World : मई माह और माता मरियम के आनंदमय भेद

 मई माह और माता मरियम के आनंदमय भेद

ईसाई माता कलीसिया अर्थात कैथोलिक चर्च में मई का महीना अत्यंत पवित्र और विशेष माना जाता है, क्योंकि यह महीना पूर्ण रूप से धन्य कुँवारी माता मरियम को समर्पित होता है। संसार भर के कैथोलिक विश्वासी इस महीने को “मरियम माह” के रूप में मनाते हैं। इस दौरान गिरजाघरों, परिवारों और प्रार्थना समूहों में माता मरियम के सम्मान में विशेष प्रार्थनाएँ, भजन, जुलूस और रोज़री माला की विनतियाँ की जाती हैं। मई माह विश्वासियों को यह याद दिलाता है कि जैसे माता मरियम ने अपने जीवन को पूर्ण रूप से परमेश्वर की इच्छा के अनुसार समर्पित किया, वैसे ही प्रत्येक विश्वासी को भी विश्वास, प्रेम, आज्ञाकारिता और शांति के मार्ग पर चलना चाहिए।

माता मरियम को शांति की रानी कहा जाता है। उनके जीवन का प्रत्येक क्षण परमेश्वर के प्रति विश्वास और समर्पण से भरा हुआ था। यही कारण है कि कलीसिया मई महीने में विशेष रूप से रोज़री माला के माध्यम से माता मरियम के जीवन की घटनाओं पर मनन करने के लिए प्रेरित करती है। रोज़री केवल शब्दों की प्रार्थना नहीं है, बल्कि यह येसु और मरियम के जीवन के रहस्यों पर ध्यान लगाने की आध्यात्मिक यात्रा है।

रोज़री माला में कुल चार प्रकार के भेद होते हैं—आनंद के भेद, ज्योतिर्मय भेद, दुःख के भेद और महिमा के भेद। प्रत्येक समूह में पाँच-पाँच रहस्य होते हैं। इनमें “आनंद के भेद” विशेष रूप से प्रभु येसु के बाल्यकाल और माता मरियम के आनंदमय अनुभवों से जुड़े हुए हैं। मई महीने में इन भेदों पर मनन करना परिवारों में शांति, प्रेम और एकता को बढ़ाता है।

आनंद के पाँच भेद

पहला भेद – देवदूत गब्रिएल का शुभ संदेश

आनंद के प्रथम भेद में देवदूत गब्रिएल माता मरियम के पास आते हैं और उन्हें यह शुभ समाचार देते हैं कि वे परमेश्वर के पुत्र येसु की माता बनने वाली हैं। यह घटना केवल मरियम के जीवन की नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानव जाति के उद्धार की शुरुआत थी। मरियम ने विनम्रता से उत्तर दिया—“देखिए, मैं प्रभु की दासी हूँ; आपके वचन के अनुसार मेरे साथ हो।” इस उत्तर में पूर्ण विश्वास, शांति और समर्पण दिखाई देता है।

यह भेद हमें सिखाता है कि जीवन में चाहे परिस्थितियाँ कैसी भी हों, यदि हम परमेश्वर की इच्छा को स्वीकार करें तो हमारे भीतर सच्ची शांति उत्पन्न होती है।

दूसरा भेद – माता मरियम की एलिज़बेथ से भेंट

दूसरे आनंद के भेद में माता मरियम अपनी संबंधी एलिज़बेथ से मिलने जाती हैं। एलिज़बेथ भी ईश्वर की विशेष कृपा से गर्भवती थीं। जैसे ही मरियम वहाँ पहुँचीं, एलिज़बेथ के गर्भ में पल रहा बालक यूहन्ना आनंद से उछल पड़ा। एलिज़बेथ ने कहा—“स्त्रियों में तुम धन्य हो।”

यह घटना प्रेम, सेवा और आध्यात्मिक आनंद का सुंदर उदाहरण है। माता मरियम अपने सुख में ही नहीं रहीं, बल्कि दूसरों की सहायता करने के लिए तुरंत निकल पड़ीं। आज के समय में यह भेद हमें सिखाता है कि परिवारों और समाज में प्रेम तथा सेवा की भावना से ही शांति आती है।

तीसरा भेद – प्रभु येसु का जन्म

तीसरे आनंद के भेद में बेतलेहेम की चरनी में प्रभु येसु का जन्म होता है। संसार के उद्धारकर्ता का जन्म किसी महल में नहीं, बल्कि अत्यंत साधारण परिस्थिति में हुआ। यह घटना विनम्रता और सादगी का महान संदेश देती है।

स्वर्गदूतों ने गड़ेरियों को यह शुभ समाचार सुनाया—“पृथ्वी पर शांति हो।” प्रभु येसु का जन्म वास्तव में शांति और प्रेम का आगमन था। मई महीने में इस भेद पर मनन करते हुए विश्वासी अपने हृदय में येसु के लिए स्थान बनाने का प्रयास करते हैं।

चौथा भेद – बालक येसु को मंदिर में चढ़ाना

यहूदी परंपरा के अनुसार माता मरियम और संत योसेफ बालक येसु को मंदिर में परमेश्वर को अर्पित करने ले जाते हैं। वहाँ धर्मी सिमेओन और भविष्यद्वक्ता अन्ना बालक येसु को देखकर आनंदित होते हैं। सिमेओन उन्हें संसार का प्रकाश बताते हैं।

यह भेद हमें सिखाता है कि माता-पिता को अपने बच्चों को परमेश्वर के मार्ग में बढ़ाना चाहिए। परिवार जब ईश्वर को प्राथमिकता देता है, तब घर में सच्ची शांति और आशीष बनी रहती है।            


पाँचवाँ भेद – मंदिर में बालक येसु का मिलना

जब येसु बारह वर्ष के थे, तब वे यरूशलेम के मंदिर में शिक्षकों के बीच पाए गए। तीन दिनों तक मरियम और योसेफ उन्हें खोजते रहे। अंततः जब वे मंदिर में मिले, तब माता मरियम को अत्यंत आनंद हुआ।

