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सोमवार, 26 जनवरी 2026
गुमनामी से गौरव तक: साकिबुल गनी के नेतृत्व में बिहार क्रिकेट का ऐतिहासिक उदय
गुमनामी से गौरव तक: साकिबुल गनी के नेतृत्व में बिहार क्रिकेट का ऐतिहासिक उदय
बिहार क्रिकेट टीम के कप्तान साकिबुल गनी—आज यह नाम सिर्फ एक खिलाड़ी या कप्तान भर नहीं, बल्कि बिहार क्रिकेट के पुनर्जागरण का प्रतीक बन चुका है.उनके नेतृत्व में बिहार ने विजय हजारे ट्रॉफी प्लेट ग्रुप और रणजी ट्रॉफी प्लेट ग्रुप में मणिपुर को पराजित कर खिताब अपने नाम किए और अब प्लेट से निकलकर एलीट ग्रुप में ऐतिहासिक प्रवेश कर लिया है.
विजय हजारे ट्रॉफी में इतिहास रचने वाला शतक
विजय हजारे ट्रॉफी प्लेट ग्रुप में नंबर-5 पर बल्लेबाज़ी करते हुए साकिबुल गनी ने वह कर दिखाया, जिसकी कल्पना तक मुश्किल थी.महज़ 32 गेंदों में शतक जड़कर उन्होंने इतिहास रच दिया.सिर्फ 40 गेंदों पर 128 रन की नाबाद पारी खेलते हुए साकिबुल गनी लिस्ट-ए क्रिकेट में सबसे तेज़ शतक लगाने वाले भारतीय बल्लेबाज़ बन गए.यह पारी सिर्फ रिकॉर्ड नहीं थी—यह बिहार क्रिकेट के बदले हुए मिज़ाज का ऐलान थी.
मोइनुल हक़ स्टेडियम: इतिहास का सजीव गवाह
रणजी ट्रॉफी प्लेट ग्रुप का फाइनल मुकाबला पटना के ऐतिहासिक मोइनुल हक़ स्टेडियम में खेला गया.जीर्णोद्धार की उम्मीद में खड़ी इसकी पुरानी दीवारें गवाह हैं कि बिहार क्रिकेट ने कितनी बेरुख़ी झेली, कितनी बार खुद को साबित करने का इंतज़ार किया.लेकिन इस बार फिज़ा बदली हुई थी.जब ख़िताबी मुक़ाबले में विरोधी टीम का आख़िरी विकेट गिरा, तो लगा मानो बिहार के सीने से वर्षों का बोझ उतर गया हो.यह सिर्फ एक जीत नहीं थी—यह उन तमाम सवालों का जवाब थी, जो वर्षों से बिहार क्रिकेट की क़ाबिलियत पर उठते रहे.
568 रनों की ऐतिहासिक जीत
बिहार ने मणिपुर को 568 रनों के विशाल अंतर से पराजित कर रणजी ट्रॉफी प्लेट ग्रुप का ताज अपने सिर सजाया।
पहली पारी: 522 रन, दूसरी पारी: 505 रन. ये आंकड़े नहीं, बल्कि उस ज़िद और आत्मविश्वास का प्रतीक थे, जो बिहार क्रिकेट ने वर्षों की उपेक्षा के बाद हासिल किया.
कप्तान की आंखों में संघर्ष की कहानी
जब ‘मैन ऑफ द मैच’ का खिताब साकिबुल गनी के हाथों में आया, तो उनकी चमकती आंखों में साफ़ झलक रहा था—गुमनामी से एलीट ग्रुप तक का लंबा, संघर्षपूर्ण सफर.इस रणजी ट्रॉफी प्लेट ग्रुप के प्रमुख प्रदर्शन.सर्वाधिक विकेट (18): हिमांशु सिंह (बिहार)
सर्वाधिक रन (540): आयुष लोहरूका
गौरतलब है कि हिमांशु सिंह अब 42 विकेट के साथ बिहार के लिए रणजी ट्रॉफी में सर्वाधिक विकेट लेने वालों की सूची में पांचवें स्थान पर पहुंच चुके हैं.
