स्वतंत्रता सेनानी की बदलती परिभाषा और समाज का दायित्व
भारत की स्वतंत्रता का इतिहास त्याग, बलिदान और संघर्ष की अमर गाथाओं से भरा हुआ है। देश की आजादी के लिए असंख्य लोगों ने अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। किसी ने जेल की यातनाएं सहीं, किसी ने अपनी संपत्ति गंवाई और अनेक वीरों ने अपने प्राणों का बलिदान तक दे दिया। ऐसे लोगों को स्वतंत्रता सेनानी के रूप में सम्मानित किया गया। आजादी के बाद भी समाज में स्वतंत्रता सेनानियों का विशेष स्थान बना रहा और उन्हें राष्ट्रनिर्माता के रूप में देखा गया।
समय बीतने के साथ स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े अधिकांश वास्तविक सेनानी इस दुनिया से विदा हो गए। नई पीढ़ी के सामने यह प्रश्न खड़ा होने लगा कि आखिर स्वतंत्रता सेनानी की पहचान क्या है और किस आधार पर किसी व्यक्ति को यह सम्मान दिया जाना चाहिए। इसी प्रश्न ने कई बार सामाजिक और राजनीतिक बहसों को जन्म दिया है।
कुछ वर्ष पूर्व राजधानी पटना से प्रकाशित होने वाली एक मासिक पत्रिका के लिए स्वतंत्रता सेनानियों पर लेख तैयार करने का अवसर मिला। विषय सरल नहीं था क्योंकि नौबतपुर सहित बिहार के अनेक क्षेत्रों में स्वतंत्रता आंदोलन के वास्तविक सेनानी अब जीवित नहीं बचे थे। ऐसे में स्थानीय लोगों से बातचीत के दौरान एक सामाजिक कार्यकर्ता ने जानकारी दी कि नौबतपुर क्षेत्र में एक ऐसे व्यक्ति रहते हैं जिन्हें स्वतंत्रता सेनानी का सम्मान प्राप्त है।
जब उनसे बातचीत की गई तो उन्होंने अपने संघर्ष का उल्लेख करते हुए बताया कि वे उस समय जेल गए थे जब इंदिरा गांधी की गिरफ्तारी के विरोध में देशभर में आंदोलन चल रहा था। उनके अनुसार इसी आंदोलन में भाग लेने और जेल जाने के कारण उन्हें प्रमाणपत्र और सम्मान प्राप्त हुआ। यह सुनकर स्वाभाविक रूप से मन में जिज्ञासा उत्पन्न हुई कि क्या इस प्रकार का संघर्ष स्वतंत्रता आंदोलन की श्रेणी में आता है या यह किसी अन्य प्रकार की राजनीतिक सक्रियता थी।
दरअसल भारत के राजनीतिक इतिहास में वर्ष 1975 से 1977 तक का आपातकाल एक अत्यंत महत्वपूर्ण और विवादास्पद कालखंड माना जाता है। आपातकाल समाप्त होने के बाद जनता पार्टी की सरकार सत्ता में आई। इसके बाद विभिन्न मामलों में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की गिरफ्तारी हुई। उनकी गिरफ्तारी के विरोध में कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने देश के अनेक हिस्सों में प्रदर्शन, धरना और जेल भरो आंदोलन चलाए। हजारों कार्यकर्ता गिरफ्तार हुए और कई दिनों तक राजनीतिक उथल-पुथल का वातावरण बना रहा।
यहीं से एक ऐसी स्थिति पैदा हुई जिसमें जेल जाने का अर्थ अलग-अलग संदर्भों में समझा जाने लगा। एक ओर वे लोग थे जिन्होंने अंग्रेजी शासन के विरुद्ध संघर्ष करते हुए जेल यात्राएं की थीं। दूसरी ओर वे लोग थे जो स्वतंत्र भारत में किसी राजनीतिक आंदोलन या विरोध प्रदर्शन के कारण जेल गए थे। दोनों परिस्थितियों में जेल यात्रा तो समान दिखाई देती है, लेकिन उनके उद्देश्य और ऐतिहासिक महत्व अलग-अलग थे।
