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सोमवार, 1 जून 2026

Bihar : अपराध सिद्ध हुआ और सजा सुनाई गई

 34 साल बाद मिला न्याय या न्याय की विडंबना?

एक समय बिहार सहित पूरे देश में अनौपचारिक शिक्षा के तहत प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रम चलाया जाता था। जिन लोगों को बचपन और युवावस्था में पढ़ने का अवसर नहीं मिला, उन्हें सरकार बुढ़ापे में अक्षर ज्ञान देने का प्रयास करती थी। इसके लिए अलग विभाग था, पाठ्यक्रम तैयार होते थे और गांव-गांव में केंद्र संचालित किए जाते थे। जिनकी उम्र जीवन की सांध्य बेला में पहुंच चुकी होती थी, उन्हें भी शिक्षा के दायरे में लाने की कोशिश होती थी। उस समय यह माना जाता था कि शिक्षा प्राप्त करने की कोई उम्र नहीं होती।

अब कुछ ऐसा ही दृश्य न्याय व्यवस्था में भी दिखाई देने लगा है। फर्क सिर्फ इतना है कि वहां पढ़ाई नहीं, बल्कि न्याय का पाठ पढ़ाया जा रहा है। ऐसा लगता है कि व्यवस्था कह रही हो—"भले ही जीवन का अधिकांश हिस्सा बीत जाए, लेकिन न्याय अवश्य मिलेगा।"

मामला वैशाली जिले का जुड़ावनपुर का है। वर्ष 1992 में आपसी विवाद के दौरान पांच लोगों ने घर के सामने बैठे व्यक्तियों पर गोलीबारी की थी। मामला अदालत पहुंचा और न्यायिक प्रक्रिया शुरू हुई। लेकिन न्याय की गाड़ी इतनी धीमी चली कि फैसला आने में पूरे 34 वर्ष लग गए। जब अदालत ने निर्णय सुनाया, तब तक आरोपित पांच व्यक्तियों में से चार की मृत्यु हो चुकी थी। केवल एक आरोपी, दीप राय, जीवित बचे थे जिनकी उम्र अब लगभग 85 वर्ष हो चुकी है।

अदालत ने उन्हें दोषी मानते हुए जेल भेजने का आदेश दिया। कानूनी दृष्टि से देखा जाए तो अदालत ने अपना दायित्व निभाया। अपराध सिद्ध हुआ और सजा सुनाई गई। लेकिन इसी बिंदु पर कई सवाल भी खड़े होते हैं।

जिस व्यक्ति को जेल भेजा गया, वह इतना वृद्ध है कि स्वयं ठीक से चल भी नहीं सकता। उसे दो लोगों के सहारे उठाकर ले जाना पड़ता है। शरीर कमजोर हो चुका है और उम्र का असर साफ दिखाई देता है। ऐसे में स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि जेल में वह अपनी दैनिक आवश्यकताओं को कैसे पूरा करेगा? खाना, नहाना, शौचालय जाना या अन्य सामान्य कार्य भी उसके लिए चुनौती हो सकते हैं।

विडंबना यह है कि जिन चार लोगों के साथ मुकदमा चला, वे फैसला आने से पहले ही इस दुनिया से विदा हो गए। यदि न्याय का उद्देश्य अपराधी को दंड देकर समाज में कानून का सम्मान स्थापित करना है, तो उन चार मृत व्यक्तियों के संदर्भ में यह उद्देश्य कैसे पूरा हुआ? और यदि फैसला आने में ही 34 साल लग जाएं, तो क्या यह न्याय व्यवस्था की सफलता कही जाएगी?

भारत की न्याय व्यवस्था में एक प्रसिद्ध कहावत है—"Justice delayed is justice denied" अर्थात न्याय में देरी भी अन्याय के समान है। यह मामला उसी कहावत की याद दिलाता है। पीड़ित पक्ष को भी 34 वर्षों तक इंतजार करना पड़ा और आरोपित पक्ष को भी। दोनों पक्षों ने अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा अदालतों के चक्कर लगाते हुए बिताया होगा।

हालांकि कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि केवल वृद्धावस्था किसी व्यक्ति को सजा से मुक्त नहीं कर सकती। भारतीय कानून में अपराध करने की कोई अधिकतम आयु सीमा नहीं है। यदि अपराध सिद्ध हो जाता है तो अदालत सजा दे सकती है, चाहे आरोपी की उम्र 25 वर्ष हो या 85 वर्ष। इसलिए दीप राय को जेल भेजना कानून के दायरे में पूरी तरह संभव है।

दूसरी ओर जेल मैनुअल और विभिन्न राज्यों की नीतियों में बुजुर्ग तथा अस्वस्थ कैदियों के लिए कुछ विशेष प्रावधान भी मौजूद हैं। समय-पूर्व रिहाई, पैरोल, स्वास्थ्य के आधार पर राहत और राज्य सरकार द्वारा सजा में छूट जैसी व्यवस्थाएं उपलब्ध हैं। लेकिन ये सुविधाएं स्वतः नहीं मिलतीं। इसके लिए निर्धारित प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है और राज्य सरकार या संबंधित प्राधिकरण को निर्णय लेना होता है।

पटना उच्च न्यायालय की अधिवक्ता प्रतिमा कुमारी का भी मानना है कि यदि संबंधित प्रावधान लागू होते हों तो ऐसे वृद्ध व्यक्ति को राहत मिल सकती है। लेकिन यह निर्णय न्यायालय या सरकार को कानूनी मानदंडों के आधार पर लेना होगा।

यह पूरा मामला एक व्यापक प्रश्न खड़ा करता है। आखिर न्यायिक प्रक्रिया इतनी लंबी क्यों होती है? यदि किसी मुकदमे का फैसला आने में तीन दशक से अधिक समय लग जाए, तो उसका सामाजिक और मानवीय प्रभाव क्या होगा? पीड़ित को देर से मिला न्याय कितनी संतुष्टि देगा और आरोपी को जीवन के अंतिम पड़ाव में मिली सजा का वास्तविक अर्थ क्या रह जाएगा?

वैशाली का यह मामला केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं है। यह भारतीय न्याय व्यवस्था की उस चुनौती को सामने लाता है जिसमें लाखों मुकदमे वर्षों से लंबित हैं। जब फैसला आने तक गवाह बूढ़े हो जाएं, आरोपी मर जाएं और परिस्थितियां पूरी तरह बदल जाएं, तब न्याय का स्वरूप भी बदल जाता है।

कानून की नजर में फैसला सही हो सकता है, लेकिन समाज की नजर में यह प्रश्न बना रहेगा कि क्या 34 साल बाद मिला दंड वास्तव में न्याय है या फिर न्यायिक विलंब की एक ऐसी मिसाल, जो व्यवस्था को आत्ममंथन करने के लिए मजबूर करती है। न्याय केवल दिया जाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि समय पर दिया जाना भी उतना ही आवश्यक है। तभी न्याय का वास्तविक उद्देश्य पूरा हो सकता है।

आलोक कुमार


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