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रविवार, 31 मई 2026

Bihar : सशक्त स्थायी समिति के चुनाव ने एक नया राजनीतिक अध्याय


बेतिया नगर निगम की राजनीति में हाल ही में हुए सशक्त स्थायी समिति के चुनाव ने एक नया राजनीतिक अध्याय खोल दिया है। यह चुनाव केवल सात सदस्यों के चयन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने नगर निगम के भीतर बदलते राजनीतिक समीकरणों और सत्ता संतुलन की वास्तविक तस्वीर भी सामने रख दी। चुनाव परिणामों ने यह स्पष्ट कर दिया कि नगर निगम के अधिकांश पार्षद अब मेयर गरिमा देवी सिकारिया के नेतृत्व से संतुष्ट नहीं हैं। परिणामस्वरूप, समिति की सातों सीटों पर विपक्षी खेमे के उम्मीदवारों ने जीत दर्ज कर ली और मेयर समर्थक एक भी उम्मीदवार चुनाव नहीं जीत सका। इसे नगर निगम के इतिहास में मेयर की सबसे बड़ी राजनीतिक पराजयों में से एक माना जा रहा है।

सशक्त स्थायी समिति नगर निगम की सबसे महत्वपूर्ण निर्णय लेने वाली संस्था होती है। नगर निगम के बजट, विकास योजनाओं, निर्माण कार्यों, निविदाओं की स्वीकृति और विभिन्न प्रशासनिक प्रस्तावों पर अंतिम निर्णय लेने में इस समिति की प्रमुख भूमिका होती है। ऐसे में समिति में बहुमत होना किसी भी मेयर के लिए राजनीतिक और प्रशासनिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। लेकिन इस चुनाव में जो परिणाम सामने आए, उन्होंने मेयर खेमे को पूरी तरह झकझोर कर रख दिया।

चुनाव से पहले नगर निगम के गलियारों में काफी हलचल थी। दोनों पक्ष अपने-अपने उम्मीदवारों को जिताने के लिए सक्रिय थे। मेयर खेमे को विश्वास था कि उनके प्रभाव और पद की शक्ति के कारण पर्याप्त समर्थन मिलेगा। वहीं विपक्ष पिछले कई महीनों से लगातार संगठनात्मक मजबूती पर काम कर रहा था। विपक्षी पार्षदों ने मेयर की कार्यशैली, विकास योजनाओं के क्रियान्वयन में कथित देरी तथा पार्षदों की उपेक्षा जैसे मुद्दों को लेकर एकजुटता दिखाई।

जब मतदान के बाद परिणाम घोषित हुए तो राजनीतिक पर्यवेक्षकों के साथ-साथ नगर निगम के कई अनुभवी सदस्यों के लिए भी यह अप्रत्याशित था। सातों सीटों पर विपक्ष समर्थित उम्मीदवारों की जीत ने यह संदेश दे दिया कि निगम के भीतर सत्ता का वास्तविक केंद्र बदल चुका है। सबसे बड़ी बात यह रही कि मेयर के करीबी माने जाने वाले उम्मीदवार भी हार गए। इससे यह संकेत मिला कि चुनाव में केवल विपक्ष की मजबूती ही नहीं, बल्कि मेयर खेमे के भीतर भी गंभीर असंतोष मौजूद था।

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार इस हार के पीछे कई कारण रहे। सबसे पहला कारण पार्षदों के साथ संवाद की कमी को माना जा रहा है। कई वार्ड पार्षद लंबे समय से यह शिकायत करते रहे थे कि उनके सुझावों और समस्याओं को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जा रहा था। विकास कार्यों के वितरण में भी पक्षपात के आरोप समय-समय पर लगते रहे। इससे कई ऐसे पार्षद भी नाराज हो गए जो पहले तटस्थ माने जाते थे।

दूसरा बड़ा कारण अति-आत्मविश्वास बताया जा रहा है। सत्ता में होने के कारण मेयर खेमा यह मानकर चल रहा था कि उनके पास पर्याप्त समर्थन है। लेकिन उन्होंने विपक्ष की रणनीति और पार्षदों के भीतर बढ़ती नाराजगी को गंभीरता से नहीं लिया। यही कारण रहा कि मतदान के समय उनका पूरा गणित बिगड़ गया।

तीसरा और सबसे चर्चित कारण भीतरघात या क्रॉस वोटिंग माना जा रहा है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि कुछ ऐसे पार्षदों ने भी विपक्षी उम्मीदवारों का समर्थन किया, जिन्हें मेयर का करीबी माना जाता था। यदि यह सच है तो यह मेयर के लिए राजनीतिक रूप से सबसे बड़ा झटका है, क्योंकि इससे उनके नेतृत्व पर सवाल खड़े होते हैं।

विपक्ष की रणनीति भी इस जीत का महत्वपूर्ण कारण रही। विपक्षी गुट ने व्यक्तिगत मतभेदों को भुलाकर केवल एक लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित किया—सशक्त स्थायी समिति पर कब्जा। जातीय, क्षेत्रीय और राजनीतिक समीकरणों को ध्यान में रखते हुए उम्मीदवारों का चयन किया गया। परिणामस्वरूप विपक्ष पूरी तरह सफल रहा और उसने समिति की सभी सीटों पर कब्जा जमा लिया।

इस चुनाव के बाद नगर निगम में मेयर की स्थिति पहले जैसी मजबूत नहीं रह गई है। अब कोई भी महत्वपूर्ण प्रस्ताव या वित्तीय निर्णय समिति की स्वीकृति के बिना आगे नहीं बढ़ सकता। चूंकि समिति के सभी सात सदस्य विपक्ष से जुड़े हैं, इसलिए मेयर को हर निर्णय के लिए विपक्ष से संवाद और सहयोग करना होगा। यदि दोनों पक्षों के बीच टकराव की स्थिति बनी रहती है तो विकास कार्य प्रभावित हो सकते हैं।

