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बुधवार, 29 अप्रैल 2026

राजनीतिः बीजेपी के कई संगठन जमीनी स्तर पर काम कर रहे हैं

 भारत में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और उससे जुड़े व्यापक वैचारिक परिवा


भारत में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और उससे जुड़े व्यापक वैचारिक परिवार, जिसे सामान्यतः राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) कहा जाता है, केवल राजनीतिक गतिविधियों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सेवा के क्षेत्रों में भी व्यापक रूप से सक्रिय हैं। इन संगठनों का उद्देश्य समाज के विभिन्न वर्गों तक पहुंचकर सेवा कार्य करना, सांस्कृतिक मूल्यों का प्रसार करना और राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में योगदान देना है। विशेष रूप से शिक्षा और चिकित्सा के क्षेत्र में इनके कई संगठन जमीनी स्तर पर काम कर रहे हैं।

सबसे पहले यदि शिक्षा क्षेत्र की बात करें, तो विद्या भारती इस दिशा में सबसे प्रमुख संगठन है। यह आरएसएस का शैक्षिक विंग माना जाता है और “विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान” के अंतर्गत देशभर में हजारों विद्यालयों का संचालन करता है। इन विद्यालयों में सरस्वती शिशु मंदिर और सरस्वती विद्या मंदिर विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इन संस्थानों में आधुनिक शिक्षा के साथ-साथ भारतीय संस्कृति, नैतिक शिक्षा और राष्ट्रभक्ति पर विशेष जोर दिया जाता है। ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में इन विद्यालयों की उपस्थिति उल्लेखनीय है, जहां वे अपेक्षाकृत कम संसाधनों में शिक्षा उपलब्ध कराते हैं।

इसी क्रम में विभिन्न राज्यों में शिक्षा विकास समिति जैसे संगठन कार्यरत हैं, जो विद्या भारती के सहयोगी के रूप में काम करते हैं। उदाहरण के लिए बिहार में “लोक शिक्षा समिति” और हरियाणा/दिल्ली में “हिंदू शिक्षा समिति” इसी ढांचे का हिस्सा हैं। ये संस्थाएं स्थानीय जरूरतों के अनुसार स्कूलों का संचालन, शिक्षकों का प्रशिक्षण और शैक्षिक गतिविधियों का विस्तार करती हैं।

उच्च शिक्षा और छात्र राजनीति के क्षेत्र में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) की भूमिका महत्वपूर्ण है। यह संगठन कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में सक्रिय रहते हुए छात्रों के मुद्दों को उठाता है, शैक्षणिक सुधारों की मांग करता है और राष्ट्रीय दृष्टिकोण के साथ छात्र नेतृत्व तैयार करने का प्रयास करता है। हालांकि यह प्रत्यक्ष रूप से स्कूल शिक्षा नहीं चलाता, लेकिन शिक्षा व्यवस्था के व्यापक ढांचे में इसकी भागीदारी स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है।

अब यदि चिकित्सा और सेवा क्षेत्र की बात करें, तो सेवा भारती एक प्रमुख संगठन है। यह समाज के वंचित और पिछड़े वर्गों के बीच स्वास्थ्य, शिक्षा और राहत कार्यों में सक्रिय है। सेवा भारती द्वारा समय-समय पर मुफ्त चिकित्सा शिविर, ब्लड डोनेशन कैंप, एम्बुलेंस सेवाएं और स्लम क्षेत्रों में क्लीनिक चलाए जाते हैं। प्राकृतिक आपदाओं के समय भी यह संगठन राहत कार्यों में अग्रणी भूमिका निभाता है।

स्वास्थ्य के क्षेत्र में विशेष रूप से कार्य करने वाला संगठन आरोग्य भारती है। इसका उद्देश्य केवल रोगों का उपचार नहीं, बल्कि समग्र स्वास्थ्य—शारीरिक, मानसिक और सामाजिक संतुलन—को बढ़ावा देना है। यह संगठन आयुर्वेद, योग और प्राकृतिक चिकित्सा जैसी भारतीय परंपरागत पद्धतियों को प्रोत्साहित करता है और स्वास्थ्य जागरूकता अभियानों के माध्यम से लोगों को स्वस्थ जीवनशैली अपनाने के लिए प्रेरित करता है।

आदिवासी और दूरदराज क्षेत्रों में कार्य करने वाला वनवासी कल्याण आश्रम भी उल्लेखनीय है। यह संगठन शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं के माध्यम से आदिवासी समुदायों के जीवन स्तर को सुधारने का प्रयास करता है। यहां स्कूल, छात्रावास, स्वास्थ्य केंद्र और स्वावलंबन से जुड़े कार्यक्रम चलाए जाते हैं, जिससे इन क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता बढ़ती है।

इसके अलावा भारत विकास परिषद भी सेवा और चिकित्सा के क्षेत्र में सक्रिय है। यह संगठन समाज के विभिन्न वर्गों को जोड़ते हुए चिकित्सा शिविर, विकलांग सहायता कार्यक्रम, और सामाजिक जागरूकता अभियानों का आयोजन करता है। इसका उद्देश्य सामाजिक समरसता और सहयोग की भावना को मजबूत करना है।

इन सभी संगठनों के अलावा, बीजेपी के भीतर भी विभिन्न प्रकोष्ठ कार्य करते हैं, जैसे “शिक्षण संस्थान प्रकोष्ठ” और “चिकित्सा प्रकोष्ठ”, जो पार्टी कार्यकर्ताओं के माध्यम से स्थानीय स्तर पर शिक्षा और स्वास्थ्य से जुड़े कार्यक्रमों को संचालित करते हैं। ये प्रकोष्ठ सरकारी नीतियों और योजनाओं को जनता तक पहुंचाने और स्थानीय समस्याओं के समाधान में सहयोग करते हैं।

समग्र रूप से देखा जाए तो बीजेपी और आरएसएस से जुड़े ये संगठन शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में एक विस्तृत नेटवर्क के रूप में कार्य कर रहे हैं। इनके कार्यों को लेकर समाज में अलग-अलग दृष्टिकोण भी मौजूद हैं—कुछ लोग इन्हें राष्ट्र निर्माण और सेवा का महत्वपूर्ण माध्यम मानते हैं, तो कुछ इनके वैचारिक प्रभाव पर सवाल उठाते हैं। फिर भी यह तथ्य स्पष्ट है कि इन संगठनों की जमीनी पहुंच व्यापक है और ये भारत के विभिन्न हिस्सों में लाखों लोगों के जीवन को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित कर रहे हैं।

आलोक कुमार

क्रिकेट:आईपीएल 2026 में “बिहारी बाबू” के नाम से चर्चित युवा बल्लेबाज़ वैभव सूर्यवंशी


आईपीएल 2026 में “बिहारी बाबू” के नाम से चर्चित युवा बल्लेबाज़ वैभव सूर्यवंशी ने जिस अंदाज़ में अपनी छाप छोड़ी है, वह केवल एक खिलाड़ी की सफलता की कहानी नहीं, बल्कि बिहार जैसे क्रिकेटिंग रूप से पिछड़े माने जाने वाले राज्य के लिए गर्व और प्रेरणा का प्रतीक बन गया है। उनकी बल्लेबाज़ी में आक्रामकता, आत्मविश्वास और परिस्थितियों के अनुसार खेलने की समझ साफ झलकती है।

इस सीजन में उनके प्रदर्शन को देखें तो आंकड़े ही उनकी कहानी बयां कर देते हैं। 9 मैचों में लगभग 400 रन बनाना, 226 से अधिक का स्ट्राइक रेट और 103 का सर्वोच्च स्कोर—ये सभी आंकड़े यह साबित करते हैं कि वैभव सिर्फ रन बनाने वाले बल्लेबाज़ नहीं, बल्कि मैच का रुख बदलने वाले खिलाड़ी हैं। खास बात यह है कि उन्होंने 34 चौके और 37 छक्के लगाए, जो उनकी विस्फोटक शैली को दर्शाते हैं। आज के टी20 क्रिकेट में जहां तेजी से रन बनाना ही सफलता की कुंजी है, वहां वैभव ने खुद को पूरी तरह फिट साबित किया है।

उनके मैच-दर-मैच प्रदर्शन पर नज़र डालें तो शुरुआत से ही उन्होंने अपना इरादा साफ कर दिया था। 31 मार्च को चेन्नई के खिलाफ 52 रन की पारी खेलकर उन्होंने संकेत दे दिया कि यह सीजन उनके नाम रहने वाला है। इसके बाद गुजरात के खिलाफ भले ही वे 31 रन पर आउट हुए, लेकिन उनकी स्ट्राइक रेट और खेलने का अंदाज़ दर्शकों को आकर्षित करता रहा। मुंबई के खिलाफ 39 रन और फिर बैंगलोर के खिलाफ 78 रन की पारी ने उन्हें चर्चा के केंद्र में ला दिया।

