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बुधवार, 3 जून 2026

World : ईसाई धर्म में संस्कारों का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है

ये केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि विश्वास, आध्यात्मिक विकास और ईश्वर के साथ संबंध को सुदृढ़ करने के माध्यम माने जाते हैं


ईसाई धर्म
में संस्कारों का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। ये केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि विश्वास, आध्यात्मिक विकास और ईश्वर के साथ संबंध को सुदृढ़ करने के माध्यम माने जाते हैं। इनमें बपतिस्मा (Baptism) और परमप्रसाद (Holy Communion या Eucharist) विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं। किसी भी ईसाई बच्चे के धार्मिक जीवन की शुरुआत बपतिस्मा से होती है, जबकि परमप्रसाद उसे मसीह के साथ गहरे आध्यात्मिक संबंध में प्रवेश कराने वाला संस्कार माना जाता है। यही कारण है कि विभिन्न ईसाई परंपराओं में बच्चों को परमप्रसाद देने की आयु, प्रक्रिया और नियमों को लेकर अलग-अलग मान्यताएं विकसित हुई हैं।

बपतिस्मा संस्कार को ईसाई जीवन का प्रवेश द्वार कहा जाता है। इस संस्कार के माध्यम से व्यक्ति को पापों से शुद्ध माना जाता है और उसे कलीसिया का सदस्य स्वीकार किया जाता है। अधिकांश ईसाई संप्रदायों में बपतिस्मा के बाद ही व्यक्ति अन्य संस्कारों को ग्रहण करने का अधिकारी बनता है। हालांकि, परमप्रसाद प्राप्त करने के लिए केवल बपतिस्मा पर्याप्त नहीं माना जाता, बल्कि बच्चे की धार्मिक समझ, तैयारी और विश्वास की परिपक्वता को भी महत्व दिया जाता है।

कैथोलिक चर्च में प्रथम परमप्रसाद (First Holy Communion) एक अत्यंत महत्वपूर्ण अवसर होता है। सामान्यतः सात या आठ वर्ष की आयु को "विवेक की आयु" माना जाता है। इस उम्र में यह माना जाता है कि बच्चा सही और गलत के बीच अंतर समझने लगता है तथा यूखारिस्ट के महत्व को ग्रहण करने में सक्षम हो जाता है। प्रथम परमप्रसाद से पहले बच्चों को विशेष धार्मिक शिक्षा दी जाती है, जिसमें उन्हें यीशु मसीह, अंतिम भोज, पवित्र मिस्सा और परमप्रसाद के महत्व के बारे में बताया जाता है। इसके अतिरिक्त, अधिकांश स्थानों पर बच्चों को पहली बार स्वीकारोक्ति या पापस्वीकार (Confession) का संस्कार भी ग्रहण कराना आवश्यक माना जाता है। इसके बाद एक विशेष समारोह में बच्चे पहली बार प्रभु के शरीर और रक्त के प्रतीक स्वरूप पवित्र प्रसाद ग्रहण करते हैं। 


एंग्लिकन परंपरा, जो कई मामलों में कैथोलिक परंपरा से मिलती-जुलती है, में भी बच्चों को धार्मिक शिक्षा और तैयारी के बाद प्रथम परमप्रसाद दिया जाता है। हालांकि विभिन्न देशों और चर्च प्रांतों में नियमों में कुछ भिन्नता देखने को मिल सकती है। कई एंग्लिकन चर्चों में पुष्टिकरण (Confirmation) के बाद ही नियमित रूप से परमप्रसाद ग्रहण करने की अनुमति दी जाती है, जबकि कुछ स्थानों पर बपतिस्मा प्राप्त बच्चों को पहले ही परमप्रसाद दिया जाने लगा है।

रूढ़िवादी या ऑर्थोडॉक्स ईसाई परंपरा इस विषय में एक अलग दृष्टिकोण रखती है। यहाँ यह विश्वास किया जाता है कि ईश्वर की कृपा आयु या बौद्धिक समझ पर निर्भर नहीं करती। इसलिए शिशु के बपतिस्मा के तुरंत बाद ही दृढ़ीकरण (Chrismation) और परमप्रसाद के संस्कार भी प्रदान कर दिए जाते हैं। इस प्रकार एक नवजात शिशु भी कलीसिया के पूर्ण सदस्य के रूप में सभी प्रमुख संस्कारों में सहभागी बन जाता है। ऑर्थोडॉक्स चर्चों में यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और आज भी अधिकांश रूढ़िवादी समुदायों में इसका पालन किया जाता है।

प्रोटेस्टेंट परंपराओं में इस विषय पर अधिक विविधता देखने को मिलती है। कई प्रोटेस्टेंट चर्च यह मानते हैं कि परमप्रसाद ग्रहण करने से पहले व्यक्ति को अपने विश्वास की व्यक्तिगत और सचेत घोषणा करनी चाहिए। इसलिए बच्चों को तब तक परमप्रसाद नहीं दिया जाता जब तक वे स्वयं यीशु मसीह में अपने विश्वास को समझकर स्वीकार न कर लें। कुछ चर्चों में किशोरावस्था के दौरान विशेष कक्षाओं और प्रशिक्षण के बाद बच्चों को परमप्रसाद ग्रहण करने की अनुमति दी जाती है। वहीं कुछ अन्य प्रोटेस्टेंट समुदायों में बपतिस्मा प्राप्त बच्चों को उनके माता-पिता और पादरी के मार्गदर्शन में अपेक्षाकृत कम आयु में भी परमप्रसाद दिया जा सकता है।

बैपटिस्ट और स्वतंत्र इंजीलवादी कलीसियाओं में तो और भी अधिक व्यक्तिगत दृष्टिकोण अपनाया जाता है। यहाँ परमप्रसाद को विश्वासियों की स्मृति और प्रतिबद्धता का प्रतीक माना जाता है। इसलिए जब कोई बच्चा या युवा अपने विश्वास को समझकर सार्वजनिक रूप से स्वीकार करता है, तभी उसे प्रभुभोज में भाग लेने योग्य माना जाता है। इस कारण कोई निश्चित आयु सीमा निर्धारित नहीं होती।

