामाजिक कार्यकर्ता इस संघर्ष का प्रमुख चेहरा बनकर उभरे। वे लगातार लोगों को संगठित कर रहे थे और पर्यावरण बचाने की अपील कर रहे थे। आंदोलन के दौरान उनके निधन ने इस संघर्ष को और भावनात्मक बना दिया। कई लोगों ने इसे “गोवा की आत्मा को बचाने की लड़ाई” कहा। उनके निधन के बाद भी प्रदर्शन जारी हैं, जो यह दर्शाता है कि यह केवल एक व्यक्ति का आंदोलन नहीं बल्कि व्यापक जनभावना का मुद्दा बन चुका है।

दूसरी ओर गोवा सरकार और TCP मंत्री Vishwajit Rane का कहना है कि यह कानून पूरी तरह वैधानिक है और विधानसभा द्वारा पारित किया गया है। सरकार का तर्क है कि विकास के लिए कुछ लचीलापन जरूरी है। उनका कहना है कि यदि किसी व्यक्ति या संगठन को आपत्ति है तो वे अदालत का दरवाजा खटखटा सकते हैं। सरकार यह भी दावा करती है कि सभी बदलाव कानूनी प्रक्रिया के तहत किए जाते हैं और इससे राज्य में निवेश तथा आर्थिक गतिविधियाँ बढ़ेंगी।

लेकिन विरोधियों का सवाल है कि क्या विकास का मतलब सिर्फ बड़े निर्माण और व्यावसायिक परियोजनाएँ हैं? क्या विकास के नाम पर पर्यावरण और स्थानीय समुदायों की पहचान को खतरे में डाला जा सकता है? गोवा में पहले भी अवैध खनन, अतिक्रमण और अनियंत्रित निर्माण को लेकर विवाद होते रहे हैं। ऐसे में धारा 39A ने लोगों के अविश्वास को और गहरा कर दिया है।

यह विवाद केवल गोवा तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे देश के लिए एक महत्वपूर्ण उदाहरण बनता जा रहा है। भारत के कई राज्यों में विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन को लेकर बहस चल रही है। एक तरफ रोजगार, निवेश और आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत है, वहीं दूसरी ओर प्राकृतिक संसाधनों और स्थानीय संस्कृति को बचाना भी उतना ही जरूरी है। गोवा का मामला इसी संघर्ष का प्रतीक बन चुका है।

आंदोलनकारियों की मुख्य मांग साफ है—धारा 39A को पूरी तरह हटाया जाए। उनका मानना है कि जब तक यह प्रावधान कानून में रहेगा, तब तक पर्यावरण और सार्वजनिक हित खतरे में रहेंगे। वे चाहते हैं कि भूमि उपयोग परिवर्तन की पुरानी पारदर्शी व्यवस्था वापस लाई जाए, जिसमें जनता की भागीदारी और पर्यावरणीय समीक्षा अनिवार्य हो।

अंततः यह मुद्दा केवल एक कानूनी धारा का नहीं बल्कि लोकतंत्र, पारदर्शिता, पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय अधिकारों का प्रश्न बन गया है। गोवा की जनता यह संदेश देना चाहती है कि विकास जरूरी है, लेकिन ऐसा विकास नहीं जो प्रकृति, संस्कृति और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को खतरे में डाल दे।

आलोक कुमार

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