आने वाले समय में नगर निगम की बैठकों में राजनीतिक खींचतान बढ़ने की संभावना भी जताई जा रही है। विपक्ष अब हर प्रस्ताव की गहन समीक्षा करेगा और बिना पर्याप्त संतुष्टि के किसी भी योजना को मंजूरी देने से बच सकता है। इससे प्रशासनिक प्रक्रियाएं धीमी पड़ सकती हैं। दूसरी ओर, यदि विपक्ष जिम्मेदार भूमिका निभाता है और जनहित को प्राथमिकता देता है, तो यह समिति नगर निगम के कामकाज में पारदर्शिता और जवाबदेही भी बढ़ा सकती है।

इस चुनाव ने एक और महत्वपूर्ण संदेश दिया है कि लोकतांत्रिक संस्थाओं में केवल पद का प्रभाव पर्याप्त नहीं होता। जनप्रतिनिधियों का विश्वास बनाए रखना, संवाद कायम रखना और सभी पक्षों को साथ लेकर चलना उतना ही आवश्यक है। नगर निगम के पार्षदों ने अपने मतदान के माध्यम से यह संकेत दिया है कि वे निर्णय प्रक्रिया में सम्मानजनक भागीदारी चाहते हैं।

बेतिया की जनता की नजरें अब मेयर और विपक्ष दोनों पर टिकी हुई हैं। जनता चाहती है कि राजनीतिक संघर्ष विकास कार्यों में बाधा न बने। शहर की सड़कें, सफाई व्यवस्था, जल निकासी, पेयजल और अन्य बुनियादी सुविधाएं पहले से ही कई चुनौतियों का सामना कर रही हैं। ऐसे में राजनीतिक टकराव का खामियाजा आम नागरिकों को भुगतना पड़ सकता है।

कुल मिलाकर, सशक्त स्थायी समिति का यह चुनाव बेतिया नगर निगम की राजनीति में एक निर्णायक मोड़ साबित हुआ है। मेयर गरिमा देवी सिकारिया को मिली यह करारी हार केवल चुनावी पराजय नहीं, बल्कि निगम के भीतर बदलते राजनीतिक विश्वास का संकेत भी है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि मेयर इस चुनौती का सामना किस प्रकार करती हैं और विपक्ष अपनी नई शक्ति का उपयोग जनहित में करता है या केवल राजनीतिक बढ़त बनाए रखने के लिए। आने वाले महीनों में बेतिया नगर निगम की राजनीति और प्रशासन दोनों की दिशा काफी हद तक इसी समीकरण पर निर्भर करेगी।

आलोक कुमार

India : सीसीबीआई के अधिकारियों ने केरल के मुख्यमंत्री वी. डी. सतीशन को किया सम्मानित

 सीसीबीआई के अधिकारियों ने केरल के मुख्यमंत्री वी. डी. सतीशन को किया सम्मानित

नई दिल्ली। भारत के कैथोलिक बिशप सम्मेलन (CCBI) के अधिकारियों ने केरल के नव-शपथ ग्रहण किए हुए मुख्यमंत्री V. D. Satheesan का अभिनंदन किया। यह मुलाकात 26 मई 2026 को नई दिल्ली स्थित केरल हाउस में हुई, जहां दोनों पक्षों के बीच राज्य के विकास, सामाजिक सद्भाव और गरीबों के कल्याण जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा हुई।

इस अवसर पर सीसीबीआई के उप महासचिव रेव. डॉ. स्टीफन अलाथारा तथा प्रवासी आयोग (Commission for Migrants) के कार्यकारी सचिव फादर एडवोकेट जैसन वडास्सेरी ने मुख्यमंत्री से भेंट की। मुख्यमंत्री वी. डी. सतीशन उस समय राष्ट्रीय राजधानी में भारत के प्रधानमंत्री Narendra Modi के साथ विभिन्न विकासात्मक और प्रशासनिक मुद्दों पर चर्चा करने के लिए आए हुए थे।

बैठक के दौरान रेव. डॉ. स्टीफन अलाथारा ने मुख्यमंत्री को मिजोरम की समृद्ध जनजातीय संस्कृति का प्रतीक एक पारंपरिक मिजो शॉल भेंट किया। यह सम्मान न केवल सांस्कृतिक विविधता का प्रतीक था, बल्कि देश के विभिन्न राज्यों के बीच भाईचारे और एकता का संदेश भी देता है।                 

इसके साथ ही उन्होंने मुख्यमंत्री को पोप लियो चौदहवें द्वारा जारी प्रथम अपोस्टोलिक उपदेश (Apostolic Exhortation) “Dilexi Te” की एक प्रति भी भेंट की। 9 अक्टूबर 2025 को प्रकाशित इस महत्वपूर्ण दस्तावेज का उपशीर्षक “गरीबों के प्रति प्रेम” है। इसमें मसीह के गरीबों और वंचितों के प्रति प्रेम पर गहन चिंतन प्रस्तुत किया गया है तथा चर्च को समाज के कमजोर, जरूरतमंद और हाशिए पर रहने वाले लोगों की सेवा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को और मजबूत करने का आह्वान किया गया है।

फादर अलाथारा ने इस अवसर पर कहा कि किसी भी सरकार की पहली और सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी समाज के गरीब, कमजोर और वंचित वर्गों के कल्याण को सुनिश्चित करना होना चाहिए। उन्होंने कहा कि जब शासन व्यवस्था समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास और न्याय पहुंचाने का प्रयास करती है, तभी वास्तविक प्रगति संभव हो पाती है। उन्होंने आशा व्यक्त की कि मुख्यमंत्री सतीशन के नेतृत्व में केरल सामाजिक न्याय, समान अवसर और समावेशी विकास की दिशा में नई ऊंचाइयों को प्राप्त करेगा।

बैठक के दौरान दोनों पक्षों के बीच सौहार्दपूर्ण और अनौपचारिक बातचीत भी हुई। सीसीबीआई के प्रतिनिधियों ने केरल के भविष्य को लेकर अपनी आशाओं और अपेक्षाओं को साझा किया। उन्होंने राज्य में शांति, धार्मिक सद्भाव, सामाजिक एकता और आपसी सहयोग को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर बल दिया। साथ ही उन्होंने मुख्यमंत्री को आश्वस्त किया कि चर्च और उसके विभिन्न संगठन समाज में सकारात्मक मूल्यों के प्रसार तथा सामुदायिक सद्भाव को मजबूत करने के लिए सरकार के साथ सहयोग करते रहेंगे।