भारतीय ईसाई समाज में भी प्रथम परमप्रसाद एक महत्वपूर्ण धार्मिक और पारिवारिक उत्सव के रूप में मनाया जाता है। बच्चे विशेष सफेद वस्त्र पहनते हैं, चर्च में सामूहिक प्रार्थना होती है और परिवारजन इस अवसर को खुशी और आशीर्वाद के साथ मनाते हैं। यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि बच्चे के आध्यात्मिक जीवन में एक नए अध्याय की शुरुआत माना जाता है।


इस प्रकार देखा जाए तो ईसाई धर्म की विभिन्न परंपराओं में परमप्रसाद ग्रहण करने की आयु और प्रक्रिया भिन्न हो सकती है, लेकिन सभी का उद्देश्य एक ही है—विश्वासी को प्रभु यीशु मसीह के और अधिक निकट लाना तथा उसके विश्वास को मजबूत बनाना। चाहे वह शिशु अवस्था में दिया जाए, बचपन में या फिर युवावस्था में, परमप्रसाद ईसाई जीवन का एक पवित्र और अत्यंत महत्वपूर्ण संस्कार बना रहता है।

आलोक कुमार

World : प्रत्येक वर्ष 3 जून को विश्व साइकिल दिवस मनाया जाता है

 विश्व साइकिल दिवस: स्वास्थ्य, पर्यावरण और जागरूकता का संदेश

प्रत्येक वर्ष 3 जून को विश्व साइकिल दिवस मनाया जाता है। यह दिवस साइकिल जैसे सरल, सुलभ, किफायती और पर्यावरण-अनुकूल परिवहन साधन के महत्व को रेखांकित करने के लिए मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा मान्यता प्राप्त इस दिवस का उद्देश्य लोगों को स्वस्थ जीवनशैली अपनाने, प्रदूषण कम करने तथा सतत विकास की दिशा में प्रेरित करना है। वर्ष 2026 में विश्व साइकिल दिवस की थीम “हरित भविष्य के लिए साइकिल चलाना” रखी गई है, जो पर्यावरण संरक्षण और स्वास्थ्य के बीच गहरे संबंध को उजागर करती है।

इसी अवसर पर कटिहार जिले के समेली प्रखंड में यूथ पावर स्वयंसेवी संगठन तथा मेरा युवा भारत (माय भारत) कटिहार के संयुक्त तत्वावधान में फिट इंडिया जागरूकता साइकिल रैली का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य युवाओं और आम नागरिकों को फिटनेस, पर्यावरण संरक्षण तथा नियमित शारीरिक गतिविधियों के प्रति जागरूक करना था।                                                                           

कार्यक्रम की अध्यक्षता यूथ पावर के अध्यक्ष हरि प्रसाद मंडल ने की। उद्घाटन समारोह में जिला खेल पदाधिकारी संजीव कुमार सिंह, पंचायती राज पदाधिकारी मोहम्मद आसीम तथा मलहरिया पंचायत के युवा मुखिया राज कुमार भारती मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। अतिथियों ने नारियल फोड़कर और फीता काटकर कार्यक्रम का शुभारंभ किया तथा हरी झंडी दिखाकर साइकिल रैली को रवाना किया।

अपने संबोधन में जिला खेल पदाधिकारी संजीव कुमार सिंह ने कहा कि स्वस्थ व्यक्ति ही समाज और राष्ट्र के विकास में अधिक प्रभावी योगदान दे सकता है। उन्होंने युवाओं से सक्रिय जीवनशैली अपनाने की अपील करते हुए कहा कि यदि हम आलस्य छोड़कर नियमित शारीरिक गतिविधियों को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बना लें तो न केवल हमारा स्वास्थ्य बेहतर होगा, बल्कि हमारी कार्यक्षमता और उत्पादकता में भी वृद्धि होगी। उन्होंने इस आयोजन को केवल एक कार्यक्रम नहीं बल्कि स्वस्थ भारत के निर्माण का संकल्प बताया।

रैली के दौरान माय भारत के युवा स्वयंसेवक शिवम कुमार और स्वयंसेविका कृति भारती ने आकर्षक नारों के माध्यम से लोगों को प्रेरित किया। “आओ जरा सेहत बनाएं, सब मिलकर साइकिल चलाएं”, “न बाइक न कार भली, सेहत कहती है साइकिल भली”, “सेहत को दे दो कुछ पल, आओ मिलकर चलाएं साइकिल” तथा “फिटनेस का डोज, आधा घंटा रोज” जैसे नारों ने पूरे वातावरण को उत्साह और जागरूकता से भर दिया।

विश्व साइकिल दिवस केवल एक प्रतीकात्मक आयोजन नहीं है, बल्कि यह हमें जीवन की उन सरल आदतों की याद दिलाता है जो हमारे स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों के लिए लाभदायक हैं। आधुनिक जीवनशैली में बढ़ती निष्क्रियता, मोटापा, मधुमेह और हृदय रोग जैसी समस्याएं गंभीर चुनौती बनती जा रही हैं। ऐसे समय में साइकिल चलाना एक आसान और प्रभावी समाधान के रूप में सामने आता है।

नियमित साइकिल चलाने से हृदय और फेफड़े मजबूत होते हैं, शरीर की सहनशक्ति बढ़ती है तथा वजन नियंत्रित रहता है। यह मांसपेशियों को सक्रिय रखती है और शरीर में रक्त संचार को बेहतर बनाती है। साथ ही यह मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी अत्यंत लाभकारी है। साइकिल चलाने से तनाव कम होता है, मन प्रसन्न रहता है और आत्मविश्वास में वृद्धि होती है।

पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से भी साइकिल का महत्व अत्यधिक है। यह शून्य-उत्सर्जन वाला परिवहन साधन है, जिससे न तो वायु प्रदूषण होता है और न ही ध्वनि प्रदूषण। आज जब दुनिया जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग जैसी समस्याओं से जूझ रही है, तब साइकिल का अधिक उपयोग एक सकारात्मक और जिम्मेदार कदम माना जा सकता है।

