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मंगलवार, 25 अगस्त 2026

India : राजनीति में बयानबाज़ी का बढ़ता स्तर और लोकतांत्रिक मर्यादा

 


राजनीति में बयानबाज़ी का बढ़ता स्तर और लोकतांत्रिक मर्यादा

 लोकतंत्र में तीखी आलोचना जरूरी है, लेकिन जब राजनीतिक बहस नीतियों से निकलकर व्यक्तिगत तंज और मेहनतकश लोगों की तुलना तक पहुंच जाए, तो सवाल सिर्फ एक बयान का नहीं रहता। सवाल यह होता है कि देश की राजनीति जनता के मुद्दों पर बहस कर रही है या सुर्खियां बटोरने के लिए भाषा की सीमाएं पार कर रही है।

भारतीय राजनीति में तीखे बयान, राजनीतिक तंज और आरोप-प्रत्यारोप कोई नई बात नहीं हैं। चुनावी राजनीति में नेताओं का एक-दूसरे पर निशाना साधना लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा का हिस्सा है। सत्ता पक्ष विपक्ष की नीतियों पर सवाल उठाता है और विपक्ष सरकार के फैसलों की आलोचना करता है। यही राजनीतिक बहस लोकतंत्र को जीवंत बनाए रखती है।

लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब नीतियों और विचारों की जगह व्यक्तिगत कटाक्ष लेने लगते हैं। भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता संबित पात्रा से जुड़ा कथित बयान कि “गोलगप्पे और सब्जी बेचने वाले भी राहुल गांधी से कहीं ज्यादा समझदार हैं” इसी सवाल को सामने लाता है कि राजनीतिक असहमति की भाषा की मर्यादा आखिर कहां तक होनी चाहिए।

बयान का राजनीतिक संदर्भ समझना भी जरूरी है। भाजपा लंबे समय से कांग्रेस नेता राहुल गांधी की राजनीतिक समझ, उनके वक्तव्यों और नीतिगत दृष्टिकोण पर सवाल उठाती रही है। भाजपा के राजनीतिक विमर्श में राहुल गांधी को कमजोर राजनीतिक विकल्प के तौर पर पेश करना एक स्थापित रणनीति रही है। दूसरी ओर कांग्रेस ऐसे हमलों को व्यक्तिगत राजनीति और जनता से जुड़े वास्तविक सवालों से ध्यान हटाने का प्रयास बताती रही है।

राजनीतिक दलों के बीच यह मतभेद स्वाभाविक है। किसी नेता की राजनीतिक समझ पर सवाल उठाना भी लोकतांत्रिक अधिकार है। लेकिन सवाल यह है कि आलोचना किस भाषा में की जाती है।

गोलगप्पे बेचने वाला या सब्जी बेचने वाला व्यक्ति कोई राजनीतिक मजाक का पात्र नहीं है। वह मेहनत करके अपना परिवार चलाता है। वह सुबह से रात तक बाजार, सड़क, मौसम, महंगाई और ग्राहकों के बदलते व्यवहार से जूझता है। उसके पास शायद राजनीतिक विज्ञान की डिग्री न हो, लेकिन जीवन का अनुभव जरूर होता है।

इसलिए जब किसी मेहनतकश व्यक्ति की तुलना किसी नेता को नीचा दिखाने के लिए की जाती है तो अनजाने में मेहनतकश वर्ग की गरिमा भी राजनीतिक तंज का हिस्सा बन जाती है। किसी नेता की आलोचना करनी है तो उसके फैसलों, बयानों, नीतियों और राजनीतिक प्रदर्शन पर सवाल उठाइए। गरीब या छोटे कारोबारी की रोजी-रोटी को तुलना का हथियार बनाना राजनीतिक बहस को मजबूत नहीं करता।

आज भारतीय राजनीति के सामने असली चुनौती भाषा से कहीं बड़ी है। देश में बेरोजगारी, महंगाई, किसानों की आय, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, आर्थिक असमानता और युवाओं के भविष्य जैसे मुद्दे हैं। बिहार जैसे राज्यों में विकास, पलायन, उद्योग, शिक्षा और रोजगार की समस्याएं लगातार राजनीतिक बहस का हिस्सा बनी हुई हैं।

ऐसे में जनता यह जानना चाहती है कि सरकार रोजगार के कितने अवसर पैदा करेगी। शिक्षा की गुणवत्ता कैसे सुधरेगी? अस्पतालों में डॉक्टर और दवाइयां कब पर्याप्त होंगी? किसानों की आय और लागत का संतुलन कैसे बनेगा? युवाओं को दूसरे राज्यों में रोजगार तलाशने के लिए मजबूर क्यों होना पड़ता है?

इन सवालों के जवाब की जगह अगर राजनीतिक मंचों और टीवी बहसों में नेताओं की व्यक्तिगत टिप्पणियां ज्यादा जगह लेने लगें तो लोकतंत्र का मूल उद्देश्य कमजोर पड़ता है।

राजनीति में व्यंग्य की जगह जरूर है। हास्य और तंज भी राजनीतिक संवाद का हिस्सा हो सकते हैं। विपक्ष की नीतियों पर तीखा हमला भी किया जा सकता है। लेकिन लोकतांत्रिक मर्यादा का अर्थ यह नहीं कि आलोचना समाप्त कर दी जाए। इसका अर्थ यह है कि आलोचना व्यक्ति के अस्तित्व या सामाजिक पहचान पर नहीं, उसके सार्वजनिक कार्य और विचारों पर केंद्रित हो।

राहुल गांधी की राजनीतिक समझ पर सवाल उठाना भाजपा का अधिकार है। उसी तरह कांग्रेस को भाजपा की नीतियों और नेताओं के बयानों पर सवाल उठाने का अधिकार है। लेकिन दोनों पक्षों से जनता यह अपेक्षा करती है कि आरोप के साथ तथ्य भी हों और आलोचना के साथ वैकल्पिक नीति भी हो।

लोकतंत्र में मजबूत विपक्ष जरूरी है और जवाबदेह सरकार भी। लेकिन दोनों की मजबूती केवल भाषणों की तीव्रता से नहीं, बल्कि तर्क की गुणवत्ता से तय होती है।

आज सोशल मीडिया ने राजनीतिक बयानबाजी की गति और प्रभाव दोनों बढ़ा दिए हैं। कुछ सेकंड का बयान मिनटों में वायरल हो जाता है। राजनीतिक दलों के प्रवक्ताओं को इसका फायदा भी मिलता है, लेकिन इसके साथ जिम्मेदारी भी बढ़ती है। एक वायरल बयान लाखों लोगों तक पहुंच सकता है और समाज में राजनीतिक संवाद की भाषा को प्रभावित कर सकता है।

इसलिए राजनीतिक प्रवक्ताओं की भूमिका सिर्फ अपने दल का बचाव करना नहीं होनी चाहिए। उन्हें यह भी सोचना चाहिए कि उनके शब्द लोकतांत्रिक संस्कृति को किस दिशा में ले जा रहे हैं।

क्या राजनीति ऐसी हो जहां हर असहमति को दुश्मनी समझा जाए? या ऐसी हो जहां विरोधी विचार रखने वाला व्यक्ति भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया का जरूरी हिस्सा माना जाए?

