रविवार, 1 दिसंबर 2013

पुरूष प्रधान देश में पुरूष प्रधान खेत भी है



पटना। सर्वविदित है कि भारत पुरूष प्रधान देश है। वहीं पुरूष प्रधान खेत भी हो गया है। वहां पर कार्यरत व्यक्ति को किसान कहते हैं। राजा के बदले रानी है। मगर किसान के बदले में क्या शब्द है? इसी लिए हम लोग खेत की आड़ी से भोजन की थाली तक अहम किरदार अदा करने वाली वीरांगनाओं को महिला किसान कहते हैं। इन महिलाओं का उत्पादन से वितरण में योगदान रहता है। वहीं 200 से 400 वर्ष पहले तक घर के तमाम सम्पति को पारिवारिक सम्पति कहा जाता था। इस लिए जमीन पर महिलाओं का अधिकार ही नहीं रहा। मगर महिलाओं की मजबूत कंधे पर पूजा पाठ और नेतृत्व की जिम्मेवारी रख दिया गया। इस तरह की अवधारणाओं को कल्याणकारी राज्य की सरकार के द्वारा बदलाव किया जा रहा है। अब महिलाओं को मान-सम्मान,पहचान और अधिकार दिये जा रहे हैं। इंदिरा आवास योजना के तहत मकान बनाते समय और जमीन का पर्चा देते समय महिला और पुरूष के नाम से संयुक्त नाम से वितरण किया जा रहा है।
 योजना एवं विकास विभाग के प्रधान सचिव विजय प्रकाश ने महिला किसान सम्मेलन को संबोधित करते हुए आगे कहा कि यदि हम राज्य में महिला किसानों की संख्या पर गौर करते हैं तो पाते हैं कि 1961 में 16 प्रतिशत,1971 में 2 प्रतिशत,2001 में 5 प्रतिशत और 2011 में 7 प्रतिशत महिला किसान हैं। कुल मिलाकर 30 लाख महिला किसान है। वहीं किसानों की कुल संख्या 1 करोड़ 61 लाख है।
महिला किसानों की आंकड़ाबाजी करते-करते प्रधान सचिव सरकार के द्वारा महिलाओं के पक्ष में किये कार्यों को गिनाने लगे। त्रिस्तरीय ग्राम पंचायत में 50 प्रतिशत, शिक्षिकाओं की बहाली में 50 प्रतिशत, पैक्स में 50 प्रतिशत और पुलिस विभाग के इंस्पेक्टर की बहाली में 35 प्रतिशत आरक्षण महिलाओं को दे रहे हैं। समेकित बाल विकास परियोजना महिलाओं के ही जिम्मे हैं। आंगनबाड़ी केन्द्र में 90 लाख सेविका और 90 लाख सेविका सेवारत हैं। इसमें सीडीपीओ भी महिला ही हैं। अभी स्वयं सहायता समूह की महिला सदस्यों की संख्या 64 लाख 61 हजार है। अभी 1 लाख 10 हजार स्वयं सहायता समूह है। इसे 5 साल में बढ़ाकर 10 हजार कर देना है। तबतक 1 करोड़ सदस्य भी हो जाएंगे। इस दिशा में मेजर परिवर्तन हो रहा है। सरकार सचेत होकर कार्यशील है।
शिक्षा के संदर्भ में जिक्र करते हुए आगे कहा कि 2001-11 तक 20 प्रतिशत साक्षरता दर में वृद्धि हुई है। 53 प्रतिशत से 73 प्रतिशत साक्षरता दर में इजाफा हुई है। वहीं समाज के किनारे रहने वाले महादलित मुसहर समुदाय के बारे में कहा कि 1961 में ढाई प्रतिशत से बढ़क 2001 में 9 प्रतिशत साक्षरता दर हो सकी है। इस समुदाय में साक्षरता दर की रफ्तार काफी धीमी है। अगर इसी तरह का हाल रहा तो 500 साल में साक्षर हो सकेंगे। सभागार में बैठे महिला किसानों से कहा कि महिला किसान होने का हक लेने के साथ शिक्षा का अधिकार भी लेने की जरूरत है। तब जाकर अधिकार मिलेगा। हम तो शिक्षा के क्षेत्र में लड़का और लड़की की संख्या में समानता के डगर पर है। इसी तरह खेत में पुरूष और महिला को समान अधिकार समान पहचान की दिशा में कारगर कार्य करने की जरूरत है।
आलोक कुमार

शुक्रवार, 8 नवंबर 2013

लोगों ने तिनके-तिनके जोड़-जोड़कर घर बनाएं





 

*हम  विश्वास करते हैं आप काम करते हैं, और अब कार्रवाई करने का समय गयी है कार्रवाई करनी चाहिए। यह बिल्डरों और नगर निगम अधिकारियों की लॉबी की मिलीभगत से अन्याय के खिलाफत धर्म की जीत होगी ऐसा करके हमलोगों के घरों को बचा ले। आप यह जरूर कर सकते हैं