यह भेद हमें बताता है कि कभी-कभी जीवन में हम आध्यात्मिक रूप से येसु से दूर हो जाते हैं, लेकिन यदि हम उन्हें खोजें, तो वे अवश्य मिलते हैं। परमेश्वर की उपस्थिति ही मनुष्य को सच्ची शांति देती है।

माता मरियम के सात आनंद

कैथोलिक कलीसिया की फ्रांसिस्कन परंपरा में “माता मरियम के सात आनंद” की विशेष माला भी प्रचलित है। इसमें मरियम के जीवन की सात महान आनंदमयी घटनाओं पर ध्यान लगाया जाता है। इनमें गब्रिएल का शुभ संदेश, एलिज़बेथ से भेंट, येसु का जन्म, ज्योतिषियों की आराधना, मंदिर में येसु का मिलना, पुनरुत्थान के बाद प्रभु का दर्शन, तथा मरियम का स्वर्गारोहण और स्वर्ग की रानी के रूप में मुकुट धारण करना शामिल है।

इन सात आनंदों का उद्देश्य यह याद दिलाना है कि दुःख और संघर्ष के बीच भी परमेश्वर अपने भक्तों को अंततः आनंद और महिमा प्रदान करते हैं।

मई माह का आध्यात्मिक महत्व

मई महीने में प्रतिदिन रोज़री माला पढ़ना केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि आत्मा को शांति देने वाला आध्यात्मिक अभ्यास है। जब परिवार एक साथ बैठकर माता मरियम की विनती करते हैं, तब घरों में प्रेम, क्षमा और एकता बढ़ती है। आज के तनावपूर्ण और अशांत वातावरण में मरियम की प्रार्थना मनुष्य को भीतर से मजबूत बनाती है।

माता मरियम का जीवन हमें यह सिखाता है कि विनम्रता, सेवा, विश्वास और प्रार्थना के द्वारा ही सच्ची शांति प्राप्त होती है। इसलिए कलीसिया मई महीने में प्रत्येक विश्वासी को प्रेरित करती है कि वे माता मरियम के निकट आएँ, रोज़री माला पढ़ें और येसु मसीह के प्रेममय जीवन का अनुसरण करें।

अंततः, मई का यह पवित्र महीना केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि आत्मिक नवीनीकरण का अवसर है। माता मरियम के आनंदमय भेदों पर मनन करते हुए हम अपने जीवन में परमेश्वर की शांति, प्रेम और कृपा का अनुभव कर सकते हैं।

आलोक कुमार

World : “माउंट एवरेस्ट दिवस” आज

इतिहास, प्रेरणा और जागरूकता का विशेष दिवस

29 मई का दिन विश्व इतिहास, खेल, विज्ञान, समाज और मानवता के अनेक महत्वपूर्ण प्रसंगों को अपने भीतर समेटे हुए है। यह दिन केवल कैलेंडर की एक तारीख नहीं, बल्कि प्रेरणा, संघर्ष, उपलब्धि और जागरूकता का प्रतीक माना जाता है। भारत सहित विश्व के कई देशों में 29 मई को अलग-अलग घटनाओं और महान व्यक्तित्वों की स्मृतियों के साथ याद किया जाता है। यह दिन हमें अतीत से सीख लेकर वर्तमान को बेहतर बनाने और भविष्य के लिए सकारात्मक सोच विकसित करने की प्रेरणा देता है।

सबसे पहले यदि खेल जगत की बात करें तो 29 मई को “माउंट एवरेस्ट दिवस” के रूप में भी विशेष महत्व प्राप्त है। वर्ष 1953 में इसी दिन न्यूजीलैंड के पर्वतारोही Edmund Hillary और नेपाल के प्रसिद्ध शेरपा Tenzing Norgay ने पहली बार विश्व की सबसे ऊँची चोटी माउंट एवरेस्ट पर सफलतापूर्वक कदम रखा था। यह उपलब्धि केवल दो व्यक्तियों की जीत नहीं थी, बल्कि पूरे मानव साहस और दृढ़ इच्छाशक्ति की विजय थी। उस समय पर्वतारोहण अत्यंत कठिन और जोखिमभरा माना जाता था। सीमित संसाधनों और कठिन परिस्थितियों के बावजूद एवरेस्ट पर विजय प्राप्त करना मानव इतिहास की सबसे महान उपलब्धियों में गिना जाता है।

29 मई हमें यह संदेश देता है कि कठिनाइयाँ चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हों, आत्मविश्वास, धैर्य और मेहनत से हर ऊँचाई को छुआ जा सकता है। आज भी दुनिया भर के युवा पर्वतारोहियों के लिए यह दिन प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है। भारत के कई साहसी पर्वतारोहियों ने भी एवरेस्ट फतह कर देश का नाम रोशन किया है। इस दिन स्कूलों, कॉलेजों और विभिन्न संस्थानों में साहसिक खेलों तथा पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।

इतिहास के पन्नों में 29 मई का महत्व राजनीतिक और सामाजिक दृष्टि से भी उल्लेखनीय रहा है। इसी दिन कई देशों में स्वतंत्रता आंदोलन, सामाजिक सुधार और लोकतांत्रिक मूल्यों से जुड़ी घटनाएँ घटित हुईं। यह दिन हमें याद दिलाता है कि समाज में परिवर्तन लाने के लिए संघर्ष, एकता और जागरूकता आवश्यक है। लोकतंत्र केवल मतदान तक सीमित नहीं, बल्कि समाज के प्रत्येक व्यक्ति की भागीदारी और जिम्मेदारी से मजबूत होता है।

भारत के संदर्भ में भी मई का अंतिम सप्ताह कई महत्वपूर्ण घटनाओं और बदलावों का साक्षी रहा है। यह समय विद्यार्थियों के लिए नई योजनाओं, किसानों के लिए मानसून की तैयारी और युवाओं के लिए नए संकल्पों का समय माना जाता है। गर्मी के मौसम के बीच यह दिन प्रकृति के बदलते स्वरूप का भी संकेत देता है। आने वाली वर्षा ऋतु किसानों के लिए आशा लेकर आती है, इसलिए ग्रामीण भारत में मई के अंतिम दिनों का विशेष महत्व होता है।