यह चुनाव राजनीतिक दलों को करना है।

जनता को भी अपनी भूमिका समझनी होगी। जब हम केवल विवादित बयानों को महत्व देते हैं और नीतिगत बहस को नजरअंदाज कर देते हैं, तब राजनीतिक दलों को भी पता चलता है कि सुर्खियों में आने का सबसे आसान रास्ता मुद्दों पर गंभीर चर्चा नहीं, बल्कि तीखा बयान है।

इस प्रवृत्ति को बदलने के लिए मीडिया, राजनीतिक दल और मतदाता—तीनों को अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी। मीडिया को बयान के सनसनीखेज हिस्से के बजाय उसके तथ्य और संदर्भ पर सवाल करना चाहिए। दलों को अपने प्रवक्ताओं की भाषा को लेकर आचार-संहिता विकसित करनी चाहिए। और मतदाताओं को भी यह तय करना चाहिए कि वे नेताओं से मनोरंजन चाहते हैं या शासन और नीतियों पर जवाब।

आखिर लोकतंत्र में नेता स्थायी नहीं होते, लेकिन संस्थाएं और राजनीतिक संस्कृति लंबे समय तक रहती हैं। आज सत्ता पक्ष किसी विपक्षी नेता पर व्यक्तिगत हमला करेगा, कल वही भाषा उसके खिलाफ भी इस्तेमाल हो सकती है।

इसलिए राजनीतिक मर्यादा किसी एक दल की जरूरत नहीं, बल्कि पूरे लोकतंत्र की जरूरत है।

जनता को नेताओं की जुबानी जंग नहीं, अपने जीवन से जुड़े सवालों के ठोस जवाब चाहिए। रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, महंगाई और विकास पर बहस जितनी मजबूत होगी, लोकतंत्र उतना ही मजबूत होगा।

राजनीति में शब्द हथियार हो सकते हैं, लेकिन उनका इस्तेमाल सोच-समझकर होना चाहिए। व्यक्ति को हराने के लिए अपमान जरूरी नहीं और विरोधी विचार को कमजोर साबित करने के लिए मेहनतकश समाज की गरिमा को राजनीतिक तुलना में घसीटना भी उचित नहीं।

भारतीय लोकतंत्र की असली ताकत यही होगी कि नेता एक-दूसरे को हराने के लिए भाषा को नीचे न गिराएं, बल्कि अपने तर्क, नीतियों और काम को इतना मजबूत बनाएं कि जनता खुद बेहतर विकल्प चुन सके।


आलोक कुमार


Bihar : लावारिस मरीजों के लिए वार्ड नहीं

 


लावारिस मरीजों के लिए वार्ड नहीं, फिर भी गुरमीत सिंह की सेवा जारी

 जिस पीएमसीएच में रोज हजारों मरीज इलाज की उम्मीद लेकर पहुंचते हैं, वहां उन मरीजों का दर्द सबसे बड़ा सवाल बन जाता है जिनके सिरहाने अपना कोई नहीं होता। अलग वार्ड नहीं है, परिवार नहीं है, पहचान नहीं है—लेकिन पटना के गुरमीत सिंह हर रात ऐसे बेसहारा मरीजों के बीच पहुंचकर पूछते हैं, “क्या आपको दर्द हो रहा है?”

पटना मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल यानी पीएमसीएच बिहार की राजधानी का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण सरकारी अस्पताल है। यहां बिहार के अलग-अलग जिलों से मरीज बेहतर इलाज की उम्मीद लेकर आते हैं। किसी के साथ परिवार के कई सदस्य होते हैं तो कोई अकेला बीमारी से जूझता हुआ अस्पताल पहुंचता है। लेकिन इन सबके बीच एक वर्ग ऐसा भी है जिसकी पीड़ा सबसे ज्यादा अनदेखी रह जाती है—लावारिस, बेसहारा और मानसिक रूप से अस्वस्थ मरीज।

इन मरीजों के पास न कोई ऐसा व्यक्ति होता है जो अस्पताल की औपचारिकताएं पूरी कर सके, न दवा खरीदने वाला और न ही बीमारी के दौरान उनके सिरहाने बैठने वाला अपना। ऐसे मरीजों के लिए अस्पताल की व्यवस्था अपने आप में बड़ी चुनौती बन जाती है।

फिलहाल पीएमसीएच में लावारिस मरीजों के लिए अलग से कोई समर्पित वार्ड मौजूद नहीं है। अस्पताल के मेगा पुनर्विकास और निर्माण कार्य के दौरान पुराने लावारिस एवं कैदी वार्ड का भवन भी तोड़ा जा चुका है। ऐसे में इन मरीजों को सामान्य वार्डों या उपलब्ध वैकल्पिक स्थानों पर इलाज दिया जाता है। इससे इलाज के साथ-साथ उनकी निगरानी, पहचान, सुरक्षा और पुनर्वास की प्रक्रिया और जटिल हो जाती है।

यह समस्या केवल अस्पताल के बिस्तर की नहीं है। यह उस व्यवस्था की परीक्षा है जिसमें कोई व्यक्ति बीमार तो है, लेकिन उसके साथ खड़ा होने वाला कोई नहीं है।

यहीं पटना के गुरमीत सिंह की कहानी उम्मीद पैदा करती है।

पिछले दो दशकों से अधिक समय से गुरमीत सिंह बेसहारा मरीजों की सेवा कर रहे हैं। पेशे से कपड़ा कारोबारी गुरमीत सिंह के लिए यह सेवा किसी संस्था का अभियान नहीं, बल्कि जीवन का हिस्सा बन चुकी है। हर रात लगभग नौ बजे चिरैयाटांड़ स्थित अपनी रेडीमेड कपड़ों की दुकान से निकलकर वे पीएमसीएच पहुंचते हैं।

अस्पताल जाने से पहले वे मरीजों के लिए भोजन और जरूरत की दवाइयां लेकर निकलते हैं। अस्पताल पहुंचते ही वे मरीजों की स्थिति जानने की कोशिश करते हैं। उनका पहला सवाल अक्सर यही होता है—“क्या आपको दर्द हो रहा है?”

सवाल छोटा है, लेकिन जिस व्यक्ति के पास बीमारी के बीच अपनी बात सुनाने वाला कोई नहीं है, उसके लिए यह बेहद बड़ा सहारा है।

गुरमीत सिंह अकेले नहीं, बल्कि अपने चार भाइयों के सहयोग से वर्षों से इस सेवा को आगे बढ़ा रहे हैं। उनकी आय का एक हिस्सा जरूरतमंद मरीजों के भोजन और दवाओं पर खर्च होता है। उन्होंने इस काम को किसी अवसर विशेष तक सीमित नहीं रखा। रात-दर-रात अस्पताल पहुंचना और मरीजों की जरूरत पूरी करने की कोशिश करना उनकी नियमित दिनचर्या बन चुकी है।

मरीज उन्हें कई बार भगवान का दर्जा देते हैं। लेकिन गुरमीत सिंह खुद को किसी असाधारण व्यक्ति के रूप में पेश नहीं करते। उनके लिए यह सिर्फ एक इंसान के दूसरे इंसान के प्रति जिम्मेदारी है। उनका मानना है कि यदि किसी व्यक्ति का दर्द थोड़ा कम किया जा सकता है तो ऐसा जरूर किया जाना चाहिए।

उनकी सेवा को वर्ष 2016 में लंदन स्थित संस्था की ओर से ‘वर्ल्ड सिख अवॉर्ड’ की ‘सिख्स इन सेवा’ श्रेणी में सम्मान भी मिला। लेकिन किसी पुरस्कार से ज्यादा महत्वपूर्ण वह भरोसा है जो उन मरीजों के बीच उन्होंने वर्षों में बनाया है जिनके पास अपने नाम के अलावा शायद कुछ भी नहीं है।

गुरमीत सिंह की कहानी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह समाज को दो अलग-अलग तस्वीरें दिखाती है। पहली तस्वीर उस व्यवस्था की है जहां बड़े अस्पताल में आधुनिक सुविधाओं और नए भवनों की जरूरत है, लेकिन बेसहारा मरीजों के लिए समर्पित व्यवस्था अभी भी सवाल बनी हुई है। दूसरी तस्वीर समाज की संवेदना की है, जहां एक व्यक्ति अपनी कमाई और समय का हिस्सा ऐसे लोगों के लिए देता है जिनसे उसका कोई निजी रिश्ता नहीं है।

लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण सवाल भी है—क्या किसी एक व्यक्ति की सेवा को सरकारी व्यवस्था का विकल्प बनाया जा सकता है?

