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सोमवार, 8 जून 2026

India : "हो गई है पीर पर्वत-सी, पिघलनी चाहिए

         "हो गई है पीर पर्वत-सी, पिघलनी चाहिए,  इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए..."

महान कवि दुष्यंत कुमार की ये पंक्तियाँ "हो गई है पीर पर्वत-सी, पिघलनी चाहिए..." — श्रीगंगानगर से उठी एक नई क्रिकेट क्रांति का नाम है मानव सुथार। उस युवा क्रिकेटर पर बिल्कुल सटीक बैठती हैं, जिसने वर्षों की मेहनत, संघर्ष और धैर्य के बाद भारतीय क्रिकेट के दरवाजे पर ऐसी दस्तक दी कि पूरा देश उसकी ओर देखने लगा। जून 2026 की वह सुबह भारतीय क्रिकेट के इतिहास में हमेशा याद रखी जाएगी, जब मुल्लांपुर (न्यू चंडीगढ़) के मैदान पर भारत और अफगानिस्तान के बीच खेले जा रहे टेस्ट मैच में 23 वर्षीय मानव सुथार ने भारतीय टेस्ट टीम की कैप पहनकर अपने सपनों को हकीकत में बदल दिया।

जब कुलदीप यादव ने उनके सिर पर भारत की 319वीं टेस्ट कैप सजाई, तब यह केवल एक खिलाड़ी का डेब्यू नहीं था, बल्कि भारतीय क्रिकेट को एक नए स्पिन ऑलराउंडर की सौगात मिलने का क्षण था। यह उस युवा की कहानी थी जिसने राजस्थान की धरती से निकलकर राष्ट्रीय टीम तक का सफर अपने प्रदर्शन के दम पर तय किया।

डेब्यू मैच में ही बना दिया इतिहास

अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में पदार्पण करना हर खिलाड़ी का सपना होता है, लेकिन बहुत कम खिलाड़ी ऐसे होते हैं जो अपने पहले ही मैच में इतिहास रच देते हैं। मानव सुथार ने अफगानिस्तान के खिलाफ अपने पहले टेस्ट में यही कर दिखाया।

अपने करियर के पहले ही ओवर की चौथी गेंद पर उन्होंने अफगानिस्तान के सलामी बल्लेबाज अब्दुल मलिक को आउट कर दिया। इसके साथ ही वे टेस्ट क्रिकेट में अपने पहले ओवर में विकेट लेने वाले भारत के चुनिंदा गेंदबाजों की सूची में शामिल हो गए।

यह विकेट केवल एक आंकड़ा नहीं था, बल्कि यह संकेत था कि भारतीय क्रिकेट को एक ऐसा खिलाड़ी मिल गया है जो बड़े मंच पर दबाव से घबराने वाला नहीं है।

गेंदबाजी में दिखी अनुभवी खिलाड़ी जैसी परिपक्वता

डेब्यू मैच में अक्सर खिलाड़ी घबराहट का शिकार हो जाते हैं, लेकिन मानव सुथार ने जिस संयम और नियंत्रण के साथ गेंदबाजी की, उसने सभी को प्रभावित किया।                             


दूसरे दिन तक उनके आंकड़े बेहद प्रभावशाली रहे—

15.5 ओवर

7 मेडन

21 रन

3 विकेट

इकोनॉमी रेट 1.33

उन्होंने सिर्फ विकेट ही नहीं लिए, बल्कि अफगानिस्तान के बल्लेबाजों को खुलकर खेलने का कोई मौका भी नहीं दिया। अब्दुल मलिक, रहमानुल्लाह गुरबाज और अफसर जजई जैसे बल्लेबाजों के विकेट लेकर उन्होंने साबित कर दिया कि उनकी फिरकी में दम है।

उनकी गेंदबाजी में धैर्य, सटीक लाइन-लेंथ और स्पष्ट रणनीति दिखाई दी, जो किसी भी सफल टेस्ट गेंदबाज की सबसे बड़ी पहचान होती है।

बल्ले से भी दिखाया दम

मानव सुथार केवल एक स्पिनर नहीं हैं। वे आधुनिक क्रिकेट की सबसे बड़ी जरूरत—एक भरोसेमंद ऑलराउंडर—के रूप में उभर रहे हैं।

भारत की पहली पारी जब 564/8 पर घोषित हुई, तब निचले क्रम में उन्होंने 41 गेंदों में 28 रन बनाए। उनकी पारी में दो चौके और दो शानदार छक्के शामिल थे।

उनकी बल्लेबाजी में आत्मविश्वास और सकारात्मक सोच साफ दिखाई दी। उन्होंने संकेत दे दिया कि जरूरत पड़ने पर वे बल्ले से भी मैच का रुख बदल सकते हैं।

घरेलू क्रिकेट में पहले ही बजा चुके थे सफलता का बिगुल

टीम इंडिया तक पहुंचने का रास्ता कभी आसान नहीं होता। मानव सुथार ने भी घरेलू क्रिकेट के कठिन संघर्षों से गुजरकर यह मुकाम हासिल किया है।

उनके प्रथम श्रेणी क्रिकेट के आंकड़े उनकी प्रतिभा को स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं—

फॉर्मेट मैच विकेट औसत सर्वश्रेष्ठ गेंदबाजी रन बल्लेबाजी औसत सर्वोच्च स्कोर

फर्स्ट क्लास 29 129 25.76 8/33 945 25.54 120

ये आंकड़े बताते हैं कि मानव केवल विकेट लेने वाले गेंदबाज नहीं हैं, बल्कि जरूरत पड़ने पर शतक लगाने की क्षमता भी रखते हैं।

रणजी ट्रॉफी से शुरू हुई पहचान

मानव सुथार पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर तब चर्चा में आए जब उन्होंने रणजी ट्रॉफी 2022-23 में शानदार प्रदर्शन किया।

उस सीजन में उन्होंने केवल 6 मैचों में 39 विकेट हासिल किए और 20.33 की औसत से बल्लेबाजों को परेशान किया। वे राजस्थान के सबसे सफल गेंदबाज बने और चयनकर्ताओं का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने में सफल रहे।