पर्दे के पीछे के नायक
इस ऐतिहासिक सफलता के पीछे कई ऐसे चेहरे हैं, जो कैमरों से दूर रहकर बिहार क्रिकेट की नींव मजबूत करते रहे.बीसीए के सचिव ज़ियाउल अरफ़ीन ने इस उपलब्धि का श्रेय.नंदन सिंह की मुस्तैदी,विनायक सामंत की रणनीतिऔर पूरे सपोर्ट स्टाफ के समर्पण को दिया. कोच संजय, मृदुल, डॉक्टर हेमेंदु और गोपाल—ये वो सिपहसालार हैं, जिन्होंने इस जीत की इबारत को मुकम्मल किया.
अब एलीट ग्रुप में बिहार
अब बिहार क्रिकेट का परचम एलीट ग्रुप में लहराएगा. यह जीत हर उस बिहारी क्रिकेट प्रेमी की रूह को सुकून देती है, जिसने मुश्किल दौर में भी अपनी टीम का साथ नहीं छोड़ा.
मुबारक हो बिहार!
आज तुम्हारी तक़दीर ने खुद अपने हाथों से नया इतिहास लिखा है.
आलोक कुमार
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Last Updated: 26 जनवरी 2026
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आलोक कुमार
रविवार, 25 जनवरी 2026
आज का भारत और बेरोज़गारी: डिग्री हाथ में, भविष्य सवालों में
आज का भारत और बेरोज़गारी: डिग्री हाथ में, भविष्य सवालों में
आज भारत में सबसे डरावना शब्द अगर कोई है, तो वह है—बेरोज़गारी
यह सिर्फ आंकड़ों की समस्या नहीं है, यह हर उस युवा की आंखों में दिखने वाला डर है, जो हाथ में डिग्री लिए नौकरी की कतार में खड़ा है. आज सवाल यह नहीं कि भारत में प्रतिभा है या नहीं, सवाल यह है कि क्या प्रतिभा के लिए अवसर हैं? आज का युवा मेहनत कर रहा है, पढ़ रहा है, प्रतियोगी परीक्षाएं दे रहा है—लेकिन बदले में उसे मिल रहा है इंतज़ार, निराशा और अनिश्चित भविष्य.
डिग्री बढ़ी, नौकरियां घटीं
पिछले एक दशक में भारत में उच्च शिक्षा पाने वाले युवाओं की संख्या तेज़ी से बढ़ी है। इंजीनियर, मैनेजमेंट ग्रेजुएट, पीएचडी—हर साल लाखों युवा डिग्री लेकर बाहर निकलते हैं.लेकिन नौकरियों की संख्या उसी अनुपात में नहीं बढ़ी.
नतीजा यह है कि इंजीनियर डिलीवरी बॉय बन रहे हैं, पोस्ट ग्रेजुएट कॉल सेंटर में काम कर रहे हैं,और पीएचडी धारक अस्थायी नौकरी के सहारे जी रहे हैं.यह सिर्फ रोजगार का संकट नहीं, सम्मान और आत्मविश्वास का संकट भी है.
प्रतियोगी परीक्षाएं: उम्मीद का नहीं, थकान का नाम
सरकारी नौकरी आज भी करोड़ों युवाओं का सपना है.लेकिन हकीकत यह है कि एक पद के लिए लाखों आवेदन,सालों तक परीक्षा,फिर परिणाम में देरी, और कई बार भर्ती रद्द.यह प्रक्रिया युवाओं को मानसिक रूप से थका रही है.उनका सबसे उत्पादक समय सिर्फ तैयारी में निकल जाता है—बिना किसी गारंटी के
निजी क्षेत्र: अवसर या शोषण?
निजी क्षेत्र में नौकरियां हैं, लेकिन स्थिरता नहीं.कॉंट्रैक्ट जॉब, कम वेतन, लंबे घंटे,और नौकरी जाने का हमेशा डर. आज का युवा सिर्फ नौकरी नहीं चाहता, वह सम्मानजनक और सुरक्षित भविष्य चाहता है.