इसका जवाब स्पष्ट रूप से नहीं है।

गुरमीत सिंह जैसे संवेदनशील लोग व्यवस्था की कमी को कुछ हद तक भर सकते हैं, लेकिन स्थायी समाधान सरकार और अस्पताल प्रशासन को ही तैयार करना होगा। पीएमसीएच जैसे बड़े अस्पताल में लावारिस और मानसिक रूप से अस्वस्थ बेघर मरीजों के लिए स्पष्ट प्रोटोकॉल होना चाहिए।

अस्पताल में ऐसे मरीज के पहुंचते ही उसकी पहचान, चिकित्सकीय स्थिति और सामाजिक पृष्ठभूमि का दस्तावेजीकरण हो। पुलिस और सामाजिक कल्याण विभाग के साथ समन्वय हो। संभावित परिजनों की तलाश के लिए प्रभावी तंत्र बनाया जाए। जरूरत पड़ने पर सुरक्षित आश्रय, पुनर्वास केंद्र और संबंधित सामाजिक संस्थाओं से संपर्क कराया जाए।

महिला मरीजों के लिए विशेष सुरक्षा और आश्रय व्यवस्था भी जरूरी है। केवल इलाज कर देना पर्याप्त नहीं है। इलाज के बाद मरीज जाएगा कहां—यह सवाल भी अस्पताल की जिम्मेदारी का हिस्सा होना चाहिए।

पीएमसीएच का वर्तमान पुनर्निर्माण भविष्य की बेहतर स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए हो रहा है। ऐसे में नई व्यवस्था में यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि कोई मरीज केवल इसलिए उपेक्षित न रह जाए क्योंकि उसके साथ कोई रिश्तेदार नहीं है।

अस्पताल की इमारत आधुनिक हो सकती है, मशीनें अत्याधुनिक हो सकती हैं और इलाज की सुविधाएं बढ़ सकती हैं, लेकिन स्वास्थ्य व्यवस्था की असली संवेदनशीलता तब साबित होगी जब वह उस मरीज के लिए भी उतनी ही जिम्मेदार हो जिसके पास अपना कहने वाला कोई नहीं है।

गुरमीत सिंह हर रात यही याद दिलाते हैं कि इंसानियत के लिए बहुत बड़े पद की जरूरत नहीं होती। जरूरत होती है दर्द को पहचानने वाली नजर और मदद के लिए बढ़ने वाले हाथ की।

लेकिन अब समय है कि उनकी सेवा को प्रेरणा मानकर व्यवस्था भी आगे बढ़े। लावारिस मरीजों के लिए अलग वार्ड, पहचान की व्यवस्था, सुरक्षित देखभाल और पुनर्वास की स्पष्ट नीति पीएमसीएच की नई व्यवस्था का हिस्सा बननी चाहिए।

क्योंकि किसी मरीज का परिवार उसके साथ हो या न हो, इलाज के अधिकार के साथ उसकी इंसानी गरिमा हमेशा उसके साथ होनी चाहिए।

आलोक कुमार

सोमवार, 24 अगस्त 2026

Bihar : दुनिया में विद्यार्थियों के लिए तर्कशक्ति, संवाद-कौशल, आत्मविश्वास, आलोचनात्मक चिंतन

  


किताबें ज्ञान देती हैं, लेकिन तर्क, संवाद और आत्मविश्वास उस ज्ञान को आवाज देते हैं। नोट्रे डेम एकेडमी, पटना में आयोजित इंटर-स्कूल ग्रेट डिबेट प्रतियोगिता ने विद्यार्थियों को इसी आवाज को मजबूत करने का मंच दिया।

पटना। आज शिक्षा का अर्थ केवल पाठ्यक्रम पूरा करना और परीक्षा में अच्छे अंक हासिल करना नहीं रह गया है। बदलती दुनिया में विद्यार्थियों के लिए तर्कशक्ति, संवाद-कौशल, आत्मविश्वास, आलोचनात्मक चिंतन और समसामयिक मुद्दों की समझ भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए नोट्रे डेम एकेडमी, पटना ने अपने पेरेंट-टीचर एसोसिएशन (PTA) के सहयोग से इंटर-स्कूल ग्रेट डिबेट इंग्लिश प्रतियोगिता का आयोजन किया।

प्रतियोगिता में 14 प्रमुख विद्यालयों के विद्यार्थियों ने हिस्सा लिया। अलग-अलग विद्यालयों से आए प्रतिभागियों ने अपने विचारों को अंग्रेजी भाषा में प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया और यह दिखाया कि नई पीढ़ी केवल विषयों को पढ़ने तक सीमित नहीं है, बल्कि उन पर विचार करने और तर्क के साथ अपनी बात रखने की क्षमता भी विकसित कर रही है।

प्रतियोगिता को जूनियर और सीनियर—दो श्रेणियों में बांटा गया था। दोनों वर्गों के विषय विद्यार्थियों की उम्र और बौद्धिक स्तर को ध्यान में रखते हुए चुने गए थे। खास बात यह रही कि विषय ऐसे थे जिन पर केवल पक्ष या विपक्ष में बोलना पर्याप्त नहीं था। प्रतिभागियों को अपने तर्क के पीछे कारण, उदाहरण और विचार प्रस्तुत करने पड़े।

एआई के इस्तेमाल पर जूनियर वर्ग में जोरदार बहस

जूनियर वर्ग का विषय था—“स्कूल के असाइनमेंट में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए।”

आज जब एआई शिक्षा का हिस्सा तेजी से बनता जा रहा है, तब इस विषय ने विद्यार्थियों को तकनीक के लाभ और उसकी सीमाओं पर सोचने का अवसर दिया। सवाल यह था कि क्या एआई विद्यार्थियों की सीखने की क्षमता को बढ़ाने वाला उपकरण है या इसके अत्यधिक इस्तेमाल से मौलिक सोच प्रभावित हो सकती है।

विद्यार्थियों ने अपने-अपने पक्ष में तर्क प्रस्तुत किए और यह साबित किया कि कम उम्र में भी वे तकनीक से जुड़े जटिल प्रश्नों पर गंभीरता से सोच सकते हैं।

जूनियर वर्ग में नोट्रे डेम एकेडमी, पटना की अक्षिता सागर को प्रथम सर्वश्रेष्ठ वक्ता चुना गया। सेंट जोसेफ कॉन्वेंट हाई स्कूल की शनाया सिंह ने द्वितीय और नोट्रे डेम एकेडमी, पटना की कनिष्का मित्तल ने तृतीय सर्वश्रेष्ठ वक्ता का पुरस्कार हासिल किया।

वहीं नोट्रे डेम एकेडमी, बाढ़ की आद्या श्री को प्रथम प्रोमिसिंग स्पीकर और सेंट माइकल्स हाई स्कूल के ऑडिटिक एडेन को द्वितीय प्रोमिसिंग स्पीकर चुना गया।

सीनियर वर्ग ने उठाया जीवन कौशल का सवाल

सीनियर वर्ग का विषय था—“जीवन कौशल अकादमिक सफलता से अधिक महत्वपूर्ण हैं।”

यह विषय सीधे विद्यार्थियों के भविष्य और सफलता की पारंपरिक धारणा से जुड़ा था। अच्छे अंक और शैक्षणिक उपलब्धियां महत्वपूर्ण हैं, लेकिन क्या केवल परीक्षा में सफलता ही जीवन में सफलता की गारंटी दे सकती है? निर्णय लेने की क्षमता, संवाद-कौशल, समस्या का समाधान, समय प्रबंधन और परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढालने जैसे जीवन कौशल की भूमिका कितनी बड़ी है?

प्रतिभागियों ने इसी विषय के अलग-अलग पहलुओं को सामने रखा। किसी ने अकादमिक उपलब्धियों के महत्व को रेखांकित किया तो किसी ने जीवन में व्यवहारिक कौशल और मानवीय गुणों को अधिक महत्वपूर्ण बताया।

सीनियर वर्ग में सेंट जोसेफ कॉन्वेंट हाई स्कूल की शनाया सिंह प्रथम सर्वश्रेष्ठ वक्ता रहीं। नोट्रे डेम एकेडमी, पटना की स्नेहा घोष ने द्वितीय और नोट्रे डेम एकेडमी, बाढ़ के हर्ष राज ने तृतीय सर्वश्रेष्ठ वक्ता का पुरस्कार हासिल किया।

नोट्रे डेम एकेडमी, पटना की हर्षिता सिन्हा को प्रथम प्रोमिसिंग स्पीकर और सेंट कैरेंस हाई स्कूल की प्रतीक्षा राज को द्वितीय प्रोमिसिंग स्पीकर का पुरस्कार दिया गया।

नोट्रे डेम एकेडमी ने जीती रनिंग ट्रॉफी

प्रतियोगिता की रनिंग ट्रॉफी नोट्रे डेम एकेडमी, पटना ने अपने नाम की। मेजबान विद्यालय के लिए यह उपलब्धि विशेष गौरव का अवसर रही।

विद्यालय की प्राचार्य सिस्टर मैरी नेहा SND ने सभी प्रतिभागियों को बधाई दी। उन्होंने विद्यार्थियों, शिक्षकों, निर्णायकों, मुख्य अतिथि और कार्यक्रम समन्वयक श्री देवव्रत के प्रयासों की सराहना की।