यहीं से भारतीय क्रिकेट के गलियारों में उनका नाम गूंजने लगा।

संकट में टीम को बचाने वाला शतक

एक सच्चे ऑलराउंडर की पहचान यह होती है कि वह मुश्किल परिस्थितियों में टीम को संभाल सके।


हिमाचल प्रदेश के खिलाफ एक मुकाबले में राजस्थान की टीम 98 रन पर 5 विकेट गंवाकर संकट में थी। ऐसे समय में मानव सुथार ने जिम्मेदारी उठाई और शानदार 120 रन की पारी खेली।

उनकी इस पारी ने न केवल टीम को संकट से बाहर निकाला बल्कि यह भी साबित कर दिया कि वे केवल गेंदबाज नहीं, बल्कि भरोसेमंद बल्लेबाज भी हैं।

दिलीप ट्रॉफी में मचाया तहलका

2024 की दिलीप ट्रॉफी मानव सुथार के करियर का एक और महत्वपूर्ण पड़ाव साबित हुई।

इंडिया-सी के लिए खेलते हुए उन्होंने एक पारी में 7 विकेट लेकर विरोधी टीम की बल्लेबाजी को तहस-नहस कर दिया। उनका 7/49 का शानदार स्पेल चयनकर्ताओं को यह संदेश देने के लिए काफी था कि वे अगले स्तर के लिए तैयार हैं।

आईपीएल ने दिया नया आत्मविश्वास

घरेलू क्रिकेट में सफलता के बाद मानव को आईपीएल में भी अवसर मिला। गुजरात टाइटन्स के साथ जुड़कर उन्हें विश्व स्तरीय खिलाड़ियों के साथ काम करने का मौका मिला।

राशिद खान और नूर अहमद जैसे दिग्गज स्पिनरों के साथ समय बिताने से उनकी गेंदबाजी में और निखार आया। उन्होंने दबाव में प्रदर्शन करना सीखा और अपनी कला को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया।

भारत को मिला भविष्य का ऑलराउंडर

भारतीय क्रिकेट में समय-समय पर ऐसे खिलाड़ी उभरते रहे हैं जिन्होंने अपने प्रदर्शन से नई उम्मीदें जगाई हैं। मानव सुथार का नाम भी अब उसी सूची में तेजी से शामिल होता दिखाई दे रहा है।

श्रीगंगानगर की साधारण पृष्ठभूमि से निकलकर भारतीय टेस्ट टीम तक पहुंचने का उनका सफर संघर्ष, अनुशासन और निरंतर मेहनत की मिसाल है। डेब्यू टेस्ट में गेंद और बल्ले दोनों से प्रभाव छोड़कर उन्होंने यह संकेत दे दिया है कि वे केवल एक उभरते हुए स्पिनर नहीं, बल्कि भारतीय क्रिकेट के संभावित ऑलराउंडर भी हैं।

क्रिकेट विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मानव सुथार इसी निरंतरता और समर्पण के साथ आगे बढ़ते रहे, तो आने वाले वर्षों में वे भारतीय टीम के अहम स्तंभ बन सकते हैं।

फिलहाल इतना तय है कि राजस्थान की धरती से निकला यह युवा खिलाड़ी करोड़ों क्रिकेट प्रेमियों की उम्मीदों का नया चेहरा बन चुका है। मानव सुथार की कहानी यह साबित करती है कि सपने बड़े हों, मेहनत सच्ची हो और हौसला अडिग हो, तो श्रीगंगानगर की गलियों से भी भारतीय क्रिकेट के शिखर तक पहुंचा जा सकता है।

उनकी कहानी अभी शुरू हुई है, लेकिन शुरुआत इतनी शानदार है कि भविष्य सुनहरा दिखाई देता है।


आलोक कुमार 

India : ग्रामीण क्षेत्रों में तकनीक की पहुंच बढ़ाकर विकास की नई संभावनाओं के द्वार खोल दिए

भारत आज तेजी से डिजिटल परिवर्तन के दौर से गुजर रहा

भारत
आज तेजी से डिजिटल परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। इंटरनेट, मोबाइल तकनीक और डिजिटल सेवाओं ने देश के विकास को नई दिशा दी है। एक समय था जब डिजिटल सुविधाओं को केवल शहरों तक सीमित माना जाता था, लेकिन अब गांव भी इस बदलाव का महत्वपूर्ण हिस्सा बनते जा रहे हैं। डिजिटल भारत अभियान ने ग्रामीण क्षेत्रों में तकनीक की पहुंच बढ़ाकर विकास की नई संभावनाओं के द्वार खोल दिए हैं।

डिजिटल भारत अभियान का उद्देश्य देश के प्रत्येक नागरिक को तकनीक से जोड़ना, सरकारी सेवाओं को सरल बनाना और डिजिटल माध्यमों के जरिए पारदर्शिता तथा सुगमता सुनिश्चित करना है। इसका प्रभाव अब ग्रामीण भारत में स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। गांवों में इंटरनेट कनेक्टिविटी बढ़ने के साथ-साथ लोगों की सोच और जीवनशैली में भी परिवर्तन देखने को मिल रहा है।

कुछ वर्ष पहले तक ग्रामीण नागरिकों को सरकारी प्रमाण पत्र, पेंशन, बैंकिंग सेवाओं या अन्य प्रशासनिक कार्यों के लिए शहरों के चक्कर लगाने पड़ते थे। कई बार एक छोटे से कार्य के लिए पूरा दिन खर्च हो जाता था। लेकिन आज डिजिटल सेवाओं की उपलब्धता ने इस स्थिति को काफी हद तक बदल दिया है। अब अनेक सरकारी सेवाएं ऑनलाइन उपलब्ध हैं, जिससे समय, श्रम और धन की बचत हो रही है। 

ग्रामीण क्षेत्रों में कॉमन सर्विस सेंटर (CSC) डिजिटल क्रांति के महत्वपूर्ण केंद्र बनकर उभरे हैं। इन केंद्रों के माध्यम से आधार अपडेट, पेंशन आवेदन, आय, जाति और निवास प्रमाण पत्र, बिजली बिल भुगतान, बीमा योजनाओं और बैंकिंग सेवाओं जैसी अनेक सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। इससे ग्रामीण नागरिकों की सरकारी योजनाओं तक पहुंच पहले की अपेक्षा कहीं अधिक आसान हो गई है।