सीसीबीआई अधिकारियों ने विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया कि आज के समय में समाज को विभाजन, ध्रुवीकरण और कट्टरता से दूर रखने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि विविधता से भरे केरल जैसे राज्य में सभी समुदायों के बीच विश्वास, सम्मान और संवाद को बढ़ावा देना अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने उम्मीद जताई कि नई सरकार सभी वर्गों को साथ लेकर चलने वाली नीतियों को प्राथमिकता देगी।

मुख्यमंत्री वी. डी. सतीशन ने भी सीसीबीआई प्रतिनिधियों के प्रति आभार व्यक्त किया और समाज के विभिन्न वर्गों के सहयोग को लोकतांत्रिक शासन की सफलता के लिए महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि राज्य के समग्र विकास के लिए धार्मिक, सामाजिक और शैक्षणिक संस्थाओं की रचनात्मक भागीदारी आवश्यक है।

उल्लेखनीय है कि वी. डी. सतीशन ने 18 मई 2026 को केरल के 13वें मुख्यमंत्री के रूप में पदभार ग्रहण किया था। उनके नेतृत्व से राज्य के लोगों को विकास, पारदर्शिता और जनकल्याण की नई उम्मीदें जुड़ी हुई हैं। राजनीतिक और प्रशासनिक अनुभव के कारण उन्हें एक ऐसे नेता के रूप में देखा जाता है जो विभिन्न समुदायों को साथ लेकर आगे बढ़ने की क्षमता रखते हैं।

सीसीबीआई और मुख्यमंत्री के बीच हुई यह मुलाकात केवल एक औपचारिक शिष्टाचार भेंट नहीं थी, बल्कि यह सामाजिक उत्तरदायित्व, मानवीय मूल्यों और जनकल्याण के प्रति साझा प्रतिबद्धता का भी प्रतीक थी। इस बैठक ने यह संदेश दिया कि सरकार और सामाजिक-धार्मिक संस्थाएं मिलकर समाज के कमजोर वर्गों के उत्थान, शांति की स्थापना और सामाजिक एकता को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।

भविष्य में भी ऐसे संवाद और सहयोग राज्य तथा देश के समावेशी विकास को नई दिशा देने में सहायक सिद्ध होंगे।

आलोक कुमार

World : आज विश्व तंबाकू निषेध दिवस

                         31 मई को पूरे विश्व में World No Tobacco Day मनाया जाता है

31 मई वर्ष का एक महत्वपूर्ण दिन है। यह दिन केवल कैलेंडर का एक सामान्य दिन नहीं, बल्कि अनेक ऐतिहासिक घटनाओं, सामाजिक जागरूकता अभियानों और प्रेरणादायक प्रसंगों से जुड़ा हुआ है। मई महीने का अंतिम दिन होने के कारण यह लोगों को बीते महीने का मूल्यांकन करने और आने वाले जून माह की नई योजनाओं के लिए तैयार होने का अवसर भी देता है।            

विश्व तंबाकू निषेध दिवस

31 मई को पूरे विश्व में World No Tobacco Day मनाया जाता है। इसकी शुरुआत World Health Organization (WHO) ने वर्ष 1987 में की थी। इस दिवस का मुख्य उद्देश्य तंबाकू सेवन से होने वाले नुकसान के प्रति लोगों को जागरूक करना और तंबाकू के उपयोग को कम करना है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार तंबाकू सेवन से हर वर्ष लाखों लोगों की मृत्यु होती है। धूम्रपान करने वाले व्यक्ति के साथ-साथ उसके आसपास रहने वाले लोग भी इसके दुष्प्रभावों का सामना करते हैं। इस दिन विभिन्न देशों में जागरूकता रैलियां, स्वास्थ्य शिविर, संगोष्ठियां और जनजागरण कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।

भारतीय और विश्व इतिहास में 31 मई

इतिहास के पन्नों में 31 मई कई महत्वपूर्ण घटनाओं के लिए दर्ज है।

वर्ष 1859 में लंदन की प्रसिद्ध घड़ी Big Ben पहली बार चलनी शुरू हुई।

वर्ष 1921 में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान कई राष्ट्रीय गतिविधियों को नई दिशा मिली।

वर्ष 1961 में दक्षिण अफ्रीका आधिकारिक रूप से Republic of South Africa बना।

वर्ष 1970 में पेरू में आए विनाशकारी भूकंप ने हजारों लोगों की जान ले ली थी।

वर्ष 2005 में पत्रकारिता और मीडिया जगत से जुड़े कई महत्वपूर्ण बदलावों का दौर शुरू हुआ, जिसने डिजिटल मीडिया के विस्तार को नई गति दी।

31 मई को जन्मे प्रसिद्ध व्यक्तित्व

इस दिन कई प्रसिद्ध व्यक्तित्वों का जन्म हुआ जिन्होंने अपने-अपने क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान दिया।

Walt Whitman (1819) – अमेरिका के महान कवि और साहित्यकार।

Clint Eastwood (1930) – विश्व प्रसिद्ध अभिनेता, निर्देशक और निर्माता।

Brooke Shields (1965) – प्रसिद्ध अभिनेत्री और मॉडल।

इन व्यक्तित्वों की उपलब्धियां आज भी नई पीढ़ी को प्रेरणा देती हैं।

31 मई को हुए महत्वपूर्ण निधन

इतिहास में यह दिन कुछ महान हस्तियों की पुण्यतिथि के रूप में भी याद किया जाता है। उनके कार्य और योगदान समाज के लिए प्रेरणास्रोत बने हुए हैं।