उन्होंने विद्यार्थियों से संवाद-कौशल और आलोचनात्मक चिंतन को लगातार विकसित करने का आह्वान किया। उनके अनुसार, ऐसी प्रतियोगिताएं विद्यार्थियों को अपनी प्रतिभा सामने रखने के साथ-साथ भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार करती हैं।

निर्णायकों ने परखी प्रतिभा

प्रतियोगिता के निर्णायक मंडल में पटना वीमेंस कॉलेज के सांख्यिकी विभाग की प्रमुख डॉ. मून, पटना साइंस कॉलेज के अंग्रेजी विभागाध्यक्ष डॉ. सोवन चक्रवर्ती तथा मनेर हाई स्कूल की पूर्व प्राचार्य डॉ. शगुफ्ता यासमीन शामिल थीं।

मुख्य अतिथि के रूप में रुबन मेमोरियल हॉस्पिटल के एमडी डॉ. सत्यजीत कुमार सिंह उपस्थित रहे। उन्होंने प्रतियोगिता की सराहना की और आयोजन के लिए सहयोग भी प्रदान किया।

प्रतियोगिता का समन्वय PTA कोषाध्यक्ष श्री देवव्रत ने किया। PTA की पूरी टीम ने आयोजन को सफल बनाने में सहयोग दिया। PTA अध्यक्ष श्रीमती संचिता घोष के साथ श्री संभव गुप्ता, श्रीमती खुशबू चौधरी, श्रीमती श्वेता, श्रीमती सुभुही, श्रीमती चित्रा, मोहम्मद तनवीर, श्री आर.के. झा, मोहम्मद नायर और मोहम्मद मुशीर सहित अन्य सदस्य उपस्थित रहे।

ट्रॉफी से आगे की कहानी

किसी डिबेट प्रतियोगिता को केवल पुरस्कारों और ट्रॉफी के नजरिए से देखना उसके वास्तविक महत्व को छोटा कर देना होगा। मंच पर खड़ा विद्यार्थी जब किसी कठिन विषय पर बोलता है, सामने बैठे लोगों के सवालों और तर्कों का सामना करता है तथा अपने विचारों को व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करता है, तब उसके व्यक्तित्व का निर्माण होता है।

डिबेट विद्यार्थियों को केवल बोलना नहीं सिखाती। यह उन्हें सुनना, असहमति को समझना और दूसरे पक्ष के तर्क का सम्मान करना भी सिखाती है।

आज सोशल मीडिया के दौर में किसी मुद्दे पर तुरंत राय बना लेना आसान है, लेकिन तथ्य समझकर तर्कपूर्ण राय बनाना कठिन। ऐसे समय में स्कूल स्तर की डिबेट प्रतियोगिताएं विद्यार्थियों में विचारों की परिपक्वता विकसित करने का महत्वपूर्ण माध्यम बन सकती हैं।

नोट्रे डेम एकेडमी की यह पहल इसी दृष्टि से उल्लेखनीय है। जूनियर वर्ग में एआई जैसे आधुनिक विषय पर बहस और सीनियर वर्ग में जीवन कौशल जैसे व्यापक विषय पर विचार-विमर्श ने विद्यार्थियों को किताबों से बाहर निकलकर वास्तविक दुनिया के प्रश्नों से जोड़ने का काम किया।

कक्षा की किताबें ज्ञान का आधार बनाती हैं, लेकिन तर्क, संवाद और आत्मविश्वास उस ज्ञान को जीवन से जोड़ते हैं।

यही कारण है कि ऐसी प्रतियोगिताएं केवल एक दिन का कार्यक्रम नहीं होतीं। मंच पर बोले गए कुछ मिनट किसी विद्यार्थी के भीतर वर्षों तक आत्मविश्वास पैदा कर सकते हैं।

और जब शिक्षा विद्यार्थी को केवल परीक्षा के लिए नहीं, बल्कि सवाल पूछने, तर्क करने, असहमति समझने और अपनी बात जिम्मेदारी से रखने के लिए तैयार करती है, तभी शिक्षा वास्तव में जीवन की तैयारी बनती है।


आलोक कुमार

Bihar : सवाल पूछना, जवाब मांगना और व्यवस्था को जवाबदेह बनाना

 


यहां भी होता है... यह जगह होती है... मौका मिलना चाहिए। लेकिन जब मौका मिला तो नतीजा सामने है—पटना प्रेस क्लब!

पत्रकारिता का काम सिर्फ खबर लिखना नहीं है। पत्रकारिता का असली अर्थ है—सवाल पूछना, जवाब मांगना और व्यवस्था को जवाबदेह बनाना। लेकिन जब सवाल अपने ही पेशे की किसी संस्था से जुड़ा हो, तब पत्रकार के सामने सबसे कठिन परीक्षा होती है। पटना प्रेस क्लब का मामला इसी परीक्षा की तरह सामने आता है।

पत्रकार मित्र प्रशांत झा ने मुझे भी पटना प्रेस क्लब की सदस्यता दिलाई थी। उस दौर में बड़ी संख्या में पत्रकारों को सदस्य बनाया गया। सदस्यता के नाम पर पत्रकारों से राशि ली गई। उपलब्ध प्रकाशित रिपोर्टों के मुताबिक छह सौ से अधिक सदस्य बनाए गए थे और सदस्यता शुल्क के रूप में करीब छह लाख रुपये जमा होने की बात सामने आई है।

यहीं से सबसे महत्वपूर्ण सवाल खड़ा होता है—उस पैसे का हिसाब कहां है?

जिस प्रेस क्लब की कल्पना पत्रकारों के लिए एक साझा मंच के रूप में की गई थी, वह पत्रकारों को संवाद, बैठक, कार्यक्रम और पेशेवर गतिविधियों के लिए एक स्थायी जगह उपलब्ध करा सकता था। लेकिन क्लब की औपचारिक शुरुआत से पहले ही विवाद, अंदरूनी खींचतान और पद-प्रतिष्ठा की राजनीति ने पूरे प्रयास को कमजोर कर दिया।

एक संस्था का निर्माण केवल भवन, कमरे या फर्नीचर से नहीं होता। संस्था विश्वास से बनती है। और पत्रकारों ने सदस्यता शुल्क देकर उसी विश्वास में अपना योगदान दिया था।

अगर क्लब नहीं चल सका तो सवाल यह नहीं है कि राजनीति किसने की और किसे पद मिला। सबसे पहले सवाल यह है कि सदस्यों से लिया गया पैसा कहां गया?

किस बैंक खाते में रकम जमा हुई?

कुल कितनी राशि जमा हुई?

किसके पास उस राशि की जिम्मेदारी थी?

उसमें से कितना पैसा खर्च हुआ?

किस मद में खर्च हुआ?

किसने खर्च की अनुमति दी?

आज उस खाते में कितनी राशि उपलब्ध है?

ये ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब किसी आरोप या प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि दस्तावेजों से मिलना चाहिए।

पत्रकारों की रकम कोई मामूली बात नहीं

एक पत्रकार की कमाई अक्सर बहुत बड़ी नहीं होती। फिर भी जब पत्रकार किसी संस्था के लिए सदस्यता शुल्क देता है तो वह उम्मीद करता है कि उसका पैसा उसी संस्था के उद्देश्य पर खर्च होगा।

अगर छह सौ से अधिक पत्रकारों से लगभग छह लाख रुपये जमा हुए थे, तो प्रत्येक रुपये का हिसाब सार्वजनिक होना चाहिए। रकम कम हो या ज्यादा, सवाल पारदर्शिता का है।

अगर तत्कालीन पदाधिकारी यह कहते हैं कि पैसा नियमों के अनुसार खर्च हुआ, तो खर्च का विवरण सामने रखा जाना चाहिए। अगर राशि अभी भी सुरक्षित है, तो खाते और वर्तमान स्थिति की जानकारी दी जानी चाहिए। और यदि क्लब उस उद्देश्य से संचालित नहीं हो सका जिसके लिए सदस्यता ली गई थी, तो सदस्यों की राशि वापसी पर भी विचार होना चाहिए।

सवाल उठाना आरोप लगाना नहीं है। सवाल का जवाब मांगना जवाबदेही मांगना है।

भवन किसके लिए था?