डिजिटल भुगतान प्रणाली ने भी ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण बदलाव लाया है। पहले अधिकांश लेन-देन नकद आधारित होते थे, लेकिन अब मोबाइल आधारित भुगतान और यूपीआई जैसी सुविधाओं ने भुगतान व्यवस्था को सरल बना दिया है। छोटे दुकानदार, सब्जी विक्रेता और ग्रामीण बाजारों के व्यापारी भी QR कोड के माध्यम से भुगतान स्वीकार कर रहे हैं। इससे वित्तीय पारदर्शिता बढ़ी है और नकदी पर निर्भरता कम हुई है।

शिक्षा के क्षेत्र में डिजिटल तकनीक ने नई संभावनाएं पैदा की हैं। ऑनलाइन कक्षाएं, ई-लर्निंग प्लेटफॉर्म, डिजिटल पुस्तकालय और शैक्षणिक वीडियो के माध्यम से विद्यार्थियों को बेहतर शैक्षिक संसाधन उपलब्ध हो रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों के छात्र अब शहरों के विद्यार्थियों की तरह विभिन्न ऑनलाइन पाठ्यक्रमों और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर पा रहे हैं। हालांकि इंटरनेट और डिजिटल उपकरणों की उपलब्धता अभी भी कई क्षेत्रों में चुनौती बनी हुई है, फिर भी स्थिति पहले की तुलना में काफी बेहतर हुई है।

कृषि क्षेत्र में भी डिजिटल तकनीक किसानों के लिए लाभदायक साबित हो रही है। किसान मोबाइल एप और ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से मौसम की जानकारी, कृषि विशेषज्ञों की सलाह, उन्नत खेती की तकनीक और मंडियों के ताजा बाजार भाव प्राप्त कर रहे हैं। इससे उन्हें खेती से जुड़े महत्वपूर्ण निर्णय लेने में सहायता मिल रही है और उत्पादन क्षमता बढ़ाने के अवसर मिल रहे हैं।

महिलाओं के जीवन में भी डिजिटल क्रांति सकारात्मक बदलाव लेकर आई है। स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाएं अब डिजिटल बैंकिंग, ऑनलाइन भुगतान और सरकारी योजनाओं की जानकारी का लाभ उठा रही हैं। कई महिलाएं सोशल मीडिया और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म के माध्यम से अपने उत्पादों का प्रचार-प्रसार कर अतिरिक्त आय अर्जित कर रही हैं। इससे आर्थिक आत्मनिर्भरता को बढ़ावा मिला है।

हालांकि डिजिटल भारत अभियान की सफलता के बावजूद कई चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं। अनेक ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट की गति और नेटवर्क कनेक्टिविटी संतोषजनक नहीं है। डिजिटल साक्षरता की कमी के कारण कई लोग तकनीक का पूरा लाभ नहीं उठा पा रहे हैं। इसके अलावा साइबर अपराध, ऑनलाइन धोखाधड़ी और डिजिटल सुरक्षा से जुड़ी समस्याएं भी चिंता का विषय बनी हुई हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि केवल इंटरनेट पहुंच उपलब्ध कराना ही पर्याप्त नहीं होगा। लोगों को डिजिटल साक्षरता, साइबर सुरक्षा और तकनीकी उपयोग के बारे में भी जागरूक करना आवश्यक है। स्कूलों, पंचायतों, स्वयंसेवी संस्थाओं और सामुदायिक संगठनों की भूमिका इस दिशा में महत्वपूर्ण हो सकती है।

सरकार और निजी क्षेत्र मिलकर ग्रामीण डिजिटल बुनियादी ढांचे को मजबूत बनाने का प्रयास कर रहे हैं। आने वाले वर्षों में बेहतर इंटरनेट कनेक्टिविटी, फाइबर नेटवर्क और नई तकनीकों के विस्तार से गांवों में डिजिटल सेवाओं की पहुंच और अधिक बढ़ने की संभावना है। इससे शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि और रोजगार के क्षेत्र में नए अवसर पैदा होंगे।

डिजिटल भारत अभियान ने यह साबित कर दिया है कि तकनीक केवल शहरी विकास का माध्यम नहीं बल्कि ग्रामीण सशक्तिकरण का भी प्रभावी उपकरण है। जब गांव डिजिटल रूप से मजबूत होंगे, तभी देश का समग्र और संतुलित विकास संभव होगा। ग्रामीण भारत की बदलती तस्वीर इस बात का प्रमाण है कि तकनीक और जागरूकता मिलकर सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन की नई कहानी लिख सकती हैं।

डिजिटल भारत अभियान केवल तकनीकी बदलाव का कार्यक्रम नहीं है, बल्कि यह एक ऐसे भारत के निर्माण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है, जहां विकास की रोशनी गांव-गांव तक पहुंचे और प्रत्येक नागरिक आधुनिक सुविधाओं का लाभ उठा सके।

आलोक कुमार

Bihar : बिहार में बढ़ती गर्मी और जल संकट

  बिहार में बढ़ती गर्मी और जल संकट: समय रहते चेतने की जरूरत

जून का महीना शुरू होते ही बिहार के अधिकांश हिस्सों में भीषण गर्मी का असर दिखाई देने लगा है। कई जिलों में तापमान 40 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंच चुका है। तेज धूप, गर्म हवाओं और उमस भरे मौसम ने लोगों का दैनिक जीवन प्रभावित कर दिया है। शहरों की तुलना में ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति अधिक चिंताजनक है, जहां पेयजल की उपलब्धता और जल संरक्षण की व्यवस्था पहले से ही सीमित है।

गर्मी बढ़ने के साथ-साथ जल संकट भी गहराता जा रहा है। गांवों में रहने वाले लोगों का जीवन खेती, पशुपालन और प्राकृतिक जल स्रोतों पर काफी हद तक निर्भर करता है। ऐसे में जब जलस्तर नीचे जाने लगता है और बारिश समय पर नहीं होती, तो इसका सीधा प्रभाव ग्रामीण जीवन और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।

