हिंदू खतरे में है या भविष्य? NEET के सवाल पर राजनीति कब तक?
जब बच्चों के हाथ में किताबें हों और नेताओं के हाथ में ‘खतरे’ का नारा, तब सवाल सिर्फ राजनीति का नहीं, देश के भविष्य का होता है।
सोशल मीडिया पर एक पोस्टर तेजी से वायरल है, जिसमें सांसद रवि किशन के नाम से कथित तौर पर कहा गया है—“यहाँ हिंदू खतरे में है और तुम लोगों को NEET एग्जाम की पड़ी है। जब हिंदू ही नहीं रहेगा तो NEET एग्जाम का क्या करोगे?” हालांकि इस कथन की स्वतंत्र और विश्वसनीय पुष्टि नहीं मिली है। इसलिए इसे रवि किशन का प्रमाणित बयान मान लेना उचित नहीं होगा। लेकिन इस वायरल पोस्टर ने एक गंभीर सवाल जरूर खड़ा कर दिया है—क्या हमारे बच्चों के भविष्य के सवालों को भी धार्मिक भय की राजनीति के नीचे दबा दिया जाएगा?
NEET सिर्फ एक परीक्षा नहीं है। यह लाखों विद्यार्थियों के सपनों का रास्ता है। किसी के लिए डॉक्टर बनने का सपना, किसी परिवार की वर्षों की मेहनत और किसी गरीब या मध्यमवर्गीय परिवार के लिए सामाजिक-आर्थिक बदलाव की उम्मीद। जिस बच्चे ने वर्षों तक किताबों के बीच बैठकर पढ़ाई की, उसके सामने परीक्षा का सवाल आता है तो उसे रोजगार, मेडिकल कॉलेजों की सीट, फीस, कोचिंग का खर्च, परीक्षा की पारदर्शिता और भविष्य की चिंता होती है।
उसे यह सुनने की जरूरत नहीं कि वह पहले यह साबित करे कि वह किस धर्म का है।
डर की राजनीति से बच्चों का भविष्य नहीं बनता
राजनीति में धार्मिक भावनाओं का इस्तेमाल नया नहीं है। लेकिन जब ‘खतरे’ की भाषा इतनी हावी हो जाए कि शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य और युवाओं के भविष्य के प्रश्न पीछे छूट जाएँ, तब लोकतंत्र को खुद से सवाल करना चाहिए।
अगर हिंदू खतरे में है तो खतरे का तथ्य क्या है?
कहाँ खतरा है? किससे खतरा है? सरकार या संबंधित संगठनों के पास इसके प्रमाण और आंकड़े क्या हैं? और यदि कोई वास्तविक खतरा है तो उसका समाधान क्या है?
इन सवालों का जवाब दिए बिना केवल “हिंदू खतरे में है” कहना समस्या का समाधान नहीं हो सकता। भय पैदा करना और समाधान देना दो अलग बातें हैं।
भारत के बच्चे किसी धार्मिक युद्ध के लिए पैदा नहीं हुए हैं। वे डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक, वैज्ञानिक, किसान, उद्यमी और सैनिक बनने का सपना देखते हैं। वे अपने माता-पिता की उम्मीद हैं। उनके लिए सबसे बड़ा सवाल यह है कि उन्हें बेहतर शिक्षा और सम्मानजनक भविष्य कब मिलेगा।
NEET की तैयारी करने वाला बच्चा किसी का दुश्मन नहीं
विडंबना यह है कि एक तरफ देश मेडिकल शिक्षा को मजबूत करने की बात करता है, दूसरी तरफ NEET जैसी परीक्षा को लेकर लाखों परिवार तनाव में रहते हैं। परीक्षा व्यवस्था, सीटों की उपलब्धता, फीस, कोचिंग का खर्च और पारदर्शिता जैसे मुद्दे लगातार चर्चा में रहते हैं।
ऐसे समय में यदि कोई राजनीतिक संदेश युवाओं से कहे कि “पहले धर्म बचाओ, परीक्षा बाद में देना”, तो यह विद्यार्थियों की वास्तविक चिंताओं से ध्यान हटाने जैसा होगा।
देश का हिंदू तभी मजबूत होगा जब उसका बच्चा शिक्षित होगा।
देश का मुसलमान तभी मजबूत होगा जब उसका बच्चा शिक्षित होगा। देश का ईसाई, सिख, बौद्ध, जैन या किसी भी समुदाय का बच्चा तभी मजबूत होगा जब उसके हाथ में किताब होगी, उसके पास अवसर होगा और उसकी मेहनत को न्याय मिलेगा।