29 मई विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में भी प्रेरणादायक माना जाता है। आधुनिक दुनिया निरंतर नई खोजों और आविष्कारों के माध्यम से आगे बढ़ रही है। आज का युवा डिजिटल युग में जी रहा है, जहाँ शिक्षा, चिकित्सा, संचार और रोजगार के क्षेत्र में तकनीक की भूमिका लगातार बढ़ती जा रही है। यह दिन हमें यह सोचने का अवसर देता है कि विज्ञान का उपयोग मानवता की भलाई और समाज के विकास के लिए किस प्रकार किया जाए। तकनीक तभी सार्थक है जब उसका लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे।

समाज में बढ़ती चुनौतियों—जैसे बेरोजगारी, महंगाई, पर्यावरण प्रदूषण और मानसिक तनाव—के बीच 29 मई सकारात्मक सोच और सामूहिक प्रयास की प्रेरणा देता है। आज की पीढ़ी को केवल सफलता के पीछे नहीं भागना चाहिए, बल्कि नैतिकता, संवेदनशीलता और सामाजिक जिम्मेदारी को भी समझना चाहिए। किसी भी राष्ट्र की वास्तविक प्रगति तभी संभव है जब उसके नागरिक शिक्षित, जागरूक और मानवीय मूल्यों से जुड़े हों।

पर्यावरण संरक्षण के संदर्भ में भी यह दिन महत्वपूर्ण संदेश देता है। माउंट एवरेस्ट की बढ़ती गंदगी और ग्लोबल वार्मिंग के खतरे आज पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय बन चुके हैं। हिमालय क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देने लगा है। ग्लेशियर पिघल रहे हैं, मौसम चक्र बदल रहा है और प्राकृतिक आपदाएँ बढ़ रही हैं। इसलिए 29 मई हमें प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारी याद दिलाता है। पेड़ लगाना, जल संरक्षण करना और प्रदूषण कम करना केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है।

आज सोशल मीडिया और इंटरनेट के दौर में सूचनाएँ तेजी से फैलती हैं। ऐसे समय में सही जानकारी और सकारात्मक विचारों का प्रसार बहुत आवश्यक है। 29 मई का अवसर हमें प्रेरित करता है कि हम समाज में भाईचारा, शांति और सहयोग की भावना को मजबूत करें। नफरत और विभाजन से किसी का भला नहीं होता, जबकि प्रेम, सहयोग और एकता समाज को आगे बढ़ाते हैं।

अंततः कहा जा सकता है कि 29 मई केवल एक तारीख नहीं, बल्कि साहस, संघर्ष, उपलब्धि और जागरूकता का प्रतीक है। यह दिन हमें जीवन की ऊँचाइयों को छूने का हौसला देता है। चाहे पर्वतारोहण हो, शिक्षा हो, विज्ञान हो या सामाजिक सेवा—हर क्षेत्र में सफलता उन्हीं को मिलती है जो निरंतर प्रयास करते हैं।

इस विशेष अवसर पर हमें संकल्प लेना चाहिए कि हम अपने जीवन को सकारात्मक दिशा देंगे, समाज और देश के विकास में योगदान करेंगे तथा मानवता और प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को समझेंगे। यही 29 मई दिवस का वास्तविक संदेश और महत्व है।

आलोक कुमार

India : भारत के लिए विज्ञान के क्षेत्र में एक बेहद गौरवपूर्ण खबर

बिहार के पश्चिम चंपारण जिले के बेतिया के होनहार छात्र सांचित पटेल 

भारत के लिए विज्ञान के क्षेत्र में एक बेहद गौरवपूर्ण खबर सामने आई है। बिहार के पश्चिम चंपारण जिले के बेतिया के होनहार छात्र सांचित पटेल ने इंटरनेशनल जूनियर साइंस ओलंपियाड (IJSO) 2026 के लिए भारतीय टीम में जगह बनाकर पूरे बिहार का नाम रोशन कर दिया है। यह उपलब्धि केवल सांचित और उनके परिवार के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे बिहार और देश के लिए गर्व का विषय बन गई है।

इंटरनेशनल जूनियर साइंस ओलंपियाड दुनिया की सबसे प्रतिष्ठित विज्ञान प्रतियोगिताओं में से एक मानी जाती है। इसमें भौतिकी, रसायन विज्ञान और जीव विज्ञान जैसे विषयों में छात्रों की वैज्ञानिक क्षमता, तार्किक सोच और समस्या समाधान कौशल की कठिन परीक्षा होती है। इस प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए छात्रों को कई स्तरों की कठिन चयन प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। पूरे भारत से लाखों छात्र इस प्रतियोगिता के लिए प्रयास करते हैं, लेकिन अंततः केवल छह सर्वश्रेष्ठ छात्रों का चयन भारतीय टीम के लिए किया जाता है। ऐसे में सांचित पटेल का चयन यह साबित करता है कि प्रतिभा किसी बड़े शहर या महंगे संसाधनों की मोहताज नहीं होती।

बेतिया जैसे शहर से निकलकर अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचने का यह सफर आसान नहीं रहा होगा। इसके पीछे वर्षों की मेहनत, अनुशासन, समर्पण और लगातार सीखने की जिज्ञासा छिपी है। सांचित की सफलता यह दिखाती है कि अगर लक्ष्य स्पष्ट हो और मेहनत ईमानदारी से की जाए, तो सीमित संसाधनों के बावजूद बड़ी उपलब्धियां हासिल की जा सकती हैं।

इस प्रतिष्ठित प्रतियोगिता के लिए चयनित भारतीय टीम के छह प्रतिभाशाली छात्रों के नाम इस प्रकार हैं—

सांचित पटेल — बेतिया, बिहार

अविशी अग्रवाल

सिद्धांत विनीत

काव्या अग्रवाल

शौर्य एस. जैन

अथर्व एम. कामोदकर


ये सभी छात्र अब अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का प्रतिनिधित्व करेंगे। इन युवा वैज्ञानिक प्रतिभाओं पर पूरे देश की उम्मीदें टिकी हैं।