जलस्तर गिरने से बढ़ी ग्रामीणों की परेशानी

बिहार के कई गांवों में हैंडपंप और चापाकल गर्मी के दिनों में पर्याप्त पानी नहीं दे पा रहे हैं। भूजल स्तर नीचे जाने के कारण लोगों को पीने और घरेलू उपयोग के लिए पानी जुटाने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। कई स्थानों पर महिलाओं और बच्चों को पानी के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है।

पानी की कमी केवल घरेलू जरूरतों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर पशुपालन पर भी पड़ रहा है। पशुओं के लिए पर्याप्त पानी उपलब्ध न होने से ग्रामीण परिवारों की आय पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

बदलता मौसम और जलवायु परिवर्तन की चुनौती

विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। पहले जहां जून के शुरुआती दिनों में बारिश की संभावना बन जाती थी, वहीं अब कई क्षेत्रों में लंबे समय तक सूखे जैसी स्थिति देखने को मिल रही है।

अनियमित वर्षा, बढ़ता तापमान और मौसम की अनिश्चितता किसानों के लिए नई चुनौतियां पैदा कर रही है। यदि यह स्थिति लगातार बनी रहती है तो कृषि उत्पादन और खाद्य सुरक्षा दोनों प्रभावित हो सकते हैं।


स्वास्थ्य पर पड़ रहा गंभीर प्रभाव

भीषण गर्मी का असर लोगों के स्वास्थ्य पर भी साफ दिखाई दे रहा है। अस्पतालों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में लू, डिहाइड्रेशन, चक्कर आना, कमजोरी और थकावट जैसी समस्याओं से पीड़ित मरीजों की संख्या बढ़ रही है।

विशेष रूप से बच्चों, बुजुर्गों और पहले से बीमार लोगों को अधिक सावधानी बरतने की आवश्यकता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि दोपहर के समय अनावश्यक रूप से बाहर न निकलें, पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं और शरीर को ठंडा रखने का प्रयास करें।

जल संरक्षण की उपेक्षा बनी बड़ी वजह

ग्रामीण क्षेत्रों में जल संकट केवल मौसमी समस्या नहीं है। वर्षों से जल संरक्षण के पारंपरिक स्रोतों की अनदेखी भी इसके प्रमुख कारणों में शामिल है।

कई गांवों में तालाब और पोखर अतिक्रमण की भेंट चढ़ चुके हैं। वर्षा जल संचयन की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है और भूजल का लगातार बढ़ता दोहन स्थिति को और गंभीर बना रहा है। यदि इन समस्याओं पर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले वर्षों में जल संकट और गहरा सकता है।

सरकारी योजनाएं और जमीनी हकीकत

राज्य सरकार और केंद्र सरकार द्वारा पेयजल उपलब्ध कराने के लिए विभिन्न योजनाएं संचालित की जा रही हैं। "हर घर नल का जल" जैसी योजनाओं से कई क्षेत्रों में लोगों को राहत मिली है। हालांकि अभी भी अनेक गांव ऐसे हैं जहां नियमित और पर्याप्त जल आपूर्ति सुनिश्चित नहीं हो सकी है।

योजनाओं की सफलता केवल उनके निर्माण तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि उनका प्रभावी संचालन और नियमित रखरखाव भी उतना ही आवश्यक है।

सामुदायिक भागीदारी से मिल सकता है समाधान

विशेषज्ञों का मानना है कि जल संकट से निपटने के लिए केवल सरकारी प्रयास पर्याप्त नहीं होंगे। समाज और समुदाय की सक्रिय भागीदारी भी जरूरी है।

गांव स्तर पर निम्नलिखित कदम प्रभावी साबित हो सकते हैं—

तालाबों और जलाशयों की नियमित सफाई।

वर्षा जल संचयन को बढ़ावा देना।

अधिक से अधिक वृक्षारोपण करना।

जल के अनावश्यक उपयोग को रोकना।

स्कूलों और पंचायतों के माध्यम से जागरूकता अभियान चलाना।

पारंपरिक जल स्रोतों का संरक्षण करना।

किसानों के सामने बढ़ती चिंता

बिहार एक कृषि प्रधान राज्य है और यहां की बड़ी आबादी खेती पर निर्भर है। धान की खेती की तैयारी शुरू हो चुकी है, लेकिन पर्याप्त पानी की उपलब्धता को लेकर किसानों में चिंता बनी हुई है।

यदि मानसून समय पर नहीं पहुंचा या सामान्य से कम वर्षा हुई, तो कृषि उत्पादन प्रभावित हो सकता है। इसका असर केवल किसानों की आय पर ही नहीं बल्कि पूरे ग्रामीण बाजार और अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।

भविष्य के लिए चेतावनी

पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि पानी को केवल वर्तमान जरूरत नहीं बल्कि भविष्य की सुरक्षा के रूप में देखना होगा। जल संरक्षण को जीवनशैली का हिस्सा बनाना समय की मांग है।

छोटे-छोटे प्रयास, जैसे नल बंद रखना, वर्षा जल का संग्रह करना, पेड़ लगाना और जल स्रोतों की रक्षा करना, भविष्य में बड़े बदलाव ला सकते हैं। यदि आज प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में जल संकट और गंभीर रूप ले सकता है।

निष्कर्ष

बिहार में बढ़ती गर्मी और जल संकट केवल मौसम से जुड़ी समस्या नहीं है, बल्कि यह पर्यावरण, स्वास्थ्य, कृषि और ग्रामीण विकास से जुड़ा गंभीर विषय बन चुका है। सरकार, समाज और आम नागरिकों को मिलकर जल संरक्षण की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे। समय रहते की गई पहल न केवल वर्तमान संकट को कम करेगी बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी सुरक्षित जल संसाधन सुनिश्चित कर सकेगी।