सरकार की ओर से पत्रकारों के लिए प्रेस क्लब जैसी व्यवस्था खड़ी करने का उद्देश्य यही होना चाहिए कि पत्रकारों को अपनी गतिविधियों के लिए एक स्वतंत्र और सुविधाजनक मंच मिले।

लेकिन अगर भवन या जमीन उपलब्ध होने के बावजूद संस्था सक्रिय नहीं हो पाती, तो यह केवल पत्रकारों की विफलता नहीं है। यह संस्थागत व्यवस्था की भी विफलता है।

बिहार के दूसरे हिस्सों में भी प्रेस क्लब भवनों के निर्माण और उनके उपयोग को लेकर सवाल उठते रहे हैं। बिहारशरीफ के प्रेस क्लब भवन के लंबे समय तक बंद रहने की खबरें इसी बड़े सवाल की ओर इशारा करती हैं—भवन बनाना आसान है, संस्था चलाना कठिन।

पटना में तो सवाल और भी गंभीर है।

भवन किसके लिए था—पत्रकारों के लिए या पद और प्रभाव की राजनीति के लिए?

सदस्यता किसलिए ली गई थी—पत्रकारों को सुविधा देने के लिए या सिर्फ सदस्य संख्या बढ़ाने के लिए?

और सबसे बड़ा सवाल—

पत्रकारों के पैसे का हिसाब कौन देगा?

सरकार भी अपनी जिम्मेदारी स्पष्ट करे

मामला केवल क्लब के तत्कालीन पदाधिकारियों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। सरकार से भी सवाल पूछा जाना चाहिए कि पत्रकारों के लिए उपलब्ध कराई गई जमीन, भवन या अन्य संसाधनों की वर्तमान स्थिति क्या है।

क्या वह संपत्ति अभी भी पत्रकारों के हित में उपयोग हो रही है?

अगर नहीं, तो उसके उपयोग में क्या बाधा है?

क्या क्लब का कोई वैधानिक या पंजीकृत ढांचा था?

सदस्यता राशि का लेखा-जोखा किस संस्था या व्यक्ति के पास था?

क्या कभी इसका ऑडिट हुआ?

अगर नहीं हुआ तो क्यों नहीं?

इन सवालों के जवाब सामने आने चाहिए।

यह भी जरूरी है कि इस पूरे मामले को व्यक्तिगत आरोपों की लड़ाई न बनाया जाए। किसी व्यक्ति पर बिना दस्तावेज आरोप लगाना उचित नहीं होगा। लेकिन सार्वजनिक संस्था, पत्रकारों की सदस्यता और उनसे ली गई रकम के मामले में पारदर्शिता की मांग पूरी तरह जायज है।

पत्रकार दूसरों से सवाल पूछता है

पत्रकार हर दिन नेताओं से पूछता है—पैसा कहां खर्च हुआ?

सरकार से पूछता है—योजना का लाभ किसे मिला?

अधिकारी से पूछता है—फाइल क्यों रुकी?

संस्था से पूछता है—चंदे का हिसाब कहां है?

तो फिर जब सवाल पत्रकारों की अपनी संस्था से जुड़ता है, तब वही कसौटी क्यों नहीं लागू होनी चाहिए?

पत्रकारिता की विश्वसनीयता केवल दूसरों की जवाबदेही से नहीं, अपनी जवाबदेही से भी बनती है।

अगर पटना प्रेस क्लब का सपना टूट गया तो उसकी समीक्षा होनी चाहिए। अगर आपसी राजनीति के कारण संस्था आगे नहीं बढ़ सकी तो उस अनुभव से सीखना चाहिए। लेकिन पत्रकारों से जमा की गई रकम का हिसाब उससे अलग और प्राथमिक सवाल है।

क्लब नहीं चला—कोई बात नहीं।

क्लब की राजनीति नहीं चली—यह भी मान लिया।

व्यवस्था विफल हुई—उसकी भी समीक्षा हो सकती है।

लेकिन पत्रकारों की जमा पूंजी का क्या हुआ?

यही वह सवाल है जिसे किसी शटर के पीछे बंद नहीं किया जा सकता।

जरूरत है कि सदस्यता राशि, बैंक खाते, खर्च और वर्तमान वित्तीय स्थिति का पूरा विवरण सार्वजनिक किया जाए। यदि रकम लौटाने योग्य है तो सदस्यों को लौटाने की प्रक्रिया तय हो। यदि किसी वैध खर्च का दावा है तो उसका दस्तावेज सामने आए।

क्योंकि प्रेस क्लब किसी व्यक्ति, पद या गुट की संपत्ति नहीं होता। वह पत्रकार समुदाय के भरोसे से बनता है।

और भरोसे की सबसे पहली शर्त है—हिसाब।

इसलिए मांग सीधी है—

क्लब का हिसाब दीजिए।

सदस्यता राशि का हिसाब दीजिए।

भवन और संसाधनों की वर्तमान स्थिति बताइए।

और अगर दस्तावेज यह साबित करते हैं कि पत्रकारों की रकम वापस की जानी चाहिए, तो—

पत्रकारों की रकम लौटाइए।

क्योंकि प्रेस क्लब का शटर बंद हो सकता है, लेकिन पत्रकारों के सवालों पर शटर नहीं लगाया जा सकता।


आलोक कुमार

रविवार, 23 अगस्त 2026

India : चीनी का भाव बाजार तय करता है तो सरकार किस काम की?

 


महंगाई जब रसोई तक पहुंचती है तो उसके साथ जनता का सवाल भी पहुंचता है—सरकार आखिर किसलिए है? पेट्रोल-डीजल महंगा हो, सब्जियों के दाम बढ़ें, दाल की कीमतें आसमान छुएं या चीनी की मिठास जेब के लिए कड़वी हो जाए, आम आदमी की नजर सरकार की ओर ही जाती है। ऐसे में अगर जवाब मिले कि कीमतें बाजार तय करता है और सरकार की कोई भूमिका नहीं है, तो सवाल सिर्फ चीनी का नहीं, सरकार की जवाबदेही का बन जाता है।

चीनी के बढ़ते दामों को लेकर भाजपा सांसद और प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी का कथित बयान इसी सवाल को जन्म देता है। यदि उनका तर्क यही है कि चीनी की कीमत बाजार तय करता है और सरकार की इसमें कोई भूमिका नहीं है, तो यह जवाब सिर्फ एक वस्तु की कीमत का नहीं, बल्कि शासन की आर्थिक जिम्मेदारी का सवाल भी बन जाता है।

विडंबना देखिए। जब नागरिकों को प्रभावित करने वाली संस्थाओं और व्यवस्थाओं की बात आती है तो सत्ता पक्ष अक्सर मजबूत और निर्णायक सरकार की तस्वीर पेश करता है। लेकिन जैसे ही महंगाई का सवाल सामने आता है, जिम्मेदारी बाजार के सिर डाल दी जाती है। तब सवाल उठना स्वाभाविक है—सरकार का नियंत्रण जहां जरूरी है, वहां बाजार स्वतंत्र और जहां राजनीतिक सुविधा हो, वहां सरकार निर्णायक कैसे?

बाजार निश्चित रूप से कीमतों को प्रभावित करता है। मांग और आपूर्ति अर्थव्यवस्था के बुनियादी सिद्धांत हैं। लेकिन खाद्य पदार्थों की कीमतें केवल बाजार की अदृश्य ताकतों से तय नहीं होतीं। उत्पादन, भंडारण, आयात-निर्यात, कर व्यवस्था, स्टॉक सीमा, जमाखोरी पर कार्रवाई और आपूर्ति व्यवस्था जैसे कई कारक कीमतों को प्रभावित करते हैं।

चीनी इसका बड़ा उदाहरण है।

अगर सरकार की चीनी की कीमत में कोई भूमिका ही नहीं है तो फिर उत्पादन और उपलब्धता को लेकर सरकारी फैसले क्यों होते हैं? स्टॉक सीमा क्यों लगाई जाती है? जमाखोरी रोकने के लिए प्रशासनिक कार्रवाई क्यों होती है? जरूरत पड़ने पर आयात नीति क्यों बदली जाती है? सरकार चीनी उद्योग के लिए अलग-अलग नीतिगत फैसले क्यों लेती है?