आर्थिक दृष्टि से भी साइकिल आम लोगों के लिए बेहद उपयोगी साधन है। इसके रखरखाव का खर्च बहुत कम होता है और ईंधन पर निर्भरता भी समाप्त हो जाती है। ग्रामीण क्षेत्रों से लेकर शहरों तक, साइकिल आज भी लाखों लोगों की दैनिक जरूरतों का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी हुई है।

समेली में आयोजित यह साइकिल रैली केवल एक खेल गतिविधि नहीं थी, बल्कि स्वास्थ्य, स्वच्छ पर्यावरण और सामाजिक जागरूकता का सशक्त संदेश देने वाला अभियान था। सैकड़ों प्रतिभागियों की सक्रिय भागीदारी ने यह साबित कर दिया कि युवा पीढ़ी फिटनेस और पर्यावरण संरक्षण के प्रति गंभीरता से सोच रही है।

विश्व साइकिल दिवस हमें यह संदेश देता है कि यदि हम प्रतिदिन कुछ समय साइकिल चलाने की आदत विकसित करें तो न केवल अपना स्वास्थ्य बेहतर बना सकते हैं, बल्कि स्वच्छ, हरित और स्वस्थ समाज के निर्माण में भी महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं। साइकिल केवल दो पहियों का वाहन नहीं, बल्कि स्वस्थ जीवन, स्वच्छ पर्यावरण और उज्ज्वल भविष्य की ओर बढ़ता एक सशक्त कदम है।

आलोक कुमार 

मंगलवार, 2 जून 2026

World : हर वर्ष 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है

 विश्व पर्यावरण दिवस : धरती को बचाने का संकल्प

हर वर्ष 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है। यह केवल एक औपचारिक दिवस नहीं, बल्कि मानव समाज को प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का स्मरण कराने का अवसर है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा 1972 में स्टॉकहोम सम्मेलन के बाद इसकी शुरुआत की गई थी और 1973 से यह दिवस विश्व स्तर पर मनाया जाने लगा। इसका मुख्य उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण, जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के प्रति लोगों को जागरूक बनाना है।

आज जब हम विकास और आधुनिकता की दौड़ में आगे बढ़ रहे हैं, तब पर्यावरणीय चुनौतियाँ भी तेजी से बढ़ रही हैं। बढ़ती जनसंख्या, औद्योगिकीकरण, शहरीकरण और प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन ने पृथ्वी के संतुलन को प्रभावित किया है। परिणामस्वरूप जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग, जल संकट, वायु प्रदूषण और जैव विविधता के ह्रास जैसी समस्याएँ सामने आ रही हैं। ऐसे समय में विश्व पर्यावरण दिवस का महत्व और अधिक बढ़ जाता है।

पर्यावरण केवल पेड़-पौधों तक सीमित नहीं है। इसमें हवा, पानी, मिट्टी, पर्वत, नदियाँ, जीव-जंतु और मनुष्य सहित सभी जैविक एवं अजैविक तत्व शामिल हैं। ये सभी एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं और जीवन का आधार बनाते हैं। यदि इनमें से किसी एक घटक को नुकसान पहुँचता है तो उसका प्रभाव पूरे पर्यावरणीय तंत्र पर पड़ता है। इसलिए पर्यावरण संरक्षण का अर्थ केवल वृक्षारोपण नहीं, बल्कि प्रकृति के हर घटक के प्रति संवेदनशील होना है।

आज पर्यावरण प्रदूषण सबसे बड़ी समस्याओं में से एक बन चुका है। वाहनों से निकलने वाला धुआँ, कारखानों का उत्सर्जन, प्लास्टिक कचरा और रासायनिक अपशिष्ट वायु, जल तथा भूमि को प्रदूषित कर रहे हैं। शहरों में बढ़ती आबादी के कारण हरित क्षेत्र कम होते जा रहे हैं। जंगलों की कटाई से न केवल वन्यजीवों का आवास नष्ट हो रहा है, बल्कि पृथ्वी की कार्बन अवशोषित करने की क्षमता भी घट रही है। इसका सीधा प्रभाव जलवायु परिवर्तन के रूप में दिखाई देता है।

ग्लोबल वार्मिंग वर्तमान समय की सबसे गंभीर चुनौतियों में से एक है। पृथ्वी का औसत तापमान लगातार बढ़ रहा है। इसके कारण हिमनद पिघल रहे हैं, समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है और मौसम के स्वरूप में तेजी से बदलाव हो रहा है। कहीं अत्यधिक वर्षा हो रही है तो कहीं लंबे समय तक सूखा पड़ रहा है। हीट वेव, चक्रवात और बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाएँ पहले की तुलना में अधिक तीव्र और बार-बार होने लगी हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो आने वाली पीढ़ियों को गंभीर संकटों का सामना करना पड़ सकता है।

जल संरक्षण भी पर्यावरण संरक्षण का महत्वपूर्ण हिस्सा है। पृथ्वी पर उपलब्ध मीठे पानी की मात्रा सीमित है, लेकिन हम इसका उपयोग अक्सर लापरवाही से करते हैं। नल खुला छोड़ देना, आवश्यकता से अधिक पानी खर्च करना और वर्षा जल का संरक्षण न करना जल संकट को बढ़ावा देता है। आज कई क्षेत्रों में पीने के पानी की समस्या गंभीर रूप धारण कर चुकी है। ऐसे में वर्षा जल संचयन, जल स्रोतों की रक्षा और पानी के विवेकपूर्ण उपयोग को जीवनशैली का हिस्सा बनाना आवश्यक है।

प्लास्टिक प्रदूषण भी एक बड़ी चुनौती है। एक बार उपयोग होने वाला प्लास्टिक वर्षों तक नष्ट नहीं होता और मिट्टी, जल तथा जीव-जंतुओं के लिए खतरा बन जाता है। बाजार जाते समय कपड़े के थैले का उपयोग, प्लास्टिक बोतलों और अन्य वस्तुओं का सीमित प्रयोग तथा कचरे का उचित प्रबंधन इस समस्या को कम करने में सहायक हो सकता है।