आलोक कुमार 

रविवार, 7 जून 2026

World : आज के आधुनिक युग में समय की बर्बादी के साधन

 समय की कीमत: जो इसे समझ गया, वह जीवन की दौड़ में आगे निकल गया

दुनिया में हर व्यक्ति को प्रतिदिन 24 घंटे ही मिलते हैं। चाहे वह कोई बड़ा उद्योगपति हो, वैज्ञानिक हो, खिलाड़ी हो या एक सामान्य व्यक्ति, समय सभी के लिए समान होता है। फिर भी कुछ लोग जीवन में असाधारण सफलता प्राप्त कर लेते हैं, जबकि कुछ लोग लगातार संघर्ष करते रहते हैं। इसका सबसे बड़ा कारण समय का उपयोग है। जो व्यक्ति समय की कीमत समझ लेता है, वह अपने जीवन को सही दिशा दे सकता है।

समय एक ऐसी संपत्ति है जिसे न खरीदा जा सकता है, न जमा किया जा सकता है और न ही वापस पाया जा सकता है। धन खो जाए तो दोबारा कमाया जा सकता है, लेकिन एक बार बीता हुआ समय कभी लौटकर नहीं आता। यही कारण है कि दुनिया के सफल लोग समय को सबसे मूल्यवान संसाधन मानते हैं।

आज के आधुनिक युग में समय की बर्बादी के साधन पहले की तुलना में कहीं अधिक बढ़ गए हैं। मोबाइल फोन, सोशल मीडिया, ऑनलाइन गेम और मनोरंजन के अनगिनत विकल्प लोगों का बहुत सारा समय अपने साथ ले जाते हैं। कई बार लोग यह महसूस भी नहीं कर पाते कि वे दिन के कितने घंटे ऐसे कार्यों में खर्च कर रहे हैं, जिनका उनके जीवन के लक्ष्यों से कोई संबंध नहीं होता।

समय प्रबंधन का अर्थ केवल व्यस्त रहना नहीं है। कई लोग पूरे दिन काम में लगे रहते हैं, फिर भी उन्हें अपेक्षित परिणाम नहीं मिलते। दूसरी ओर कुछ लोग सीमित समय में भी महत्वपूर्ण कार्य पूरे कर लेते हैं। इसका कारण यह है कि वे अपनी प्राथमिकताओं को स्पष्ट रखते हैं और जरूरी कार्यों पर ध्यान केंद्रित करते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि समय का सही उपयोग करने के लिए सबसे पहले व्यक्ति को अपने लक्ष्य स्पष्ट करने चाहिए। जब लक्ष्य स्पष्ट होते हैं, तब यह तय करना आसान हो जाता है कि किस कार्य पर कितना समय देना है। बिना लक्ष्य के जीवन ऐसा है जैसे बिना दिशा के यात्रा करना। व्यक्ति चलता तो रहता है, लेकिन उसे पता नहीं होता कि उसे पहुंचना कहाँ है।

समय का महत्व छात्रों के जीवन में विशेष रूप से दिखाई देता है। परीक्षा के दिनों में अक्सर वही छात्र बेहतर प्रदर्शन करते हैं जिन्होंने पूरे वर्ष नियमित अध्ययन किया होता है। जो छात्र अंतिम समय तक तैयारी टालते रहते हैं, उन्हें अधिक तनाव का सामना करना पड़ता है। यह केवल शिक्षा ही नहीं, बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में लागू होता है।

व्यापार और रोजगार के क्षेत्र में भी समय की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। समय पर लिया गया निर्णय सफलता का कारण बन सकता है, जबकि देरी कई अवसरों को समाप्त कर सकती है। इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण हैं जहाँ लोगों ने सही समय पर सही कदम उठाकर बड़ी उपलब्धियां हासिल कीं।             

समय का संबंध केवल कार्यक्षमता से ही नहीं, बल्कि जीवन की गुणवत्ता से भी है। यदि कोई व्यक्ति अपना सारा समय केवल काम में ही लगा दे और परिवार, स्वास्थ्य तथा सामाजिक संबंधों के लिए समय न निकाले, तो उसका जीवन असंतुलित हो सकता है। इसलिए समय प्रबंधन का अर्थ जीवन के विभिन्न क्षेत्रों के बीच संतुलन स्थापित करना भी है।

स्वास्थ्य के क्षेत्र में समय का महत्व और भी बढ़ जाता है। नियमित व्यायाम, पर्याप्त नींद और संतुलित दिनचर्या के लिए समय निकालना आवश्यक है। कई लोग व्यस्तता का बहाना बनाकर स्वास्थ्य की उपेक्षा करते हैं, लेकिन बाद में उन्हें इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है। इसलिए समय का एक हिस्सा स्वयं की देखभाल के लिए भी सुरक्षित रखना चाहिए।

आज की तेज रफ्तार दुनिया में टालमटोल की आदत एक बड़ी समस्या बन चुकी है। कई लोग महत्वपूर्ण कार्यों को बाद के लिए छोड़ देते हैं। धीरे-धीरे यही आदत तनाव और असफलता का कारण बन जाती है। सफल लोग कार्यों को टालने के बजाय समय पर पूरा करने की कोशिश करते हैं। वे जानते हैं कि आज का काम कल पर छोड़ना भविष्य की समस्याओं को आमंत्रित करना है।

समय का सदुपयोग करने के लिए कुछ सरल आदतें अपनाई जा सकती हैं। प्रतिदिन की योजना बनाना, प्राथमिकताएं तय करना, अनावश्यक गतिविधियों को सीमित करना और लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित रखना अत्यंत उपयोगी सिद्ध होता है। छोटी-छोटी आदतें लंबे समय में बड़े परिणाम देती हैं।

महान वैज्ञानिक, खिलाड़ी और सफल उद्यमी अक्सर एक बात पर जोर देते हैं कि सफलता किसी चमत्कार का परिणाम नहीं होती। यह अनुशासन, निरंतर प्रयास और समय के सही उपयोग का परिणाम होती है। उन्होंने भी दिन के वही 24 घंटे प्राप्त किए जो हमें मिलते हैं, लेकिन उन्होंने उन घंटों का उपयोग अलग तरीके से किया।