सांचित पटेल की सफलता बिहार के युवाओं के लिए विशेष रूप से प्रेरणादायक है। अक्सर यह धारणा बनाई जाती है कि छोटे शहरों के छात्रों के पास बड़े अवसर नहीं होते, लेकिन सांचित ने अपनी उपलब्धि से इस सोच को गलत साबित कर दिया है। उन्होंने यह दिखा दिया कि अगर मेहनत और लगन सच्ची हो, तो दुनिया की कोई भी मंजिल दूर नहीं रहती।

बिहार लंबे समय से शिक्षा और प्रतिभा की भूमि रहा है। इसी धरती ने देश को अनेक वैज्ञानिक, शिक्षक, प्रशासक और विद्वान दिए हैं। सांचित की उपलब्धि उसी गौरवशाली परंपरा को आगे बढ़ाने का काम करती है। उनकी सफलता यह भी बताती है कि बिहार के युवा अब केवल पारंपरिक क्षेत्रों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि विज्ञान और शोध के क्षेत्र में भी अपनी अलग पहचान बना रहे हैं।

सांचित की इस उपलब्धि के पीछे उनके माता-पिता, शिक्षकों और मार्गदर्शकों का योगदान भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। किसी भी छात्र की सफलता केवल उसकी व्यक्तिगत मेहनत का परिणाम नहीं होती, बल्कि परिवार और गुरुजनों के सहयोग, प्रेरणा और विश्वास का भी बड़ा योगदान होता है। कठिन समय में हौसला बढ़ाना और सही दिशा दिखाना ही किसी प्रतिभा को ऊंचाइयों तक पहुंचाता है।

आज सोशल मीडिया से लेकर शिक्षा जगत तक हर जगह सांचित पटेल की चर्चा हो रही है। लोग उन्हें बधाइयां दे रहे हैं और उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना कर रहे हैं। बेतिया और पूरे पश्चिम चंपारण में खुशी का माहौल है। यह सफलता आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बन चुकी है।

इंटरनेशनल जूनियर साइंस ओलंपियाड केवल एक प्रतियोगिता नहीं, बल्कि विज्ञान के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर प्रतिभा को पहचान दिलाने का मंच है। यहां दुनिया के अलग-अलग देशों के सबसे मेधावी छात्र भाग लेते हैं। ऐसे मंच पर भारत का प्रतिनिधित्व करना अपने आप में बहुत बड़ी जिम्मेदारी और सम्मान की बात होती है।

सांचित पटेल की कहानी हमें यह सिखाती है कि सपने बड़े होने चाहिए और उन्हें पूरा करने के लिए मेहनत भी उतनी ही बड़ी होनी चाहिए। सफलता कभी अचानक नहीं मिलती, उसके पीछे वर्षों का संघर्ष और निरंतर प्रयास होता है।

आज पूरा बिहार गर्व से कह रहा है कि बेतिया का बेटा अब दुनिया के मंच पर भारत का नाम रोशन करेगा। उम्मीद है कि सांचित और उनकी पूरी टीम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शानदार प्रदर्शन करेगी और देश के लिए पदक जीतकर लौटेगी।

सांचित पटेल और भारतीय टीम के सभी छह प्रतिभाशाली छात्रों को हार्दिक बधाई और उज्ज्वल भविष्य के लिए ढेरों शुभकामनाएं। यह सफलता आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का एक नया अध्याय लिखेगी।

आलोक कुमार

India : वर्ष 2024 में गोवा सरकार ने TCP अधिनियम में संशोधन कर इस धारा को जोड़ा

गोवा नगर एवं ग्राम नियोजन अधिनियम यानी Goa Town and Country Planning (TCP) Act की धारा 39A

गोवा इस समय सिर्फ एक पर्यटन स्थल या समुद्री तटों के लिए ही चर्चा में नहीं है, बल्कि वहाँ का पर्यावरण, भूमि और विकास नीति एक बड़े जनआंदोलन का कारण बन चुकी है। विवाद का केंद्र है गोवा नगर एवं ग्राम नियोजन अधिनियम यानी Goa Town and Country Planning (TCP) Act की धारा 39A। यह धारा इतनी विवादित हो चुकी है कि सामाजिक कार्यकर्ता, पर्यावरण प्रेमी, किसान, स्थानीय निवासी और चर्च से जुड़े लोग तक इसके विरोध में सड़क पर उतर आए हैं। आंदोलन के दौरान नेतृत्व कर रहे फादर बोलमैक्स का निधन भी हो गया, लेकिन इसके बावजूद आंदोलन थमा नहीं है। लोगों की मांग आज भी स्पष्ट है—धारा 39A को पूरी तरह समाप्त किया जाए।

सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि धारा 39A आखिर है क्या। वर्ष 2024 में गोवा सरकार ने TCP अधिनियम में संशोधन कर इस धारा को जोड़ा। इस संशोधन के तहत “मुख्य नगर नियोजक” (Chief Town Planner) को अत्यधिक अधिकार दे दिए गए। अब वे किसी भी जमीन के टुकड़े का “लैंड यूज़” यानी उपयोग बदल सकते हैं। उदाहरण के लिए यदि कोई जमीन कृषि क्षेत्र, हरित क्षेत्र (Green Zone) या “नो डेवलपमेंट ज़ोन” में आती है, तब भी उसे व्यावसायिक, होटल, आवासीय या निर्माण क्षेत्र में बदला जा सकता है।

यहीं से विवाद शुरू होता है। पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह अधिकार बहुत व्यापक और खतरनाक है। पहले किसी भी भूमि उपयोग परिवर्तन के लिए सार्वजनिक चर्चा, स्थानीय निकायों की राय और लंबी प्रक्रिया होती थी। लेकिन धारा 39A के बाद यह प्रक्रिया काफी आसान हो गई है। विरोधियों का आरोप है कि इससे बड़े बिल्डर, रिसॉर्ट कंपनियाँ और निजी कारोबारी फायदा उठा रहे हैं। गोवा जैसे छोटे और पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील राज्य में यह बदलाव भविष्य के लिए गंभीर खतरा बन सकता है।