हालांकि हर खिलाड़ी की तरह उनके प्रदर्शन में भी उतार-चढ़ाव आया। सनराइजर्स हैदराबाद के खिलाफ 0 पर आउट होना और फिर लखनऊ के खिलाफ केवल 8 रन बनाना यह दिखाता है कि क्रिकेट अनिश्चितताओं का खेल है। लेकिन असली खिलाड़ी वही होता है जो असफलता से सीखकर वापसी करता है। वैभव ने 25 अप्रैल को हैदराबाद के खिलाफ 103 रन की शानदार पारी खेलकर यह साबित कर दिया कि उनमें मानसिक मजबूती भी है।

“बिहारी बाबू” का यह टैग उन्हें यूं ही नहीं मिला। बिहार लंबे समय तक क्रिकेट के मुख्य ढांचे से दूर रहा है। वहां से अंतरराष्ट्रीय या आईपीएल स्तर के खिलाड़ियों का उभरना बहुत कम देखने को मिला है। ऐसे में वैभव सूर्यवंशी का उभरना उस सोच को बदल रहा है कि प्रतिभा केवल बड़े शहरों तक सीमित होती है। उनकी सफलता यह संदेश देती है कि अगर अवसर और मेहनत मिले, तो छोटे शहरों और गांवों से भी बड़े सितारे निकल सकते हैं।

उनकी बल्लेबाज़ी शैली पर अगर गौर करें तो वह आधुनिक टी20 क्रिकेट के अनुरूप है। पावरप्ले में आक्रामक शुरुआत, मिडिल ओवर्स में स्ट्राइक रोटेशन और डेथ ओवर्स में बड़े शॉट्स—इन सभी पहलुओं में वे संतुलन बनाए रखते हैं। उनकी शॉट सिलेक्शन और टाइमिंग यह दिखाती है कि उन्होंने अपनी तकनीक पर काफी मेहनत की है। खासकर स्पिन गेंदबाज़ों के खिलाफ उनका आत्मविश्वास उन्हें और भी खतरनाक बनाता है।

इसके अलावा, उनकी सफलता के पीछे उनकी मानसिकता भी बड़ी भूमिका निभाती है। युवा होने के बावजूद उनमें दबाव झेलने की क्षमता है। बड़े मैचों में भी वे घबराते नहीं हैं, बल्कि स्थिति के अनुसार खेलते हैं। यही कारण है कि उनकी पारियां टीम के लिए निर्णायक साबित हो रही हैं।

अगर आईपीएल के बड़े मंच की बात करें, तो यह केवल एक लीग नहीं बल्कि प्रतिभाओं को पहचान दिलाने का सबसे बड़ा प्लेटफॉर्म है। ऐसे में वैभव का यह प्रदर्शन उन्हें भविष्य में भारतीय टीम के दरवाजे तक भी पहुंचा सकता है। चयनकर्ताओं की नजरें निश्चित रूप से उन पर होंगी, क्योंकि आज के समय में ऐसे खिलाड़ियों की जरूरत है जो तेजी से रन बना सकें और मैच का परिणाम बदल सकें।

बिहार के युवाओं के लिए वैभव सूर्यवंशी एक रोल मॉडल बनकर उभरे हैं। जहां पहले क्रिकेट को लेकर संसाधनों की कमी और अवसरों का अभाव था, वहीं अब उनकी सफलता से नई उम्मीद जगी है। गांव-गांव में बच्चे उन्हें देखकर प्रेरित हो रहे हैं और क्रिकेट को करियर के रूप में अपनाने का सपना देख रहे हैं।

अंत में कहा जा सकता है कि “बिहारी बाबू” का यह सफर अभी शुरुआत भर है। उन्होंने आईपीएल 2026 में जो प्रदर्शन किया है, वह आने वाले समय के लिए एक मजबूत नींव है। अगर वे इसी तरह मेहनत और निरंतरता बनाए रखते हैं, तो वह दिन दूर नहीं जब वे भारतीय क्रिकेट के बड़े सितारों में शामिल होंगे।

वैभव सूर्यवंशी की कहानी हमें यह सिखाती है कि प्रतिभा किसी स्थान की मोहताज नहीं होती। सही दिशा, मेहनत और आत्मविश्वास से कोई भी खिलाड़ी शिखर तक पहुंच सकता है—और “बिहारी बाबू” इसका जीता-जागता उदाहरण हैं।


आलोक कुमार

मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के मंत्रिमंडल विस्तार पर बड़ी खबर


वर्तमान में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने खुद 29 महत्वपूर्ण विभागों को अपने पास रखा

बिहार की राजनीति में एक नया अध्याय शुरू हो गया है। पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राजीनामा के बाद 15 अप्रैल 2026 को भाजपा के वरिष्ठ नेता सम्राट चौधरी ने बिहार के पहले भाजपा मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। नीतीश कुमार राज्यसभा की सदस्यता ग्रहण करने के बाद मुख्यमंत्री पद से अलग हो गए, जिसके बाद सम्राट चौधरी ने विधायक दल का नेता चुने जाने के बाद शपथ ग्रहण की। शपथ लेने के तुरंत बाद बिहार विधानसभा का एक दिवसीय सत्र बुलाकर उन्होंने विश्वासमत भी प्राप्त कर लिया।अब नई सरकार पूरे जोर-शोर से काम कर रही है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी प्रशासनिक अधिकारियों के तबादलों और विभागीय समीक्षाओं में व्यस्त हैं। उसी क्रम में मंत्रिमंडल विस्तार की चर्चाएं जोरों पर हैं। सूत्रों के मुताबिक, नए मंत्रियों की सूची पर विचार-विमर्श अंतिम चरण में पहुंच गया है। पार्टी संगठन, वरिष्ठ नेताओं और
सहयोगी दलों के बीच लगातार बैठकें हो रही हैं।विस्तार का मकसद और संभावित समयराजनीतिक विशेषज्ञों का


मानना है कि यह विस्तार सिर्फ़ मंत्रियों की संख्या बढ़ाने के लिए नहीं, बल्कि आगामी चुनावों को ध्यान में रखकर क्षेत्रीय, जातीय और सामाजिक संतुलन को मजबूत करने के उद्देश्य से किया जा रहा है। वर्तमान में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने खुद 29 महत्वपूर्ण विभागों को अपने पास रखा है, जबकि शेष विभागों का बंटवारा विस्तार के बाद होगा। जेडीयू के दो वरिष्ठ नेताओं विजय कुमार चौधरी और बिजेंद्र प्रसाद यादव को उपमुख्यमंत्री बनाया गया है। भाजपा को लगभग 15 मंत्रियों (सीएम सहित), जेडीयू को 17 (दो उपमुख्यमंत्री सहित), एलजेपी (राम विलास) को 2, हम और आरएलएम को 1-1 मंत्री का प्रतिनिधित्व मिलने की संभावना है। विस्तार की संभावित तिथि मई 2026 के पहले सप्ताह में, खासकर 4 मई को कुछ राज्यों के विधानसभा चुनाव नतीजों के बाद मानी जा रही है।पटना की दो सीटों का राजनीतिक महत्वपटना की पश्चिमी सीट को विभक्त कर बांकीपुर और दीघा विधानसभा क्षेत्र बनाए गए। इस विभाजन का सबसे बड़ा लाभ बांकीपुर क्षेत्र को मिला। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के पिता बांकीपुर से विधायक और मंत्री रहे थे। उनके निधन के बाद नितिन नवीन को भी इसी क्षेत्र से राजनीतिक मौका मिला। जब तक वे बांकीपुर के विधायक रहे, उन्हें मंत्री पद की सौगात मिलती रही। अब नितिन नवीन पार्टी के उच्च पद पर पहुंच गए हैं, तो बांकीपुर की जगह दीघा पर फोकस बढ़ गया है।दीघा विधानसभा के वर्तमान विधायक डॉ. संजीव चौरसिया (संजीव चौरसिया) काफी समय से सक्रिय हैं। स्थानीय भाजपा कार्यकर्ता संजय राय, अरविंद कुमार वर्मा, राजन क्लेमेंट साह आदि लगातार मांग कर रहे हैं कि मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी इस बार दीघा के विधायक को मंत्रिमंडल में शामिल करें। डॉ. संजीव चौरसिया तमोली (पान वाले) समुदाय से आते हैं, जो अत्यंत पिछड़ा वर्ग (EBC) का हिस्सा है। उन्हें व्यवसायी पृष्ठभूमि भी है, जिससे वे बनिया समुदाय से भी जुड़ाव रखते हैं। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि जातीय संतुलन और पटना क्षेत्र के प्रतिनिधित्व को देखते हुए उनका नाम मंत्रिमंडल विस्तार में मजबूत दावेदार के रूप में उभर रहा है।क्या कहते हैं सूत्र और स्थानीय कार्यकर्ता?स्थानीय भाजपा कार्यकर्ताओं का तर्क है कि बांकीपुर को पहले पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिल चुका है। अब दीघा को भी विकास और प्रशासनिक निर्णयों में भागीदारी मिलनी चाहिए।

डॉ. संजीव चौरसिया लगातार क्षेत्र में सक्रिय रहे हैं। 2015 से दीघा का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं और 2025 के चुनाव में भी भाजपा उम्मीदवार के रूप में जीते।

