बिहार की राजनीति में इस समय भूमि अतिक्रमण और बुलडोजर कार्रवाई एक बेहद संवेदनशील और चर्चित मुद्दा बन चुका है। खासकर जब राज्य के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी खुद इस अभियान का नेतृत्व करते हुए सख्त रुख अपनाते दिखाई दे रहे हैं। जब वे उपमुख्यमंत्री थे, तभी से “बुलडोजर बाबा” की छवि बन चुकी थी, और अब मुख्यमंत्री बनने के बाद इस अभियान में और तेजी देखी जा रही है। सरकार का स्पष्ट संदेश है कि सरकारी जमीन पर कब्जा करने वालों को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा, चाहे वह आम नागरिक हो या प्रभावशाली व्यक्ति।
लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने कई ज्वलंत सवाल खड़े कर दिए हैं, जिनका उत्तर केवल प्रशासनिक कार्रवाई से नहीं, बल्कि नीति और व्यवस्था के स्तर पर भी तलाशना जरूरी है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर कोई जमीन वास्तव में सरकारी थी, तो उसका रजिस्ट्रेशन कैसे हुआ? रजिस्ट्रेशन के बाद जमाबंदी क्यों की गई? और जब ये सारी प्रक्रियाएं पूरी हो गईं, तो बैंकों ने उस जमीन के आधार पर लोगों को लोन कैसे दे दिया? यह एक-दो लोगों की गलती नहीं लगती, बल्कि यह एक व्यापक प्रशासनिक और संस्थागत विफलता का संकेत देता है।
बिहार जैसे राज्य में, जहां बड़ी संख्या में लोग अपनी जीवनभर की कमाई लगाकर एक छोटा सा घर बनाते हैं, वहां इस तरह की कार्रवाई का सामाजिक और मानवीय प्रभाव भी बहुत बड़ा होता है। लोग वर्षों तक अपनी मेहनत की कमाई से ईंट-ईंट जोड़कर घर बनाते हैं। उस घर में उनके सपने, उनकी उम्मीदें और उनके बच्चों का भविष्य जुड़ा होता है। ऐसे में जब अचानक बुलडोजर चलाकर उन घरों को जमींदोज कर दिया जाता है, तो यह केवल एक अवैध निर्माण को हटाने की कार्रवाई नहीं रहती, बल्कि यह एक पूरे परिवार के जीवन को प्रभावित करने वाली घटना बन जाती है।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि कई मामलों में लोग यह दावा कर रहे हैं कि उन्होंने जमीन खरीदते समय सभी जरूरी दस्तावेज पूरे किए थे। रजिस्ट्री ऑफिस में विधिवत रजिस्ट्रेशन हुआ, राजस्व विभाग ने जमाबंदी की, और यहां तक कि बैंक ने उस जमीन पर लोन भी स्वीकृत किया। ऐसे में आम नागरिक यह कैसे मान ले कि उसकी जमीन अवैध है? अगर कहीं गड़बड़ी थी, तो वह किस स्तर पर हुई? क्या इसके लिए केवल नागरिक जिम्मेदार हैं, या फिर सरकारी तंत्र में बैठे लोगों की भी जवाबदेही तय होनी चाहिए?
सरकार का पक्ष यह है कि हालिया सर्वे में यह पाया गया कि कई जमीनें वास्तव में सरकारी थीं, जिन पर अवैध कब्जा कर लिया गया था। इस आधार पर कार्रवाई की जा रही है। लेकिन यहां सवाल यह उठता है कि सर्वे की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी और निष्पक्ष है? क्या प्रभावित लोगों को अपनी बात रखने का पर्याप्त अवसर दिया जा रहा है? क्या उन्हें कानूनी सहायता मिल रही है? और सबसे महत्वपूर्ण, क्या इस पूरी प्रक्रिया में न्याय का संतुलन बना हुआ है?
इस मुद्दे का एक और पहलू है—भ्रष्टाचार। अगर जमीन का गलत रजिस्ट्रेशन हुआ, जमाबंदी हुई और बैंक से लोन भी मिल गया, तो यह साफ संकेत है कि कहीं न कहीं सिस्टम में भ्रष्टाचार व्याप्त है। ऐसे में केवल गरीब और मध्यम वर्ग के लोगों के घरों पर बुलडोजर चलाना समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकता। जरूरी है कि उन अधिकारियों और कर्मचारियों की भी जांच हो, जिन्होंने इस पूरे प्रक्रिया में भूमिका निभाई। अगर केवल अंतिम उपभोक्ता यानी आम नागरिक को ही सजा दी जाएगी, तो यह न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ होगा।
प्रभावित लोग अब सरकार से अपील कर रहे हैं कि इस समस्या का कोई बीच का रास्ता निकाला जाए। वे चाहते हैं कि जिन लोगों ने अनजाने में या सिस्टम की खामियों के कारण जमीन खरीदी है, उन्हें वैधता देने का कोई उपाय खोजा जाए। उदाहरण के तौर पर, सरकार चाहें तो एक निश्चित शुल्क लेकर या नियमों में संशोधन करके ऐसी जमीनों को नियमित (regularize) कर सकती है। इससे एक ओर जहां लोगों का घर बच जाएगा, वहीं दूसरी ओर सरकार को भी राजस्व प्राप्त होगा।
इसके अलावा, भविष्य में ऐसी समस्याएं न हों, इसके लिए भूमि प्रबंधन प्रणाली में सुधार करना भी बेहद जरूरी है। डिजिटल रजिस्ट्रेशन, पारदर्शी सर्वे, और विभिन्न विभागों के बीच बेहतर समन्वय से इस तरह की गड़बड़ियों को रोका जा सकता है। साथ ही, मकान निर्माण से पहले एनओसी (No Objection Certificate) की प्रक्रिया को भी सरल और अनिवार्य बनाया जाना चाहिए, ताकि बाद में किसी प्रकार का विवाद न उत्पन्न हो।
अंततः, यह मुद्दा केवल कानून और व्यवस्था का नहीं, बल्कि संवेदनशीलता और न्याय का भी है। सरकार को सख्ती के साथ-साथ मानवीय दृष्टिकोण भी अपनाना होगा। जिन लोगों ने जानबूझकर अवैध कब्जा किया है, उनके खिलाफ कार्रवाई जरूरी है, लेकिन जो लोग सिस्टम की खामियों का शिकार हुए हैं, उनके लिए सहानुभूति और समाधान दोनों की आवश्यकता है।
मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के सामने यह एक बड़ी चुनौती है कि वे कानून के शासन को कायम रखते हुए आम जनता के हितों की रक्षा कैसे करें। अगर इस दिशा में संतुलित और न्यायपूर्ण निर्णय लिए जाते हैं, तो न केवल इस समस्या का समाधान संभव है, बल्कि शासन के प्रति लोगों का विश्वास भी मजबूत होगा।
आलोक कुमार