गोवा की पहचान केवल समुद्र तटों से नहीं, बल्कि उसकी हरियाली, खेती, जंगल, पहाड़ और पारंपरिक गांवों से भी है। स्थानीय लोग मानते हैं कि यदि ग्रीन ज़ोन और खेती की जमीन को लगातार निर्माण क्षेत्र में बदला गया, तो गोवा का मूल स्वरूप नष्ट हो जाएगा। इससे भूजल स्तर, जैव विविधता, नदी-तालाब और पर्यावरणीय संतुलन पर गहरा असर पड़ेगा। गोवा पहले से ही अनियंत्रित पर्यटन और निर्माण के दबाव से जूझ रहा है। ऐसे में धारा 39A को “विकास” के नाम पर पर्यावरण विनाश का रास्ता बताया जा रहा है।

आंदोलनकारियों का एक बड़ा आरोप “स्पॉट ज़ोनिंग” को लेकर भी है। इसका मतलब है कि किसी विशेष जमीन के छोटे हिस्से को अचानक अलग श्रेणी में बदल देना। विरोधियों का कहना है कि इससे पारदर्शिता खत्म होती है और प्रभावशाली लोगों को लाभ पहुंचता है। कई मामलों में स्थानीय निवासियों को तब पता चलता है जब निर्माण कार्य शुरू हो जाता है। इससे लोगों के भीतर यह भावना मजबूत हुई है कि निर्णय जनता के हित में नहीं बल्कि निजी पूंजी के हित में लिए जा रहे हैं।

इस आंदोलन में चर्च, सामाजिक संगठन, किसान समूह और युवा भी बड़ी संख्या में शामिल हुए हैं। फादर बोलमैक्स जैसे सामाजिक कार्यकर्ता इस संघर्ष का प्रमुख चेहरा बनकर उभरे। वे लगातार लोगों को संगठित कर रहे थे और पर्यावरण बचाने की अपील कर रहे थे। आंदोलन के दौरान उनके निधन ने इस संघर्ष को और भावनात्मक बना दिया। कई लोगों ने इसे “गोवा की आत्मा को बचाने की लड़ाई” कहा। उनके निधन के बाद भी प्रदर्शन जारी हैं, जो यह दर्शाता है कि यह केवल एक व्यक्ति का आंदोलन नहीं बल्कि व्यापक जनभावना का मुद्दा बन चुका है।

दूसरी ओर गोवा सरकार और TCP मंत्री Vishwajit Rane का कहना है कि यह कानून पूरी तरह वैधानिक है और विधानसभा द्वारा पारित किया गया है। सरकार का तर्क है कि विकास के लिए कुछ लचीलापन जरूरी है। उनका कहना है कि यदि किसी व्यक्ति या संगठन को आपत्ति है तो वे अदालत का दरवाजा खटखटा सकते हैं। सरकार यह भी दावा करती है कि सभी बदलाव कानूनी प्रक्रिया के तहत किए जाते हैं और इससे राज्य में निवेश तथा आर्थिक गतिविधियाँ बढ़ेंगी।

लेकिन विरोधियों का सवाल है कि क्या विकास का मतलब सिर्फ बड़े निर्माण और व्यावसायिक परियोजनाएँ हैं? क्या विकास के नाम पर पर्यावरण और स्थानीय समुदायों की पहचान को खतरे में डाला जा सकता है? गोवा में पहले भी अवैध खनन, अतिक्रमण और अनियंत्रित निर्माण को लेकर विवाद होते रहे हैं। ऐसे में धारा 39A ने लोगों के अविश्वास को और गहरा कर दिया है।

यह विवाद केवल गोवा तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे देश के लिए एक महत्वपूर्ण उदाहरण बनता जा रहा है। भारत के कई राज्यों में विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन को लेकर बहस चल रही है। एक तरफ रोजगार, निवेश और आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत है, वहीं दूसरी ओर प्राकृतिक संसाधनों और स्थानीय संस्कृति को बचाना भी उतना ही जरूरी है। गोवा का मामला इसी संघर्ष का प्रतीक बन चुका है।

आंदोलनकारियों की मुख्य मांग साफ है—धारा 39A को पूरी तरह हटाया जाए। उनका मानना है कि जब तक यह प्रावधान कानून में रहेगा, तब तक पर्यावरण और सार्वजनिक हित खतरे में रहेंगे। वे चाहते हैं कि भूमि उपयोग परिवर्तन की पुरानी पारदर्शी व्यवस्था वापस लाई जाए, जिसमें जनता की भागीदारी और पर्यावरणीय समीक्षा अनिवार्य हो।

अंततः यह मुद्दा केवल एक कानूनी धारा का नहीं बल्कि लोकतंत्र, पारदर्शिता, पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय अधिकारों का प्रश्न बन गया है। गोवा की जनता यह संदेश देना चाहती है कि विकास जरूरी है, लेकिन ऐसा विकास नहीं जो प्रकृति, संस्कृति और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को खतरे में डाल दे।

आलोक कुमार

World :दुनिया में मुस्लिम समुदाय द्वारा मनाया जाने वाला पवित्र पर्व


आज 28 मई को पूरी दुनिया में मुस्लिम समुदाय द्वारा मनाया जाने वाला पवित्र पर्व ईद-उल-अजहा यानी बकरीद आस्था, त्याग, समर्पण और इंसानियत का महान संदेश लेकर आया है। यह इस्लाम धर्म के सबसे महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक माना जाता है। भारत सहित विश्व के अनेक देशों में मुस्लिम भाई-बहन इस पर्व को पूरे उत्साह, श्रद्धा और धार्मिक परंपराओं के साथ मना रहे हैं।

बकरीद केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि यह त्याग, बलिदान, करुणा और मानवता का प्रतीक है। यह त्योहार हमें सिखाता है कि सच्ची भक्ति केवल शब्दों से नहीं, बल्कि त्याग और सेवा से सिद्ध होती है। इस दिन लोग अल्लाह के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं तथा समाज में प्रेम और भाईचारे का संदेश फैलाते हैं।

इस पर्व का संबंध हजरत इब्राहिम और उनके पुत्र हजरत इस्माइल की महान कुर्बानी से जुड़ा हुआ है। इस्लामी मान्यता के अनुसार, अल्लाह ने हजरत इब्राहिम की परीक्षा लेने के लिए उनसे उनके सबसे प्रिय पुत्र की कुर्बानी मांगी। हजरत इब्राहिम ने बिना किसी संकोच के अल्लाह की आज्ञा का पालन करने का निश्चय किया। जब वे अपने पुत्र की कुर्बानी देने जा रहे थे, तब अल्लाह ने उनकी निष्ठा और समर्पण को देखकर हजरत इस्माइल की जगह एक जानवर भेज दिया। तभी से कुर्बानी की यह परंपरा शुरू हुई और यह दिन ईद-उल-अजहा के रूप में मनाया जाने लगा।                                                                               