समय हमें हर दिन एक नया अवसर देता है। बीता हुआ कल बदल नहीं सकता और आने वाला कल हमारे नियंत्रण में नहीं है। हमारे पास केवल आज है। यदि हम आज का सही उपयोग कर लें, तो भविष्य अपने आप बेहतर बन सकता है।

अंततः समय जीवन की सबसे मूल्यवान पूंजी है। इसे समझना और इसका सम्मान करना ही सफलता की पहली सीढ़ी है। जो व्यक्ति समय को महत्व देता है, समय भी उसे महत्व देता है। जीवन की दौड़ में वही आगे निकलता है जो हर क्षण का सदुपयोग करना सीख लेता है। इसलिए आज ही यह संकल्प लेना चाहिए कि हम अपने समय को व्यर्थ नहीं गंवाएंगे, बल्कि उसे अपने सपनों और लक्ष्यों को पूरा करने के लिए उपयोग करेंगे। यही सफलता, संतुलन और संतोषपूर्ण जीवन का सबसे बड़ा रहस्य है।


आलोक कुमार

India : छोटी बचत, बड़ा भविष्य: आर्थिक सुरक्षा की पहली सीढ़ी

                            आज के समय में महंगाई लगातार बढ़ रही है

आज के समय में महंगाई लगातार बढ़ रही है। शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास और दैनिक जरूरतों पर होने वाला खर्च पहले की तुलना में काफी अधिक हो गया है। ऐसे में आर्थिक सुरक्षा केवल अमीर लोगों की जरूरत नहीं रह गई है, बल्कि हर व्यक्ति और परिवार के लिए आवश्यक बन चुकी है। आर्थिक सुरक्षा की शुरुआत अक्सर बड़ी आय से नहीं, बल्कि छोटी-छोटी बचतों से होती है।

कई लोग यह सोचकर बचत शुरू नहीं करते कि उनकी आय बहुत कम है। उन्हें लगता है कि बचत केवल वही लोग कर सकते हैं जिनकी कमाई अधिक हो। लेकिन वित्तीय विशेषज्ञों का मानना है कि बचत का संबंध आय से कम और आदत से अधिक होता है। जो व्यक्ति कम आय में भी थोड़ी-थोड़ी बचत करने की आदत विकसित कर लेता है, वह भविष्य में आर्थिक रूप से अधिक मजबूत बन सकता है।

बचत का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह कठिन समय में सुरक्षा कवच का काम करती है। जीवन हमेशा एक जैसा नहीं रहता। अचानक बीमारी, नौकरी का नुकसान, व्यवसाय में मंदी या कोई पारिवारिक आपात स्थिति कभी भी सामने आ सकती है। ऐसे समय में यदि व्यक्ति के पास बचत होती है, तो वह परिस्थितियों का सामना अधिक आत्मविश्वास के साथ कर सकता है।

ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में आर्थिक चुनौतियां अलग-अलग रूपों में मौजूद हैं। गांवों में कृषि पर निर्भरता और मौसम की अनिश्चितता आय को प्रभावित कर सकती है। वहीं शहरों में बढ़ते खर्च और प्रतिस्पर्धा आर्थिक दबाव पैदा कर सकते हैं। ऐसी स्थिति में नियमित बचत भविष्य के लिए एक मजबूत आधार तैयार करती है।

बचत की शुरुआत बहुत छोटे स्तर से भी की जा सकती है। यदि कोई व्यक्ति प्रतिदिन केवल 20 या 50 रुपये भी अलग रखता है, तो समय के साथ यह राशि एक महत्वपूर्ण निधि का रूप ले सकती है। बचत का वास्तविक महत्व उसकी राशि में नहीं, बल्कि उसकी निरंतरता में होता है। नियमित रूप से की गई छोटी बचत लंबे समय में बड़े परिणाम दे सकती है।

आज बैंकिंग सेवाओं और डिजिटल तकनीक ने बचत को पहले से कहीं अधिक आसान बना दिया है। बैंक खाते, आवर्ती जमा योजनाएं, बचत खाते और अन्य वित्तीय साधन लोगों को अपनी बचत सुरक्षित रखने के अवसर प्रदान करते हैं। डिजिटल भुगतान और ऑनलाइन बैंकिंग के माध्यम से लोग अपने धन का बेहतर प्रबंधन भी कर सकते हैं।

आर्थिक सुरक्षा का एक महत्वपूर्ण पहलू बजट बनाना भी है। कई बार लोगों की आय पर्याप्त होती है, लेकिन खर्चों पर नियंत्रण न होने के कारण वे बचत नहीं कर पाते। यदि व्यक्ति अपनी मासिक आय और खर्च का स्पष्ट हिसाब रखे, तो वह अनावश्यक खर्चों की पहचान कर सकता है। यही छोटी-छोटी सावधानियां बचत की राह को आसान बनाती हैं।

विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि आय का एक निश्चित हिस्सा बचत के लिए अलग रखा जाना चाहिए। कई लोग पहले खर्च करते हैं और जो बचता है उसे बचत मानते हैं। इसके विपरीत, बेहतर तरीका यह है कि आय मिलते ही कुछ हिस्सा बचत के लिए सुरक्षित कर लिया जाए और बाकी राशि से खर्चों की योजना बनाई जाए।

बचत केवल धन जमा करने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह भविष्य के सपनों को पूरा करने का साधन भी है। बच्चों की शिक्षा, घर का निर्माण, व्यवसाय की शुरुआत या किसी अन्य बड़े लक्ष्य के लिए वित्तीय तैयारी आवश्यक होती है। नियमित बचत इन लक्ष्यों को प्राप्त करने में सहायता करती है और ऋण पर अत्यधिक निर्भरता को कम करती है।

युवाओं के लिए बचत का महत्व और भी अधिक है। करियर की शुरुआत में यदि वित्तीय अनुशासन विकसित कर लिया जाए, तो आने वाले वर्षों में आर्थिक स्थिरता प्राप्त करना आसान हो जाता है। कई सफल लोग अपनी आर्थिक सफलता का श्रेय बचपन या युवावस्था में विकसित की गई बचत की आदत को देते हैं।