सवाल सिर्फ चीनी के एक किलो पैकेट का नहीं है। सवाल उस सोच का है जिसमें मुनाफा निजी क्षेत्र का हो तो बाजार की स्वतंत्रता और संकट पैदा हो तो समाधान के लिए सरकार से उम्मीद की जाती है।

जनता सरकार से यह नहीं कहती कि वह हर दुकान पर खड़े होकर चीनी का भाव तय करे। जनता की अपेक्षा इतनी है कि आवश्यक वस्तुओं की कीमतें उसकी पहुंच से बाहर न हों। अगर बाजार में किसी वस्तु की कीमत असामान्य रूप से बढ़ रही है तो सरकार को उसके कारण तलाशने चाहिए।

उत्पादन कम है तो उत्पादन बढ़ाने की नीति बने। आपूर्ति बाधित है तो रास्ता साफ किया जाए। जमाखोरी है तो कार्रवाई हो। आयात जरूरी है तो समय पर फैसला लिया जाए। किसानों और उपभोक्ताओं के हितों के बीच संतुलन बनाया जाए।

यही सरकार की भूमिका है।

सरकार का काम केवल कीमत लिख देना नहीं, बल्कि ऐसा आर्थिक वातावरण तैयार करना है जिसमें बाजार जनता के खिलाफ न खड़ा हो जाए।

यहां एक और महत्वपूर्ण सवाल सामने आता है। जब सरकार कई बार कीमतों को नियंत्रित करने के लिए नीतिगत हस्तक्षेप करती है, तब यह कहना कि बाजार कीमत तय करता है और सरकार की कोई भूमिका नहीं है, अधूरा तर्क लगता है। अगर सरकार बाजार में किसी भी तरह का हस्तक्षेप नहीं करेगी तो संकट की घड़ी में राहत कौन देगा?

किसान को उसकी उपज का उचित मूल्य चाहिए। उपभोक्ता को सस्ती वस्तु चाहिए। चीनी मिल को आर्थिक रूप से टिकाऊ कीमत चाहिए। व्यापारी को कारोबार चाहिए। सरकार का काम इन सभी हितों के बीच संतुलन बनाना है। केवल यह कह देना कि बाजार तय करेगा, शासन की जिम्मेदारी से मुक्ति का रास्ता नहीं हो सकता।

राजनीतिक प्रवक्ताओं की भी बड़ी जिम्मेदारी होती है। वे सिर्फ अपनी पार्टी का बचाव नहीं करते, बल्कि जनता के सामने सरकार की नीतियों और फैसलों का पक्ष रखते हैं। इसलिए जब महंगाई पर सवाल पूछा जाए तो जवाब ऐसा होना चाहिए जो जनता की चिंता को समझाए, न कि सवाल को ही बाजार के हवाले कर दे।

आज चीनी महंगी है तो कल कोई दूसरी जरूरी वस्तु महंगी हो सकती है। अगर हर बार जवाब यही होगा कि बाजार कीमत तय करता है, तो फिर जनता सरकार से किस चीज की उम्मीद करे?

सरकार बाजार को नियंत्रित करने वाली संस्था भले न हो, लेकिन वह बाजार के लिए नियम बनाने वाली संस्था जरूर है। वह कर नीति तय करती है, आयात-निर्यात नीति बनाती है, जमाखोरी के खिलाफ कार्रवाई करती है, उपभोक्ता हितों की रक्षा करती है और जरूरत पड़ने पर हस्तक्षेप भी करती है।

इसलिए ज्यादा सटीक बात यह होगी कि कीमत बाजार में बनती है, लेकिन बाजार का माहौल सरकार की नीतियों से बनता है।

यही वह बिंदु है जहां राजनीतिक बचाव और शासन की जवाबदेही के बीच अंतर दिखाई देता है।

जनता को भाषण नहीं चाहिए। जनता को चीनी चाहिए—वह भी ऐसी कीमत पर जिसे खरीदते समय घर का बजट न बिगड़े।

सत्ता पक्ष के नेताओं को यह समझना होगा कि महंगाई का सवाल विपक्ष का राजनीतिक हथियार भर नहीं है। यह रसोई का सवाल है। यह मध्यम वर्ग की चिंता है। यह गरीब परिवार के मासिक बजट का सवाल है। जब किसी जरूरी वस्तु की कीमत बढ़ती है तो उसका असर सिर्फ बाजार पर नहीं, परिवार की थाली और पूरे घरेलू बजट पर पड़ता है।

इसलिए सवाल सुधांशु त्रिवेदी के कथित बयान से आगे बढ़कर सरकार से पूछा जाना चाहिए—

अगर चीनी का भाव बाजार तय करता है, तो सरकार बाजार को जवाबदेह बनाने के लिए क्या कर रही है?

अगर सरकार की कोई भूमिका नहीं है, तो फिर महंगाई के समय जनता सरकार से राहत की उम्मीद क्यों न करे?

और सबसे बड़ा सवाल—

अगर सरकार दूसरे क्षेत्रों में मजबूत और निर्णायक भूमिका का दावा करती है, लेकिन चीनी के भाव पर आते ही कहती है कि बाजार स्वतंत्र है, तो जनता आखिर किस बात के लिए सरकार चुने?

लोकतंत्र में सरकार का मतलब हर वस्तु की कीमत खुद तय करना नहीं है। लेकिन सरकार का मतलब जनता को बाजार की मनमानी के भरोसे छोड़ देना भी नहीं है।

सरकार की असली परीक्षा यही है कि वह बाजार की स्वतंत्रता और जनता के हित के बीच संतुलन कैसे बनाती है। बाजार में प्रतिस्पर्धा जरूरी है, लेकिन उपभोक्ता संरक्षण भी उतना ही जरूरी है। उद्योग की आर्थिक सेहत महत्वपूर्ण है, लेकिन परिवार की रसोई भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

चीनी का स्वाद मीठा होता है। लेकिन महंगाई पर दिया गया ऐसा राजनीतिक बचाव जनता के लिए बेहद कड़वा साबित हो सकता है।

बाजार भाव तय कर सकता है, लेकिन बाजार को संतुलित रखने और जनता के हितों की रक्षा करने की जवाबदेही सरकार की ही होती है।


आलोक कुमार

MP: तड़का लगाते-लगाते नर्सिंग की पढ़ाई भी खत्म हो जाए, आरती का रिजल्ट कब आएगा?

तड़का लगाते-लगाते नर्सिंग की पढ़ाई भी खत्म हो जाए, आरती का रिजल्ट कब आएगा?


“दाल में तड़का न लगे तो स्वाद अधूरा लगता है, लेकिन नर्सिंग की पढ़ाई में अगर सालों तक रिजल्ट का तड़का ही न लगे तो भविष्य अधूरा रह जाता है।” मध्यप्रदेश के छोटे से जिले निवाड़ी की नर्सिंग छात्रा आरती कुशवाहा की कहानी आज इसी सवाल के सामने खड़ी है। फर्क इतना है कि रसोई में तड़का कुछ सेकंड में लग जाता है, लेकिन आरती की नर्सिंग पढ़ाई में छह साल से इंतजार का तड़का पड़ रहा है—और वह भी ऐसा, जिसमें स्वाद की जगह सिर्फ बेचैनी, निराशा और सवाल हैं।

आरती ने वर्ष 2020 में बीएससी नर्सिंग में दाखिला लिया था। तब शायद उसके मन में यही सपना रहा होगा कि कुछ वर्षों की मेहनत के बाद डिग्री हाथ में होगी, नौकरी का रास्ता खुलेगा और वह अपने पैरों पर खड़ी होगी। लेकिन वर्ष 2020 से 2026 आ गया। छह साल गुजर गए। पढ़ाई तीसरे वर्ष तक पहुंची और तीसरे वर्ष की परीक्षा का परिणाम भी अब तक सामने नहीं आया।

आरती के मुताबिक, तीसरे वर्ष की परीक्षा इसी वर्ष जनवरी में हुई थी। जनवरी से अगस्त आ गया, लेकिन रिजल्ट का कहीं अता-पता नहीं है। यानी जिस परीक्षा का परिणाम कुछ समय बाद छात्र-छात्राओं के भविष्य का रास्ता खोलना चाहिए था, वही परिणाम अब उनके भविष्य पर ताला लगाए बैठा है।

और आरती की पीड़ा सिर्फ परीक्षा परिणाम तक सीमित नहीं है। इस बीच उसकी शादी हो गई। शादी के बाद बच्चा भी हो गया। जिम्मेदारियां बढ़ गईं, लेकिन बीएससी नर्सिंग की पढ़ाई वहीं की वहीं खड़ी है। इसलिए आरती का यह सवाल व्यवस्था के सामने आईना बनकर खड़ा होता है—“नर्सिंग करते-करते शादी हो गई, बच्चा भी हो गया। अब क्या बूढ़े हो जाएंगे, तब आएगा रिजल्ट?”