बकरीद का वास्तविक अर्थ केवल जानवर की कुर्बानी तक सीमित नहीं है। इसका गहरा संदेश यह है कि मनुष्य अपने अंदर के अहंकार, लालच, स्वार्थ और बुराइयों की कुर्बानी दे। समाज में प्रेम, दया और सहानुभूति को बढ़ावा देना ही इस पर्व की सबसे बड़ी सीख है। यही कारण है कि इस दिन लोग गरीबों और जरूरतमंदों की मदद करते हैं तथा कुर्बानी के मांस का एक बड़ा हिस्सा जरूरतमंदों में बांटते हैं। इससे समाज में समानता और सामाजिक न्याय की भावना मजबूत होती है।

भारत जैसे विविधताओं वाले देश में बकरीद सांप्रदायिक सौहार्द और गंगा-जमुनी तहजीब का भी प्रतीक है। यहां सभी धर्मों के लोग एक-दूसरे के त्योहारों में भाग लेते हैं और खुशियां साझा करते हैं। बकरीद के अवसर पर मस्जिदों और ईदगाहों में विशेष नमाज अदा की जाती है। लोग नए कपड़े पहनते हैं, एक-दूसरे को गले लगाकर मुबारकबाद देते हैं और घरों में विशेष पकवान बनाए जाते हैं। सेवइयां, बिरयानी, कबाब और अन्य व्यंजन इस त्योहार की रौनक को और बढ़ा देते हैं।

यह पर्व हमें यह भी सिखाता है कि किसी भी समाज की असली ताकत उसकी एकता और आपसी सम्मान में होती है। आज जब दुनिया कई तरह के संघर्षों, हिंसा और विभाजन का सामना कर रही है, तब बकरीद का संदेश और भी अधिक प्रासंगिक हो जाता है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि धर्म का मूल उद्देश्य मानवता की सेवा और शांति की स्थापना है।


बकरीद का महत्व आध्यात्मिक दृष्टि से भी अत्यंत बड़ा है। यह पर्व इंसान को ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण की प्रेरणा देता है। यह बताता है कि जीवन में सच्चा धर्म वही है, जिसमें दूसरों के प्रति करुणा, त्याग और जिम्मेदारी की भावना हो। केवल धार्मिक अनुष्ठान ही नहीं, बल्कि मानव सेवा भी इबादत का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

आज के समय में पर्यावरण संरक्षण और स्वच्छता का संदेश भी इस पर्व से जोड़ा जा रहा है। कई सामाजिक संगठन लोगों से स्वच्छ और जिम्मेदार तरीके से त्योहार मनाने की अपील कर रहे हैं। साथ ही जरूरतमंदों की सहायता, रक्तदान, गरीबों को भोजन वितरण और सामाजिक सेवा के अनेक कार्यक्रम भी आयोजित किए जा रहे हैं। इससे यह त्योहार केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना का भी माध्यम बन रहा है।

बकरीद हमें यह समझने की प्रेरणा देती है कि इंसान की महानता उसके धन या शक्ति में नहीं, बल्कि उसके त्याग, दया और मानवता में होती है। यदि हम इस पर्व के मूल संदेश को अपने जीवन में उतार लें, तो समाज में प्रेम, भाईचारा और शांति की स्थापना संभव हो सकती है।

इस पावन अवसर पर सभी मुस्लिम भाई-बहनों को ईद-उल-अजहा की हार्दिक मुबारकबाद। यह त्योहार सभी के जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और आपसी प्रेम लेकर आए। समाज में भाईचारा और सद्भाव की भावना और मजबूत हो तथा मानवता का संदेश पूरी दुनिया में फैलता रहे — यही इस पवित्र पर्व की सबसे बड़ी सीख है।

आलोक कुमार

India : एक कुशल लेखक, कवि, समाज सुधारक और विचारक भी थे “वीर सावरकर”

 28 मई : इतिहास, विज्ञान, राजनीति और संस्कृति का विशेष दिन

28 मई ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार वर्ष का 148वाँ दिन (लीप वर्ष में 149वाँ दिन) होता है। वर्ष समाप्त होने में अभी 217 दिन शेष रहते हैं। इतिहास के पन्नों में यह दिन अनेक महत्वपूर्ण घटनाओं, महान व्यक्तित्वों के जन्म, वैज्ञानिक उपलब्धियों और सामाजिक परिवर्तनों के कारण विशेष महत्व रखता है। भारत ही नहीं बल्कि विश्व इतिहास में भी 28 मई कई ऐसे प्रसंगों का साक्षी रहा है, जिन्होंने मानव सभ्यता की दिशा को प्रभावित किया।

भारत के संदर्भ में 28 मई का महत्व

भारत के लिए 28 मई का दिन विशेष रूप से इसलिए महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि इसी दिन आधुनिक भारत के महान राष्ट्रवादी नेता और हिंदुत्व विचारधारा के प्रमुख चिंतक Vinayak Damodar Savarkar का जन्म हुआ था। उनका जन्म 28 मई 1883 को महाराष्ट्र के नासिक जिले में हुआ था। उन्हें “वीर सावरकर” के नाम से जाना जाता है।

सावरकर केवल स्वतंत्रता सेनानी ही नहीं थे, बल्कि एक कुशल लेखक, कवि, समाज सुधारक और विचारक भी थे। उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ क्रांतिकारी आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। काला पानी की सजा भुगतते हुए उन्होंने अंडमान की सेल्युलर जेल में अत्यंत कठिन जीवन बिताया। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में उनके योगदान को आज भी सम्मान के साथ याद किया जाता है।