बचत के साथ-साथ वित्तीय जागरूकता भी आवश्यक है। लोगों को यह समझना चाहिए कि केवल धन कमाना ही पर्याप्त नहीं है। धन का सही उपयोग, सुरक्षित निवेश और भविष्य की योजना भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। आर्थिक शिक्षा व्यक्ति को बेहतर निर्णय लेने में मदद करती है और वित्तीय जोखिमों को कम करती है।

आज उपभोक्तावाद का दौर है। बाजार में हर दिन नए उत्पाद और सेवाएं लोगों को आकर्षित करती हैं। विज्ञापन और सोशल मीडिया कई बार ऐसी इच्छाएं पैदा कर देते हैं जो वास्तव में आवश्यक नहीं होतीं। यदि व्यक्ति हर आकर्षण के पीछे भागने लगे, तो बचत करना कठिन हो जाता है। इसलिए जरूरत और इच्छा के बीच अंतर समझना जरूरी है।

आर्थिक रूप से मजबूत परिवार केवल अपनी ही मदद नहीं करते, बल्कि समाज के विकास में भी योगदान देते हैं। जब लोगों के पास वित्तीय स्थिरता होती है, तो वे शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक गतिविधियों में अधिक भागीदारी कर सकते हैं। इससे पूरे समाज की प्रगति को बल मिलता है।

अंततः बचत कोई बोझ नहीं, बल्कि भविष्य के प्रति जिम्मेदारी का प्रतीक है। यह हमें आत्मनिर्भर बनाती है और अनिश्चित परिस्थितियों में भी आत्मविश्वास बनाए रखने की शक्ति देती है। आर्थिक सुरक्षा की राह किसी बड़े कदम से नहीं, बल्कि छोटी और नियमित बचत से शुरू होती है।

जो व्यक्ति आज बचत का महत्व समझता है, वह कल की चुनौतियों का सामना अधिक मजबूती से कर सकता है। इसलिए चाहे आय कम हो या अधिक, बचत की आदत को जीवन का हिस्सा बनाना चाहिए। छोटी बचत ही बड़े भविष्य की नींव बनती है और यही आर्थिक सुरक्षा की पहली सीढ़ी है।

आलोक कुमार

Chhattisgarh: प्यास पर पहरा: जब भेदभाव के बीच मानवता बनी उम्मीद की किरण

 प्यास पर पहरा: जब भेदभाव के बीच मानवता बनी उम्मीद की किरण

पानी को जीवन कहा जाता है। यह प्रकृति का ऐसा उपहार है, जिस पर हर व्यक्ति का समान अधिकार माना जाता है। लेकिन जब किसी समुदाय या परिवार को पानी जैसी बुनियादी आवश्यकता से भी वंचित कर दिया जाए, तो यह केवल एक सामाजिक समस्या नहीं रह जाती, बल्कि मानव गरिमा और मूल अधिकारों से जुड़ा गंभीर प्रश्न बन जाती है।

छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले से सामने आई एक घटना ने इसी मुद्दे को चर्चा के केंद्र में ला दिया। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, जिले के एक क्षेत्र में रहने वाले 14 ईसाई परिवारों के लगभग 70 लोगों को सामाजिक बहिष्कार और भेदभाव का सामना करना पड़ा। स्थिति ऐसी बताई गई कि उन्हें सार्वजनिक जल स्रोतों से पानी लेने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।

पानी केवल एक संसाधन नहीं, बल्कि दैनिक जीवन की आधारभूत आवश्यकता है। पीने, भोजन बनाने, स्वच्छता बनाए रखने और अन्य आवश्यक कार्यों के लिए इसकी जरूरत हर व्यक्ति को होती है। ऐसे में जब किसी परिवार की पानी तक पहुंच बाधित हो जाए, तो उसका असर जीवन के लगभग हर पहलू पर पड़ता है।

इस प्रकार की परिस्थितियों का सबसे अधिक प्रभाव बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों पर पड़ता है। बच्चों के स्वास्थ्य और शिक्षा पर असर पड़ सकता है, जबकि बुजुर्गों और महिलाओं को अतिरिक्त कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। पानी जुटाने की चुनौती केवल शारीरिक नहीं होती, बल्कि यह सामाजिक और मानसिक दबाव भी पैदा करती है।

इसी दौरान एक राहत संगठन को प्रभावित परिवारों की स्थिति की जानकारी मिली। संगठन ने केवल सहानुभूति व्यक्त करने के बजाय समस्या के समाधान की दिशा में कदम उठाने का निर्णय लिया। प्रभावित परिवारों के लिए एक स्वतंत्र जल स्रोत उपलब्ध कराने की योजना बनाई गई और बोरवेल निर्माण का कार्य शुरू किया गया।

यह पहल केवल पानी उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं थी। इसका उद्देश्य प्रभावित परिवारों को आत्मनिर्भर बनाना और उन्हें सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अवसर प्रदान करना भी था। किसी भी व्यक्ति या समुदाय के लिए अपने संसाधनों तक सुरक्षित और सम्मानजनक पहुंच होना अत्यंत महत्वपूर्ण है।


परियोजना के दौरान कई चुनौतियां सामने आईं। स्थानीय परिस्थितियों और विभिन्न बाधाओं के बावजूद प्रयास जारी रहे। अंततः बोरवेल निर्माण का कार्य पूरा हुआ और प्रभावित परिवारों को पानी का एक स्थायी स्रोत उपलब्ध हो सका।

यह उपलब्धि केवल एक निर्माण परियोजना की सफलता नहीं थी, बल्कि सहयोग, सेवा और सामुदायिक समर्थन की शक्ति का उदाहरण भी थी। इससे यह संदेश मिलता है कि कठिन परिस्थितियों में भी सामूहिक प्रयास सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं।


यह घटना कई महत्वपूर्ण प्रश्नों को सामने लाती है। क्या किसी व्यक्ति की धार्मिक या सामाजिक पहचान उसके मूल अधिकारों तक पहुंच को प्रभावित कर सकती है? क्या पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य और सम्मान जैसे अधिकारों को किसी भी आधार पर सीमित किया जाना चाहिए? लोकतांत्रिक व्यवस्था और संवैधानिक मूल्यों का आधार समानता और गरिमा ही है।

