कुर्जी होली फैमिली हॉस्पिटल में वेतन समझौता: टकराव से सहमति तक का सफर
राजधानी पटना स्थित Kurji Holy Family Hospital बिहार के प्रमुख निजी और मिशनरी अस्पतालों में से एक माना जाता है। वर्षों से यह अस्पताल चिकित्सा सेवा, सामाजिक दायित्व और मानवता की सेवा के लिए अपनी पहचान बनाए हुए है। अस्पताल में कार्यरत कर्मचारियों के हितों की रक्षा और उनकी समस्याओं को उठाने के लिए कुर्जी होली फैमिली अस्पताल कर्मचारी यूनियन भी सक्रिय रूप से कार्य करती रही है। समय-समय पर अस्पताल प्रबंधन और यूनियन के बीच विभिन्न मुद्दों पर बातचीत होती रही है, लेकिन हाल के वर्षों में वेतन वृद्धि को लेकर जो घटनाक्रम सामने आया, उसने श्रम संबंधों और संवाद की एक दिलचस्प मिसाल पेश की।
किसी भी संस्थान में कर्मचारी यूनियन का प्रारंभिक स्वरूप प्रायः संघर्षशील होता है। कर्मचारियों की मांगों को मजबूती से रखने के लिए यूनियन को कई बार आक्रामक रुख अपनाना पड़ता है। कुर्जी होली फैमिली अस्पताल कर्मचारी यूनियन के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। शुरुआती दौर में यूनियन के तेवर काफी सख्त दिखाई देते थे, लेकिन समय के साथ उसने अस्पताल और कर्मचारियों दोनों के हितों के बीच संतुलन बनाने का प्रयास किया। यही कारण है कि धीरे-धीरे यूनियन को केवल विरोध करने वाली संस्था नहीं, बल्कि अस्पताल की हितैषी और जिम्मेदार संगठन के रूप में देखा जाने लगा।
अस्पताल में प्रत्येक तीन वर्ष के अंतराल पर वेतन, भत्तों और अन्य सुविधाओं में वृद्धि को लेकर बातचीत होती है। यह प्रक्रिया कर्मचारियों और प्रबंधन दोनों के लिए महत्वपूर्ण होती है क्योंकि इससे कर्मचारियों की आर्थिक स्थिति और संस्थान की वित्तीय व्यवस्था दोनों प्रभावित होती हैं। हालिया वेतन पुनरीक्षण के दौरान भी यही स्थिति देखने को मिली।
यूनियन ने कर्मचारियों की बढ़ती जरूरतों, महंगाई और जीवन-यापन की बढ़ती लागत को ध्यान में रखते हुए प्रबंधन के समक्ष वेतन वृद्धि की मांग रखी। मांग पत्र में कर्मचारियों के वेतन एवं अन्य लाभों में उल्लेखनीय बढ़ोतरी की अपेक्षा की गई थी। अस्पताल की प्रशासिका ने यूनियन के मांग पत्र को स्वीकार तो कर लिया, लेकिन बातचीत के दौरान उनका रुख काफी स्पष्ट था। उन्होंने दृढ़ता के साथ कहा कि अस्पताल प्रबंधन 20 प्रतिशत से अधिक वेतन वृद्धि देने की स्थिति में नहीं है।
प्रबंधन का यह रुख सामने आने के बाद यूनियन ने भी अपने तेवर दिखाए। यूनियन नेताओं ने स्पष्ट घोषणा कर दी कि वे 25 प्रतिशत से कम वेतन वृद्धि पर समझौता नहीं करेंगे। इस प्रकार बातचीत का केंद्र बिंदु पांच प्रतिशत का अंतर बन गया। एक ओर प्रबंधन 20 प्रतिशत की सीमा पर अडिग था, तो दूसरी ओर यूनियन 25 प्रतिशत से नीचे आने को तैयार नहीं थी।
स्थिति धीरे-धीरे गतिरोध की ओर बढ़ने लगी। कई दौर की वार्ताएं आयोजित की गईं, लेकिन कोई ठोस समाधान नहीं निकल सका। दोनों पक्ष अपने-अपने तर्कों के साथ डटे रहे। प्रबंधन का कहना था कि अस्पताल की आर्थिक परिस्थितियों, संचालन लागत और स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र की चुनौतियों को देखते हुए 20 प्रतिशत से अधिक वृद्धि संभव नहीं है। दूसरी तरफ यूनियन का तर्क था कि कर्मचारियों की मेहनत, अस्पताल की प्रगति में उनका योगदान और लगातार बढ़ती महंगाई को देखते हुए 25 प्रतिशत वृद्धि पूरी तरह न्यायसंगत है।