यह सिर्फ एक छात्रा की नाराजगी नहीं है। यह उस शिक्षा व्यवस्था पर सवाल है, जिसमें विद्यार्थी परीक्षा देता है, फीस देता है, वर्षों तक पढ़ाई करता है, लेकिन परिणाम के लिए उसे महीनों तक इंतजार करना पड़ता है। छात्र के लिए परीक्षा का परिणाम सिर्फ एक कागज नहीं होता। वह अगली कक्षा में प्रवेश, डिग्री, नौकरी और प्रतियोगी परीक्षाओं में आगे बढ़ने की चाबी होता है।

आरती ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से वीडियो के माध्यम से गुहार लगाई है कि उनका रिजल्ट जल्द अपलोड कराया जाए। उन्होंने केंद्र और मध्यप्रदेश सरकार से भी हस्तक्षेप की अपील की है। आरती दतिया के एसआरआई नर्सिंग कॉलेज से बीएससी नर्सिंग कर रही हैं, जो उनके अनुसार जबलपुर विश्वविद्यालय से संबद्ध है।

आरती की बातों में गुस्सा भी है और बेबसी भी। वह पूछती हैं कि आखिर वह पूरी जिंदगी बीएससी नर्सिंग करते हुए ही निकाल दें क्या? छह-सात साल में अगर पढ़ाई तीसरे वर्ष तक पहुंची है और उसका भी रिजल्ट नहीं आया, तो चौथा वर्ष पूरा होने में कितना समय लगेगा—इसका जवाब कौन देगा?

यह सवाल सिर्फ आरती का नहीं होना चाहिए। अगर किसी विश्वविद्यालय या संबंधित व्यवस्था में परीक्षा परिणाम जारी करने में असामान्य देरी हो रही है तो उसकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। छात्र को यह बताना जरूरी है कि रिजल्ट कब आएगा, अगली परीक्षा कब होगी और पूरी डिग्री कब तक पूरी होगी। “जल्द आएगा” जैसी सरकारी भाषा से छात्र का भविष्य नहीं चलता।

आरती ने अपनी स्थिति बताते हुए कहा कि वह अब गृहिणी हैं। घर और बच्चे की जिम्मेदारी संभालने के साथ उन्हें अपनी पढ़ाई के लिए समय निकालना पड़ता है। ऐसे में वर्षों तक परीक्षा और रिजल्ट का इंतजार करना किसी मानसिक परीक्षा से कम नहीं है।

सबसे चुभने वाली बात तब सामने आती है जब आरती नीट छात्रों के आंदोलन का उदाहरण देती हैं। उनका कहना है कि नीट के छात्रों के लिए जंतर-मंतर तक लोग खड़े हो गए, लेकिन वह अकेले वहां जाकर प्रदर्शन कैसे करें? उनकी बात में एक बड़ा सामाजिक सवाल छिपा है—क्या छोटे पाठ्यक्रम, छोटे शहरों और कम सुर्खियों वाले विद्यार्थियों की समस्याएं कम महत्वपूर्ण हैं?

नर्सिंग कोई मामूली शिक्षा नहीं है। अस्पतालों में डॉक्टरों के साथ मरीजों की देखभाल की सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी नर्सिंग स्टाफ निभाता है। कोरोना महामारी से लेकर सामान्य स्वास्थ्य सेवाओं तक नर्सिंग कर्मियों की भूमिका किसी से छिपी नहीं है। जब देश को प्रशिक्षित नर्सिंग कर्मियों की जरूरत है, तब नर्सिंग छात्रों की पढ़ाई और परीक्षा परिणाम में अनावश्यक देरी आखिर किसके हित में है?

आरती की आवाज में इसलिए सिर्फ एक छात्रा की शिकायत नहीं, बल्कि हजारों नर्सिंग विद्यार्थियों की संभावित पीड़ा सुनाई देती है। उन्होंने खुद कहा है कि नर्सिंग में बहुत से छात्र-छात्राएं रिजल्ट के लिए परेशान हैं। डिग्री नहीं होने के कारण वह दूसरी परीक्षाओं में भी शामिल नहीं हो पा रही हैं।

यही सबसे गंभीर समस्या है। एक रिजल्ट की देरी कई दूसरे अवसरों को रोक देती है। सरकारी नौकरी की परीक्षा छूट सकती है, निजी नौकरी का अवसर हाथ से जा सकता है, आगे की पढ़ाई रुक सकती है और उम्र बढ़ने के साथ प्रतियोगी परीक्षाओं की संभावनाएं भी सीमित होती जाती हैं।

अब जरूरत किसी राजनीतिक बयान की नहीं, नतीजे की है। सरकार, विश्वविद्यालय और संबंधित नर्सिंग संस्थान को यह स्पष्ट करना चाहिए कि जनवरी में हुई परीक्षा का परिणाम अगस्त तक क्यों लंबित है। अगर तकनीकी, प्रशासनिक या विश्वविद्यालय स्तर पर कोई समस्या है तो उसे तत्काल दूर किया जाए।

आरती ने प्रधानमंत्री से अपील की है—“मोदीजी कुछ ऐसा करें कि मेरा रिजल्ट जल्दी आ जाए और जल्द एग्जाम हो।” यह अपील भले ही एक छात्रा की हो, लेकिन इसका जवाब व्यवस्था को देना चाहिए।

आखिर तड़का सिर्फ दाल में ही क्यों लगे? कभी-कभी व्यवस्था में भी जवाबदेही का तड़का जरूरी होता है। आरती को आश्वासन नहीं, परिणाम चाहिए। उन्हें भाषण नहीं, डिग्री की ओर बढ़ने का रास्ता चाहिए। और नर्सिंग के उन तमाम विद्यार्थियों को भी यही भरोसा चाहिए कि उनकी मेहनत सरकारी फाइलों में कहीं अटककर उम्र भर का इंतजार नहीं बन जाएगी।

आरती का सवाल सीधा है—“रिजल्ट कब आएगा?” अब जिम्मेदारों का जवाब भी उतना ही सीधा होना चाहिए।


आलोक कुमार



शनिवार, 22 अगस्त 2026

Bihar : स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड: कर्ज की सीमा नहीं, सपनों की उड़ान बचाइए

 


स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड: कर्ज की सीमा नहीं, सपनों की उड़ान बचाइए

जिस योजना का मकसद गरीब बिहार के बच्चों को यह भरोसा देना था कि पैसे की कमी उनके सपनों की सबसे बड़ी दीवार नहीं बनेगी, आज वही योजना सवालों के घेरे में है। सवाल सिर्फ ₹4 लाख से ₹2 लाख का नहीं है। सवाल यह है कि बिहार का गरीब और मध्यमवर्गीय विद्यार्थी आखिर अपनी उच्च शिक्षा का खर्च कैसे उठाएगा?

बिहार में शिक्षा और रोजगार की चर्चा जब भी होती है, एक सवाल सबसे पहले सामने आता है—क्या आर्थिक रूप से कमजोर परिवार का बच्चा भी इंजीनियर, डॉक्टर, मैनेजर या किसी दूसरे पेशेवर पाठ्यक्रम की पढ़ाई कर सकता है? इसी सवाल का जवाब देने के उद्देश्य से बिहार सरकार ने बिहार स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड योजना की शुरुआत की थी। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सरकार ने इसे अपने विकास एजेंडे ‘आर्थिक हल, युवाओं को बल’ के तहत लागू किया और सात निश्चय कार्यक्रम का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया।

2 अक्टूबर 2016, गांधी जयंती के दिन शुरू हुई इस योजना ने उन विद्यार्थियों के लिए उम्मीद पैदा की, जिनके सामने प्रतिभा तो थी, लेकिन आर्थिक संसाधन नहीं थे। 12वीं पास विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा के लिए अधिकतम ₹4 लाख तक शिक्षा ऋण उपलब्ध कराने की व्यवस्था का उद्देश्य यही था कि पैसे के अभाव में कोई विद्यार्थी अपनी पढ़ाई न छोड़े। जिला निबंधन एवं परामर्श केंद्र यानी DRCC के माध्यम से संचालित यह योजना बिहार के शिक्षा मॉडल में एक महत्वपूर्ण प्रयोग मानी गई।