मई माह का समापन

31 मई वर्ष के पाँचवें महीने का अंतिम दिन होता है। यह समय विद्यार्थियों, कर्मचारियों, व्यवसायियों और किसानों के लिए विशेष महत्व रखता है। भारत के अधिकांश हिस्सों में इस समय गर्मी अपने चरम पर होती है और लोग मानसून के आगमन की प्रतीक्षा कर रहे होते हैं। किसान आगामी खरीफ फसलों की तैयारी शुरू कर देते हैं।

सामाजिक संदेश


31 मई हमें स्वास्थ्य, अनुशासन और जागरूकता का संदेश देता है। विशेष रूप से विश्व तंबाकू निषेध दिवस लोगों को यह सोचने के लिए प्रेरित करता है कि स्वस्थ जीवन ही सबसे बड़ी संपत्ति है। तंबाकू से दूरी बनाकर न केवल व्यक्ति स्वयं स्वस्थ रह सकता है, बल्कि अपने परिवार और समाज को भी सुरक्षित रख सकता है।

निष्कर्ष

31 मई अनेक दृष्टियों से महत्वपूर्ण दिन है। यह दिन विश्व तंबाकू निषेध दिवस के माध्यम से स्वास्थ्य जागरूकता का संदेश देता है, वहीं इतिहास की अनेक घटनाओं और महान व्यक्तित्वों की याद भी दिलाता है। मई माह के अंतिम दिन के रूप में यह आत्ममंथन, नई योजनाओं और सकारात्मक बदलाव का अवसर प्रदान करता है। इसलिए 31 मई केवल एक तारीख नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, इतिहास, प्रेरणा और जागरूकता का प्रतीक है।

आलोक कुमार

शनिवार, 30 मई 2026

Bihar : नकटा दियारा की जनता की मांग को अनसुना न करें केंद्र सरकार

 नकटा दियारा की जनता की मांग को अनसुना न करें केंद्र सरकार

पटना संसदीय क्षेत्र के लोकप्रिय सांसद एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री Ravi Shankar Prasad ने एक बार फिर गंगा नदी पर निर्माणाधीन छह लेन सड़क पुल परियोजना से जुड़े एक महत्वपूर्ण जनहित के मुद्दे को केंद्र सरकार के समक्ष उठाया है। उन्होंने सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री Nitin Gadkari को पत्र लिखकर आग्रह किया है कि जे.पी. सेतु के समानांतर बन रहे राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 139W के पुल पर पिलर संख्या 16 से 26 के बीच नकटा दियारा क्षेत्र के लिए एक अप्रोच अथवा रैंप रोड का निर्माण कराया जाए।

यह मांग केवल एक सड़क निर्माण की मांग नहीं है, बल्कि लाखों लोगों के जीवन को आसान बनाने का प्रश्न है। सांसद रविशंकर प्रसाद ने अपने पत्र में स्पष्ट किया है कि दीघा-सोनपुर के बीच निर्माणाधीन छह लेन पुल का एक हिस्सा ग्राम नकटा दियारा एवं छितरचक क्षेत्र से होकर गुजरता है। यहां के ग्रामीण लंबे समय से चाहते हैं कि पुल से सीधे दियारा क्षेत्र को जोड़ने के लिए एक रैंप रोड बनाई जाए, जिससे वे मुख्य सड़क नेटवर्क से सीधे जुड़ सकें।

दियारा क्षेत्र की सबसे बड़ी समस्या उसका भौगोलिक स्वरूप है। गंगा और अन्य नदियों से घिरे इन इलाकों में वर्षा ऋतु और बाढ़ के दौरान आवागमन लगभग ठप हो जाता है। कई गांवों का संपर्क जिला मुख्यालय, अनुमंडल मुख्यालय तथा प्रखंड मुख्यालय से कट जाता है। मरीजों को अस्पताल पहुंचाने में कठिनाई होती है, विद्यार्थियों
की पढ़ाई प्रभावित होती है तथा प्रशासनिक सेवाओं तक पहुंच बाधित हो जाती है। ऐसे में यदि निर्माणाधीन पुल से सीधे एक अप्रोच रोड उतार दी जाए तो यह क्षेत्र पूरे वर्ष राजधानी पटना और अन्य महत्वपूर्ण केंद्रों से जुड़ा रहेगा।

सांसद रविशंकर प्रसाद ने अपने पत्र में यह भी उल्लेख किया है कि इस मांग को पहले भी केंद्र सरकार के समक्ष उठाया गया था। उन्होंने अपने पूर्व पत्र का संदर्भ देते हुए बताया कि तत्कालीन बिहार सरकार के पथ निर्माण मंत्री Nitin Nabin ने भी 14 मई 2025 को इस मांग का समर्थन किया था। इतना ही नहीं, इस विषय पर केंद्र और राज्य सरकार के बीच हुई बैठक में भी चर्चा हुई थी। बाद में नकटा दियारा को किसी अन्य प्रस्तावित मार्ग से जोड़ने का विकल्प सामने आया, किंतु स्थानीय जनता इसे व्यावहारिक समाधान नहीं मानती।

स्थानीय लोगों का कहना है कि शेरपुर के निकट प्रस्तावित वैकल्पिक संपर्क मार्ग नकटा दियारा के निवासियों के लिए सुविधाजनक नहीं होगा। नकटा दियारा से उस प्रस्तावित संपर्क मार्ग तक आने-जाने में लगभग 50 किलोमीटर अतिरिक्त दूरी तय करनी पड़ेगी। ग्रामीणों के अनुसार यह न केवल समय और धन की बर्बादी होगी, बल्कि बाढ़ के समय स्थिति और भी विकट हो जाएगी। गंगा नदी के फैलाव के कारण लोगों को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है।

नकटा दियारा कोई साधारण गांव नहीं है। यह एक प्राचीन एवं ऐतिहासिक क्षेत्र है, जिसके संपर्क में लगभग दस पंचायतें आती हैं। अनुमानतः दो से तीन लाख लोगों की आबादी इस प्रस्तावित रैंप रोड से सीधे लाभान्वित होगी। यदि यहां अप्रोच रोड का निर्माण होता है तो कृषि, व्यापार, शिक्षा, स्वास्थ्य तथा रोजगार के अवसरों में उल्लेखनीय वृद्धि होगी। दियारा क्षेत्र के किसानों को अपनी उपज बाजार तक पहुंचाने में आसानी होगी तथा युवाओं को रोजगार और शिक्षा के बेहतर अवसर प्राप्त होंगे।