मंत्रिमंडल विस्तार में जातीय समीकरण, क्षेत्रीय संतुलन और नए चेहरों को मौका देने का फॉर्मूला अपनाया जा सकता है, ताकि NDA का सामाजिक आधार और मजबूत हो।


हालांकि अभी तक कोई आधिकारिक सूची जारी नहीं हुई है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने दिल्ली में उच्च नेतृत्व से मुलाकात की है और नितिन नवीन, नीतीश कुमार आदि से चर्चा भी की है। विस्तार कब और कैसे होता है, यह देखना दिलचस्प होगा।निष्कर्षबिहार में नीतीश कुमार युग के समाप्त होने और सम्राट चौधरी के नेतृत्व में भाजपा के सीधे सत्ता संचालन की शुरुआत हो चुकी है। मंत्रिमंडल विस्तार इस नए दौर की पहली बड़ी परीक्षा होगी। अगर दीघा के डॉ. संजीव चौरसिया को मंत्री बनाया जाता है, तो यह पटना के दोनों हिस्सों के बीच संतुलन का प्रतीक भी बन सकता है। बिहार की जनता विकास, सुशासन और जाति-धर्म से ऊपर उठकर समावेशी सरकार की उम्मीद कर रही है। सम्राट चौधरी की सरकार कितना क्षेत्रीय और सामाजिक संतुलन बनाए रख पाती है, यह आने वाले दिनों में साफ होगा।


आलोक कुमार


 

विश्वासियों के आध्यात्मिक जीवन के ऐसे महत्वपूर्ण पड़ाव

                                          इन संस्कारों को Jesus Christ द्वारा स्थापित माना जाता है

कैथोलिक परंपरा में “सात संस्कार” (Sacraments) केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं हैं, बल्कि विश्वासियों के आध्यात्मिक जीवन के ऐसे महत्वपूर्ण पड़ाव हैं, जिनके माध्यम से वे ईश्वर की कृपा को अनुभव करते हैं। Roman Catholic Church में इन संस्कारों को Jesus Christ द्वारा स्थापित माना जाता है। इनका उद्देश्य मानव जीवन के विभिन्न चरणों को पवित्र बनाना और व्यक्ति को ईश्वर तथा समुदाय (कलीसिया) के साथ गहरे संबंध में जोड़ना है।

रोमन कैथोलिक चर्च वास्तव में एक विशाल वैश्विक परिवार है, जिसमें विभिन्न “रीतियाँ” (Rites) और स्वायत्त चर्च शामिल हैं। ये सभी चर्च अपनी-अपनी परंपराओं और पूजा-पद्धतियों में भिन्न होते हुए भी Pope को सर्वोच्च धर्मगुरु मानते हैं और एक ही विश्वास में एकजुट रहते हैं। भारत में, विशेषकर केरल में, कैथोलिक चर्च तीन प्रमुख शाखाओं में विभाजित है—लैटिन कैथोलिक, Syro-Malabar Catholic Church और Syro-Malankara Catholic Church। ये तीनों चर्च अलग-अलग परंपराओं का पालन करते हैं, लेकिन सातों संस्कारों को समान महत्व देते हैं।

इन सात संस्कारों को तीन मुख्य श्रेणियों में विभाजित किया गया है—दीक्षा संस्कार, चिकित्सा के संस्कार और सेवा/समुदाय के संस्कार। सबसे पहले दीक्षा संस्कार (Sacraments of Initiation) आते हैं, जिनमें बपतिस्मा, पुष्टिकरण और यूखारिस्ट शामिल हैं। बपतिस्मा वह पहला संस्कार है, जिसके द्वारा व्यक्ति ईसाई समुदाय में प्रवेश करता है। इसमें जल के माध्यम से पापों से शुद्धि और नए जीवन की शुरुआत का प्रतीक मिलता है। इसके बाद पुष्टिकरण (Confirmation) संस्कार आता है, जिसमें व्यक्ति अपने विश्वास को स्वयं स्वीकार करता है और पवित्र आत्मा की शक्ति प्राप्त करता है। तीसरा संस्कार यूखारिस्ट (पवित्र भोज) है, जिसमें रोटी और दाखरस के रूप में मसीह की उपस्थिति का अनुभव किया जाता है। यह संस्कार ईसाई जीवन का केंद्र माना जाता है।

दूसरी श्रेणी है—चिकित्सा के संस्कार (Sacraments of Healing)। इसमें प्रायश्चित या मेल-मिलाप (Confession) और बीमारों का अभिषेक शामिल हैं। प्रायश्चित संस्कार के माध्यम से व्यक्ति अपने पापों को स्वीकार करता है और ईश्वर से क्षमा प्राप्त करता है। यह आत्मिक शुद्धि और नए आरंभ का अवसर देता है। वहीं बीमारों का अभिषेक उन लोगों को दिया जाता है जो शारीरिक या मानसिक रूप से बीमार होते हैं। इस संस्कार के माध्यम से उन्हें सांत्वना, शक्ति और कभी-कभी चंगाई भी प्राप्त होती है।

तीसरी श्रेणी है—सेवा और समुदाय के संस्कार (Sacraments at the Service of Communion)। इसमें पवित्र आदेश (Holy Orders) और विवाह (Matrimony) शामिल हैं। पवित्र आदेश संस्कार के माध्यम से व्यक्ति को पुरोहित, बिशप या डीकन के रूप में कलीसिया की सेवा के लिए नियुक्त किया जाता है। वहीं विवाह संस्कार पति-पत्नी के बीच पवित्र बंधन को स्थापित करता है, जो प्रेम, समर्पण और पारिवारिक जीवन का आधार बनता है।

इन संस्कारों का महत्व केवल सैद्धांतिक नहीं, बल्कि व्यावहारिक और जीवंत है। ये व्यक्ति के जन्म से लेकर जीवन के अंतिम क्षण तक उसके साथ रहते हैं और हर मोड़ पर उसे मार्गदर्शन देते हैं। यही कारण है कि कैथोलिक समुदाय में इन संस्कारों को “आध्यात्मिक मील के पत्थर” कहा जाता है।

बिहार की राजधानी Patna में भी कैथोलिक समुदाय इन परंपराओं का पालन पूरे श्रद्धा और अनुशासन के साथ करता है। Roman Catholic Archdiocese of Patna के अंतर्गत आने वाले विभिन्न गिरजाघरों (पल्ली) में समय-समय पर इन संस्कारों का आयोजन किया जाता है। हाल ही में पटना महाधर्मप्रांत के कुर्जी पल्ली में पुष्टिकरण संस्कार का आयोजन किया गया, जो इस बात का जीवंत उदाहरण है कि ये परंपराएं आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं जितनी पहले थीं।

इस अवसर पर महाधर्माध्यक्ष Sebastian Kallupura के करकमलों से लगभग 60 बच्चों को पुष्टिकरण (दृढ़करण) संस्कार प्रदान किया गया। इस संस्कार के दौरान बच्चों ने अपने विश्वास को दृढ़ करने और बुराई (शैतान) से दूर रहने का संकल्प लिया। यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि एक नैतिक और आध्यात्मिक प्रतिबद्धता भी है, जो उन्हें जीवनभर सही मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करती है।

इस आयोजन में कई परिवारों ने भाग लिया, जिनमें संजय कुमार और पिंकी संजय के पुत्र अर्नव संजय साह, पप्पू स्टेफन की पुत्री सिया स्टेफन और जोसेफ राज की पुत्री सहित कई अन्य बच्चे शामिल थे। यह समारोह न केवल बच्चों के लिए, बल्कि उनके परिवारों और पूरे समुदाय के लिए गर्व और आनंद का क्षण बना।

अंततः, कैथोलिक चर्च के सात संस्कार केवल धार्मिक कर्तव्य नहीं हैं, बल्कि एक संपूर्ण जीवन पद्धति का हिस्सा हैं। ये व्यक्ति को ईश्वर के साथ जोड़ते हैं, उसे नैतिक मूल्यों की शिक्षा देते हैं और समाज में प्रेम, शांति और सेवा की भावना को बढ़ावा देते हैं। चाहे वह केरल के प्राचीन चर्च हों या पटना की आधुनिक पल्ली, इन संस्कारों की महत्ता हर जगह समान रूप से बनी हुई है।

इस प्रकार, सात संस्कार कैथोलिक विश्वास की आत्मा हैं, जो हर विश्वासी को एक मजबूत आध्यात्मिक आधार प्रदान करते हैं और उसे जीवन के हर चरण में ईश्वर की कृपा का अनुभव कराते हैं।

अब “बुलडोजर एक्शन” केवल एक चेतावनी नहीं

बिहार में सरकारी भूमि पर अवैध कब्जों के खिलाफ चल रही सख्त कार्रवाई इन दिनों व्यापक चर्चा और बहस का विषय बनी हुई है। राज्य सरकार ने स्पष्ट संकेत दे दिया है कि अब “बुलडोजर एक्शन” केवल एक चेतावनी नहीं, बल्कि वास्तविक नीति का हिस्सा बन चुका है। सरकार का मानना है कि यदि राज्य को व्यवस्थित और योजनाबद्ध तरीके से विकसित करना है, तो सबसे पहले सरकारी जमीनों को अतिक्रमण मुक्त कराना अनिवार्य है। इसी उद्देश्य से प्रशासन ने अभियान चलाकर अवैध निर्माणों को चिन्हित करना और उन्हें ध्वस्त करना शुरू कर दिया है।