लेकिन सत्र 2026-27 में व्यवस्था में बदलाव के बाद एक नया विवाद खड़ा हो गया है। विद्यार्थियों और विपक्षी दलों का आरोप है कि स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड के तहत मिलने वाले शिक्षा ऋण की सीमा ₹4 लाख से घटाकर ₹2 लाख कर दी गई है। अगर वास्तव में ऐसा होता, तो यह फैसला निश्चित रूप से गरीब विद्यार्थियों के भविष्य पर गंभीर असर डाल सकता था।

क्योंकि आज उच्च शिक्षा की वास्तविक लागत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इंजीनियरिंग, मेडिकल, मैनेजमेंट, तकनीकी और दूसरे व्यावसायिक पाठ्यक्रमों की फीस के साथ हॉस्टल, भोजन, किताबें, लैपटॉप, परिवहन और अन्य खर्च जुड़ते हैं। ऐसे में ₹2 लाख की राशि कई पाठ्यक्रमों के लिए पर्याप्त नहीं हो सकती।

गरीब परिवार का विद्यार्थी जब उच्च शिक्षा के लिए घर से बाहर निकलता है तो उसके सामने केवल कॉलेज की फीस नहीं होती। उसे रहने और खाने का खर्च भी उठाना पड़ता है। परिवार पहले से आर्थिक दबाव में हो तो अतिरिक्त ऋण लेना आसान नहीं होता। बैंकिंग प्रक्रिया, दस्तावेज और ब्याज की चिंता अलग होती है।

यही कारण है कि छात्रों के बीच यह आशंका पैदा होना स्वाभाविक है कि कहीं आर्थिक कठिनाई उनकी पढ़ाई के रास्ते में फिर से बाधा न बन जाए। शिक्षा का अधिकार केवल स्कूल तक सीमित नहीं होना चाहिए। यदि सरकार उच्च शिक्षा को सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन का माध्यम मानती है तो उसे यह सुनिश्चित करना होगा कि गरीब विद्यार्थी बीच रास्ते में आर्थिक संकट के कारण कॉलेज छोड़ने को मजबूर न हो।

हालांकि विवाद के बीच बिहार सरकार के शिक्षा विभाग ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा है कि कुल ऋण राशि में कटौती नहीं की गई है। सरकार के अनुसार ₹2 लाख तक का ऋण पहले की तरह बिहार राज्य शिक्षा वित्त निगम के माध्यम से लिया जा सकेगा। वहीं ₹2 लाख से ₹4 लाख तक की अतिरिक्त राशि के लिए विद्यार्थियों को केंद्र सरकार के PM-Vidyalaxmi Portal के माध्यम से वाणिज्यिक बैंकों में आवेदन करना होगा।

सरकार का यह भी कहना है कि नियमित रूप से किस्त चुकाने वाले विद्यार्थियों को बैंक से लिए गए ऋण पर ब्याज में 30 प्रतिशत तक की सब्सिडी दी जाएगी। सरकार की दलील है कि नई व्यवस्था में बैंकों को शामिल करने से योजना का दायरा बढ़ेगा और ज्यादा विद्यार्थियों को वित्तीय सहायता मिल सकेगी।

यहीं से असली सवाल पैदा होता है—योजना का विस्तार कागज पर हो रहा है या विद्यार्थी के लिए वास्तव में सुविधा बढ़ रही है?

सरकार अगर कहती है कि ₹4 लाख की सुविधा बरकरार है तो उसे विद्यार्थियों के सामने पूरी प्रक्रिया बेहद सरल और पारदर्शी तरीके से रखनी चाहिए। कितने विद्यार्थियों को ₹2 लाख तक की राशि कितने समय में मिलेगी? ₹2 लाख से अधिक राशि के लिए बैंक में आवेदन की प्रक्रिया क्या होगी? कितने दिन में ऋण स्वीकृत होगा? क्या बैंक अतिरिक्त शर्तें लगाएंगे? क्या गरीब विद्यार्थी को किसी प्रकार की गारंटी या अतिरिक्त सुरक्षा देनी होगी? इन सवालों के स्पष्ट जवाब जरूरी हैं।

क्योंकि सरकारी योजना की सफलता केवल इस बात से तय नहीं होती कि अधिसूचना में कितनी राशि लिखी है। सफलता इस बात से तय होती है कि जरूरतमंद विद्यार्थी को पैसा कितनी आसानी, कितनी जल्दी और कितनी निश्चितता से मिलता है।

विपक्ष ने इस मुद्दे को लेकर सरकार पर हमला बोला है। राजद नेता तेजस्वी यादव और जन सुराज पार्टी ने बदलाव का विरोध किया है। राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप लोकतंत्र का हिस्सा हैं, लेकिन विद्यार्थियों के भविष्य का सवाल राजनीति से ऊपर होना चाहिए।

सरकार को भी आलोचना को राजनीतिक हमला मानकर खारिज करने के बजाय विद्यार्थियों की आशंकाओं को गंभीरता से सुनना चाहिए। अगर नई व्यवस्था वास्तव में बेहतर है तो सरकार को आंकड़ों के साथ यह साबित करना चाहिए कि इससे पहले की तुलना में कितने अधिक विद्यार्थियों को लाभ मिलेगा और ऋण प्राप्त करने में कितना समय लगेगा।

शिक्षा पर खर्च को बोझ नहीं, निवेश समझना होगा। बिहार जैसे राज्य के लिए यह और भी जरूरी है, जहां बड़ी आबादी युवा है और रोजगार के बेहतर अवसरों के लिए उच्च शिक्षा की ओर देख रही है। एक प्रतिभाशाली विद्यार्थी अगर केवल इसलिए डॉक्टर, इंजीनियर या प्रबंधक नहीं बन पाता कि उसके परिवार के पास फीस और हॉस्टल का खर्च उठाने के पैसे नहीं हैं, तो नुकसान केवल उस परिवार का नहीं, पूरे समाज का है।

स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड योजना की मूल भावना यही थी कि पैसा किसी बच्चे की प्रतिभा को रोक न सके। इसलिए सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि व्यवस्था बदलने के नाम पर प्रक्रिया जटिल न हो और गरीब विद्यार्थी बैंकिंग औपचारिकताओं में उलझकर अपने सपने न छोड़ दे।

सरकार चाहे तो इसके लिए एक स्पष्ट सार्वजनिक रोडमैप जारी कर सकती है। उसमें आवेदन से लेकर ऋण स्वीकृति और राशि जारी होने तक प्रत्येक चरण की समय-सीमा बताई जाए। साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाए कि बिहार सरकार और बैंक की जिम्मेदारी कहां से शुरू और कहां खत्म होती है। इससे विद्यार्थियों और अभिभावकों में पैदा हुआ भ्रम दूर होगा।

जरूरत इस बात की है कि सरकार विद्यार्थियों को यह संदेश दे—₹2 लाख की प्रक्रिया हो या ₹4 लाख की सुविधा, पढ़ाई के रास्ते में पैसे की दीवार नहीं खड़ी होने दी जाएगी।

बिहार को अपने युवाओं को कर्ज का बोझ नहीं, अवसर का भरोसा देना होगा। आखिर किसी भी राज्य की सबसे बड़ी पूंजी उसकी इमारतें, सड़कें या योजनाएं नहीं, बल्कि उसके पढ़े-लिखे और सक्षम युवा होते हैं।

स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड की असली परीक्षा यही है कि वह कितने सपनों को डिग्री तक और कितनी प्रतिभाओं को रोजगार तक पहुंचाता है।

अगर योजना की राशि वही है, लेकिन उसे पाने का रास्ता कठिन हो गया, तो विद्यार्थी के लिए समस्या फिर भी बनी रहेगी। और अगर व्यवस्था सरल, पारदर्शी और समयबद्ध है, तो यही योजना बिहार के हजारों युवाओं के लिए सामाजिक बदलाव का मजबूत माध्यम बन सकती है।

इसलिए बहस केवल ₹2 लाख बनाम ₹4 लाख की नहीं होनी चाहिए। बहस इस बात पर होनी चाहिए कि बिहार के गरीब बच्चे को उच्च शिक्षा का अधिकार व्यवहार में कितना आसान मिला है।

सपनों को कर्ज की शर्तों में नहीं तौलना चाहिए। सरकार का काम यह सुनिश्चित करना है कि आर्थिक कमजोरी किसी विद्यार्थी की प्रतिभा का फैसला न करे। स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड तभी सफल होगा, जब बिहार का बच्चा यह कह सके—पैसा कम था, लेकिन मेरा सपना छोटा नहीं हुआ।


आलोक कुमार