यहां के लोगों की संस्कृति, परंपरा और जीवनशैली का अहम हिस्सा हैं
यहां के लोगों की संस्कृति, परंपरा और जीवनशैली का अहम हिस्सा हैं।पश्चिम चंपारण (बिहार) की पहचान केवल उसके ऐतिहासिक महत्व—जैसे चंपारण सत्याग्रह—से ही नहीं, बल्कि उसके समृद्ध खान-पान से भी होती है। इस क्षेत्र के स्वाद में जो आत्मीयता और परंपरा की मिठास है, वह खासकर आनंदी का चूड़ा और चिकन ताश जैसे व्यंजनों में झलकती है। ये केवल खाने की चीजें नहीं हैं, बल्कि यहां के लोगों की संस्कृति, परंपरा और जीवनशैली का अहम हिस्सा हैं।
सबसे पहले बात करें आनंदी के चूड़ा की, तो यह पश्चिम चंपारण के चनपटिया और आसपास के इलाकों में बनने वाला एक बेहद खास खाद्य पदार्थ है। चूड़ा, जिसे सामान्य भाषा में पोहा या चिवड़ा भी कहा जाता है, भारत के कई हिस्सों में बनाया जाता है, लेकिन “आनंदी का चूड़ा” अपनी गुणवत्ता और स्वाद के कारण अलग पहचान रखता है। इसका पतलापन, हल्कापन और कुरकुरापन इसे विशेष बनाता है। पारंपरिक तकनीक से धान को भिगोकर, सुखाकर और फिर विशेष ढंग से कूटकर तैयार किया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में अनुभव और धैर्य की जरूरत होती है, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी स्थानीय कारीगरों में स्थानांतरित होती रही है।इस चूड़ा का सबसे बड़ा महत्व मकर संक्रांति के त्योहार में देखने को मिलता है। बिहार में इस पर्व पर “चूड़ा-दही और तिलकुट” खाने की परंपरा सदियों पुरानी है। खासकर पश्चिम चंपारण में यदि आनंदी का चूड़ा न हो, तो संक्रांति का स्वाद अधूरा माना जाता है। यह केवल भोजन नहीं, बल्कि सामाजिक जुड़ाव और परंपरा का प्रतीक है। परिवार के सभी सदस्य एक साथ बैठकर इस व्यंजन का आनंद लेते हैं, जिससे पारिवारिक और सामाजिक संबंध और मजबूत होते हैं।
इसके अलावा, आनंदी का चूड़ा अब स्थानीय पहचान का प्रतीक बन चुका है। इसे भौगोलिक संकेतक (GI Tag) दिलाने के प्रयास भी इस बात को दर्शाते हैं कि यह केवल एक उत्पाद नहीं, बल्कि क्षेत्रीय ब्रांड बन चुका है। यह कई परिवारों की आजीविका का प्रमुख साधन भी है। चनपटिया क्षेत्र में सैकड़ों परिवार इस उद्योग से जुड़े हुए हैं और पारंपरिक तरीके से चूड़ा बनाकर अपनी जीविका चला रहे हैं। इस तरह यह स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूती प्रदान करता है।
अब बात करें पश्चिम चंपारण के दूसरे लोकप्रिय व्यंजन चिकन ताश की, जो खासकर बेतिया शहर में बेहद प्रसिद्ध है। चिकन ताश एक मसालेदार, सूखा और तीखा चिकन व्यंजन है, जिसे खास अंदाज में तैयार किया जाता है। इसका नाम “ताश” इसलिए पड़ा क्योंकि इसे बनाने के दौरान चिकन के टुकड़ों को तेज आंच पर इस तरह से भुना जाता है कि वे ताश के पत्तों की तरह खड़कते और कुरकुरे हो जाते हैं।चिकन ताश का स्वाद तीखा और चटपटा होता है, जो इसे खास बनाता है। इसमें स्थानीय मसालों का भरपूर उपयोग किया जाता है, जैसे लाल मिर्च, धनिया, लहसुन और अदरक। इसे आमतौर पर शाम के नाश्ते के रूप में परोसा जाता है और इसके साथ “चूड़ा-मूढ़ी” या मुरमुरा दिया जाता है। यह संयोजन इतना लोकप्रिय है कि स्थानीय लोग ही नहीं, बल्कि बाहर से आने वाले पर्यटक भी इसका स्वाद चखने के लिए उत्सुक रहते हैं।
बेतिया और आसपास के इलाकों में यह एक प्रमुख स्ट्रीट फूड के रूप में विकसित हो चुका है। छोटे-छोटे ठेलों और दुकानों पर शाम होते ही लोगों की भीड़ उमड़ पड़ती है। चिकन ताश का स्वाद ऐसा होता है कि एक बार खाने के बाद लोग बार-बार इसे खाने के लिए आकर्षित होते हैं। यह व्यंजन स्थानीय युवाओं के बीच खासा लोकप्रिय है और अब धीरे-धीरे अन्य शहरों में भी अपनी पहचान बना रहा है।
इन दोनों व्यंजनों की खासियत यह है कि ये पश्चिम चंपारण की मिट्टी से जुड़े हुए हैं। जहां आनंदी का चूड़ा सादगी, परंपरा और स्वास्थ्य का प्रतीक है, वहीं चिकन ताश आधुनिकता, चटपटे स्वाद और स्ट्रीट फूड संस्कृति का प्रतिनिधित्व करता है। दोनों मिलकर इस क्षेत्र की खाद्य विविधता को दर्शाते हैं।
अंततः कहा जा सकता है कि पश्चिम चंपारण का यह स्वाद केवल जीभ को ही नहीं, बल्कि दिल को भी संतुष्ट करता है। आनंदी का चूड़ा और चिकन ताश यहां की सांस्कृतिक धरोहर हैं, जो समय के साथ और भी लोकप्रिय होते जा रहे हैं। ये व्यंजन न केवल स्थानीय लोगों की पहचान हैं, बल्कि बिहार के गौरव को भी पूरे देश में फैलाने का काम कर रहे हैं।
आलोक कुमार