ग्रामीण युवा: सबसे ज्यादा प्रभावित
ग्रामीण भारत का युवा दोहरी मार झेल रहा है.खेती से आय घट रही है,और शहरों में नौकरी मिल नहीं रही.गांव से शहर की ओर पलायन बढ़ रहा है, लेकिन शहर भी अब सभी को जगह देने की स्थिति में नहीं हैं.यह असंतुलन सामाजिक तनाव को जन्म दे रहा है.
सरकार की भूमिका और सीमाएं
सरकारें रोजगार के वादे करती हैं,योजनाएं बनती हैं, स्किल डेवलपमेंट की बातें होती हैं.लेकिन ज़मीनी स्तर पर उद्योग, शिक्षा और रोजगार के बीच तालमेल की कमी साफ दिखती है.केवल कौशल सिखाना काफी नहीं,उसी कौशल के अनुरूप नौकरियां पैदा करना भी ज़रूरी है.
बेरोज़गारी के सामाजिक असर
बेरोज़गारी सिर्फ आर्थिक समस्या नहीं है.यह पारिवारिक तनाव बढ़ाती है,मानसिक स्वास्थ्य पर असर डालती है, और कई बार अपराध की ओर भी धकेलती है.जब युवा खुद को बेकार महसूस करने लगता है,तो समाज की ऊर्जा कमजोर पड़ जाती है.
समाधान क्या हो सकता है?
समाधान एक नहीं, कई स्तरों पर चाहिए: शिक्षा को रोजगार-उन्मुख बनाना.छोटे और मध्यम उद्योगों को प्रोत्साहन.स्टार्टअप्स को वास्तविक समर्थन.सरकारी भर्तियों में पारदर्शिता और समयबद्धता.ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार सृजन.सबसे जरूरी है—युवा को सिर्फ आश्वासन नहीं, अवसर देना.
निष्कर्ष: बेरोज़गार युवा, कमजोर भविष्य
कोई भी देश अपने युवाओं की अनदेखी करके आगे नहीं बढ़ सकता.अगर आज का युवा हताश है, तो कल का भारत कमजोर होगा.आज ज़रूरत है ईमानदार आत्ममंथन की—क्या हम युवाओं को सिर्फ सपने दिखा रहे हैं,या उन्हें पूरा करने का रास्ता भी दे रहे हैं?
चिंगारी प्राइम न्यूज आज यही सवाल उठाता है,
क्योंकि बेरोज़गारी सिर्फ युवाओं की नहीं,
पूरे देश की समस्या है.
आलोक कुमार
शनिवार, 24 जनवरी 2026
आज की सबसे बड़ी सच्चाई: महंगाई नहीं बढ़ी, आम आदमी की सांसें छोटी हुई हैं
आज की सबसे बड़ी सच्चाई: महंगाई नहीं बढ़ी, आम आदमी की सांसें छोटी हुई हैं
आज जब सुबह एक आम नागरिक घर से निकलता है, तो उसके हाथ में सिर्फ चाबी और मोबाइल नहीं होता—उसके कंधों पर महंगाई का बोझ भी लदा होता है। दूध, सब्ज़ी, दाल, गैस, दवा, शिक्षा—ऐसा शायद ही कोई क्षेत्र बचा हो, जहां दाम चुपचाप न बढ़े हों. सवाल यह नहीं है कि महंगाई बढ़ रही है या नहीं, सवाल यह है कि क्या आम आदमी की आमदनी भी उसी रफ्तार से बढ़ी है?यही आज का सबसे बड़ा मुद्दा है। यही आज की सबसे कड़वी सच्चाई है.
आंकड़े कहते हैं “कंट्रोल में”, ज़िंदगी कहती है “मुश्किल में”
सरकारी आंकड़े अक्सर बताते हैं कि महंगाई दर “काबू में” हैलेकिन किचन का बजट कुछ और कहानी कहता है. सब्ज़ी मंडी, मेडिकल स्टोर और स्कूल की फीस—इन तीन जगहों पर खड़े होकर कोई भी समझ सकता है कि महंगाई सिर्फ प्रतिशत नहीं, अनुभव है.आज की महंगाई सबसे ज्यादा असर डाल रही है उस वर्ग पर, जो न गरीब है और न अमीर—मिडिल क्लास. न उसे सब्सिडी पूरी मिलती है, न उसकी आय इतनी है कि बढ़ते खर्च को नज़रअंदाज़ कर सके.