पर्यावरण संरक्षण के लिए वृक्षारोपण एक प्रभावी उपाय है, लेकिन केवल पौधे लगाना पर्याप्त नहीं है। उनकी देखभाल और संरक्षण भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यदि लगाए गए पौधे जीवित नहीं रहेंगे तो वृक्षारोपण अभियान का उद्देश्य पूरा नहीं होगा। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को कम से कम कुछ पौधे लगाने और उन्हें पेड़ बनने तक सुरक्षित रखने का संकल्प लेना चाहिए।

कृषि क्षेत्र में भी पर्यावरण के अनुकूल तरीकों को अपनाने की आवश्यकता है। जैविक खेती, प्राकृतिक खाद, देशी बीजों का संरक्षण और रासायनिक उर्वरकों के सीमित उपयोग से मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है तथा पर्यावरण पर नकारात्मक प्रभाव कम पड़ता है। ग्रामीण क्षेत्रों में पारंपरिक जल संरक्षण प्रणालियों और स्थानीय ज्ञान को पुनर्जीवित करना भी समय की मांग है।

विश्व पर्यावरण दिवस हमें यह संदेश देता है कि पृथ्वी केवल हमारी नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की भी धरोहर है। यदि हम आज प्रकृति का सम्मान करेंगे, संसाधनों का संतुलित उपयोग करेंगे और पर्यावरण संरक्षण को अपनी आदत बनाएंगे, तभी भविष्य सुरक्षित रह सकेगा। पर्यावरण की रक्षा किसी एक सरकार, संस्था या संगठन की जिम्मेदारी नहीं है। यह प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है।

आइए, इस विश्व पर्यावरण दिवस पर हम संकल्प लें कि जल बचाएंगे, प्लास्टिक का कम उपयोग करेंगे, अधिक से अधिक पेड़ लगाएंगे, ऊर्जा की बचत करेंगे और प्रकृति के साथ संतुलित जीवन जीने का प्रयास करेंगे। यही धरती के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि और आने वाली पीढ़ियों के प्रति सबसे बड़ा उपहार होगा।

आलोक कुमार

Kolkata: दिलीप एंथनी रोजारियो के निधन से उत्पन्न शून्य को भरना आसान नहीं

 दिलीप एंथनी रोजारियो : एक समर्पित संगीतकार और चर्च सेवक को श्रद्धांजलि

कोलकाता
महाधर्मप्रांत (आर्चडायोसिस ऑफ कलकत्ता) के लिए 2 जून 2026 का दिन अत्यंत दुखद रहा। चर्च, संगीत और सामाजिक सेवा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले दिलीप एंथनी रोजारियो के निधन का समाचार मिलते ही शोक की लहर दौड़ गई। वे केवल एक प्रतिभाशाली संगीतकार ही नहीं थे, बल्कि एक समर्पित ले-विश्वासी (Lay Faithful) और चर्च के सक्रिय कार्यकर्ता भी थे। उनके निधन से चर्च समुदाय ने एक ऐसे व्यक्ति को खो दिया है जिसने अपना जीवन सेवा, संगीत और सुसमाचार के प्रचार-प्रसार के लिए समर्पित कर दिया था।

दिलीप एंथनी रोजारियो का जन्म 17 जून 1962 को हुआ था। बचपन से ही उन्हें संगीत के प्रति विशेष लगाव था। उन्होंने अपनी प्रतिभा और मेहनत के बल पर चर्च संगीत के क्षेत्र में एक विशिष्ट पहचान बनाई। उनके नेतृत्व और योगदान से अनेक धार्मिक कार्यक्रमों तथा प्रार्थना सभाओं को नई ऊँचाइयाँ मिलीं। वे कोलकाता क्रिश्चियन कॉयर से भी जुड़े रहे और अपनी मधुर प्रस्तुति तथा संगीत निर्देशन के लिए व्यापक रूप से सम्मानित किए जाते थे।

चर्च के प्रति उनकी निष्ठा केवल संगीत तक सीमित नहीं थी। उन्होंने महाधर्मप्रांत के लेटी आयोग (Laity Commission) के प्रमुख के रूप में भी कार्य किया। इस जिम्मेदारी के दौरान उन्होंने आम विश्वासियों को चर्च की गतिविधियों से जोड़ने, युवाओं को प्रेरित करने और समाज में ईसाई मूल्यों के प्रसार के लिए उल्लेखनीय प्रयास किए। उनका व्यक्तित्व सरल, विनम्र और प्रेरणादायक था, जिसके कारण वे सभी आयु वर्ग के लोगों के प्रिय बने रहे।

उनके निधन की सूचना मिलने के बाद सोशल मीडिया पर शोक संदेशों की बाढ़ आ गई। अनेक लोगों ने उन्हें एक दयालु, सहृदय और समर्पित व्यक्ति बताया। जिन्होंने उनके साथ कार्य किया था, वे उनकी सादगी और सेवा भावना को याद कर रहे हैं। कई लोगों ने कहा कि वे चर्च और समाज के लिए सदैव उपलब्ध रहने वाले व्यक्ति थे। दूसरों की सहायता करना और समुदाय को जोड़कर रखना उनकी विशेष पहचान थी।

उनके एक परिचित ने लिखा कि यह समाचार सुनकर उन्हें गहरा आघात लगा है। उन्होंने कहा कि दिलीप रोजारियो एक ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने सुसमाचार के संदेश को लोगों तक पहुँचाने के लिए अथक परिश्रम किया। वहीं अन्य श्रद्धांजलि संदेशों में उन्हें एक उत्कृष्ट संगीतकार, संवेदनशील इंसान और प्रेरणास्रोत बताया गया। लोगों ने उनके परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त करते हुए उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की।

