नगर गजरौला, जनपद अमरोहा में स्थित ईसाई कब्रिस्तान को लेकर उठी आवाज
गजरौला के मायापुरी क्षेत्र, पुराने बाबा तालाब के पास स्थित यह कब्रिस्तान लगभग 60 वर्ष पहले स्थानीय ईसाई समाज के अंतिम संस्कार और धार्मिक परंपराओं को ध्यान में रखते हुए आवंटित किया गया था। समय के साथ यह स्थान नगर के समस्त मसीही समुदाय की आस्था और स्मृतियों का केंद्र बन गया। यहां कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट दोनों समुदायों के लोग अपने परिजनों का अंतिम संस्कार करते हैं। छोटे नगरों में अक्सर अलग-अलग संप्रदायों के लिए पृथक कब्रिस्तान नहीं होते, इसलिए यह कब्रिस्तान पूरे ईसाई समाज की साझा धरोहर माना जाता है।
लेकिन बीते कुछ वर्षों में इस कब्रिस्तान पर अतिक्रमण और जलभराव की समस्या लगातार बढ़ती गई। राष्ट्रीय मसीह संगठन का आरोप है कि कुछ असामाजिक तत्वों द्वारा कब्रिस्तान की भूमि पर कब्जा करने का प्रयास किया गया, जिससे कई कब्रों को नुकसान पहुंचा। बरसात के दिनों में जलभराव की स्थिति इतनी गंभीर हो जाती है कि अंतिम संस्कार करना भी कठिन हो जाता है। अप्रैल महीने की घटना ने पूरे समाज को झकझोर दिया, जब एक मृतक के परिजनों को कब्रिस्तान में जगह और सुविधा नहीं मिलने के कारण दूसरे शहर जाकर अंतिम संस्कार करना पड़ा। इस घटना ने समाज की पीड़ा और प्रशासनिक उदासीनता दोनों को उजागर कर दिया।
राष्ट्रीय मसीह संगठन के मंडल अध्यक्ष अनिल उठवाल के नेतृत्व में पहले भी प्रशासन को ज्ञापन सौंपा गया था। संगठन ने स्पष्ट रूप से कहा कि कब्रिस्तान पर अतिक्रमण केवल जमीन का विवाद नहीं, बल्कि धार्मिक भावनाओं पर चोट है। कब्रिस्तान हर समुदाय के लिए पवित्र स्थान होता है, जहां लोग अपने पूर्वजों को सम्मानपूर्वक दफनाते हैं और उनकी स्मृतियों से जुड़े रहते हैं। यदि ऐसे स्थानों पर अतिक्रमण होने लगे और प्रशासन समय पर कार्रवाई न करे, तो यह समाज में असुरक्षा और असंतोष की भावना पैदा करता है।
22 मई को होने वाला ज्ञापन कार्यक्रम इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि यह केवल विरोध प्रदर्शन नहीं, बल्कि समाज की एकता का प्रदर्शन भी होगा। राष्ट्रीय मसीह संगठन ने सभी चर्चों, प्रार्थना सभाओं और ईसाई संस्थाओं से सहयोग की अपील की है। संगठन का कहना है कि यदि आज समाज अपने अधिकारों के लिए एकजुट नहीं होगा, तो भविष्य में धार्मिक स्थलों की सुरक्षा और भी कठिन हो जाएगी।इस पूरे विवाद में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी सामने आया है कि यह कब्रिस्तान किसी एक संप्रदाय का नहीं है। अक्सर लोग यह सवाल पूछते हैं कि यह कब्रिस्तान कैथोलिक समाज का है या प्रोटेस्टेंट समाज का। लेकिन स्थानीय स्तर पर यह स्पष्ट किया गया है कि गजरौला का यह कब्रिस्तान पूरे मसीही समाज का साझा कब्रिस्तान है। यहां कैथोलिक, मेथोडिस्ट, पेंटाकोस्टल और अन्य प्रोटेस्टेंट समुदायों के लोग समान रूप से अंतिम संस्कार करते हैं। यही कारण है कि इस मुद्दे को लेकर पूरे ईसाई समाज में चिंता और एकजुटता दिखाई दे रही है।
धार्मिक स्थलों और कब्रिस्तानों की सुरक्षा किसी भी लोकतांत्रिक समाज की जिम्मेदारी होती है। संविधान सभी नागरिकों को अपने धर्म का पालन करने और धार्मिक परंपराओं को सुरक्षित रखने का अधिकार देता है। ऐसे में यदि किसी समुदाय को अपने मृतकों के अंतिम संस्कार तक में कठिनाई का सामना करना पड़े, तो यह गंभीर प्रशासनिक विषय बन जाता है। स्थानीय प्रशासन से अपेक्षा की जा रही है कि वह जल्द से जल्द कब्रिस्तान की भूमि का सीमांकन कर अतिक्रमण हटवाए तथा जलनिकासी की स्थायी व्यवस्था सुनिश्चित करे।
समाज के वरिष्ठ लोगों का कहना है कि यह संघर्ष किसी के खिलाफ नहीं, बल्कि अपने अधिकार और सम्मान की रक्षा के लिए है। शांतिपूर्ण तरीके से ज्ञापन देना और प्रशासन से न्याय की मांग करना लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है। यही कारण है कि कार्यक्रम में सभी से अनुशासन और एकता बनाए रखने की अपील भी की गई है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि समाज आपसी मतभेदों को भूलकर एक मंच पर आए। कब्रिस्तान केवल मृतकों की दफन भूमि नहीं, बल्कि समाज की ऐतिहासिक और आध्यात्मिक पहचान का प्रतीक होता है। यदि इस पहचान को बचाने के लिए समाज आवाज नहीं उठाएगा, तो आने वाली पीढ़ियां अपने इतिहास और परंपराओं से दूर हो जाएंगी।
22 मई का दिन गजरौला के ईसाई समाज के लिए केवल ज्ञापन देने का दिन नहीं होगा, बल्कि यह अपने अधिकार, अस्तित्व और सम्मान के लिए एकजुटता का संदेश देने का अवसर भी बनेगा। प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वह इस मामले को गंभीरता से लेकर शीघ्र समाधान सुनिश्चित करे, ताकि समाज में विश्वास कायम रह सके और भविष्य में ऐसी समस्याएं दोबारा उत्पन्न न हों।
आलोक कुमार
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