वेतन वहीं का वहीं, खर्च आसमान पर
नौकरीपेशा वर्ग की सैलरी साल में एक बार बढ़ती है—वो भी अगर किस्मत साथ दे.लेकिन महंगाई रोज़ बढ़ती है. बिजली का बिल, घर का किराया, बच्चों की पढ़ाई, और बुज़ुर्गों की दवाइयाँ—इन सबमें हर महीने “छोटी-छोटी” बढ़ोतरी होती है, जो साल के अंत तक बड़ा झटका बन जाती है.नतीजा यह है कि लोग बचत नहीं कर पा रहे,और जो कर रहे हैं, वह आपातकाल के डर से.
युवा वर्ग: सपनों और EMI के बीच फंसा
आज का युवा सिर्फ करियर नहीं बना रहा, वह EMI, क्रेडिट कार्ड और बढ़ते खर्चों से भी जूझ रहा है.घर खरीदना सपना बन गया है, शादी कर्ज़ बन गई है, और नौकरी की सुरक्षा सवाल बन गई है.महंगाई ने युवा वर्ग से सिर्फ पैसा नहीं छीना, भरोसा भी छीना है—भविष्य पर भरोसा.
ग्रामीण भारत की अलग लड़ाई
शहरों में महंगाई जेब पर असर डालती है, लेकिन गांवों में यह जीविका पर हमला करती है.किसान को फसल का सही दाम नहीं मिलता,लेकिन बीज, खाद और डीज़ल महंगे होते जा रहे हैं. ग्रामीण मज़दूरी बढ़ी है,लेकिन महंगाई उससे कहीं तेज़.इस असंतुलन का असर पूरे देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है.
सरकार की चुनौती और ज़िम्मेदारी
सरकार के लिए महंगाई सिर्फ आर्थिक मुद्दा नहीं, यह राजनीतिक और सामाजिक मुद्दा भी है.नीतियां बनती हैं, योजनाएं घोषित होती हैं, लेकिन ज़मीनी असर समय लेता है.सबसे बड़ी चुनौती यह है कि महंगाई पर नियंत्रण के साथ-साथ आमदनी के स्रोत भी मजबूत किए जाएं. केवल दाम रोकना काफी नहीं, कमाई बढ़ाना भी उतना ही ज़रूरी है.बाजार, मुनाफा और नैतिकता एक कड़वा सच यह भी है कि कुछ जगहों पर महंगाई मजबूरी नहीं,मुनाफाखोरी का नतीजा है. त्योहार आते ही दाम बढ़ जाते हैं.संकट आते ही जमाखोरी शुरू हो जाती है.यह सिर्फ आर्थिक नहीं, नैतिक संकट भी है.
आम आदमी क्या करे?
आम आदमी के पास विकल्प सीमित हैं, लेकिन विवेक अब भी है.खर्च की प्राथमिकता तय करना,अनावश्यक दिखावे से दूरी, और वित्तीय समझ—आज के दौर में यही बचाव के हथियार हैं.साथ ही, सवाल पूछना भी ज़रूरी है. लोकतंत्र में चुप्पी समाधान नहीं होती.
निष्कर्ष: महंगाई से बड़ी चुनौती है असमानता
आज की समस्या सिर्फ महंगाई नहीं, बल्कि यह है कि इसका बोझ बराबर नहीं बंट रहा.जो पहले से मजबूत हैं, वे संभल जाते हैं.जो कमजोर हैं, वे और पीछे छूट जाते हैं.आज ज़रूरत है ऐसी नीतियों की, जो सिर्फ आंकड़ों में नहीं,रसोई और जेब में राहत दें.क्योंकि जब आम आदमी थकता है, तो देश की रफ्तार भी धीमी पड़ती है.