इस मांग को केवल सांसद रविशंकर प्रसाद ने ही नहीं उठाया है। पूर्णिया (बिहार) के वर्तमान सांसद राजेश रंजन (पप्पू यादव) हैं।सांसद Pappu Yadav ने भी जनभावनाओं का सम्मान करते हुए अप्रोच रोड निर्माण का समर्थन किया है। वहीं बिहार सरकार के सहकारिता मंत्री Ram Kripal Yadav भी इस मांग के पक्ष में अपनी आवाज बुलंद कर चुके हैं। जब विभिन्न राजनीतिक दलों और जनप्रतिनिधियों की राय एक समान हो तथा जनता की मांग भी स्पष्ट हो, तब सरकार को इस विषय पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।

विकास का वास्तविक अर्थ केवल बड़े-बड़े पुल और राजमार्ग बनाना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि उन परियोजनाओं का लाभ स्थानीय जनता तक पहुंचे। यदि करोड़ों रुपये की लागत से बनने वाला पुल दियारा क्षेत्र के लोगों को प्रत्यक्ष लाभ नहीं दे पाता, तो विकास का उद्देश्य अधूरा रह जाएगा। एक रैंप रोड का निर्माण अपेक्षाकृत कम लागत में लाखों लोगों के जीवन में बड़ा परिवर्तन ला सकता है।

केंद्रीय मंत्री नितिन गड़करी देश में आधुनिक सड़क अवसंरचना के निर्माण के लिए जाने जाते हैं। उनके नेतृत्व में अनेक महत्वाकांक्षी परियोजनाएं सफलतापूर्वक पूरी हुई हैं। ऐसे में नकटा दियारा की इस जनहितकारी मांग पर सकारात्मक निर्णय लेना न केवल स्थानीय जनता के हित में होगा, बल्कि यह सरकार की जनसंवेदनशीलता का भी परिचायक बनेगा।

आज आवश्यकता इस बात की है कि केंद्र सरकार, राज्य सरकार और संबंधित विभाग मिलकर नकटा दियारा क्षेत्र की वास्तविक परिस्थितियों का पुनर्मूल्यांकन करें। यदि तकनीकी दृष्टि से संभव हो, तो पिलर संख्या 16 से 26 के बीच एक उपयुक्त अप्रोच अथवा रैंप रोड का निर्माण कराया जाए। इससे लाखों लोगों की वर्षों पुरानी मांग पूरी होगी और दियारा क्षेत्र विकास की मुख्यधारा से स्थायी रूप से जुड़ सकेगा। जनता की अपेक्षा भी यही है कि उनकी आवाज को सुना जाए और विकास का लाभ उनके दरवाजे तक पहुंचाया जाए।

आलोक कुमार


World :"पीड़ित मानवता के लिए प्रार्थना करने का आह्वान किया "

 विश्व शांति के लिए रोजरी माला विनती : सन्त पापा लियो 14वें की विशेष पहल

कैथोलिक कलीसिया में मई का महीना माता मरियम को समर्पित माना जाता है। इस पूरे महीने में विश्व भर के श्रद्धालु माता मरियम के प्रति अपनी भक्ति व्यक्त करते हुए रोजरी माला का पाठ करते हैं। इस वर्ष मई माह के समापन पर सन्त पापा लियो 14वें ने विश्व शांति के लिए एक विशेष पहल की है। उन्होंने युद्धों, हिंसा और संघर्षों से पीड़ित मानवता के लिए प्रार्थना करने का आह्वान किया है तथा स्वयं 30 मई को वाटिकन गार्डन्स में पवित्र रोजरी माला विनती की अध्यक्षता करने का निर्णय लिया है।

सन्त पापा लियो 14वें अपने परमाध्यक्षीय कार्यकाल के आरम्भ से ही विश्व में शांति स्थापित करने की आवश्यकता पर जोर देते रहे हैं। उन्होंने विभिन्न अवसरों पर युद्धरत देशों और संघर्षों से जूझ रहे क्षेत्रों के लिए प्रार्थना की अपील की है। उनका मानना है कि प्रार्थना केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि मानव हृदय को बदलने और शांति का मार्ग प्रशस्त करने का एक प्रभावशाली साधन है। इसी सोच के साथ वे मई माह के अंतिम दिनों में विश्व के सभी लोगों को एकजुट होकर शांति के लिए प्रार्थना करने के लिए आमंत्रित कर रहे हैं। 

30 मई की शाम रोम समयानुसार 7 बजे, वाटिकन गार्डन्स में स्थित लूर्द की रानी माता मरियम को समर्पित गुफा के सामने यह विशेष रोजरी माला विनती आयोजित की जाएगी। इस प्रार्थना में सन्त पापा स्वयं नेतृत्व करेंगे और विश्व भर के श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक रूप से इसमें सहभागी बनने का अवसर मिलेगा। यह आयोजन केवल वाटिकन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि दुनिया के अनेक प्रमुख तीर्थस्थल भी इसमें सहभागी होंगे।

विशेष बात यह है कि इस रोजरी विनती के प्रत्येक भेद को युद्ध और हिंसा से प्रभावित लोगों के लिए समर्पित किया जाएगा। सामान्यतः रोजरी माला के भेद प्रभु यीशु और माता मरियम के जीवन की विभिन्न घटनाओं पर आधारित होते हैं, किन्तु इस अवसर पर प्रत्येक भेद के साथ युद्ध पीड़ित परिवारों, विस्थापित लोगों, घायल नागरिकों, चिकित्सकों, राहत कर्मियों और स्वयंसेवकों के लिए विशेष प्रार्थनाएं की जाएंगी। इस प्रकार यह परंपरागत रोजरी पाठ के साथ-साथ समकालीन मानवीय पीड़ा को भी अपने भीतर समाहित करेगा।