इस पूरे अभियान की अगुवाई राज्य के शीर्ष नेतृत्व द्वारा की जा रही है। मुख्यमंत्री Samrat Choudhary ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि सरकारी जमीन पर बने किसी भी अवैध ढांचे को बख्शा नहीं जाएगा, चाहे वह किसी भी व्यक्ति का क्यों न हो। इस बयान के साथ ही प्रशासनिक तंत्र भी पूरी तरह सक्रिय हो गया है और जिलों में बड़े पैमाने पर सर्वे का काम चल रहा है। गैर मजरूआ जमीन, तालाब, सड़क, पार्क और सरकारी परियोजनाओं के लिए चिन्हित भूमि पर बने निर्माणों को विशेष रूप से निशाने पर लिया गया है।

इस अभियान की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें किसी प्रकार की पक्षपात की गुंजाइश नहीं छोड़ी जा रही है। इसका एक चर्चित उदाहरण मुंगेर जिले के तारापुर क्षेत्र में देखने को मिला, जहां खुद मुख्यमंत्री के निजी आवास से जुड़ी सीढ़ियों का हिस्सा भी सरकारी जमीन पर पाया गया और उसे तोड़ दिया गया। इस कार्रवाई ने यह संदेश देने की कोशिश की कि कानून सबके लिए समान है और “जीरो टॉलरेंस” नीति केवल कागजों तक सीमित नहीं है।

सरकार की इस सख्ती के पीछे कई तर्क दिए जा रहे हैं। पहला, वर्षों से सरकारी जमीनों पर अवैध कब्जों के कारण विकास कार्य बाधित होते रहे हैं। सड़क निर्माण, स्कूल, अस्पताल और अन्य बुनियादी परियोजनाएं अक्सर भूमि विवादों में उलझ जाती हैं। दूसरा, भूमाफियाओं द्वारा सरकारी जमीनों की अवैध खरीद-फरोख्त ने एक समानांतर काला बाजार खड़ा कर दिया है, जिससे न केवल सरकारी राजस्व का नुकसान होता है, बल्कि आम लोगों को भी धोखे का सामना करना पड़ता है। तीसरा, शहरी क्षेत्रों में अनियोजित निर्माण से बुनियादी सुविधाओं पर दबाव बढ़ता है, जिससे जीवन की गुणवत्ता प्रभावित होती है।

हालांकि, इस सख्त कार्रवाई का एक दूसरा पहलू भी सामने आ रहा है, जो आम नागरिकों की परेशानियों और आक्रोश को दर्शाता है। खासकर राजधानी Patna में कई अपार्टमेंट और मकान इस कार्रवाई की जद में आ गए हैं। Patna Municipal Corporation ने ऐसे भवनों को चिन्हित कर नोटिस जारी करना शुरू कर दिया है। लोगों को चेतावनी दी जा रही है कि वे स्वयं अवैध निर्माण को हटाएं, अन्यथा प्रशासन बुलडोजर चलाने को मजबूर होगा।

यहीं से विवाद और असंतोष की स्थिति उत्पन्न हो रही है। प्रभावित लोगों का कहना है कि उन्होंने जमीन खरीदते समय सभी कानूनी प्रक्रियाएं पूरी की थीं। उन्होंने रजिस्ट्री कराई, बैंक से लोन लिया और नियमित रूप से नगर निगम को टैक्स तथा बिजली बिल का भुगतान भी करते रहे। ऐसे में अचानक यह कहना कि उनका निर्माण अवैध है, उनके लिए एक बड़ा झटका है। उनका तर्क है कि यदि जमीन या निर्माण में कोई गड़बड़ी थी, तो संबंधित विभागों ने पहले ही क्यों नहीं रोका? वर्षों तक निगमकर्मी और अधिकारी चुप क्यों रहे?

लोग यह भी आरोप लगा रहे हैं कि पूर्व में प्रशासनिक लापरवाही और भ्रष्टाचार के कारण ही ऐसी स्थिति पैदा हुई है। कई मामलों में यह सामने आया है कि भूमाफियाओं ने सरकारी जमीन को निजी बताकर बेच दिया और अधिकारियों की मिलीभगत से रजिस्ट्री तक हो गई। अब जब सरकार सख्ती कर रही है, तो उसका खामियाजा आम नागरिकों को भुगतना पड़ रहा है, जिन्होंने अपनी जीवनभर की जमा-पूंजी लगाकर घर बनाया है।

इस पूरे मुद्दे में एक महत्वपूर्ण कानूनी और नैतिक प्रश्न भी उठता है—क्या केवल अवैध निर्माण को तोड़ देना ही समाधान है, या इसके साथ जिम्मेदार अधिकारियों और भूमाफियाओं के खिलाफ भी समान रूप से कार्रवाई होनी चाहिए? विशेषज्ञों का मानना है कि यदि केवल मकान तोड़ने पर ध्यान दिया गया और मूल समस्या—यानी अवैध भूमि बिक्री और प्रशासनिक भ्रष्टाचार—को नजरअंदाज किया गया, तो यह समस्या फिर से उत्पन्न हो सकती है।

सरकार के सामने चुनौती यह भी है कि वह इस अभियान को मानवीय दृष्टिकोण के साथ संतुलित करे। जिन लोगों ने अनजाने में गलत जमीन खरीद ली है, उनके लिए वैकल्पिक व्यवस्था या मुआवजे पर भी विचार किया जाना चाहिए। साथ ही, भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए भूमि रिकॉर्ड को डिजिटल और पारदर्शी बनाना जरूरी है, ताकि कोई भी व्यक्ति जमीन खरीदने से पहले उसकी वैधता की आसानी से जांच कर सके।

अंततः, बिहार में चल रहा यह बुलडोजर अभियान एक महत्वपूर्ण मोड़ का संकेत देता है। यह जहां एक ओर कानून के राज और विकास की दिशा में सख्त कदम है, वहीं दूसरी ओर यह प्रशासनिक व्यवस्था की पुरानी खामियों को भी उजागर करता है। जरूरत इस बात की है कि सरकार सख्ती के साथ-साथ न्याय और पारदर्शिता का भी ध्यान रखे, ताकि निर्दोष लोगों को नुकसान न हो और दोषियों को उचित सजा मिले।

इस प्रकार, “सरकारी भूमि पर घर बनाने वालों की खैर नहीं” केवल एक नारा नहीं, बल्कि एक सख्त वास्तविकता बन चुकी है। लेकिन इस वास्तविकता को संतुलित और न्यायपूर्ण बनाना ही सरकार की सबसे बड़ी परीक्षा होगी।


आलोक कुमार

विश्व स्तर पर अंतरराष्ट्रीय नृत्य दिवस

                                          देश के विकास और लोकतंत्र को मजबूत करने में योगदान 

 


29 अप्रैल का दिन इतिहास, संस्कृति, विज्ञान और वैश्विक जागरूकता के कई महत्वपूर्ण आयामों से जुड़ा हुआ है। यह दिन न केवल अतीत की घटनाओं को याद करने का अवसर देता है, बल्कि वर्तमान समाज को प्रेरित करने और भविष्य के लिए दिशा तय करने का भी माध्यम बनता है। आइए 29 अप्रैल के विशेष महत्व को विभिन्न पहलुओं में विस्तार से समझते हैं।

सबसे पहले, 29 अप्रैल को विश्व स्तर पर अंतरराष्ट्रीय नृत्य दिवस (International Dance Day) के रूप में मनाया जाता है। इस दिवस की शुरुआत UNESCO से जुड़े अंतरराष्ट्रीय रंगमंच संस्थान द्वारा की गई थी। इसका उद्देश्य नृत्य कला को बढ़ावा देना, लोगों को इसके प्रति जागरूक करना और विभिन्न संस्कृतियों के बीच संवाद स्थापित करना है। इस दिन दुनिया भर में नृत्य से जुड़े कार्यक्रम, कार्यशालाएं और प्रस्तुतियां आयोजित की जाती हैं। यह दिन महान फ्रांसीसी नृत्यकार Jean-Georges Noverre की जयंती के रूप में भी मनाया जाता है, जिन्हें आधुनिक बैले का जनक माना जाता है।

भारत जैसे सांस्कृतिक रूप से समृद्ध देश में नृत्य की परंपरा अत्यंत प्राचीन और विविधतापूर्ण है। भरतनाट्यम, कथक, ओडिसी, कुचिपुड़ी जैसे शास्त्रीय नृत्य और भांगड़ा, गरबा, झूमर जैसे लोकनृत्य हमारी सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा हैं। ऐसे में 29 अप्रैल का यह दिवस भारतीय संस्कृति के संरक्षण और प्रसार के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है।

इतिहास के पन्नों में भी 29 अप्रैल कई महत्वपूर्ण घटनाओं का साक्षी रहा है। 1945 में इसी दिन Adolf Hitler ने अपनी लंबे समय की साथी Eva Braun से विवाह किया था, जो द्वितीय विश्व युद्ध के अंतिम दिनों की एक चर्चित घटना है। यह घटना युद्ध के अंत और नाजी शासन के पतन का प्रतीक मानी जाती है। इसके अगले ही दिन हिटलर ने आत्महत्या कर ली थी, जिससे विश्व इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ आया।