मुम्बई। 25 वर्षों से अधिक समय से रहते हैं। इन लोगों ने तिनके-तिनके जोड़-जोड़कर घर बनाएं हैं। आने वाले 11 नवम्बर,2013 किसी बुरे सपने से कम नहीं होगा। उस दिन बुलडोजर से 102 घरों को जमींदोज कर दिया जाएगा। इनके घरों के तमाम समान बाहर सड़कों पर फेंक दिया जाएगा। सभी लोगों के प्यारे समान को तहस-नहस कर दिया जाएगा। बच्चों और महिलाओं को परिजन कहां ले जाएंगे। यह सवाल उठ खड़ा हुआ है। बुजुर्ग को कहां ले जाएंगे? अब कैसे अपने बच्चों को आश्रय दे सकेंगे ? सच में गरीब लोग अपने घरों को खो देंगे, अपने रिश्तेदारों को खो देंगे। एक बसा- बसाया मलिन बस्तियों  के अस्तित्व मिट्टी में मिला देंगे।
कैम्पा कोला कंपाउंड,वर्ली, मुम्बई के इस अतिक्रमण वाली जमीन पर बनाया गया मलिन बस्तियों का एक साधारण विध्वंस नहीं है। वास्तव में, 1995 से पहले निर्मित मलिन बस्तियों वास्तव में नियमित और वैकल्पिक आवास की व्यवस्था की गई है। वे स्टांप शुल्क का भुगतान किया है और पंजीकरण शुल्क, क्योंकि वे संपत्ति कर का भुगतान करते हैं क्योंकि कैम्पा कोला कंपाउंड के कानून का पालन करने वाला निवासियों की गलती हैं। यहां पर सीधे निवासियों को ही जवाबदेह बनाया गया है। उनको बस एक ही अपराध के लिए सजा दी जा रही है। यहां पर लोग रहते हैं। तंत्र के द्वारा अनधिकृत विकास के लिए जिम्मेदार बिल्डरों बख्शा गया है।
25 सालों से रहने वाले इन निवासियों को किसी तरह का मुआवजा या वैकल्पिक आवास की सुविधा दिये ही बिना, बेघर किया जा रहा है। विडंबना यह है कि 46 प्रतिशत एफएसआई से अनुमान्य की सीमा के भीतर है, जबकि विध्वंस के लिए चिह्नित क्षेत्र के केवल 10 प्रतिशत , एफएसआई सीमा का उल्लंघन कर रही है। एफएसआई के सर्वाेत्तम प्रयासों के बावजूद निवासियों को उनके मामले का औचित्य साबित करने के लिए बिल्डर  और निगम के गठजोड़ से लड़ने में असमर्थ पा रहे है।
निवासियों सुधार की जरूरत है कि एक प्रणाली के शिकार हैं। कानून लागू किया गया है , लेकिन न्याय प्रबल नहीं किया गया है सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार, अनधिकृत हैं कि मुंबई शहर में 55,000 इमारतों को खत्म हो गई हैं आज यह कैम्पा कोला है , कल यह तुम हो सकता है। व्यवस्था बदलने की जरूरत है , और केवल आप उस परिवर्तन के बारे को ला सकते हैं। इस परिवर्तन के बारे में और लाने में मदद करने की अपील की गयी है। मदद करने सैकड़ों की संख्या बेघर होने वाले लोगों को नयी जीवन देने में सहायक बन सकते हैं।
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण को लिखे खतः
जो मुंबईवासी कैम्पा कोला के परिसर में रहते हैं। उनको बेघर किया जा रहा है। कोई 102 परिवार रहते हैं। उनको 768 मुम्बईवासियों और निवासियों के समर्थन में खड़े हो गये हैं। इन लोगों ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण को खत लिखा है। इसमें बिल्डर और नगर निगम के गठजोड़ के बारे में इशारा किया गया है।
11 नवंबर, 2013 पर, कैम्पा कोला परिसर के निवासियों को अपने घरों से बेदखल कर दिया जाएगा। बिल्डरों को मोटी राशि भुगतान करके खरीदे। नगर निगम के अधिकारियों ने अंधेरे में फ्लैट खरीदारों को रखा। नगर निगम ने लॉलीपोप दिया। सब के सब दूर टैक्स मुक्त हो जाओ। यह एक तरह से एक अंधे आँख से बदल देना साबित हुआ। इससे 102 निर्दोष परिवारों को दंडित कर दिया। घर से बेघर कर देना। यह छोटे दंड नहीं है। यह एक घर की हानि, तो कानूनी रूप से खरीदा गया था कि उनके सिर पर एक छत है। परिवार में रोटी कमाने के लिए, यह सजा कुछ भी नहीं है लेकिन एक मौत की सज़ा नहीं है? आपसे आशा और विश्वास है कि इस आसन्न त्रासदी के लिए विधायी ढांचे के भीतर एक समाधान खोजे। जो विधायी वाले वंदे में शक्ति निहित हैं। हम  विश्वास करते हैं आप काम करते हैं, और अब कार्रवाई करने का समय गयी है कार्रवाई करनी चाहिए। यह बिल्डरों और नगर निगम अधिकारियों की लॉबी की मिलीभगत से अन्याय के खिलाफत धर्म की जीत होगी ऐसा करके हमलोगों के घरों को बचा ले। आप यह जरूर कर सकते हैं
!आलोक कुमार

वर्षों से इस मुद्दे को लेकर लगातार आंदोलन किया

अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस (1 मई) की पूर्व संध्या पर देशभर के करोड़ों श्रमिकों, पेंशनभोगियों और विशेष रूप से ईपीएस-95 (Employees’ Pension Sche...