सेवा, आस्था और समर्पण का जीवन — एस.डी. सेलेस्टीन
बिहार के बेतिया धर्मप्रांत के अंतर्गत चुहड़ी पल्ली ने अनेक व्यक्तित्वों को जन्म दिया, परंतु उनमें से कुछ ही ऐसे होते हैं जिनकी जीवन-यात्रा समय के साथ स्मृतियों में नहीं, बल्कि प्रेरणा के रूप में जीवित रहती है। सेराफीन डेविड सेलेस्टीन, जिन्हें लोग एस.डी. सेलेस्टीन के नाम से जानते थे, ऐसे ही एक विलक्षण व्यक्तित्व थे। उनका जीवन केवल व्यक्तिगत उपलब्धियों की कहानी नहीं, बल्कि समाज सेवा, धार्मिक आस्था और मानवीय संवेदनाओं से बुनी हुई एक गहन जीवन-गाथा है।
9 जून 1936 को जन्मे एस.डी. सेलेस्टीन, स्वर्गीय डेविड सेलेस्टीन के पुत्र थे। उनके परिवार में तीन भाई थे—एस.डी. सेलेस्टीन, के.डी. सेलेस्टीन और जी.डी. सेलेस्टीन। इन तीनों ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा के. आर. उच्च विद्यालय से प्राप्त की। विद्यालय जीवन में ही सेलेस्टीन का व्यक्तित्व स्पष्ट रूप से आकार लेने लगा था। वे केवल अध्ययनशील ही नहीं थे, बल्कि खेलकूद में भी सक्रिय रहते थे, विशेषकर फुटबॉल के प्रति उनका विशेष रुझान था।
शिक्षा पूर्ण करने के पश्चात बेहतर भविष्य की तलाश में उन्होंने पटना का रुख किया। यहीं से उनके जीवन का एक नया अध्याय आरंभ हुआ। उन्होंने पोस्ट एंड टेलीग्राफ विभाग में नौकरी प्राप्त की और अपने परिश्रम, अनुशासन तथा ईमानदारी के बल पर वरिष्ठ सेक्शन सुपरवाइजर के पद तक पहुँचे। यह उपलब्धि केवल एक पदोन्नति नहीं थी, बल्कि उनके समर्पण और कार्यनिष्ठा का प्रमाण थी। नौकरी के साथ-साथ वे सामाजिक सरोकारों से भी गहराई से जुड़े रहे।
उनका विवाह बेनेदिक्ता न्याट्रिस के साथ हुआ। यह दांपत्य जीवन प्रेम, उत्तरदायित्व और पारिवारिक मूल्यों से परिपूर्ण था। इस परिवार में चार पुत्रियाँ और तीन पुत्रों का जन्म हुआ, और जीवन एक सुखद पारिवारिक प्रवाह में आगे बढ़ता रहा। परंतु जीवन सदैव सरल नहीं होता—उसमें दुख और परीक्षण भी शामिल होते हैं।
एस.डी. सेलेस्टीन के जीवन का सबसे गहरा आघात उनकी पुत्री किरण पीटर की असमय मृत्यु थी। किरण, जिन्होंने कुर्जी होली फैमिली अस्पताल से जनरल नर्सिंग की शिक्षा प्राप्त की थी, स्वयं उसी अस्पताल में प्रसव के दौरान जटिलताओं का शिकार हो गईं। अत्यधिक रक्तस्राव के कारण उनका निधन हो गया। यह घटना केवल एक परिवार का नहीं, बल्कि पूरे जीवन-तंत्र का भावनात्मक टूटन था। नवजात शिशु करण ने अपनी माँ का स्नेह कभी महसूस नहीं किया, और आगे चलकर पिता पीटर जेम्स का भी निधन हो गया, जिससे यह त्रासदी और गहरी हो गई।इन व्यक्तिगत पीड़ाओं के बावजूद एस.