भारत के संदर्भ में भी यह दिन कई मायनों में महत्वपूर्ण रहा है। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान और उसके बाद भी इस दिन विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियां हुई हैं, जिन्होंने देश के विकास और लोकतंत्र को मजबूत करने में योगदान दिया। हालांकि 29 अप्रैल से जुड़ी कोई एक बड़ी राष्ट्रीय घटना विशेष रूप से प्रसिद्ध नहीं है, लेकिन यह दिन हमें उन अनगिनत प्रयासों की याद दिलाता है जो देश निर्माण में निरंतर जारी रहे।

विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में भी 29 अप्रैल का महत्व कम नहीं है। इस दिन कई वैज्ञानिकों और नवाचारों से जुड़े घटनाक्रम सामने आए हैं, जिन्होंने मानव जीवन को सरल और उन्नत बनाने में भूमिका निभाई। यह दिन हमें विज्ञान के महत्व को समझने और नई खोजों के प्रति उत्सुक रहने की प्रेरणा देता है।

इसके अलावा, 29 अप्रैल को कई प्रसिद्ध व्यक्तित्वों का जन्मदिन और पुण्यतिथि भी मनाई जाती है। ये महान लोग विभिन्न क्षेत्रों—जैसे साहित्य, कला, राजनीति और खेल—में अपने योगदान के लिए जाने जाते हैं। इनके जीवन से हमें प्रेरणा मिलती है कि कठिन परिस्थितियों में भी दृढ़ संकल्प और मेहनत से सफलता प्राप्त की जा सकती है।

सामाजिक दृष्टिकोण से भी 29 अप्रैल का महत्व है। यह दिन हमें कला, संस्कृति और इतिहास के प्रति संवेदनशील बनाता है। साथ ही यह हमें यह सोचने का अवसर देता है कि हम अपनी परंपराओं को कैसे सहेज सकते हैं और उन्हें नई पीढ़ी तक कैसे पहुंचा सकते हैं। आज के आधुनिक और तकनीकी युग में जहां लोग अपनी जड़ों से दूर होते जा रहे हैं, ऐसे दिवस हमें अपनी पहचान से जोड़ने का काम करते हैं।

शिक्षा के क्षेत्र में भी इस दिन का विशेष महत्व है। स्कूलों और कॉलेजों में नृत्य, कला और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन कर छात्रों को रचनात्मक गतिविधियों में भाग लेने के लिए प्रेरित किया जाता है। इससे न केवल उनकी प्रतिभा निखरती है, बल्कि उनमें आत्मविश्वास और सामाजिक समरसता की भावना भी विकसित होती है।

अंततः, 29 अप्रैल केवल एक तारीख नहीं है, बल्कि यह एक ऐसा दिन है जो हमें जीवन के विभिन्न पहलुओं—कला, इतिहास, विज्ञान और समाज—के प्रति जागरूक करता है। यह दिन हमें अतीत से सीख लेकर वर्तमान को बेहतर बनाने और भविष्य के लिए सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाने की प्रेरणा देता है।

इस प्रकार, 29 अप्रैल का महत्व बहुआयामी है। यह दिन हमें यह सिखाता है कि जीवन में संतुलन बनाए रखने के लिए कला, ज्ञान और इतिहास का समन्वय कितना आवश्यक है। इसलिए हमें इस दिन को केवल एक सामान्य दिन की तरह नहीं, बल्कि एक प्रेरणादायक अवसर के रूप में देखना चाहिए, जो हमें निरंतर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।

आलोक कुमार

मंगलवार, 28 अप्रैल 2026

यहां के लोगों की संस्कृति, परंपरा और जीवनशैली का अहम हिस्सा

यहां के लोगों की संस्कृति, परंपरा और जीवनशैली का अहम हिस्सा हैं

यहां के लोगों की संस्कृति, परंपरा और जीवनशैली का अहम हिस्सा हैं।पश्चिम चंपारण (बिहार) की पहचान केवल उसके ऐतिहासिक महत्व—जैसे चंपारण सत्याग्रह—से ही नहीं, बल्कि उसके समृद्ध खान-पान से भी होती है। इस क्षेत्र के स्वाद में जो आत्मीयता और परंपरा की मिठास है, वह खासकर आनंदी का चूड़ा और चिकन ताश जैसे व्यंजनों में झलकती है। ये केवल खाने की चीजें नहीं हैं, बल्कि यहां के लोगों की संस्कृति, परंपरा और जीवनशैली का अहम हिस्सा हैं।

सबसे पहले बात करें आनंदी के चूड़ा की, तो यह पश्चिम चंपारण के चनपटिया और आसपास के इलाकों में बनने वाला एक बेहद खास खाद्य पदार्थ है। चूड़ा, जिसे सामान्य भाषा में पोहा या चिवड़ा भी कहा जाता है, भारत के कई हिस्सों में बनाया जाता है, लेकिन “आनंदी का चूड़ा” अपनी गुणवत्ता और स्वाद के कारण अलग पहचान रखता है। इसका पतलापन, हल्कापन और कुरकुरापन इसे विशेष बनाता है। पारंपरिक तकनीक से धान को भिगोकर, सुखाकर और फिर विशेष ढंग से कूटकर तैयार किया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में अनुभव और धैर्य की जरूरत होती है, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी स्थानीय कारीगरों में स्थानांतरित होती रही है।

इस चूड़ा का सबसे बड़ा महत्व मकर संक्रांति के त्योहार में देखने को मिलता है। बिहार में इस पर्व पर “चूड़ा-दही और तिलकुट” खाने की परंपरा सदियों पुरानी है। खासकर पश्चिम चंपारण में यदि आनंदी का चूड़ा न हो, तो संक्रांति का स्वाद अधूरा माना जाता है। यह केवल भोजन नहीं, बल्कि सामाजिक जुड़ाव और परंपरा का प्रतीक है। परिवार के सभी सदस्य एक साथ बैठकर इस व्यंजन का आनंद लेते हैं, जिससे पारिवारिक और सामाजिक संबंध और मजबूत होते हैं।

इसके अलावा, आनंदी का चूड़ा अब स्थानीय पहचान का प्रतीक बन चुका है। इसे भौगोलिक संकेतक (GI Tag) दिलाने के प्रयास भी इस बात को दर्शाते हैं कि यह केवल एक उत्पाद नहीं, बल्कि क्षेत्रीय ब्रांड बन चुका है। यह कई परिवारों की आजीविका का प्रमुख साधन भी है। चनपटिया क्षेत्र में सैकड़ों परिवार इस उद्योग से जुड़े हुए हैं और पारंपरिक तरीके से चूड़ा बनाकर अपनी जीविका चला रहे हैं। इस तरह यह स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूती प्रदान करता है।

अब बात करें पश्चिम चंपारण के दूसरे लोकप्रिय व्यंजन चिकन ताश की, जो खासकर बेतिया शहर में बेहद प्रसिद्ध है। चिकन ताश एक मसालेदार, सूखा और तीखा चिकन व्यंजन है, जिसे खास अंदाज में तैयार किया जाता है। इसका नाम “ताश” इसलिए पड़ा क्योंकि इसे बनाने के दौरान चिकन के टुकड़ों को तेज आंच पर इस तरह से भुना जाता है कि वे ताश के पत्तों की तरह खड़कते और कुरकुरे हो जाते हैं।

चिकन ताश का स्वाद तीखा और चटपटा होता है, जो इसे खास बनाता है। इसमें स्थानीय मसालों का भरपूर उपयोग किया जाता है, जैसे लाल मिर्च, धनिया, लहसुन और अदरक। इसे आमतौर पर शाम के नाश्ते के रूप में परोसा जाता है और इसके साथ “चूड़ा-मूढ़ी” या मुरमुरा दिया जाता है। यह संयोजन इतना लोकप्रिय है कि स्थानीय लोग ही नहीं, बल्कि बाहर से आने वाले पर्यटक भी इसका स्वाद चखने के लिए उत्सुक रहते हैं।

बेतिया और आसपास के इलाकों में यह एक प्रमुख स्ट्रीट फूड के रूप में विकसित हो चुका है। छोटे-छोटे ठेलों और दुकानों पर शाम होते ही लोगों की भीड़ उमड़ पड़ती है। चिकन ताश का स्वाद ऐसा होता है कि एक बार खाने के बाद लोग बार-बार इसे खाने के लिए आकर्षित होते हैं। यह व्यंजन स्थानीय युवाओं के बीच खासा लोकप्रिय है और अब धीरे-धीरे अन्य शहरों में भी अपनी पहचान बना रहा है।

इन दोनों व्यंजनों की खासियत यह है कि ये पश्चिम चंपारण की मिट्टी से जुड़े हुए हैं। जहां आनंदी का चूड़ा सादगी, परंपरा और स्वास्थ्य का प्रतीक है, वहीं चिकन ताश आधुनिकता, चटपटे स्वाद और स्ट्रीट फूड संस्कृति का प्रतिनिधित्व करता है। दोनों मिलकर इस क्षेत्र की खाद्य विविधता को दर्शाते हैं।