दिलीप रोजारियो का जीवन इस बात का उदाहरण है कि प्रतिभा और सेवा भावना जब एक साथ आती हैं, तो समाज पर गहरा सकारात्मक प्रभाव छोड़ती हैं। उन्होंने संगीत को केवल कला के रूप में नहीं देखा, बल्कि उसे ईश्वर की महिमा और लोगों को जोड़ने का माध्यम बनाया। उनके गीत, उनकी प्रस्तुतियाँ और उनका मार्गदर्शन आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करता रहेगा।

आज जब चर्च समुदाय उन्हें याद कर रहा है, तब उनके जीवन की सबसे बड़ी विरासत उनकी सेवा, समर्पण और प्रेम की भावना है। उन्होंने अपने कार्यों से यह सिद्ध किया कि सच्ची महानता पद या प्रतिष्ठा में नहीं, बल्कि दूसरों के लिए किए गए निस्वार्थ कार्यों में होती है। उनकी कमी लंबे समय तक महसूस की जाएगी, लेकिन उनके द्वारा छोड़े गए आदर्श और मूल्य सदैव जीवित रहेंगे।                                                         

दिलीप एंथनी रोजारियो के निधन से उत्पन्न शून्य को भरना आसान नहीं होगा। फिर भी उनके जीवन से प्रेरणा लेकर चर्च और समाज के लोग उनके अधूरे सपनों को आगे बढ़ाने का प्रयास करेंगे। उनकी स्मृतियाँ, उनका संगीत और उनकी सेवा भावना सदैव लोगों के हृदय में जीवित रहेगी।

ईश्वर दिवंगत आत्मा को अनंत शांति प्रदान करें तथा उनके परिवार, मित्रों और शुभचिंतकों को इस कठिन समय में धैर्य और शक्ति दें। दिलीप एंथनी रोजारियो को विनम्र श्रद्धांजलि। उनकी आत्मा चिरशांति में विश्राम करे। (RIP)

आलोक कुमार

Bihar : बेतिया: उत्तर भारत में कैथोलिक मिशन का ऐतिहासिक केंद्र

 बेतिया: उत्तर भारत में कैथोलिक मिशन का ऐतिहासिक केंद्र

बिहार के पश्चिम चंपारण जिले में स्थित बेतिया केवल एक ऐतिहासिक नगर ही नहीं, बल्कि उत्तर भारत में कैथोलिक मिशनरी गतिविधियों का एक महत्वपूर्ण केंद्र भी रहा है। बेतिया का धार्मिक, शैक्षणिक और सामाजिक इतिहास लगभग तीन शताब्दियों पुराना है। यहां स्थापित कैथोलिक मिशन ने शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सेवा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया है। इस गौरवशाली इतिहास के केंद्र में एक महान मिशनरी पादरी फादर जोसेफ मेरी बिरिनी का नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित है।

फादर जोसेफ मेरी बिरिनी (1709-1761) उत्तर भारत के पहले कैपुचिन मिशन, बेतिया मिशन, के संस्थापक थे। वे इटली से भारत आए और अपने ज्ञान, सेवा तथा समर्पण के कारण शीघ्र ही स्थानीय लोगों के बीच लोकप्रिय हो गए। वर्ष 1740 में उन्होंने बेतिया राज की महारानी की एक लंबी और गंभीर बीमारी को चमत्कारिक रूप से ठीक किया। इस घटना ने मिशन के प्रति लोगों का विश्वास बढ़ाया और बेतिया राज परिवार के साथ कैथोलिक मिशन के संबंध और मजबूत हुए।

फादर बिरिनी केवल धर्मप्रचारक ही नहीं, बल्कि एक विद्वान भाषाविद भी थे। उन्हें इतालवी, लैटिन, फ्रेंच, जर्मन, हिंदुस्तानी और संस्कृत भाषाओं का उत्कृष्ट ज्ञान था। उनकी विद्वता का प्रमाण यह है कि उन्होंने प्रसिद्ध "वाल्मीकि रामायण" का इतालवी भाषा में अनुवाद किया। उस समय किसी यूरोपीय मिशनरी द्वारा भारतीय धार्मिक ग्रंथ का अध्ययन और अनुवाद करना एक असाधारण उपलब्धि मानी जाती थी। इससे भारतीय संस्कृति के प्रति उनके सम्मान और गहन रुचि का भी पता चलता है।

वर्ष 1751 में फादर बिरिनी ने बेतिया में एक विशाल और सुंदर गिरजाघर का निर्माण कराया। उसी वर्ष क्रिसमस की पूर्व संध्या पर इस चर्च को विधिवत आशीष देकर श्रद्धालुओं के लिए खोल दिया गया। यह चर्च उस समय उत्तर भारत के सबसे महत्वपूर्ण कैथोलिक उपासना केंद्रों में से एक था। फादर बिरिनी ने अपने जीवन का अधिकांश समय बेतिया में बिताया और यहीं 15 जनवरी 1761 को उनका निधन हुआ। उनका जीवन आज भी सेवा, त्याग और समर्पण की प्रेरणा देता है।

बेतिया मिशन ने शिक्षा के क्षेत्र में भी ऐतिहासिक कार्य किए। वर्ष 1860 में फादर जॉन बैपटिस्ट ने मिशन मिडिल स्कूल की स्थापना की। यह कैपुचिन मिशन का तीसरा विद्यालय था। इस विद्यालय ने क्षेत्र के हजारों विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान की और अनेक प्रतिभाओं को विकसित किया। शिक्षा के माध्यम से समाज में जागरूकता और प्रगति लाने का यह प्रयास अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ।

महिलाओं की शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए वर्ष 1874 में धन्य कुँवारी मरियम की बहनों (Sisters of the Blessed Virgin Mary) ने बेतिया में एक बालिका विद्यालय की स्थापना की, जिसे बाद में सेंट टेरेसा गर्ल्स हाई स्कूल नाम दिया गया। उस दौर में लड़कियों की शिक्षा पर विशेष ध्यान देना एक दूरदर्शी कदम था। वर्ष 1892 में इस विद्यालय का संचालन स्विट्जरलैंड की होली क्रॉस की सिस्टर्स ऑफ मर्सी को सौंप दिया गया। आज भी यह विद्यालय क्षेत्र की प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थाओं में गिना जाता है।