कलीसिया में ऐसी परंपरा पहले भी देखी गई है। विशेषकर लेंट काल के दौरान कई चर्चों में पारंपरिक प्रार्थनाओं के साथ वर्तमान समाज के दुख-दर्द और चुनौतियों को जोड़कर विशेष पाठ किए जाते हैं। जिस प्रकार क्रूस मार्ग की चौदह मंजिलों के चिंतन में मानव जीवन की कठिनाइयों को शामिल किया जाता है, उसी प्रकार इस रोजरी विनती में भी विश्व की पीड़ाओं को ईश्वर और माता मरियम के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा।

इस आयोजन में विश्व के अनेक प्रसिद्ध मरियम तीर्थस्थलों और धार्मिक केंद्रों को भी आमंत्रित किया गया है। जिन प्रमुख तीर्थस्थलों ने अपनी सहभागिता की पुष्टि की है, उनमें यूक्रेन का मरियम तीर्थस्थल, फिलीपींस में शांति की रानी माता मरियम का अंतरराष्ट्रीय तीर्थ, पुर्तगाल का प्रसिद्ध फातिमा तीर्थस्थल, बोस्निया और हर्जेगोविना का मेज्जुगोर्ये तीर्थ, फ्रांस का लूर्द तीर्थस्थल, लेबनान का संत चारबेल अन्नाया तीर्थ और इटली का लॉरेटो स्थित परमधर्मपीठीय हाउस ऑफ लॉरेटो शामिल हैं। इन सभी स्थानों पर श्रद्धालु उसी समय प्रार्थना में सहभागी होंगे और इस प्रकार विश्वभर के लाखों लोग एक आध्यात्मिक सूत्र में बंध जाएंगे।

आज जब दुनिया के अनेक हिस्सों में युद्ध, आतंकवाद, राजनीतिक संघर्ष और सामाजिक अस्थिरता बनी हुई है, तब यह पहल और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। युद्ध केवल सैनिकों को ही प्रभावित नहीं करता, बल्कि असंख्य परिवारों को बिखेर देता है। बच्चे अनाथ हो जाते हैं, माता-पिता अपने प्रियजनों को खो देते हैं और लाखों लोग अपने घरों से विस्थापित हो जाते हैं। अस्पतालों में कार्यरत चिकित्सक और स्वास्थ्यकर्मी दिन-रात घायलों की सेवा करते हैं, जबकि राहतकर्मी और स्वयंसेवक कठिन परिस्थितियों में मानवता की सेवा में लगे रहते हैं। सन्त पापा लियो 14वें ने विशेष रूप से इन सभी लोगों को अपनी प्रार्थनाओं में शामिल करने का निर्णय लिया है।

रोजरी माला विनती में सुख के पाँच भेदों का पाठ किया जाएगा। प्रत्येक भेद के माध्यम से विश्व के विभिन्न संकटग्रस्त क्षेत्रों के लिए ईश्वर से शांति, न्याय और मेल-मिलाप की याचना की जाएगी। साथ ही माता मरियम, जिन्हें “शांति की रानी” कहा जाता है, के संरक्षण और मध्यस्थता की प्रार्थना की जाएगी। विश्वासियों का मानना है कि माता मरियम की मध्यस्थता मानवता को ईश्वर के और निकट लाती है तथा कठिन समय में आशा प्रदान करती है।

रोम में उपस्थित तीर्थयात्रियों और श्रद्धालुओं के लिए भी विशेष व्यवस्था की गई है। वे सन्त पेत्रुस महागिरजाघर के प्रांगण में स्थापित विशाल स्क्रीन के माध्यम से इस प्रार्थना में सहभागी बन सकेंगे। इससे हजारों लोग एक साथ इस आध्यात्मिक आयोजन का हिस्सा बनेंगे और विश्व शांति के लिए अपनी प्रार्थनाएं अर्पित करेंगे।

यह कार्यक्रम सुसमाचार प्रचार संबंधी परमधर्मपीठीय परिषद के तत्वावधान में आयोजित किया जा रहा है। इसका उद्देश्य केवल एक धार्मिक समारोह आयोजित करना नहीं, बल्कि विश्व भर के लोगों को शांति, करुणा और भाईचारे के संदेश से जोड़ना है। आज की विभाजित दुनिया में यह पहल हमें याद दिलाती है कि प्रार्थना और एकता के माध्यम से मानवता बेहतर भविष्य की ओर बढ़ सकती है।

सन्त पापा लियो 14वें की यह पहल इस बात का प्रतीक है कि शांति केवल राजनीतिक समझौतों से नहीं, बल्कि मानव हृदयों के परिवर्तन से भी आती है। जब लाखों लोग एक साथ शांति के लिए प्रार्थना करते हैं, तब आशा की एक नई किरण जन्म लेती है। यही संदेश इस विशेष रोजरी माला विनती का भी है—विश्व में शांति स्थापित हो, युद्ध समाप्त हों और समस्त मानवता प्रेम, न्याय तथा भाईचारे के मार्ग पर आगे बढ़े।


आलोक कुमार


World : इतिहास, महत्व और आत्ममंथन का अवसर

 मई माह का अंतिम दिन 30 मई वर्ष के उन विशेष दिनों में से एक है

मई माह का अंतिम दिन 30 मई वर्ष के उन विशेष दिनों में से एक है, जो हमें बीते हुए महीने का मूल्यांकन करने और आने वाले समय के लिए नई ऊर्जा के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। वर्ष का पाँचवाँ महीना मई अपने साथ गर्मी, संघर्ष, परिश्रम और अनेक ऐतिहासिक घटनाओं की स्मृतियाँ लेकर आता है। जब हम 30 मई पर पहुँचते हैं, तब यह केवल एक कैलेंडर की तारीख नहीं रह जाती, बल्कि जीवन के अनेक पहलुओं पर विचार करने का अवसर भी प्रदान करती है।