अंततः कहा जा सकता है कि पश्चिम चंपारण का यह स्वाद केवल जीभ को ही नहीं, बल्कि दिल को भी संतुष्ट करता है। आनंदी का चूड़ा और चिकन ताश यहां की सांस्कृतिक धरोहर हैं, जो समय के साथ और भी लोकप्रिय होते जा रहे हैं। ये व्यंजन न केवल स्थानीय लोगों की पहचान हैं, बल्कि बिहार के गौरव को भी पूरे देश में फैलाने का काम कर रहे हैं।

आलोक कुमार


बंगाल के लोकप्रिय स्ट्रीट फूड ‘झालमुड़ी’ का स्वाद

         बंगाल के लोकप्रिय स्ट्रीट फूड ‘झालमुड़ी’ का स्वाद पटना पहुंचा

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के दौरान देश की राजनीति में एक दिलचस्प और प्रतीकात्मक दृश्य देखने को मिला, जब नरेंद्र मोदी ने 19 अप्रैल 2026 को झाड़ग्राम में चुनावी प्रचार के बीच एक स्थानीय दुकान पर रुककर बंगाल के लोकप्रिय स्ट्रीट फूड ‘झालमुड़ी’ का स्वाद लिया। यह केवल एक साधारण खान-पान का क्षण नहीं था, बल्कि यह जनसंपर्क और सांस्कृतिक जुड़ाव का एक सशक्त उदाहरण बन गया। ‘झालमुड़ी’ जैसे स्थानीय व्यंजन को अपनाकर प्रधानमंत्री ने यह संदेश दिया कि भारत की विविधता ही उसकी असली ताकत है और स्थानीय संस्कृति के साथ जुड़ाव ही जनभावनाओं को समझने का माध्यम है।

‘झालमुड़ी’ पश्चिम बंगाल का एक प्रसिद्ध स्ट्रीट फूड है, जिसमें मुरमुरा (फूला हुआ चावल), सरसों का तेल, हरी मिर्च, प्याज, चाट मसाला और नींबू का रस मिलाकर तैयार किया जाता है। इसकी सादगी और चटपटे स्वाद के कारण यह आम लोगों के बीच बेहद लोकप्रिय है। जब प्रधानमंत्री जैसे शीर्ष नेता इस प्रकार के आम जनजीवन से जुड़े खाद्य पदार्थ का स्वाद लेते हैं, तो यह एक प्रकार से आम जनता के साथ उनकी निकटता को दर्शाता है।

प्रधानमंत्री के इसी ‘झालमुड़ी’ प्रेम की झलक बिहार की राजधानी पटना में भी देखने को मिली, जहां भारतीय जनता पार्टी के पंचायती राज प्रकोष्ठ, बिहार प्रदेश द्वारा आयोजित एक विशेष कार्यक्रम में अतिथियों का स्वागत ‘पान पराग’ जैसे पारंपरिक तरीके से नहीं, बल्कि ‘झालमुड़ी’ खिलाकर किया गया। यह आयोजन बीआईए (BIA) सभागार में हुआ, जहां महाराणा प्रताप के परम मित्र, शूरवीर और दानवीर भामाशाह की जयंती मनाई गई।

इस कार्यक्रम का आयोजन भारतीय जनता पार्टी के पंचायती राज प्रकोष्ठ, बिहार प्रदेश द्वारा किया गया था। आयोजन का उद्देश्य न केवल भामाशाह जी के जीवन और उनके योगदान को याद करना था, बल्कि उनके आदर्शों को वर्तमान पीढ़ी तक पहुंचाना भी था। कार्यक्रम में उपस्थित नेताओं और कार्यकर्ताओं ने भामाशाह के त्याग, समर्पण और राष्ट्रभक्ति को आत्मसात करने का संकल्प लिया।

कार्यक्रम में भाजपा के सह संयोजक संजय राय ने अतिथियों का स्वागत बड़े ही अनोखे तरीके से किया। उन्होंने पारंपरिक स्वागत सामग्री की जगह ‘झालमुड़ी’ परोसी, जो प्रधानमंत्री मोदी के हालिया झारग्राम दौरे से प्रेरित थी। अतिथि भी इस अभिनव स्वागत से प्रभावित हुए और उन्होंने ‘झालमुड़ी’ का आनंद लेते हुए कार्यक्रम की शुरुआत की। यह दृश्य दर्शाता है कि कैसे एक छोटा सा सांस्कृतिक तत्व राजनीतिक और सामाजिक आयोजनों में नई ऊर्जा भर सकता है।

इस कार्यक्रम में बिहार सरकार के पूर्व कृषि मंत्री राम कृपाल यादव सहित कई वरिष्ठ नेता उपस्थित थे। उनके साथ-साथ पूर्व उप मुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा, प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी, शिवेश कुमार, तारकिशोर प्रसाद और प्रमोद कुमार चंद्रवंशी जैसे प्रमुख नेताओं ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। सभी वक्ताओं ने अपने संबोधन में भामाशाह के जीवन के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला।

भामाशाह, जो महाराणा प्रताप के घनिष्ठ सहयोगी थे, ने अपने संपूर्ण धन को राष्ट्र और स्वाभिमान की रक्षा के लिए समर्पित कर दिया था। उनका यह त्याग भारतीय इतिहास में अद्वितीय माना जाता है। वक्ताओं ने कहा कि भामाशाह केवल एक दानवीर ही नहीं, बल्कि एक कुशल रणनीतिकार और राष्ट्रभक्त भी थे। उनके जीवन से यह सीख मिलती है कि राष्ट्रहित सर्वोपरि होना चाहिए और इसके लिए किसी भी प्रकार का त्याग करने से पीछे नहीं हटना चाहिए।

कार्यक्रम में यह भी कहा गया कि आज के समय में जब समाज विभिन्न चुनौतियों से जूझ रहा है, तब भामाशाह जैसे महापुरुषों के जीवन से प्रेरणा लेकर राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भागीदारी निभाना आवश्यक है। बिहार के विभिन्न क्षेत्रों से आए लोगों को उनके पदचिह्नों पर चलने के लिए प्रेरित किया गया।

इस पूरे घटनाक्रम में ‘झालमुड़ी’ एक प्रतीक के रूप में उभरकर सामने आया—एक ऐसा प्रतीक जो आम जनजीवन, सादगी और सांस्कृतिक एकता को दर्शाता है। चाहे वह पश्चिम बंगाल के चुनावी मंच पर हो या पटना के सभागार में आयोजित एक सांस्कृतिक कार्यक्रम, ‘झालमुड़ी’ ने यह साबित कर दिया कि भारत की असली पहचान उसकी लोकसंस्कृति में ही निहित है।

अंततः यह कहा जा सकता है कि राजनीति केवल भाषणों और घोषणाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जनभावनाओं, परंपराओं और सांस्कृतिक प्रतीकों के माध्यम से भी व्यक्त होती है। ‘झालमुड़ी’ के माध्यम से जो संदेश दिया गया, वह यह है कि भारत की आत्मा उसकी विविधता में बसती है और उसी विविधता को सम्मान देना ही सच्चा राष्ट्रनिर्माण है।

आलोक कुमार

5 मैचों की टी20 सीरीज में 4-1 की हार,भारतीय टीम के लिए चेतावनी बना


                                       भारतीय टीम की सबसे बड़ी समस्या रही बल्लेबाजी में निरंतरता की कमी

जून में होने वाले महिला टी20 वर्ल्ड कप से ठीक पहले दक्षिण अफ्रीका दौरे पर भारतीय महिला टीम का प्रदर्शन कई सवाल खड़े कर गया है। 5 मैचों की टी20 सीरीज में 4-1 की हार केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि टीम की तैयारियों, संतुलन और मानसिक मजबूती पर एक गंभीर संकेत है। जिस दौरे को “तैयारी” के तौर पर देखा जा रहा था, वह कहीं न कहीं भारतीय टीम के लिए चेतावनी बन गया है।

सबसे पहले बात करें इस सीरीज की सबसे बड़ी स्टार की—Laura Wolvaardt। दक्षिण अफ्रीका की कप्तान ने जिस तरह से बल्लेबाजी की, उसने भारतीय गेंदबाजों की रणनीति की पोल खोल दी। 5 मैचों में 330 रन बनाना और आखिरी मैच में नाबाद 92 रन की पारी खेलना केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि यह दिखाता है कि विपक्षी टीम ने भारतीय आक्रमण को कितनी आसानी से पढ़ लिया। खासकर तीसरे मैच में उनका शतक भारत के लिए मनोवैज्ञानिक झटका था, जहां 190+ का स्कोर भी सुरक्षित नहीं रह सका।