मुद्रण और प्रकाशन के क्षेत्र में भी बेतिया मिशन ने महत्वपूर्ण योगदान दिया। वर्ष 1897 में कैथोलिक मिशन प्रेस, बेतिया की स्थापना हुई। इस प्रेस के माध्यम से धार्मिक, शैक्षणिक और सामाजिक साहित्य का प्रकाशन किया जाने लगा। इससे शिक्षा और ज्ञान के प्रसार को नई गति मिली।

बेतिया मिशन की एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि फादर काजेतान सेसारी का पुरोहित बनना था। वे बेतिया में जन्मे पहले भारतीय कैथोलिक पादरी थे। उनकी नियुक्ति ने यह सिद्ध कर दिया कि मिशन केवल विदेशी धर्मप्रचारकों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि स्थानीय लोगों को भी नेतृत्व और सेवा के अवसर प्रदान किए गए।

समय के साथ बेतिया के कैथोलिक समुदाय का विस्तार हुआ। जब श्रद्धालुओं की संख्या एक हजार से अधिक हो गई, तब पुराने चर्च को हटाकर वर्ष 1833 में एक नया और अधिक भव्य चर्च बनाया गया। यह चर्च अपनी सुंदर वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध था। लेकिन जनवरी 1934 में बिहार में आए विनाशकारी भूकंप ने इस ऐतिहासिक भवन को पूरी तरह नष्ट कर दिया। बाद में जेसुइट पादरियों ने वर्तमान बेतिया चर्च का निर्माण कराया, जो आज भी विश्वास और इतिहास का प्रतीक बना हुआ है।                                   

वर्ष 1919 में बिहार स्थित कैपुचिन मिशन का दायित्व अमेरिकी जेसुइट मिशनरियों को सौंप दिया गया। जेसुइटों ने शिक्षा, सामाजिक सेवा और धार्मिक कार्यों को आगे बढ़ाते हुए मिशन की गौरवशाली परंपरा को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया।

आज बेतिया केवल एक नगर नहीं, बल्कि उत्तर भारत में कैथोलिक इतिहास, शिक्षा और सामाजिक सेवा की जीवंत विरासत का प्रतीक है। फादर जोसेफ मेरी बिरिनी और उनके सहयोगियों द्वारा बोया गया सेवा और विश्वास का बीज आज एक विशाल वृक्ष का रूप ले चुका है। बेतिया का यह इतिहास न केवल स्थानीय ईसाई समुदाय बल्कि पूरे बिहार और भारत की सांस्कृतिक एवं शैक्षणिक धरोहर का महत्वपूर्ण अध्याय है।


आलोक कुमार

India : जब एंकर भी नेताओं की भाषा बोलने लगे

  अंजना ओम कश्यप की भाषाई चूक और टीवी पत्रकारिता का बदलता स्वर

भारतीय राजनीति में भाषाई चूक, अतिशयोक्ति और तंज लंबे समय से चर्चा का विषय रहे हैं। चुनावी मंचों पर नेता कई बार जल्दबाजी, भावनात्मक आवेश या राजनीतिक आक्रामकता में ऐसे शब्द बोल जाते हैं जो बाद में सोशल मीडिया पर मजाक और बहस का कारण बनते हैं। लेकिन अब ऐसा लगता है कि यह प्रवृत्ति केवल नेताओं तक सीमित नहीं रह गई है। टीवी चैनलों के एंकर और पत्रकार भी उसी शैली को अपनाते दिखाई दे रहे हैं। इसी संदर्भ में वरिष्ठ टीवी एंकर Anjana Om Kashyap का एक चर्चित भाषाई प्रसंग अक्सर चर्चा में आता है, जब उन्होंने लाइव बहस के दौरान मानक मुहावरे की जगह उसका अशुद्ध रूप बोल दिया।

एक टीवी डिबेट के दौरान विपक्षी नेता पर टिप्पणी करते हुए अंजना ओम कश्यप ने “कौड़ी न जानना” की जगह “जानना न कौढ़ी” कह दिया। यह सुनते ही सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गई। लोगों ने इस कथन के वीडियो क्लिप साझा किए और भाषा प्रेमियों ने इसे हिंदी मुहावरों की अशुद्ध प्रस्तुति का उदाहरण बताया। कुछ लोगों ने इसे सामान्य मानवीय भूल कहा, जबकि कुछ ने इसे टीवी पत्रकारिता की गिरती भाषाई गुणवत्ता से जोड़कर देखा।

हिंदी भाषा में मुहावरे केवल शब्दों का समूह नहीं होते, बल्कि वे एक निश्चित संरचना और अर्थ के साथ स्थापित अभिव्यक्तियां हैं। “कौड़ी न जानना” एक प्रचलित मुहावरा है, जिसका अर्थ किसी विषय की बिल्कुल जानकारी न होना है। मुहावरों की विशेषता यह होती है कि उनमें शब्दों का क्रम बदलने पर उनका प्रभाव और शुद्धता समाप्त हो जाती है। इसलिए “जानना न कौढ़ी” भाषाई दृष्टि से गलत माना जाएगा। यह उसी तरह है जैसे कोई “नौ दो ग्यारह होना” की जगह “ग्यारह दो नौ होना” कह दे। अर्थ का संकेत भले मिल जाए, लेकिन भाषाई शुद्धता समाप्त हो जाती है।

हालांकि यह भी सच है कि लाइव टीवी पर काम करने वाले पत्रकारों पर असाधारण दबाव होता है। एंकर को एक साथ कई जिम्मेदारियां निभानी पड़ती हैं। उसे बहस का संचालन करना होता है, मेहमानों के बीच संतुलन बनाए रखना होता है, दर्शकों की रुचि बनाए रखनी होती है और साथ ही तथ्यों तथा भाषा पर भी नियंत्रण रखना होता है। ऐसे माहौल में कभी-कभी शब्दों की अदला-बदली हो जाना अस्वाभाविक नहीं है। बड़े-बड़े राजनेता, अभिनेता, न्यायविद और लेखक भी सार्वजनिक मंचों पर ऐसी गलतियां कर चुके हैं।

