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सोमवार, 1 जून 2026

India : दो जून की रोटी का संघर्ष: भारत के मेहनतकश वर्ग की कड़वी हकीकत

 दो जून की रोटी का संघर्ष: भारत के मेहनतकश वर्ग की कड़वी हकीकत

“दो जून की रोटी” केवल एक मुहावरा नहीं है, बल्कि करोड़ों भारतीयों के जीवन का सबसे बड़ा संघर्ष है। इसका अर्थ है दिन में दो समय भरपेट भोजन की व्यवस्था करना। सुनने में यह एक सामान्य आवश्यकता लगती है, लेकिन भारत के असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले मजदूरों, भूमिहीन किसानों, प्रवासी श्रमिकों और गरीब परिवारों के लिए यह आज भी एक कठिन चुनौती बनी हुई है। वर्ष 2026 में भारत दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होने की ओर बढ़ रहा है, लेकिन इसके बावजूद समाज का एक बड़ा वर्ग आज भी रोज़ी-रोटी की चिंता में अपना जीवन गुजार रहा है।

भारत की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा असंगठित क्षेत्र पर आधारित है। निर्माण कार्य, कृषि, ईंट-भट्ठे, घरेलू कामकाज, रिक्शा-चालन, छोटे दुकानों और कारखानों में काम करने वाले करोड़ों लोग इसी क्षेत्र से जुड़े हैं। इन श्रमिकों की सबसे बड़ी समस्या अनियमित आय है। दिहाड़ी मजदूरों को काम मिलने पर ही मजदूरी मिलती है। यदि किसी दिन काम नहीं मिला, बारिश हो गई या तबीयत खराब हो गई, तो उस दिन परिवार के चूल्हे पर संकट खड़ा हो जाता है। यही कारण है कि उनके जीवन में आर्थिक सुरक्षा लगभग नहीं के बराबर होती है।

महँगाई ने इस समस्या को और गंभीर बना दिया है। पिछले कुछ वर्षों में खाद्यान्न, सब्जियों, दालों, रसोई गैस, ईंधन और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में लगातार वृद्धि हुई है। गरीब परिवारों की आय जिस गति से नहीं बढ़ी, उससे कहीं अधिक तेजी से खर्च बढ़ गया। परिणामस्वरूप उन्हें अपनी जरूरतों में कटौती करनी पड़ती है। कई परिवार पौष्टिक भोजन से वंचित रह जाते हैं और केवल पेट भरने के लिए सस्ते खाद्य पदार्थों पर निर्भर रहते हैं। बच्चों और महिलाओं में कुपोषण की समस्या भी इसी आर्थिक असमानता का परिणाम है।

ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के सीमित अवसर भी लोगों को पलायन के लिए मजबूर करते हैं। खेती पर निर्भर लाखों परिवारों को वर्षभर पर्याप्त काम नहीं मिल पाता। छोटे और सीमांत किसानों की आय अक्सर खेती की लागत भी नहीं निकाल पाती। ऐसे में गांवों से बड़ी संख्या में लोग दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, बेंगलुरु और अन्य महानगरों की ओर रोजगार की तलाश में निकल पड़ते हैं। लेकिन शहरों में भी उनका जीवन आसान नहीं होता। उन्हें झुग्गी-झोपड़ियों में रहना पड़ता है, जहां स्वच्छ पानी, स्वास्थ्य सुविधाओं और सुरक्षित आवास का अभाव होता है। कई बार उन्हें न्यूनतम मजदूरी से भी कम भुगतान किया जाता है और श्रम कानूनों का लाभ नहीं मिल पाता।

असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों के सामने सामाजिक सुरक्षा का अभाव भी एक बड़ी समस्या है। अधिकांश मजदूरों के पास स्वास्थ्य बीमा, पेंशन, भविष्य निधि या दुर्घटना बीमा जैसी सुविधाएं नहीं होतीं। यदि परिवार का कमाने वाला सदस्य बीमार पड़ जाए या किसी दुर्घटना का शिकार हो जाए, तो पूरा परिवार आर्थिक संकट में डूब जाता है। कोरोना महामारी के दौरान देश ने देखा कि लाखों प्रवासी मजदूर किस प्रकार भोजन और रोजगार के संकट से जूझ रहे थे। उस अनुभव ने यह स्पष्ट कर दिया कि गरीब वर्ग की आर्थिक स्थिति कितनी अस्थिर है।

इन चुनौतियों को कम करने के लिए सरकार ने कई कल्याणकारी योजनाएं शुरू की हैं। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत राशन कार्ड धारकों को सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से रियायती दरों पर गेहूं और चावल उपलब्ध कराया जाता है। इससे करोड़ों गरीब परिवारों को खाद्य सुरक्षा मिली है। कई राज्यों में अतिरिक्त राशन और अन्य खाद्य सामग्री भी वितरित की जाती है, जिससे गरीबों को राहत मिलती है।

इसी प्रकार, महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार उपलब्ध कराने की दिशा में एक महत्वपूर्ण योजना है। इसके तहत ग्रामीण परिवारों को वर्ष में कम से कम 100 दिन का रोजगार देने का प्रावधान है। इससे गांवों में आय के अवसर बढ़े हैं और पलायन को कुछ हद तक रोकने में मदद मिली है। हालांकि कई क्षेत्रों में समय पर भुगतान न होना और कार्यों की कमी जैसी समस्याएं अभी भी मौजूद हैं।

युवाओं को रोजगार योग्य बनाने के लिए दीन दयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल योजना और अन्य कौशल विकास कार्यक्रम भी चलाए जा रहे हैं। इन योजनाओं का उद्देश्य युवाओं को आधुनिक उद्योगों और सेवाओं की जरूरतों के अनुरूप प्रशिक्षण देकर बेहतर रोजगार से जोड़ना है। यदि इन योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन हो, तो गरीब परिवारों की आर्थिक स्थिति में स्थायी सुधार लाया जा सकता है।

हालांकि सरकारी प्रयासों के बावजूद कई चुनौतियां बनी हुई हैं। योजनाओं की जानकारी का अभाव, भ्रष्टाचार, बिचौलियों की भूमिका, पात्र लोगों तक लाभ न पहुंचना और प्रशासनिक लापरवाही जैसी समस्याएं अक्सर इनके प्रभाव को कम कर देती हैं। कई जरूरतमंद परिवार आज भी सरकारी सहायता से वंचित हैं।

“दो जून की रोटी” का संघर्ष केवल आर्थिक समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और मानवीय गरिमा का प्रश्न भी है। जब तक प्रत्येक व्यक्ति को सम्मानजनक रोजगार, उचित मजदूरी, सुरक्षित कार्यस्थल और सामाजिक सुरक्षा उपलब्ध नहीं होगी, तब तक यह संघर्ष जारी रहेगा। भारत के विकास का वास्तविक अर्थ तभी होगा जब देश का कोई भी नागरिक भूखा सोने के लिए मजबूर न हो। इसके लिए सरकार, समाज, उद्योग जगत और नागरिक संगठनों को मिलकर कार्य करना होगा। तभी करोड़ों मेहनतकश लोगों का जीवन बेहतर बनेगा और “दो जून की रोटी” का संघर्ष इतिहास का विषय बन सकेगा।

आलोक कुमार

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