भारतीय टीम की सबसे बड़ी समस्या रही बल्लेबाजी में निरंतरता की कमी। Harmanpreet Kaur और Shafali Verma ने कुछ मैचों में अच्छी पारियां जरूर खेलीं, लेकिन टीम का मध्यक्रम बार-बार दबाव में बिखरता नजर आया। दूसरे और पांचवें टी20 में यह साफ दिखा कि जैसे ही शुरुआती विकेट गिरे, रन गति रुक गई और बल्लेबाज आत्मविश्वास खो बैठे। टी20 जैसे तेज फॉर्मेट में यह कमजोरी विश्व कप में भारी पड़ सकती है।

हालांकि इस सीरीज में एक सकारात्मक पहलू भी सामने आया—Deepti Sharma का प्रदर्शन। चौथे मैच में उनकी ऑलराउंड भूमिका (36* रन और 5 विकेट) यह बताती है कि टीम के पास मैच विनर खिलाड़ी हैं। लेकिन समस्या यह है कि ऐसे प्रदर्शन लगातार नहीं आ रहे। एक या दो खिलाड़ियों के दम पर कोई भी टीम बड़ी प्रतियोगिता नहीं जीत सकती।

गेंदबाजी की बात करें तो भारतीय टीम ने शुरुआती विकेट लेने में लगातार संघर्ष किया। पावरप्ले में विकेट न मिलना दक्षिण अफ्रीका को मजबूत शुरुआत देता रहा। इसके अलावा डेथ ओवर्स में भी रन रोकने में नाकामी रही। आखिरी मैच में 155 का स्कोर बहुत बड़ा नहीं था, लेकिन भारतीय गेंदबाजों ने उसे चुनौतीपूर्ण बना दिया क्योंकि वे दबाव बनाने में असफल रहे।

इस पूरी सीरीज में एक और महत्वपूर्ण पहलू सामने आया—रणनीतिक लचीलापन की कमी। दक्षिण अफ्रीका ने हर मैच में भारतीय टीम की कमजोरियों के अनुसार अपनी रणनीति बदली, जबकि भारत बार-बार एक ही पैटर्न में खेलता नजर आया। चाहे बल्लेबाजी क्रम हो या गेंदबाजी बदलाव, टीम मैनेजमेंट को अधिक प्रयोगशील और परिस्थितियों के अनुसार निर्णय लेने की जरूरत है।

मानसिक मजबूती भी एक बड़ा मुद्दा बनकर उभरा। तीसरे टी20 में 190 से ज्यादा रन बनाने के बावजूद हार जाना टीम के आत्मविश्वास को प्रभावित करता है। इसके बाद के मैचों में बल्लेबाजों के शॉट चयन और गेंदबाजों की लाइन-लेंथ में यह दबाव साफ दिखा। बड़े टूर्नामेंट में ऐसी मानसिक कमजोरी टीम को नॉकआउट दौर तक पहुंचने से रोक सकती है।

अब सवाल यह है कि वर्ल्ड कप से पहले भारतीय टीम को किन क्षेत्रों पर ध्यान देना चाहिए। सबसे पहले, बल्लेबाजी क्रम को स्थिर करना होगा। ओपनिंग से लेकर फिनिशिंग तक हर खिलाड़ी की भूमिका स्पष्ट होनी चाहिए। दूसरे, गेंदबाजी में विविधता लानी होगी—खासकर स्पिन और डेथ बॉलिंग में। तीसरे, फील्डिंग में सुधार जरूरी है, क्योंकि कई मौकों पर आसान कैच छूटे और रन आउट के मौके गंवाए गए।

इसके अलावा, टीम को मैच सिचुएशन के अनुसार खेलने की आदत डालनी होगी। केवल बड़े स्कोर बनाना ही काफी नहीं, बल्कि उन्हें डिफेंड करना भी सीखना होगा। कप्तान और कोचिंग स्टाफ को मिलकर ऐसी रणनीति बनानी होगी जो अलग-अलग परिस्थितियों में काम कर सके।

निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि यह हार जितनी निराशाजनक है, उतनी ही उपयोगी भी साबित हो सकती है—अगर टीम इससे सीख ले। वर्ल्ड कप जैसे बड़े मंच पर छोटी गलतियां भी भारी पड़ती हैं। दक्षिण अफ्रीका दौरे ने भारतीय टीम को आईना दिखा दिया है। अब यह टीम पर निर्भर करता है कि वह इस आईने में अपनी कमजोरियों को पहचानकर उन्हें ताकत में बदलती है या फिर वही गलतियां दोहराती है।

आने वाला टी20 वर्ल्ड कप भारतीय महिला टीम के लिए केवल एक टूर्नामेंट नहीं, बल्कि अपनी साख और क्षमता साबित करने का मौका है। अगर टीम ने समय रहते सुधार कर लिया, तो यह हार एक बड़ी सफलता की नींव भी बन सकती है।

आलोक कुमार

महान व्यक्तित्वों और महत्वपूर्ण उपलब्धियों के कारण विशेष स्थान

                                                                 वर्कप्लेस सेफ्टी’ का मुद्दा अत्यंत महत्वपूर्ण

28 अप्रैल इतिहास के पन्नों में एक ऐसा दिन है, जो विविध घटनाओं, महान व्यक्तित्वों और महत्वपूर्ण उपलब्धियों के कारण विशेष स्थान रखता है। यह दिन केवल तिथियों का संयोग नहीं, बल्कि उन घटनाओं का स्मरण है जिन्होंने दुनिया की दिशा और दशा को प्रभावित किया। आइए 28 अप्रैल के ऐतिहासिक महत्व पर विस्तार से प्रकाश डालते हैं।

सबसे पहले इस दिन से जुड़ी एक प्रमुख वैश्विक पहल की बात करें तो 28 अप्रैल को दुनिया भर में World Day for Safety and Health at Work मनाया जाता है। इसकी शुरुआत International Labour Organization (ILO) ने की थी। इसका उद्देश्य कार्यस्थलों पर सुरक्षा, स्वास्थ्य और श्रमिकों के अधिकारों के प्रति जागरूकता बढ़ाना है। औद्योगिक क्रांति के बाद बढ़ते कारखानों और श्रमिकों की समस्याओं ने यह आवश्यकता पैदा की कि काम के दौरान होने वाली दुर्घटनाओं और बीमारियों को रोका जाए। आज के समय में यह दिवस विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो गया है, जब तकनीक और उद्योग तेजी से बदल रहे हैं।

भारतीय इतिहास की दृष्टि से भी 28 अप्रैल का दिन कई मायनों में उल्लेखनीय रहा है। इसी दिन भारत के प्रसिद्ध उद्योगपति Jamnalal Bajaj का निधन हुआ था। वे केवल एक सफल व्यापारी ही नहीं, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम के सक्रिय सहयोगी और Mahatma Gandhi के करीबी अनुयायी थे। जमनालाल बजाज ने स्वदेशी आंदोलन को बढ़ावा दिया और सामाजिक सुधारों के लिए भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनके कार्यों ने भारतीय उद्योग और समाज को नई दिशा दी।

अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में 28 अप्रैल कई ऐतिहासिक घटनाओं का साक्षी रहा है। 1945 में इसी दिन Benito Mussolini execution की घटना हुई थी। इटली के तानाशाह बेनिटो मुसोलिनी को द्वितीय विश्व युद्ध के अंत में इतालवी पार्टिज़न्स द्वारा पकड़ा गया और उनकी हत्या कर दी गई। यह घटना फासीवादी शासन के पतन का प्रतीक बनी और विश्व राजनीति में एक नए युग की शुरुआत का संकेत भी थी।

विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भी यह दिन महत्वपूर्ण रहा है। 2001 में Dennis Tito flight के साथ अंतरिक्ष पर्यटन की शुरुआत हुई, जब अमेरिकी व्यवसायी डेनिस टीटो अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन की यात्रा पर गए। यह घटना मानव इतिहास में एक नए अध्याय की शुरुआत थी, जहां अंतरिक्ष केवल वैज्ञानिकों तक सीमित न रहकर आम लोगों के लिए भी संभावनाओं का क्षेत्र बन गया।

साहित्य और कला के क्षेत्र में भी 28 अप्रैल को कई उल्लेखनीय व्यक्तित्वों का जन्म हुआ। उदाहरण के लिए, प्रसिद्ध लेखक Harper Lee का जन्म 28 अप्रैल 1926 को हुआ था। उनकी प्रसिद्ध कृति To Kill a Mockingbird ने साहित्य जगत में गहरी छाप छोड़ी। इस उपन्यास ने नस्लीय भेदभाव और न्याय के मुद्दों को बहुत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया।

इसके अलावा खेल जगत में भी 28 अप्रैल का दिन कई उपलब्धियों का गवाह रहा है। अलग-अलग वर्षों में इस दिन कई महत्वपूर्ण मैच और रिकॉर्ड बने, जिन्होंने खेल इतिहास को समृद्ध किया। हालांकि यह दिन किसी एक विशेष खेल घटना के लिए प्रसिद्ध नहीं है, फिर भी यह खेल जगत में निरंतर प्रगति और प्रतिस्पर्धा का प्रतीक है।

समाज और संस्कृति के स्तर पर 28 अप्रैल हमें यह सिखाता है कि इतिहास केवल राजाओं और युद्धों का नहीं, बल्कि आम लोगों, श्रमिकों और सामाजिक सुधारकों का भी होता है। यह दिन हमें उन अनगिनत लोगों की याद दिलाता है, जिन्होंने अपने कार्यों से समाज को बेहतर बनाने का प्रयास किया।