लेकिन इस घटना ने एक बड़ा सवाल भी खड़ा किया। क्या आज के टीवी चैनलों में भाषा की शुद्धता और संतुलन पहले जैसी प्राथमिकता नहीं रह गई है? पिछले कुछ वर्षों में समाचार चैनलों की बहसों का स्वर काफी आक्रामक हुआ है। एंकर केवल सवाल पूछने वाले मध्यस्थ नहीं रह गए हैं, बल्कि कई बार वे स्वयं बहस के प्रमुख पात्र बन जाते हैं। उनकी भाषा में भी राजनीतिक नेताओं जैसी तीखी टिप्पणी, व्यंग्य और नाटकीयता दिखाई देने लगी है।

यही कारण है कि जब कोई एंकर भाषाई गलती करता है तो उसकी चर्चा सामान्य व्यक्ति की तुलना में अधिक होती है। दर्शक पत्रकारों से अपेक्षा करते हैं कि वे तथ्यों के साथ-साथ भाषा के भी मानक प्रस्तुत करें। पत्रकारिता केवल सूचना देने का माध्यम नहीं है, बल्कि वह समाज में भाषा और अभिव्यक्ति की संस्कृति को भी प्रभावित करती है। करोड़ों लोग समाचार चैनल देखते हैं और अनजाने में वहां प्रयुक्त शब्दों तथा वाक्य संरचनाओं को अपनाते हैं।

सोशल मीडिया के दौर में ऐसी छोटी-सी चूक भी तुरंत वायरल हो जाती है। पहले यदि किसी एंकर या नेता से कोई गलती हो जाती थी तो वह सीमित दर्शकों तक ही रहती थी। आज हर व्यक्ति के हाथ में स्मार्टफोन है और कुछ ही मिनटों में वीडियो क्लिप लाखों लोगों तक पहुंच जाती है। इस कारण सार्वजनिक जीवन से जुड़े लोगों की भाषाई जिम्मेदारी और बढ़ गई है।

हालांकि यह भी जरूरी है कि ऐसी घटनाओं को संतुलित दृष्टि से देखा जाए। एक भाषाई गलती के आधार पर किसी पत्रकार की पूरी क्षमता या योगदान का मूल्यांकन नहीं किया जा सकता। अंजना ओम कश्यप लंबे समय से टीवी पत्रकारिता में सक्रिय हैं और उन्होंने अनेक महत्वपूर्ण राजनीतिक एवं सामाजिक मुद्दों को कवर किया है। इसलिए किसी एक चूक को उनके पूरे पेशेवर जीवन का प्रतिनिधि नहीं माना जा सकता।

फिर भी यह घटना एक महत्वपूर्ण संदेश देती है। मीडिया संस्थानों को भाषा प्रशिक्षण और संपादकीय गुणवत्ता पर लगातार ध्यान देना चाहिए। पत्रकारों और एंकरों को भी यह समझना होगा कि उनकी हर बात लाखों लोगों तक पहुंचती है। इसलिए शब्दों के चयन और प्रयोग में सावधानी आवश्यक है।

आज जब राजनीति और मीडिया के बीच की रेखाएं कई बार धुंधली होती दिखाई देती हैं, तब पत्रकारिता की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए भाषा की शुद्धता, तथ्यात्मकता और संयम पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गए हैं। अंजना ओम कश्यप की यह चर्चित भाषाई चूक केवल एक व्यक्तिगत भूल नहीं थी, बल्कि उसने उस व्यापक प्रवृत्ति की ओर भी संकेत किया जिसमें टीवी एंकर धीरे-धीरे नेताओं जैसी शैली अपनाते दिखाई दे रहे हैं। लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका अलग और विशिष्ट होती है। इसलिए पत्रकारिता की ताकत केवल तेज आवाज में नहीं, बल्कि सटीक तथ्यों, संतुलित प्रस्तुति और शुद्ध भाषा में निहित है।

आलोक कुमार

सोमवार, 1 जून 2026

Bihar : मई माह के अंतिम दिन माता मरियम की आराधना से गूंज उठा बेतिया महागिरजाघर परिसर

 मई माह के अंतिम दिन माता मरियम की आराधना से गूंज उठा बेतिया महागिरजाघर परिसर

बेतिया धर्मप्रांत में मई माह का अंतिम दिन श्रद्धा, आस्था और आध्यात्मिक उल्लास का एक अद्भुत संगम लेकर आया। Nativity of the Blessed Virgin Mary Cathedral महागिरजाघर परिसर स्थित विश्व की मां मरियम के ग्रोटो (प्रतिमा स्थल) पर आयोजित विशेष प्रार्थना एवं यात्रा समारोह ने उपस्थित श्रद्धालुओं के हृदय को भक्ति से भर दिया। यह आयोजन केवल एक धार्मिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि विश्वास, सामुदायिक एकता और प्रकृति के साथ ईश्वरीय सामंजस्य का भी सुंदर उदाहरण बन गया।

मई माह को कैथोलिक परंपरा में विशेष रूप से माता मरियम को समर्पित माना जाता है। पूरे महीने श्रद्धालु रोज़री (माला बिनती), प्रार्थना और विशेष आराधना के माध्यम से माता मरियम के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं। इस माह के अंतिम दिन आयोजित समारोह का महत्व और भी अधिक था, क्योंकि यह पूरे महीने की भक्ति का समापन समारोह था।

महागिरजाघर परिसर में स्थित माता मरियम के ग्रोटो को इस अवसर पर अत्यंत आकर्षक ढंग से सजाया गया था। ग्रोटो के चारों ओर रंग-बिरंगी रोशनियों, फूलों और सजावटी वस्तुओं से ऐसी मनोहारी सजावट की गई थी कि पूरा परिसर किसी आध्यात्मिक उद्यान की तरह दिखाई दे रहा था। प्रवेश द्वार अर्थात तोरण द्वार को गुब्बारों और ताजे फूलों से विशेष रूप से सजाया गया था। दूर से ही आने वाले श्रद्धालुओं का स्वागत यह भव्य तोरण द्वार कर रहा था।