भारत की ताकत किसी एक समुदाय के भय में नहीं, बल्कि उसके नागरिकों की शिक्षा, अवसर और संवैधानिक समानता में है।
नेताओं से एक सीधा सवाल
अगर सचमुच हिंदू खतरे में है तो नेताओं को केवल चुनावी मंचों से नारे लगाने के बजाय संसद और सार्वजनिक नीति के स्तर पर ठोस समाधान सामने रखना चाहिए।
अगर युवा खतरे में है तो बेरोजगारी पर बहस होनी चाहिए।
अगर विद्यार्थी खतरे में हैं तो परीक्षा व्यवस्था की पारदर्शिता पर बहस होनी चाहिए।
अगर गरीब परिवार खतरे में हैं तो मेडिकल शिक्षा की बढ़ती लागत और अवसरों की उपलब्धता पर बहस होनी चाहिए।
अगर देश का भविष्य खतरे में है तो सरकारी स्कूलों, विश्वविद्यालयों, स्वास्थ्य व्यवस्था और रोजगार पर बहस होनी चाहिए।
सिर्फ खतरे का नारा लगाने से कोई खतरा खत्म नहीं होता।
और यदि कोई नेता वास्तव में ऐसा बयान देता है, तो उससे यह पूछना बिल्कुल जायज है कि वह युवाओं को डर देना चाहता है या दिशा?
धर्म की रक्षा शिक्षा से भी होती है
किसी भी धर्म की वास्तविक शक्ति केवल राजनीतिक नारों में नहीं होती। वह उसके मूल्यों, संस्कृति, शिक्षा, नैतिकता और मानवीय संवेदना में होती है।
अगर कोई हिंदू परिवार अपने बच्चे को डॉक्टर बनाना चाहता है तो उसे NEET की तैयारी करने दीजिए। उसे डराइए मत।
उसे यह मत बताइए कि उसका भविष्य किसी दूसरे समुदाय की मौजूदगी से खतरे में है। उसे यह बताइए कि वह पढ़े, आगे बढ़े और समाज की सेवा करे।
कल वही डॉक्टर किसी हिंदू मरीज का इलाज करेगा और किसी मुसलमान, ईसाई या सिख मरीज का भी। अस्पताल में बीमारी मरीज का धर्म पूछकर शरीर में प्रवेश नहीं करती।
असली खतरा क्या है?
आज भारत के सामने असली सवाल यह नहीं होना चाहिए कि कौन किससे खतरे में है। असली सवाल यह है कि क्या हमारे बच्चे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पा रहे हैं? क्या युवाओं को रोजगार मिल रहा है? क्या परीक्षाएँ पारदर्शी हैं? क्या गरीब परिवार का बच्चा भी डॉक्टर बनने का सपना पूरा कर सकता है?
इन सवालों से ध्यान हटाकर समाज को धार्मिक डर में उलझाना आसान हो सकता है, लेकिन इससे देश मजबूत नहीं होगा।
इसलिए वायरल पोस्टर चाहे किसी का वास्तविक बयान हो या सोशल मीडिया पर बनाई गई सामग्री—उसकी सत्यता की जांच जरूरी है। बिना प्रमाण किसी व्यक्ति के नाम से बयान फैलाना भी उचित नहीं है। लेकिन यदि कोई व्यक्ति वास्तव में ऐसा बयान देता है, तो उससे जवाब मांगना भी लोकतांत्रिक अधिकार है।
“हिंदू खतरे में है”—यह कहने से पहले खतरे का प्रमाण दीजिए।
और बच्चों से यह कहने से पहले कि “NEET की क्या जरूरत है”, एक बार उनके सपनों को देखिए।
क्योंकि जिस देश के बच्चे डॉक्टर बनने की तैयारी कर रहे हों, उस देश को उनके हाथ में किताब चाहिए—डर का झंडा नहीं।
भारत का भविष्य केवल मंदिर-मस्जिद की बहस से नहीं, बल्कि स्कूल-कॉलेज, अस्पताल, प्रयोगशालाओं और रोजगार के अवसरों से भी तय होगा।
और याद रखिए—
जिस दिन राजनीति ने बच्चों की किताबों से बड़ा अपना धार्मिक डर बना लिया, उसी दिन सवाल केवल हिंदू-मुसलमान का नहीं, भारत के भविष्य का हो जाता है।
आलोेक कुमार
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