कांकेर की यह घटना केवल एक क्षेत्र विशेष की कहानी नहीं है। यह उस व्यापक चुनौती की ओर संकेत करती है, जहां समाज को समानता, सहिष्णुता और मानवीय मूल्यों को और अधिक मजबूत करने की आवश्यकता है। साथ ही यह भी दिखाती है कि जब संवेदनशील लोग और संगठन आगे आते हैं, तो कठिन परिस्थितियों में भी समाधान का रास्ता निकाला जा सकता है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि विकास केवल भौतिक संसाधनों तक सीमित न रहे, बल्कि समाज के प्रत्येक व्यक्ति तक सम्मान, अधिकार और अवसर के रूप में पहुंचे। किसी भी सभ्य समाज की पहचान इसी बात से होती है कि वह अपने सबसे कमजोर और जरूरतमंद लोगों के साथ कैसा व्यवहार करता है।

अंततः यह कहानी हमें याद दिलाती है कि भेदभाव और कठिनाइयों के बीच भी मानवता, सहयोग और सेवा की भावना परिवर्तन का माध्यम बन सकती है। जब समाज मिलकर समस्याओं का समाधान खोजता है, तब उम्मीद की नई राहें खुलती हैं और जीवन आगे बढ़ता है।

आलोक कुमार

World : जापान में भारतीय आमों की एंट्री क्यों है मुश्किल?

जापान में भारतीय आमों की एंट्री क्यों है मुश्किल? जानिए सख्त नियमों की पूरी कहानी

भारत को आमों का देश कहा जाता है। यहां उगने वाले अल्फांसो, दशहरी, लंगड़ा, चौसा और केसर जैसे आम दुनिया भर में अपनी मिठास और स्वाद के लिए प्रसिद्ध हैं। इसके बावजूद दुनिया के कुछ बड़े बाजारों में भारतीय आमों को प्रवेश पाने के लिए कड़े मानकों से गुजरना पड़ता है। जापान भी ऐसे ही देशों में शामिल है।

अक्सर यह सवाल पूछा जाता है कि क्या जापान ने भारतीय आमों पर प्रतिबंध लगा रखा है। इस प्रश्न का सीधा उत्तर यह है कि जापान ने भारतीय आमों पर कोई स्थायी प्रतिबंध नहीं लगाया है। हालांकि, कुछ अवसरों पर नियमों के उल्लंघन, निरीक्षण संबंधी कमियों या सुरक्षा मानकों पर खरा न उतरने वाली खेपों को अस्थायी रूप से रोका गया है।

जापान का कृषि और खाद्य सुरक्षा तंत्र दुनिया के सबसे सख्त तंत्रों में माना जाता है। वहां आयात होने वाले फलों, सब्जियों और खाद्य पदार्थों की अत्यंत सावधानी से जांच की जाती है। जापानी अधिकारी यह सुनिश्चित करते हैं कि आयातित उत्पादों में किसी प्रकार के हानिकारक कीट, रोग या निर्धारित सीमा से अधिक रासायनिक अवशेष मौजूद न हों।                                                                                           

भारतीय आमों के मामले में सबसे बड़ी चिंता फल मक्खी (फ्रूट फ्लाई) और अन्य कृषि कीटों को लेकर रही है। यदि किसी खेप में ऐसे कीट या उनके अंश पाए जाते हैं, तो जापानी अधिकारी उसे अस्वीकार कर सकते हैं। यही कारण है कि निर्यात से पहले आमों का विशेष उपचार और वैज्ञानिक परीक्षण किया जाता है।

जापान केवल फलों की गुणवत्ता ही नहीं देखता, बल्कि उनकी पूरी यात्रा का रिकॉर्ड भी चाहता है। इसे ट्रेसबिलिटी कहा जाता है। इसके तहत यह जानकारी उपलब्ध होनी चाहिए कि आम किस बाग से आया, उसकी देखभाल कैसे हुई, उसका उपचार कब किया गया और पैकिंग की प्रक्रिया किस प्रकार पूरी की गई। दस्तावेजी प्रक्रिया में किसी भी प्रकार की कमी निर्यात को प्रभावित कर सकती है।

भारत और जापान के बीच कृषि व्यापार को लेकर लगातार सहयोग और संवाद होता रहा है। भारतीय एजेंसियों ने निर्यात मानकों को बेहतर बनाने, निरीक्षण व्यवस्था को मजबूत करने और पैकिंग प्रक्रियाओं को अंतरराष्ट्रीय स्तर के अनुरूप बनाने के लिए कई कदम उठाए हैं। इसका परिणाम यह हुआ कि भारतीय आमों की कई खेपें सफलतापूर्वक जापानी बाजार तक पहुंची हैं।

यह कहना सही नहीं होगा कि जापान भारतीय आम नहीं खरीदना चाहता। वास्तव में जापानी उपभोक्ता भारतीय आमों के स्वाद और गुणवत्ता को पसंद करते हैं। लेकिन जापान केवल उन्हीं उत्पादों को स्वीकार करता है जो उसके सख्त स्वास्थ्य और सुरक्षा मानकों को पूरा करते हैं।

इस पूरे मामले से एक महत्वपूर्ण सीख मिलती है। आज के वैश्विक बाजार में केवल अच्छा उत्पादन ही पर्याप्त नहीं है। गुणवत्ता नियंत्रण, वैज्ञानिक परीक्षण, पारदर्शिता, ट्रेसबिलिटी और अंतरराष्ट्रीय नियमों का पालन भी उतना ही आवश्यक है। वैश्विक प्रतिस्पर्धा में सफलता के लिए उत्पाद की गुणवत्ता के साथ-साथ उसकी विश्वसनीयता भी महत्वपूर्ण होती है।

भारतीय आमों की मिठास और लोकप्रियता पर दुनिया को कोई संदेह नहीं है। यदि किसान, निर्यातक और सरकारी एजेंसियां मिलकर अंतरराष्ट्रीय मानकों का पालन करती रहें, तो जापान ही नहीं बल्कि दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित बाजारों में भी भारतीय आमों की मांग लगातार बढ़ सकती है।


आलोक कुमार