ग्रोटो के सामने बैठने की समुचित व्यवस्था की गई थी। सैकड़ों कुर्सियां लगाई गई थीं ताकि बड़ी संख्या में आने वाले श्रद्धालु आराम से प्रार्थना में शामिल हो सकें। शाम ढलते ही पूरा परिसर रोशनी से जगमगा उठा और वातावरण में भक्ति गीतों की मधुर ध्वनि गूंजने लगी।

इस आयोजन की सुंदरता को बढ़ाने में प्रकृति ने भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हालांकि एक समय ऐसा भी आया जब लगा कि मौसम इस कार्यक्रम में बाधा उत्पन्न कर सकता है। ग्रोटो की सजावट लगभग पूरी हो चुकी थी और श्रद्धालु धीरे-धीरे परिसर में पहुंच रहे थे। तभी अचानक आसमान में बादल घिर आए और तेज बारिश शुरू हो गई।

बारिश के कारण लोगों के बीच असमंजस की स्थिति उत्पन्न हो गई। कई श्रद्धालु यह सोचने लगे कि शायद इस बार मई माह की अंतिम माला बिनती और प्रार्थना सभा महागिरजाघर के भीतर ही आयोजित करनी पड़ेगी। कुछ लोग कुर्सियों से उठकर सुरक्षित स्थानों की ओर जाने लगे, जबकि आयोजन समिति भी मौसम की स्थिति पर नजर बनाए हुए थी।

लेकिन कुछ ही समय बाद मौसम ने अप्रत्याशित रूप से करवट ली। श्रद्धालुओं ने इसे माता मरियम के विशेष आशीर्वाद के रूप में देखा। धीरे-धीरे बारिश रुक गई, बादल छंटने लगे और वातावरण अत्यंत सुहावना हो गया। हल्की ठंडी हवा चलने लगी, जिससे पूरे परिसर का माहौल और भी मनमोहक बन गया। लोगों के चेहरों पर फिर से प्रसन्नता लौट आई और सभी श्रद्धालु अपनी-अपनी कुर्सियों पर बैठकर कार्यक्रम शुरू होने की प्रतीक्षा करने लगे।

जब मौसम पूरी तरह अनुकूल हो गया, तब धार्मिक समारोह का शुभारंभ हुआ। बेतिया धर्मप्रांत के विकार जनरल फादर  Finton Sah द्वारा पवित्र मिस्सा (धर्मविधि) की शुरुआत की गई। उन्होंने अपने संदेश में माता मरियम के जीवन, उनकी विनम्रता, समर्पण और विश्वास की चर्चा करते हुए श्रद्धालुओं को उनके आदर्शों पर चलने का आह्वान किया।

मिस्सा के दौरान उपस्थित लोगों ने पूरे मनोयोग और श्रद्धा के साथ प्रार्थनाओं में भाग लिया। वातावरण में आध्यात्मिक गंभीरता और भक्ति का अद्भुत समावेश दिखाई दे रहा था। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी श्रद्धालु प्रार्थना में लीन थे। यह दृश्य इस बात का प्रमाण था कि आज भी धार्मिक आस्था लोगों के जीवन में महत्वपूर्ण स्थान रखती है।

इस विशेष मिस्सा में कुल पांच पुरोहितों ने सहभागिता की। सभी फादरों ने मिलकर धर्मविधि का संचालन किया। उनकी सामूहिक उपस्थिति ने समारोह की गरिमा और महत्व को और बढ़ा दिया। मिस्सा के दौरान भजनों और स्तुतिगानों ने श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक आनंद से भर दिया।

मिस्सा समाप्त होने के बाद माता मरियम के सम्मान में विशेष यात्रा (प्रोसेशन) का आयोजन किया गया। इस यात्रा का नेतृत्व पाल पुरोहित ने किया। माता मरियम की प्रतिमा को अत्यंत सुंदर ढंग से सजाकर यात्रा में शामिल किया गया। श्रद्धालु हाथों में मोमबत्तियां और माला लिए हुए भक्ति गीत गाते हुए यात्रा में आगे बढ़ रहे थे।

यात्रा के दौरान पूरा परिसर "जय माता मरियम" और प्रार्थना गीतों से गूंज उठा। महिलाएं, पुरुष, युवा और बच्चे सभी उत्साहपूर्वक इसमें शामिल हुए। श्रद्धालुओं के चेहरों पर भक्ति और संतोष का भाव स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा था। यह यात्रा केवल धार्मिक परंपरा का निर्वहन नहीं थी, बल्कि समुदाय की एकता और सामूहिक विश्वास का भी प्रतीक थी।

रात्रि लगभग आठ बजे यह भव्य यात्रा समारोह संपन्न हुआ। कार्यक्रम के समापन के साथ ही श्रद्धालुओं ने माता मरियम के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त की और उनके आशीर्वाद की कामना की। पूरे आयोजन ने उपस्थित लोगों के मन में गहरी आध्यात्मिक छाप छोड़ी।

मई माह के अंतिम दिन आयोजित यह समारोह बेतिया धर्मप्रांत के लिए एक यादगार अवसर बन गया। सजावट की भव्यता, श्रद्धालुओं की भारी उपस्थिति, पुरोहितों का मार्गदर्शन और प्रकृति का सहयोग—इन सभी ने मिलकर इस आयोजन को विशेष बना दिया। यह कार्यक्रम इस बात का प्रमाण था कि आस्था और विश्वास के सामने हर बाधा छोटी पड़ जाती है। बारिश की क्षणिक चुनौती के बाद जिस प्रकार मौसम सुहावना हुआ, उसे श्रद्धालुओं ने माता मरियम की कृपा के रूप में अनुभव किया और पूरे उत्साह के साथ इस आध्यात्मिक उत्सव को सफल बनाया।

आलोक कुमार