स्वतंत्रता सेनानी शब्द का मूल अर्थ उन लोगों से जुड़ा है जिन्होंने 15 अगस्त 1947 से पहले विदेशी शासन के विरुद्ध लड़ाई लड़ी। उनके संघर्ष का उद्देश्य भारत को स्वतंत्र कराना था। इस श्रेणी के लोगों को सरकार द्वारा विभिन्न योजनाओं के माध्यम से सम्मान और सुविधाएं प्रदान की गईं। समाज में भी उन्हें विशेष आदर प्राप्त हुआ क्योंकि उनका योगदान राष्ट्र की स्वतंत्रता से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ा था।
इसके विपरीत स्वतंत्र भारत में विभिन्न राजनीतिक आंदोलनों में भाग लेने वाले लोगों की भूमिका अलग प्रकार की रही है। किसी सरकार के समर्थन या विरोध में आंदोलन करना लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है। ऐसे आंदोलनों में जेल जाना राजनीतिक संघर्ष माना जा सकता है, लेकिन उसे स्वतः स्वतंत्रता संग्राम के समकक्ष नहीं रखा जा सकता। यही कारण है कि समय-समय पर यह बहस होती रही है कि राजनीतिक आंदोलनों में भाग लेने वालों को किस श्रेणी में देखा जाए।
समाज के लिए यह आवश्यक है कि वह इतिहास और राजनीति के बीच स्पष्ट अंतर को समझे। स्वतंत्रता संग्राम का महत्व इसलिए असाधारण है क्योंकि वह पूरे राष्ट्र की आजादी का संघर्ष था। वहीं बाद के राजनीतिक आंदोलनों का उद्देश्य प्रायः किसी नीति, सरकार या राजनीतिक नेतृत्व के पक्ष अथवा विपक्ष में जनमत तैयार करना होता है। दोनों की ऐतिहासिक भूमिका का सम्मान किया जाना चाहिए, किंतु दोनों को एक ही तराजू पर तौलना उचित नहीं होगा।
नौबतपुर जैसे क्षेत्रों में जब स्वतंत्रता सेनानियों की चर्चा होती है तो यह केवल व्यक्तियों की कहानी नहीं होती, बल्कि इतिहास की स्मृतियों को संजोने का प्रयास भी होता है। नई पीढ़ी को यह जानना चाहिए कि आजादी हमें सहज रूप से प्राप्त नहीं हुई थी। इसके पीछे लाखों लोगों का त्याग और संघर्ष छिपा हुआ है। यदि हम स्वतंत्रता सेनानी की अवधारणा को स्पष्ट रूप से नहीं समझेंगे तो आने वाले समय में इतिहास और राजनीति के बीच की रेखाएं धुंधली पड़ सकती हैं।
आज आवश्यकता इस बात की है कि वास्तविक स्वतंत्रता सेनानियों के योगदान को अधिकाधिक प्रचारित किया जाए। विद्यालयों, महाविद्यालयों और सामाजिक संस्थाओं को उनके जीवन संघर्षों पर चर्चा करनी चाहिए। साथ ही लोकतांत्रिक आंदोलनों में भाग लेने वाले लोगों के योगदान को भी उनके वास्तविक संदर्भ में समझना चाहिए। इतिहास का सम्मान तभी संभव है जब हम तथ्यों को उनकी सही पृष्ठभूमि में देखें।
स्वतंत्रता सेनानी केवल एक सरकारी प्रमाणपत्र का नाम नहीं है, बल्कि वह राष्ट्र के प्रति समर्पण, साहस और बलिदान का प्रतीक है। इस सम्मान की गरिमा बनाए रखना समाज और सरकार दोनों की जिम्मेदारी है। जब हम स्वतंत्रता सेनानियों को याद करते हैं तो हमें केवल व्यक्तियों को नहीं, बल्कि उस महान भावना को भी नमन करना चाहिए जिसने भारत को स्वतंत्र राष्ट्र बनने की शक्ति प्रदान की।
आलोक कुमार