आलोक कुमार
शुक्रवार, 23 जनवरी 2026
फेक न्यूज़ का जाल और लोकतंत्र पर हमला
फेक न्यूज़ का जाल और लोकतंत्र पर हमला: सवाल सिर्फ सूचना का नहीं, भरोसे का है
डिजिटल युग में सूचना जितनी तेज़ी से फैलती है, उतनी ही तेजी से भ्रम भी फैलता है. आज भारत ही नहीं, पूरी दुनिया जिस सबसे खतरनाक चुनौती से जूझ रही है, वह है फेक न्यूज़. यह सिर्फ झूठी खबरों का मामला नहीं रहा, बल्कि यह लोकतंत्र, सामाजिक सौहार्द और आम नागरिक के विवेक पर सीधा हमला बन चुका है.
एक समय था जब खबरें अख़बारों और टीवी चैनलों से छनकर आती थीं. संपादक की ज़िम्मेदारी, संस्थान की साख और पत्रकारिता के नियम खबरों की विश्वसनीयता तय करते थे. लेकिन सोशल मीडिया के दौर में हर हाथ में कैमरा है, हर अकाउंट एक “न्यूज़ चैनल” बन गया है और हर अफवाह “ब्रेकिंग न्यूज़”.
फेक न्यूज़: अफवाह से हथियार तक
फेक न्यूज़ अब सिर्फ गलत जानकारी नहीं, बल्कि एक रणनीतिक हथियार बन चुकी है। चुनाव प्रभावित करने से लेकर धार्मिक तनाव भड़काने तक, भीड़ को उकसाने से लेकर किसी व्यक्ति की छवि तबाह करने तक—झूठी खबरें हर जगह इस्तेमाल हो रही हैं.
व्हाट्सऐप फॉरवर्ड, फेसबुक पोस्ट, एक्स (ट्विटर) ट्रेंड और यूट्यूब वीडियो—इन सबके जरिए झूठ को इस तरह पेश किया जाता है कि वह सच से ज़्यादा विश्वसनीय लगने लगता है. सबसे खतरनाक बात यह है कि फेक न्यूज़ अक्सर हमारी भावनाओं को निशाना बनाती है—धर्म, जाति, राष्ट्रवाद, डर और गुस्सा.
लोकतंत्र पर सीधा खतरा
लोकतंत्र की बुनियाद सही सूचना और जागरूक नागरिक पर टिकी होती है. जब नागरिक को ही ग़लत जानकारी दी जाए, तो उसका निर्णय भी ग़लत होगा. फेक न्यूज़ चुनावों को प्रभावित कर सकती है, जनमत को मोड़ सकती है और सरकारों पर अविश्वास पैदा कर सकती है.
आज राजनीतिक दलों से लेकर ट्रोल आर्मी तक, सब इस खेल में शामिल हैं। सवाल यह नहीं कि फेक न्यूज़ कौन फैला रहा है, सवाल यह है कि क्यों फैल रही है और किसके फायदे के लिए।
मीडिया की साख पर सवाल
फेक न्यूज़ का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि इसने मुख्यधारा मीडिया की विश्वसनीयता को भी कमजोर किया है. जब झूठ और सच एक ही स्क्रीन पर, एक ही फॉन्ट में दिखाई दें, तो आम दर्शक भ्रमित हो जाता है.
कुछ मीडिया संस्थान टीआरपी और क्लिक की दौड़ में बिना जांच-पड़ताल के खबरें चलाने लगे हैं। नतीजा यह कि असली पत्रकारिता और अफवाह के बीच की रेखा धुंधली होती जा रही है।
सरकार, कानून और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म
सरकारें कानून बनाने की बात करती हैं, सोशल मीडिया कंपनियां गाइडलाइंस की. लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ कानून से फेक न्यूज़ रुकेगी? अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और नियंत्रण के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं है.
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एल्गोरिदम के जरिए वही कंटेंट आगे बढ़ाते हैं, जो ज्यादा भावनात्मक और उत्तेजक हो. और फेक न्यूज़ इस पैमाने पर पूरी तरह फिट बैठती है.
असली जिम्मेदारी किसकी?
सरकार की जिम्मेदारी है कि वह पारदर्शी कानून बनाए.