उनकी पुस्तक “हिंदुत्व” ने भारतीय राजनीति और सामाजिक विमर्श को गहराई से प्रभावित किया। हालांकि उनके विचारों को लेकर समाज में मतभेद भी रहे, लेकिन यह सत्य है कि वे भारतीय इतिहास के सबसे चर्चित और प्रभावशाली व्यक्तित्वों में से एक रहे।

अंतरराष्ट्रीय घटनाएँ

28 मई विश्व इतिहास में भी कई ऐतिहासिक घटनाओं का गवाह रहा है। वर्ष 1937 में इसी दिन जर्मन ऑटोमोबाइल कंपनी Volkswagen की स्थापना हुई थी। यह कंपनी बाद में दुनिया की सबसे बड़ी कार निर्माण कंपनियों में शामिल हुई। “फॉक्सवैगन” का अर्थ ही होता है — “जनता की कार”। इस कंपनी ने ऑटोमोबाइल उद्योग में क्रांति ला दी।

वर्ष 1959 में इसी दिन दो अमेरिकी बंदरों एबल और बेकर को अंतरिक्ष यात्रा पर भेजा गया था। यह वैज्ञानिक प्रयोग मानव अंतरिक्ष मिशनों की दिशा में एक बड़ा कदम माना गया। बाद में इन्हीं प्रयोगों के आधार पर मानव को अंतरिक्ष में भेजने की तैयारी मजबूत हुई।

खेल जगत में महत्व

28 मई खेल जगत में भी कई यादगार घटनाओं से जुड़ा हुआ है। क्रिकेट, फुटबॉल और ओलंपिक खेलों में इस दिन कई ऐतिहासिक मुकाबले हुए हैं। यूरोपीय फुटबॉल प्रतियोगिताओं के कई फाइनल मुकाबले मई के अंतिम सप्ताह में खेले जाते रहे हैं, जिससे यह दिन खेल प्रेमियों के लिए भी उत्साह का केंद्र बन जाता है।

भारत में आईपीएल जैसे टूर्नामेंट भी मई के अंतिम सप्ताह में चरम पर होते हैं। क्रिकेट प्रेमियों के लिए यह समय रोमांच और उत्सव का माहौल लेकर आता है।

विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में

विज्ञान और तकनीक की दुनिया में भी 28 मई को कई महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ दर्ज हुई हैं। अंतरिक्ष अनुसंधान, चिकित्सा और संचार तकनीक में हुए प्रयोगों ने इस दिन को वैज्ञानिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण बनाया है।

आधुनिक युग में विज्ञान ने मानव जीवन को सरल और उन्नत बनाया है। 28 मई हमें यह याद दिलाता है कि निरंतर अनुसंधान और खोज मानव सभ्यता को आगे बढ़ाने की सबसे बड़ी शक्ति है।

सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व

मई का अंतिम सप्ताह सामान्यतः गर्मी के मौसम का चरम समय होता है। भारत में इस समय स्कूलों की छुट्टियाँ चलती हैं और लोग परिवार के साथ समय बिताते हैं। कई क्षेत्रों में धार्मिक आयोजन, मेले और सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं।

सोशल मीडिया और डिजिटल युग में अब विशेष दिनों को याद करने का तरीका भी बदल गया है। लोग महान व्यक्तित्वों को श्रद्धांजलि देते हैं, ऐतिहासिक घटनाओं को साझा करते हैं और नई पीढ़ी को इतिहास से जोड़ने का प्रयास करते हैं।

28 मई को जन्मे अन्य प्रसिद्ध व्यक्ति

इस दिन कई प्रसिद्ध व्यक्तित्वों का जन्म हुआ, जिन्होंने साहित्य, राजनीति, खेल और कला के क्षेत्र में विशेष पहचान बनाई। इन महान लोगों की उपलब्धियाँ समाज को प्रेरणा देती हैं कि कठिन परिस्थितियों के बावजूद मेहनत और समर्पण से सफलता प्राप्त की जा सकती है।

प्रेरणा का दिन

28 मई केवल इतिहास को याद करने का दिन नहीं है, बल्कि यह प्रेरणा लेने का भी अवसर है। वीर सावरकर जैसे व्यक्तित्व हमें देशभक्ति, साहस और संघर्ष की सीख देते हैं। वैज्ञानिक उपलब्धियाँ हमें नवाचार और अनुसंधान के महत्व को समझाती हैं। वहीं सामाजिक घटनाएँ यह संदेश देती हैं कि समाज में संवाद, सहयोग और एकता सबसे आवश्यक हैं।

निष्कर्ष

28 मई इतिहास, राष्ट्रवाद, विज्ञान, खेल और संस्कृति का अनूठा संगम है। यह दिन हमें अतीत की महत्वपूर्ण घटनाओं को याद करने के साथ-साथ भविष्य के लिए प्रेरणा भी देता है। इतिहास के हर विशेष दिन की तरह 28 मई भी हमें यह सिखाता है कि समय बदलता रहता है, लेकिन महान कार्य और विचार सदैव अमर रहते हैं।

इस विशेष दिन पर हमें उन सभी महान व्यक्तित्वों और घटनाओं को स्मरण करना चाहिए जिन्होंने मानव समाज को बेहतर बनाने में योगदान दिया। इतिहास केवल बीते समय की कहानी नहीं होता, बल्कि वह भविष्य के निर्माण की प्रेरणा भी होता है।

आलोक कुमार

India : आईपीएल 2026 के पहले क्वालीफायर में आरसीबी

           प्रीमियर लीग के इतिहास में पांचवीं बार फाइनल का टिकट हासिल किया

आईपीएल 2026 के पहले क्वालीफायर में Royal Challengers Bengaluru ने शानदार प्रदर्शन करते हुए Gujarat Titans को 92 रनों से हराकर फाइनल में दमदार एंट्री कर ली। धर्मशाला के खूबसूरत मैदान पर खेले गए इस मुकाबले में आरसीबी ने बल्लेबाजी और गेंदबाजी दोनों विभागों में पूरी तरह दबदबा बनाए रखा। डिफेंडिंग चैंपियन आरसीबी ने एक बार फिर साबित कर दिया कि वह लगातार दूसरी बार खिताब जीतने की सबसे मजबूत दावेदारों में शामिल है। इस जीत के साथ टीम ने इंडियन प्रीमियर लीग के इतिहास में पांचवीं बार फाइनल का टिकट हासिल किया।