डी. सेलेस्टीन ने अपने जीवन को टूटने नहीं दिया। उन्होंने अपने दुखों को सेवा में बदल दिया। वे क्रिश्चियन वेलफेयर एसोसिएशन के सक्रिय कार्यकारिणी सदस्य रहे और संत विन्सेंट डी पौल सोसाइटी, पटना सेंट्रल काउंसिल के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने गरीबों, बीमारों और जरूरतमंदों की सहायता में अपना जीवन समर्पित कर दिया। वे केवल संस्था के पदाधिकारी नहीं थे, बल्कि वास्तविक अर्थों में सेवा के सिपाही थे। वे स्वयं लोगों के घरों तक पहुँचते, उनकी समस्याएँ सुनते और यथासंभव सहायता करते।
उनकी आस्था अत्यंत गहरी और अटूट थी। वे प्रतिदिन चर्च में मिस्सा प्रार्थना में भाग लेते थे। वृद्धावस्था और शारीरिक कठिनाइयों के बावजूद उनकी यह दिनचर्या कभी नहीं टूटी। प्रेरितों की रानी ईश मंदिर तक वे नियमित रूप से पहुँचते थे, जहाँ उनका मन ईश्वर की आराधना में स्थिर रहता था। यह उनकी आध्यात्मिक दृढ़ता और विश्वास का जीवंत प्रमाण था।
वर्ष 2004 में उनके हृदय में पेसमेकर लगाया गया, और 2016 में पुनः एक और चिकित्सा प्रक्रिया से उन्हें गुजरना पड़ा। इसके बावजूद उनका स्वास्थ्य धीरे-धीरे गिरने लगा। अंततः 30 जुलाई 2016 को उन्होंने 80 वर्ष की आयु में अंतिम सांस ली। उनका निधन केवल एक व्यक्ति का अंत नहीं था, बल्कि एक युग का शांत अवसान था।
उनके निधन के बाद पूरे पटना और आसपास के क्षेत्रों में शोक की लहर फैल गई। अंतिम समय उन्होंने अपने पुत्र सुनील कुमार के आवास पर बिताया। ईसाई धर्म परंपरा के अनुसार उनका अंतिम संस्कार अत्यंत श्रद्धा और सम्मान के साथ किया गया। कुर्जी पल्ली के चर्च में अंतिम मिस्सा पूजा संपन्न हुई, जिसका नेतृत्व फादर जॉनसन ने किया।
इस अवसर पर फादर आल्फ्रेड जॉर्ज सेलेस्टीन, जो उनके भतीजे भी थे, विशेष रूप से उपस्थित हुए। उन्होंने अपने प्रवचन में कहा कि एस.डी. सेलेस्टीन ने जीवन की अच्छी लड़ाई लड़ी और अंततः ईश्वर की इच्छा के आगे समर्पण कर दिया। उनके शब्दों ने उपस्थित सभी लोगों के हृदय को गहराई से छू लिया।
अंततः उन्हें कुर्जी कब्रिस्तान में पूरे सम्मान के साथ दफनाया गया। उस क्षण उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति की आँखें नम थीं, और वातावरण में एक गहन मौन छा गया था—एक ऐसा मौन जिसमें स्मृतियाँ बोल रही थीं।
एस.डी. सेलेस्टीन का जीवन यह स्पष्ट संदेश देता है कि मानव की वास्तविक पहचान उसके पद या उपलब्धियों में नहीं, बल्कि उसकी सेवा, करुणा और आस्था में निहित होती है। उन्होंने अपने जीवन में अनेक दुख झेले, परंतु कभी अपने मूल्यों को नहीं छोड़ा। वे उन विरल व्यक्तित्वों में से थे, जिनका जीवन स्वयं एक प्रेरणा बन जाता है।
आज भी उनका स्मरण केवल एक व्यक्ति की याद नहीं, बल्कि उस विचार की स्मृति है जिसमें सेवा ही धर्म है, और समर्पण ही जीवन का सर्वोच्च अर्थ।
आलोक कुमार
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