मीडिया की जिम्मेदारी है कि वह तथ्यपरक पत्रकारिता करे.
सोशल मीडिया कंपनियों की जिम्मेदारी है कि वे गलत सूचना पर लगाम लगाएं.
लेकिन इन सबके बीच सबसे बड़ी जिम्मेदारी नागरिक की है.
हर फॉरवर्ड सच नहीं होता.
हर वायरल वीडियो सच्चाई नहीं होता.
हर हेडलाइन खबर नहीं होती.
समाधान क्या है?
फेक न्यूज़ के खिलाफ लड़ाई किसी एक संस्था की नहीं, बल्कि सामूहिक चेतना की लड़ाई है.
मीडिया साक्षरता को शिक्षा का हिस्सा बनाया जाए
खबर साझा करने से पहले स्रोत की जांच की जाए
भावनाओं में बहकर प्रतिक्रिया न दी जाए
जिम्मेदार पत्रकारिता को समर्थन दिया जाए
निष्कर्ष: सच की लड़ाई लंबी है, लेकिन ज़रूरी है
फेक न्यूज़ का सबसे बड़ा हथियार हमारा डर और हमारी जल्दबाज़ी है। अगर हम रुककर सोचें, जांचें और समझें, तो आधी लड़ाई वहीं खत्म हो जाती है।
लोकतंत्र सिर्फ वोट डालने से नहीं चलता,
वह सच जानने और सच बोलने से चलता है.
आज ज़रूरत है कि हम खबरों के उपभोक्ता नहीं,
जिम्मेदार नागरिक बनें
क्योंकि जब सच हारता है,
तो सिर्फ खबर नहीं मरती—
लोकतंत्र घायल होता है.
आलोक कुमार
गुरुवार, 22 जनवरी 2026
डिजिटल मीडिया का बदलता स्वरूप: पाठक, पत्रकारिता और विश्वसनीयता की कसौटी
डिजिटल मीडिया का बदलता स्वरूप: पाठक, पत्रकारिता और विश्वसनीयता की कसौटी
डिजिटल क्रांति ने सूचना की दुनिया को पूरी तरह बदल दिया है. आज समाचार केवल सुबह के अख़बार या तय समय के टीवी बुलेटिन तक सीमित नहीं हैं, बल्कि हर क्षण मोबाइल स्क्रीन पर उपलब्ध हैं.इस त्वरित सूचना युग ने जहाँ आम नागरिक को सशक्त बनाया है, वहीं पत्रकारिता की विश्वसनीयता के सामने गंभीर प्रश्न भी खड़े कर दिए हैं.
डिजिटल मीडिया का विस्तार
इंटरनेट और सोशल मीडिया के व्यापक प्रसार ने डिजिटल मीडिया को मुख्यधारा बना दिया है. न्यूज़ वेबसाइट, ब्लॉग, यूट्यूब चैनल और सोशल प्लेटफ़ॉर्म आज सूचना के प्रमुख स्रोत बन चुके हैं. अब खबरें केवल पेशेवर संस्थानों तक सीमित नहीं रहीं—हर व्यक्ति संभावित रिपोर्टर बन गया है. यह बदलाव लोकतांत्रिक तो है, लेकिन इसके साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी है.
पाठक: दर्शक से सहभागी तक
डिजिटल युग में पाठक की भूमिका निष्क्रिय नहीं रही. वह अब केवल खबर पढ़ता नहीं, बल्कि प्रतिक्रिया देता है, सवाल उठाता है और खबरों को आगे पहुँचाने में भूमिका निभाता है. लाइक, शेयर और कमेंट के माध्यम से पाठक यह तय करने लगा है कि कौन-सी खबर चर्चा में रहेगी. यही कारण है कि पाठक की जागरूकता आज पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गई है.
पत्रकारिता के सामने नई चुनौतियाँ
डिजिटल प्रतिस्पर्धा में “सबसे पहले” की दौड़ ने कई बार तथ्य-जांच को पीछे छोड़ दिया है. क्लिकबेट सुर्खियाँ, अपुष्ट सूचनाएँ और अधूरी रिपोर्टिंग पत्रकारिता की साख को प्रभावित कर रही हैं. फेक न्यूज़ केवल भ्रम नहीं फैलाती, बल्कि सामाजिक विश्वास को भी कमजोर करती है.