30 मई का दिन इतिहास में कई महत्वपूर्ण घटनाओं के लिए जाना जाता है। विभिन्न देशों में इस दिन राजनीतिक, सामाजिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों में उल्लेखनीय घटनाएँ घटी हैं। भारत के संदर्भ में भी मई का महीना अनेक ऐतिहासिक आंदोलनों, स्वतंत्रता सेनानियों के योगदान तथा राष्ट्रीय विकास की उपलब्धियों की याद दिलाता है। यह दिन हमें उन महान व्यक्तित्वों को स्मरण करने का अवसर देता है जिन्होंने अपने कार्यों से समाज और राष्ट्र को नई दिशा प्रदान की।

मई का महीना विद्यार्थियों के लिए भी विशेष महत्व रखता है। अधिकांश विद्यालयों और महाविद्यालयों में इस समय ग्रीष्मावकाश प्रारंभ हो जाता है। बच्चे पूरे वर्ष की पढ़ाई के बाद विश्राम, मनोरंजन और नई गतिविधियों के लिए समय निकालते हैं। 30 मई तक पहुँचते-पहुँचते वे अपने अवकाश का आनंद लेते हुए नई कक्षाओं और भविष्य की योजनाओं के लिए भी तैयार होने लगते हैं। यह समय आत्मविकास, पुस्तक-पठन, खेलकूद और पारिवारिक संबंधों को मजबूत करने का भी अवसर देता है।

कृषि प्रधान भारत में मई का अंतिम सप्ताह किसानों के लिए भी महत्वपूर्ण होता है। इस समय वे मानसून के आगमन की प्रतीक्षा करते हैं। खेतों की तैयारी, बीजों का चयन और आगामी खरीफ फसलों की योजना बनाना इसी अवधि में शुरू होता है। 30 मई किसानों के लिए आशा और अपेक्षा का प्रतीक बन जाता है, क्योंकि कुछ ही दिनों बाद वर्षा ऋतु का आगमन होने वाला होता है। प्रकृति भी इस समय एक परिवर्तन के दौर से गुजरती दिखाई देती है।

धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से भी मई का अंतिम दिन महत्वपूर्ण माना जा सकता है। ईसाई परंपरा में मई का महीना माता मरियम को समर्पित होता है। पूरे महीने श्रद्धालु विशेष प्रार्थनाएँ, जपमाला और आराधना के माध्यम से माता मरियम के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं। 30 मई को मरियम माह के समापन की तैयारी होती है और भक्त ईश्वर के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हैं। यह दिन प्रेम, सेवा, विनम्रता और विश्वास के मूल्यों को अपने जीवन में अपनाने की प्रेरणा देता है।

सामाजिक दृष्टि से देखा जाए तो 30 मई हमें यह सोचने का अवसर देता है कि हमने पूरे महीने समाज और परिवार के लिए क्या योगदान दिया। क्या हमने किसी जरूरतमंद की सहायता की? क्या हमने अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन किया? क्या हमने अपने संबंधों को बेहतर बनाने का प्रयास किया? ऐसे प्रश्न व्यक्ति को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करते हैं और जीवन को अधिक सार्थक बनाने में सहायता करते हैं।

पर्यावरण के संदर्भ में भी मई का अंतिम दिन विशेष संदेश देता है। भीषण गर्मी, बढ़ता तापमान और जल संकट हमें प्रकृति के संरक्षण की आवश्यकता का एहसास कराते हैं। जल बचाने, पेड़ लगाने और पर्यावरण संतुलन बनाए रखने के लिए यह समय लोगों को जागरूक करने का उपयुक्त अवसर है। यदि प्रत्येक व्यक्ति प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझे, तो आने वाली पीढ़ियों को एक सुरक्षित और स्वस्थ पर्यावरण प्रदान किया जा सकता है।

आज के आधुनिक युग में समय बहुत तेजी से गुजरता है। ऐसे में 30 मई जैसे दिन हमें ठहरकर यह सोचने का अवसर देते हैं कि हमने अपने लक्ष्यों की दिशा में कितना कार्य किया है। यदि कोई लक्ष्य अधूरा रह गया है तो उसे पूरा करने की नई योजना बनाई जा सकती है। यदि कोई सफलता मिली है तो उसके लिए ईश्वर और अपने सहयोगियों के प्रति आभार व्यक्त किया जा सकता है।

30 मई हमें यह भी सिखाता है कि जीवन में प्रत्येक अंत एक नई शुरुआत का संकेत होता है। मई का समापन जून के आगमन का मार्ग प्रशस्त करता है। उसी प्रकार जीवन में आने वाली चुनौतियाँ और परिवर्तन हमें नए अवसरों की ओर ले जाते हैं। इसलिए हमें निराश होने के बजाय हर अनुभव से सीख लेकर आगे बढ़ना चाहिए।

अंततः, मई माह का अंतिम दिन 30 मई केवल एक तारीख नहीं, बल्कि चिंतन, कृतज्ञता, योजना और नई आशाओं का प्रतीक है। यह दिन हमें अपने अतीत से सीखने, वर्तमान को बेहतर बनाने और भविष्य के लिए सकारात्मक संकल्प लेने की प्रेरणा देता है। यदि हम इस भावना के साथ प्रत्येक महीने का समापन करें, तो हमारा जीवन अधिक अनुशासित, सार्थक और सफल बन सकता है। 30 मई इसी संदेश के साथ हमें आगे बढ़ने का आह्वान करता है कि समय अमूल्य है, इसलिए हर दिन को उद्देश्यपूर्ण और मानवता की सेवा के लिए समर्पित करना चाहिए।

आलोक कुमार

शुक्रवार, 29 मई 2026

India : न्यूनतम पेंशन से जुड़े मामलों में पुराने दस्तावेजों की मांग

वर्ष 1961 का भारत कई मायनों में परिवर्तन और उम्मीदों का दौर था


वर्ष
1961 का भारत कई मायनों में परिवर्तन और उम्मीदों का दौर था। देश के प्रधानमंत्री पंडित Jawaharlal Nehru थे और देश विकास, उद्योग, लोकतंत्र तथा सामाजिक न्याय की नई राह पर आगे बढ़ रहा था। उसी समय हिंदी सिनेमा भी समाज की भावनाओं को बड़े प्रभावशाली तरीके से व्यक्त कर रहा था। इसी दौर में आई थी प्रसिद्ध फिल्म Gunga Jumna, जिसका गीत “ढूंढो ढूंढो रे साजना” आज भी लोगों की जुबान पर है। यह गीत प्रेम और तलाश की भावनाओं को दर्शाता था, लेकिन आज के समय में यही पंक्ति एक अलग दर्द और विडंबना का प्रतीक बन गई है।