इस पूरे घटनाक्रम के दौरान बिहार के मिशनरी संस्थानों में कर्मचारी यूनियनों को लेकर पुराने अनुभवों की चर्चा भी होने लगी। यह सर्वविदित है कि राज्य में कई ईसाई मिशनरी संस्थाएं शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में महत्वपूर्ण सेवाएं दे रही हैं। हालांकि, अनेक बार इन संस्थानों में कर्मचारी यूनियनों को लेकर मतभेद भी देखने को मिले हैं। कर्मचारियों के बीच यह धारणा रही है कि कुछ मिशनरी संस्थान यूनियन गतिविधियों को सहज रूप से स्वीकार नहीं करते।
ऐसे ही संदर्भ में मोकामा स्थित Nazareth Hospital का उदाहरण अक्सर दिया जाता है। यह अस्पताल Sisters of Charity of Nazareth द्वारा संचालित था। कर्मचारी यूनियन से जुड़े विवादों के बाद अस्पताल बंद हो गया और वहां कार्यरत अनेक कर्मचारियों को रोजगार संकट का सामना करना पड़ा। इस घटना ने स्वास्थ्य क्षेत्र के कर्मचारियों के बीच गहरी चिंता पैदा की थी।
यही कारण था कि जब कुर्जी होली फैमिली अस्पताल में वेतन वृद्धि को लेकर विवाद बढ़ा तो कर्मचारियों और यूनियन के बीच यह आशंका भी बनी रही कि कहीं स्थिति अनावश्यक रूप से जटिल न हो जाए। हालांकि, कुर्जी अस्पताल में दोनों पक्षों ने अंततः संवाद का रास्ता नहीं छोड़ा और समाधान खोजने की कोशिश जारी रखी।
जब कई दौर की वार्ता विफल हो गई तो मामला बिहार सरकार के श्रम संसाधन विभाग के पास पहुंचा। इसके बाद समाधान की जिम्मेदारी सरकारी मध्यस्थता पर आ गई। पटना के उप श्रमायुक्त के रूप में कार्यरत Akbar Javed ने इस मामले में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
उन्होंने दोनों पक्षों को कई बार आमने-सामने बैठाकर चर्चा कराई। प्रबंधन और यूनियन के तर्कों को ध्यानपूर्वक सुना गया। एक ओर अस्पताल की वित्तीय सीमाओं पर विचार किया गया, वहीं दूसरी ओर कर्मचारियों की जायज अपेक्षाओं और उनकी आर्थिक जरूरतों को भी महत्व दिया गया।
अंततः उप श्रमायुक्त की मध्यस्थता रंग लाई। जिस प्रकार बिहार की राजनीति में कभी “25 से 30, फिर से नीतीश” जैसा नारा चर्चा का विषय बना था, उसी तरह इस विवाद में भी “20 बनाम 25” की स्थिति बनी हुई थी। लेकिन सफल मध्यस्थता के बाद दोनों पक्षों के बीच 22 प्रतिशत वेतन वृद्धि पर सहमति बन गई। यह समझौता न केवल एक व्यावहारिक समाधान था, बल्कि संवाद और संतुलन की जीत भी थी।
22 प्रतिशत की वृद्धि पर हुआ यह समझौता इस बात का प्रमाण है कि श्रम संबंधों में टकराव से अधिक महत्वपूर्ण संवाद और समझदारी होती है। प्रबंधन ने अपनी सीमा से आगे बढ़कर कर्मचारियों की मांगों का सम्मान किया, वहीं यूनियन ने भी संस्थान के व्यापक हितों को ध्यान में रखते हुए लचीलापन दिखाया।
कुर्जी होली फैमिली अस्पताल का यह अनुभव बताता है कि यदि दोनों पक्ष सकारात्मक सोच और पारस्परिक सम्मान के साथ बातचीत करें तो कठिन से कठिन विवाद का भी समाधान निकाला जा सकता है। यह समझौता केवल वेतन वृद्धि का मामला नहीं था, बल्कि कर्मचारियों, यूनियन, प्रबंधन और श्रम विभाग के बीच सहयोग, विश्वास और लोकतांत्रिक संवाद की एक महत्वपूर्ण मिसाल भी बन गया।
आलोक कुमार
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