विश्वसनीयता: लोकतंत्र की रीढ़
विश्वसनीय सूचना किसी भी लोकतंत्र की नींव होती है। जब पाठक सही और संतुलित जानकारी प्राप्त करता है, तभी वह विवेकपूर्ण निर्णय ले सकता है। इसलिए डिजिटल मीडिया की जिम्मेदारी है कि वह सत्यापन, स्रोतों की पुष्टि और निष्पक्षता को सर्वोच्च प्राथमिकता दे।
समाधान और आगे की राह
डिजिटल पत्रकारिता को मजबूत बनाने के लिए कुछ मूलभूत कदम आवश्यक हैं:
तथ्य-जांच को अनिवार्य प्रक्रिया बनाना
गुणवत्ता को लोकप्रियता से ऊपर रखना
मीडिया साक्षरता के प्रति पाठकों को जागरूक करना
जिम्मेदार और स्वतंत्र पत्रकारिता को प्रोत्साहित करना
निष्कर्ष
डिजिटल मीडिया एक शक्तिशाली माध्यम है, जो समाज को दिशा भी दे सकता है और भ्रमित भी.इसकी दिशा इस बात पर निर्भर करती है कि सूचना का उपयोग कितनी जिम्मेदारी और समझदारी से किया जाता है. यदि मीडिया सत्यनिष्ठा बनाए रखे और पाठक सजग रहें, तो डिजिटल युग में पत्रकारिता लोकतंत्र की सशक्त आवाज़ बनी रह सकती है.
आलोक कुमार
बुधवार, 21 जनवरी 2026
डिजिटल शिक्षा: ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में सीखने के नए अवसर
डिजिटल शिक्षा: ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में सीखने के नए अवसर
आज के डिजिटल युग में शिक्षा केवल कक्षा की चार दीवारों तक सीमित नहीं रही। डिजिटल शिक्षा ने सीखने के तरीके, पहुँच और गुणवत्ता—तीनों को पूरी तरह बदल दिया है। खास बात यह है कि इससे ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच शिक्षा की खाई धीरे-धीरे कम हो रही है।
डिजिटल शिक्षा क्या है?
डिजिटल शिक्षा का अर्थ है तकनीक के माध्यम से सीखना—जैसे ऑनलाइन क्लास, ई-लर्निंग ऐप्स, वीडियो लेक्चर, डिजिटल क्लासरूम और वर्चुअल लाइब्रेरी। इंटरनेट और स्मार्टफोन की मदद से छात्र अब कहीं से भी पढ़ाई कर सकते हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल शिक्षा का प्रभाव
पहले ग्रामीण क्षेत्रों में अच्छे शिक्षकों, कोचिंग और संसाधनों की भारी कमी थी। डिजिटल शिक्षा ने इस स्थिति को बदल दिया है।.अब गांवों के छात्र भी:
देश के शीर्ष शिक्षकों के वीडियो लेक्चर देख सकते हैं
ऑनलाइन टेस्ट और स्टडी मटेरियल तक पहुँच बना सकते हैं
प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी घर बैठे कर सकते हैं
सरकार की डिजिटल इंडिया, PM e-Vidya, और DIKSHA जैसे पोर्टल्स ने ग्रामीण छात्रों के लिए नई संभावनाएँ खोली हैं.
शहरी क्षेत्रों में डिजिटल शिक्षा के लाभ
शहरी क्षेत्रों में डिजिटल शिक्षा ने सीखने को और अधिक लचीला बनाया है.छात्र:
स्कूल या कॉलेज के साथ-साथ ऑनलाइन स्किल्स सीख सकते हैं
कोडिंग, डेटा एनालिटिक्स, डिजिटल मार्केटिंग जैसे नए कोर्स कर सकते हैं
समय का बेहतर प्रबंधन कर सकते हैं
डिजिटल शिक्षा के प्रमुख लाभ
* शिक्षा तक समान और आसान पहुँच
*समय और दूरी की बाधा समाप्त
* पढ़ाई की गुणवत्ता और समझ में सुधार
* ग्रामीण और शहरी छात्रों के बीच शैक्षिक अंतर में कमी
* भविष्य की नौकरियों के लिए डिजिटल कौशल का विकास
चुनौतियाँ और समाधान
हालाँकि डिजिटल शिक्षा के सामने इंटरनेट कनेक्टिविटी और डिजिटल उपकरणों की कमी जैसी चुनौतियाँ हैं, लेकिन सरकार और निजी संस्थानों के प्रयासों से इन समस्याओं पर लगातार काम हो रहा है.