आज देश के लाखों बुजुर्ग ईपीएफओ की न्यूनतम पेंशन व्यवस्था से जुड़े संघर्ष में मानो यही गीत गुनगुना रहे हैं — “ढूंढो ढूंढो रे साजना।” फर्क सिर्फ इतना है कि अब वे अपने जीवनसाथी या प्रेम को नहीं, बल्कि 2014 से पहले के पुराने कागजात, वेतन रिकॉर्ड, नियुक्ति पत्र, पीएफ खाते की जानकारियां और सेवा प्रमाणपत्र ढूंढने को मजबूर हैं।

कई पेंशनधारियों का कहना है कि ईपीएफओ द्वारा उच्च पेंशन या न्यूनतम पेंशन से जुड़े मामलों में पुराने दस्तावेजों की मांग की जा रही है। समस्या यह है कि जिन लोगों ने 30-35 वर्ष पहले नौकरी की थी, उनके पास आज सभी कागजात सुरक्षित नहीं हैं। बहुत से कारखाने बंद हो चुके हैं, कंपनियां मालिक बदल चुकी हैं, रिकॉर्ड नष्ट हो गए हैं, और कई संस्थानों का अस्तित्व ही समाप्त हो गया है। ऐसे में 70-75 वर्ष की उम्र में कोई बुजुर्ग आखिर कहां-कहां जाकर पुराने दस्तावेज तलाश करेगा?                                                        

यह स्थिति केवल प्रशासनिक कठिनाई नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं से जुड़ा बड़ा प्रश्न है। जिन्होंने अपनी जवानी देश की फैक्ट्रियों, मिलों, कार्यालयों और उद्योगों में खपा दी, आज वही बुजुर्ग सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने को विवश हैं। कोई बैंक से पुरानी एंट्री निकलवाने की कोशिश कर रहा है, कोई बंद कंपनी के पुराने मालिक का पता खोज रहा है, तो कोई पुराने साथियों से संपर्क कर प्रमाण जुटाने की कोशिश कर रहा है। यह दृश्य देखकर सचमुच लगता है कि जैसे जिंदगी एक फिल्मी गीत की पंक्तियों में बदल गई हो — “ढूंढो ढूंढो रे साजना।”

तकनीकी और डिजिटल भारत के इस युग में सवाल उठता है कि क्या आम नागरिक की दशकों पुरानी जानकारी सुरक्षित रखना केवल नागरिक की जिम्मेदारी है? क्या सरकारी संस्थानों और विभागों की कोई जिम्मेदारी नहीं बनती? जब सरकारें डिजिटलीकरण, आधुनिक डेटा प्रबंधन और ऑनलाइन सेवाओं की बात करती हैं, तब बुजुर्गों से इतने पुराने दस्तावेज मांगना कहीं न कहीं व्यवस्था की कमजोरी को भी उजागर करता है।

वास्तव में, न्यूनतम पेंशन पाने वाले अधिकांश लोग आर्थिक रूप से बेहद साधारण पृष्ठभूमि से आते हैं। उनकी मासिक पेंशन इतनी कम होती है कि दवा, इलाज और घरेलू खर्च चलाना भी कठिन हो जाता है। ऐसे में उनसे बार-बार दस्तावेज लाने की मांग करना मानसिक और शारीरिक दोनों प्रकार की पीड़ा बढ़ा देता है। कई बुजुर्गों के लिए यह प्रक्रिया अपमानजनक और थकाऊ अनुभव बन चुकी है।

यह भी याद रखना चाहिए कि 1961 का भारत और आज का भारत बहुत अलग है। उस समय रिकॉर्ड रखने की व्यवस्था सीमित थी। न डिजिटल स्कैनिंग थी, न ऑनलाइन पोर्टल और न ही क्लाउड स्टोरेज। अधिकांश दस्तावेज कागजों पर आधारित होते थे, जो समय के साथ खराब हो जाना स्वाभाविक है। कई लोगों ने बाढ़, आग, घर बदलने या पारिवारिक संकटों में अपने दस्तावेज खो दिए। ऐसे में उनसे आधी सदी पुराने प्रमाण मांगना व्यावहारिक नहीं लगता।

सरकार और ईपीएफओ को इस विषय पर संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है। जिन लोगों के रिकॉर्ड विभागीय स्तर पर उपलब्ध हैं, उन्हें प्राथमिकता देकर सत्यापन किया जाना चाहिए। जहां दस्तावेज नहीं मिल पा रहे हों, वहां वैकल्पिक प्रमाण, स्वयं घोषणा पत्र या अन्य मानवीय उपाय अपनाए जाने चाहिए। आखिर पेंशन कोई दया नहीं, बल्कि कर्मचारियों की वर्षों की मेहनत और अधिकार का परिणाम है।

समाज को भी इस मुद्दे को गंभीरता से समझना होगा। आज जो बुजुर्ग परेशान हैं, कल वही स्थिति किसी और की भी हो सकती है। बुजुर्गों का सम्मान केवल भाषणों और नारों से नहीं, बल्कि सरल और मानवीय प्रशासनिक व्यवस्था से होता है।

1961 में फिल्मी गीत मनोरंजन और भावनाओं का माध्यम था। लेकिन आज “ढूंढो ढूंढो रे साजना” व्यवस्था की उस विडंबना का प्रतीक बन गया है, जिसमें बुजुर्ग अपनी जिंदगी के अंतिम पड़ाव पर दस्तावेजों की तलाश में भटक रहे हैं। यह समय है कि व्यवस्था उनकी उम्र, संघर्ष और सम्मान को समझे, ताकि उन्हें अपने अधिकार पाने के लिए फिर से “ढूंढो ढूंढो रे साजना” न गाना पड़े।

आलोक कुमार