पहले बल्लेबाजी करते हुए आरसीबी के बल्लेबाजों ने शुरुआत से ही आक्रामक रवैया अपनाया। टीम ने गुजरात के गेंदबाजों पर लगातार दबाव बनाया और बड़े शॉट्स की मदद से विशाल स्कोर खड़ा किया। आरसीबी ने निर्धारित 20 ओवरों में 254 रन बनाकर गुजरात के सामने 255 रनों का कठिन लक्ष्य रखा। इतने बड़े लक्ष्य का पीछा करना आसान नहीं था, खासकर तब जब सामने आरसीबी जैसी मजबूत गेंदबाजी इकाई हो।

लक्ष्य का पीछा करने उतरी गुजरात टाइटंस की शुरुआत बेहद खराब रही। आरसीबी के गेंदबाजों ने पहले ही ओवर से सटीक लाइन और लेंथ के साथ दबाव बनाना शुरू कर दिया। गुजरात की बल्लेबाजी पूरी तरह लड़खड़ा गई और पावरप्ले खत्म होने से पहले ही टीम ने अपने कई अहम विकेट गंवा दिए। शुरुआती झटकों से टीम कभी उबर नहीं सकी और लगातार विकेट गिरते रहे।

गुजरात को सबसे बड़ा झटका तब लगा जब शानदार फॉर्म में चल रहे Sai Sudharsan मात्र 9 रन बनाकर आउट हो गए। उनसे इस अहम मुकाबले में बड़ी पारी की उम्मीद थी, लेकिन वह आरसीबी के गेंदबाजों के सामने ज्यादा देर टिक नहीं सके। कप्तान Shubman Gill भी केवल 2 रन बनाकर पवेलियन लौट गए। युवा बल्लेबाज निशांत सिंधू 8 रन ही बना सके, जबकि अनुभवी ऑलराउंडर Jason Holder बिना खाता खोले आउट हो गए। लगातार विकेट गिरने से गुजरात की टीम पूरी तरह दबाव में आ गई।

हालांकि इंग्लैंड के विस्फोटक बल्लेबाज Jos Buttler ने कुछ समय तक मुकाबले में जान डालने की कोशिश की। बटलर ने सिर्फ 11 गेंदों में 29 रन ठोक दिए, जिसमें चार चौके और दो शानदार छक्के शामिल रहे। उनकी बल्लेबाजी से ऐसा लगा कि गुजरात वापसी कर सकती है, लेकिन वह बड़ी पारी खेलने में सफल नहीं हो सके। शुरुआती छह ओवरों में गुजरात ने 51 रन बनाए, लेकिन विकेटों का सिलसिला नहीं रुका और टीम लगातार मुश्किल में फंसती चली गई।

जब ऐसा लग रहा था कि गुजरात की टीम बेहद छोटे स्कोर पर सिमट जाएगी, तब Rahul Tewatia ने अकेले मोर्चा संभाला। तेवतिया ने शानदार संघर्ष करते हुए जुझारू अर्धशतक लगाया और टीम की इज्जत बचाने का काम किया। उन्होंने 43 गेंदों में 68 रन बनाए, जिसमें 8 चौके और 4 बेहतरीन छक्के शामिल थे। तेवतिया ने निचले क्रम के बल्लेबाज Mohammed Siraj के साथ नौवें विकेट के लिए 68 रनों की अहम साझेदारी की। इसी साझेदारी की बदौलत गुजरात की टीम 162 रन तक पहुंच सकी, वरना टीम का स्कोर और भी कम रह सकता था।

आरसीबी की गेंदबाजी इस मुकाबले में पूरी तरह हावी रही। तेज गेंदबाज Jacob Duffy ने शानदार गेंदबाजी करते हुए तीन विकेट झटके और गुजरात की बल्लेबाजी की कमर तोड़ दी। अनुभवी गेंदबाज Bhuvneshwar Kumar ने अपनी सटीक लाइन और लेंथ से बल्लेबाजों को परेशान किया और दो विकेट हासिल किए। वहीं Krunal Pandya और Rasikh Salam ने भी दो-दो विकेट लेकर गुजरात को पूरी तरह बैकफुट पर धकेल दिया।

इस जीत ने आरसीबी के आत्मविश्वास को और मजबूत कर दिया है। पिछले सीजन में पंजाब किंग्स को हराकर टीम ने पहली बार आईपीएल ट्रॉफी जीतने का सपना पूरा किया था और अब लगातार दूसरी बार खिताब जीतने की ओर तेजी से बढ़ रही है। कप्तान और टीम प्रबंधन दोनों ही खिलाड़ियों के प्रदर्शन से बेहद खुश नजर आए। बल्लेबाजों ने जहां बड़ा स्कोर खड़ा किया, वहीं गेंदबाजों ने उसे शानदार तरीके से बचाते हुए टीम को यादगार जीत दिलाई।

दूसरी ओर गुजरात टाइटंस के लिए यह हार किसी बड़े झटके से कम नहीं रही। टीम के स्टार बल्लेबाज बड़े मुकाबले में फ्लॉप साबित हुए और बल्लेबाजी क्रम पूरी तरह बिखर गया। हालांकि राहुल तेवतिया की जुझारू पारी ने जरूर प्रशंसकों का दिल जीत लिया। अब गुजरात को फाइनल की उम्मीद बनाए रखने के लिए अगले मुकाबले में दमदार वापसी करनी होगी।

धर्मशाला में खेला गया यह मुकाबला लंबे समय तक आरसीबी के दबदबे और गुजरात की कमजोर बल्लेबाजी के लिए याद रखा जाएगा। आरसीबी के फैंस अब एक और आईपीएल ट्रॉफी की उम्मीद लगाए बैठे हैं, जबकि टीम पूरे टूर्नामेंट में शानदार लय में नजर आ रही है।

आलोक कुमार



India : अब नाराज फूफा का शगूफा छोड़ा गया

  अब नाराज फूफा का शगूफा छोड़ा गया है, बेरोजगारी, लाचारी और महंगाई ताक पर रख दी गई पटना। चुनावी मौसम आते ही राजनीति का माहौल बदलने लगता है।...