यदि हम समकालीन संदर्भ में देखें, तो 28 अप्रैल का महत्व और भी बढ़ जाता है। आज के समय में जब कार्यस्थलों पर तनाव, दुर्घटनाएं और स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं बढ़ रही हैं, तब ‘वर्कप्लेस सेफ्टी’ का मुद्दा अत्यंत महत्वपूर्ण हो गया है। इस दिन के माध्यम से सरकारें, संस्थाएं और समाज मिलकर यह सुनिश्चित करने का प्रयास करते हैं कि हर व्यक्ति को सुरक्षित और स्वस्थ वातावरण में काम करने का अधिकार मिले।

अंततः कहा जा सकता है कि 28 अप्रैल केवल एक तारीख नहीं, बल्कि एक प्रेरणा है—सुरक्षा, न्याय, समानता और प्रगति की दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा। यह दिन हमें इतिहास से सीखने, वर्तमान को समझने और भविष्य को बेहतर बनाने का संदेश देता है। इसलिए 28 अप्रैल का ऐतिहासिक और सामाजिक महत्व सदैव बना रहेगा।

आलोक कुमार

सोमवार, 27 अप्रैल 2026

विरोध प्रदर्शन और सोशल मीडिया पर उबाल

बयान ने स्वाभाविक रूप से राजनीतिक हलकों में तीखी प्रतिक्रिया पैदा की

आज का प्रसंग सचमुच “गजब” इसलिए लगा क्योंकि इसमें सिर्फ एक एंकर की भावुकता नहीं, बल्कि हमारे समय के मीडिया और राजनीति का पूरा चेहरा झलकता है। अशोक श्रीवास्तव द्वारा लाइव डिबेट में राहुल गांधी को “चप्पल की धूल के कण” से भी छोटा बताना महज एक वाक्य नहीं, बल्कि उस गिरते स्तर का संकेत है जहाँ बहस तर्क से हटकर व्यक्तिगत अपमान में बदल जाती है। इस बयान ने स्वाभाविक रूप से राजनीतिक हलकों में तीखी प्रतिक्रिया पैदा की—कांग्रेस समर्थकों का आक्रोश, विरोध प्रदर्शन और सोशल मीडिया पर उबाल—सब कुछ इस बात का प्रमाण है कि भाषा का प्रभाव कितना व्यापक होता है।

इस पूरे विवाद के केंद्र में एक और बड़ा नाम है—विनायक दामोदर सावरकर। सावरकर भारतीय इतिहास के उन जटिल व्यक्तित्वों में से हैं, जिन्हें एक ही रंग में नहीं देखा जा सकता। एक ओर वे क्रांतिकारी थे, जिन्होंने ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष किया, काला पानी की सजा झेली और कठिन यातनाओं का सामना किया। दूसरी ओर, उनकी “हिंदुत्व” की विचारधारा और ब्रिटिश शासन के दौरान लिखे गए क्षमायाचना पत्र उन्हें विवादों के घेरे में भी रखते हैं। समर्थकों के लिए वे “वीर” हैं, राष्ट्रभक्ति के प्रतीक हैं; आलोचकों के लिए वे समझौतावादी और वैचारिक रूप से विभाजनकारी भी माने जाते हैं। यही द्वंद्व आज भी भारतीय राजनीति और समाज में दिखाई देता है।

ऐसे में जब कोई एंकर सावरकर के पक्ष में बोलते-बोलते इस हद तक भावुक हो जाए कि वह एक प्रमुख विपक्षी नेता का सार्वजनिक अपमान कर बैठे, तो यह सिर्फ व्यक्तिगत गलती नहीं रह जाती। यह उस प्रवृत्ति का हिस्सा बन जाती है, जहाँ मीडिया निष्पक्ष मंच के बजाय विचारधारा का अखाड़ा बनता जा रहा है। विशेष रूप से तब, जब यह मंच दूरदर्शन जैसा सरकारी चैनल हो, जिसकी जिम्मेदारी निजी चैनलों से कहीं अधिक है।

दूरदर्शन जनता के टैक्स के पैसे से चलता है। इसका मूल उद्देश्य सूचना देना, शिक्षित करना और संतुलित दृष्टिकोण प्रस्तुत करना है। लेकिन जब इसी मंच पर भाषा का स्तर गिरता है, तो सवाल उठना लाजिमी है—क्या यह वही पत्रकारिता है जिसकी अपेक्षा एक लोकतांत्रिक समाज करता है? अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार जरूर है, लेकिन उसके साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी होती है। खासकर तब, जब आप लाखों दर्शकों के सामने बोल रहे हों।

इस घटना ने एक और महत्वपूर्ण सवाल खड़ा किया है—क्या आज के एंकर सिर्फ “मॉडरेटर” रह गए हैं या खुद “खिलाड़ी” बन गए हैं? पहले पत्रकार का काम था सवाल पूछना, तथ्यों को सामने रखना और बहस को संतुलित रखना। लेकिन आज कई एंकर खुद ही निर्णायक बन बैठते हैं। वे बहस को दिशा देने के बजाय उसे नियंत्रित करते हैं, अपनी राय को अंतिम सत्य की तरह पेश करते हैं और विरोधी विचारों को दबाने की कोशिश करते हैं। इससे दर्शक को निष्पक्ष जानकारी नहीं, बल्कि एक पक्षीय दृष्टिकोण मिलता है।

यहाँ यह भी समझना जरूरी है कि आलोचना और अपमान में फर्क होता है। राहुल गांधी की नीतियों, बयानों या राजनीतिक रणनीतियों पर सवाल उठाना पूरी तरह वैध है। वे एक बड़े राजनीतिक दल के नेता हैं और लोकतंत्र में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण है। लेकिन उन्हें “चप्पल की धूल” कहना न तो आलोचना है, न ही वैचारिक असहमति—यह सिर्फ व्यक्तिगत हमला है। इससे न तो सावरकर की महानता बढ़ती है और न ही बहस का स्तर ऊँचा होता है।

दूसरी तरफ, सावरकर के आलोचकों को भी आत्ममंथन करना चाहिए। किसी ऐतिहासिक व्यक्तित्व को एक ही पहलू के आधार पर खारिज कर देना भी उचित नहीं। इतिहास बहुआयामी होता है, और उसमें व्यक्तियों के योगदान और विवाद दोनों को समझना जरूरी है। सावरकर के योगदान को पूरी तरह नकारना उतना ही गलत है, जितना उन्हें बिना आलोचना के महिमामंडित करना।

मीडिया के इस ध्रुवीकरण का असर सिर्फ टीवी स्टूडियो तक सीमित नहीं रहता। यह समाज में भी विभाजन को गहरा करता है। दर्शक अपने-अपने “पसंदीदा” चैनल चुन लेते हैं, जहाँ उनकी सोच को ही सही ठहराया जाता है। नतीजा यह होता है कि संवाद की जगह टकराव ले लेता है। जब हर पक्ष खुद को ही सही मानने लगे और दूसरे को पूरी तरह खारिज कर दे, तो लोकतंत्र की बुनियाद कमजोर होने लगती है।

इस संदर्भ में अंतरराष्ट्रीय उदाहरण भी अक्सर दिए जाते हैं, जहाँ मीडिया की भूमिका ने समाज को प्रभावित किया है। हालांकि हर देश का संदर्भ अलग होता है, लेकिन एक बात सार्वभौमिक है—मीडिया अगर जिम्मेदारी से काम न करे, तो उसका असर खतरनाक हो सकता है। इसलिए जरूरी है कि पत्रकारिता को फिर से उसके मूल उद्देश्य की ओर लौटाया जाए—सत्य की खोज और समाज को जागरूक करना।

इस पूरे घटनाक्रम से कुछ स्पष्ट सीख मिलती हैं। पहली, सार्वजनिक मंच पर भाषा की मर्यादा बनाए रखना अनिवार्य है। दूसरी, मीडिया को अपनी निष्पक्षता और विश्वसनीयता को प्राथमिकता देनी चाहिए। तीसरी, दर्शकों को भी सजग होना होगा—वे क्या देख रहे हैं, क्यों देख रहे हैं और उस पर कैसे प्रतिक्रिया दे रहे हैं। लोकतंत्र सिर्फ नेताओं या पत्रकारों से नहीं चलता, बल्कि जागरूक नागरिकों से भी चलता है।

अंततः, यह घटना एक चेतावनी की तरह है। यह बताती है कि अगर बहस का स्तर इसी तरह गिरता रहा, तो हम मुद्दों से भटककर सिर्फ व्यक्तियों पर आ जाएंगे। असहमति लोकतंत्र की ताकत है, लेकिन जब वह असहमति अपमान में बदल जाती है, तो वही ताकत कमजोरी बन जाती है। इसलिए जरूरी है कि सभी पक्ष—मीडिया, राजनीति और जनता—अपनी-अपनी जिम्मेदारी को समझें और संवाद को गरिमा के साथ आगे बढ़ाएं।

आलोक कुमार

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