निष्कर्ष
डिजिटल शिक्षा केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि भविष्य की आवश्यकता बन चुकी है.यह ग्रामीण और शहरी—दोनों क्षेत्रों के छात्रों को समान अवसर प्रदान कर रही है और भारत को ज्ञान आधारित समाज की ओर ले जा रही है. सही नीतियों और संसाधनों के साथ डिजिटल शिक्षा शिक्षा में गुणवत्ता और समानता दोनों सुनिश्चित कर सकती है.
आलोक कुमार
मंगलवार, 20 जनवरी 2026
यह नाम परंपरा और परिवर्तन—दोनों का संतुलित प्रतीक बनकर उभरता है
भारतीय जनसंघ से भाजपा तक: राष्ट्रीय अध्यक्षों की परंपरा और नितिन नबीन का उभार
इतिहास की तस्वीरें तब बदलती हैं, जब संगठन ज़मीन से उठे नेतृत्व पर भरोसा जताता है. भारतीय जनसंघ से लेकर भारतीय जनता पार्टी तक की यात्रा केवल सत्ता परिवर्तन की कहानी नहीं, बल्कि एक सुदीर्घ संगठनात्मक परंपरा का विस्तार है. इस परंपरा में राष्ट्रीय अध्यक्षों की भूमिका केंद्रीय रही है—वे विचार, संगठन और अनुशासन के धुरी रहे हैं.
भारतीय जनसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष
भारतीय जनसंघ की स्थापना के साथ जिन नेताओं ने संगठन की वैचारिक नींव रखी, वे आज भी राजनीतिक इतिहास में स्मरणीय हैं—
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी (1951–1952) मौलि चन्द्र शर्मा (1954) प्रेम नाथ डोगरा (1955) आचार्य देवप्रसाद घोष (1956–1959) पीताम्बर दास (1960) अवसरला राम राव (1961) आचार्य देवप्रसाद घोष (1962, 1964) टेव वीट (1963) वाछराज व्यास (1965) बलराज मधोक (1966) पंडित दीनदयाल उपाध्याय (1967–1968)
इन नामों ने संगठन को वैचारिक दृढ़ता और अनुशासित ढांचा दिया, जिसने आगे चलकर भाजपा का स्वरूप गढ़ा.
भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष (1980 से अब तक)
1980 में भारतीय जनता पार्टी के गठन के बाद नेतृत्व की यह परंपरा और मजबूत हुई—
अटल बिहारी वाजपेयी (1980–1986)
लालकृष्ण आडवाणी (1986–1991, 1993–1998, 2004–2005)
मुरली मनोहर जोशी (1991–1993)
कुशाभाऊ ठाकरे (1998–2000)
बंगारू लक्ष्मण (2000–2001)
के. जनाकृष्णमूर्ति (2001–2002)
वेंकैया नायडू (2002–2004)
राजनाथ सिंह (2005–2009, 2013–2014)
नितिन गडकरी (2009–2013)
अमित शाह (2014–2020)
जगत प्रकाश नड्डा (2020–2025/26)
यह क्रम बताता है कि भाजपा में अध्यक्ष पद केवल औपचारिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि संगठन संचालन की सबसे अहम कड़ी है.
नितिन नबीन: परंपरा और परिवर्तन का संगम
अब इसी परंपरा में बिहार के नितिन नबीन का नाम जुड़ता दिखाई दे रहा है.भारतीय जनता पार्टी ने उन्हें राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष की जिम्मेदारी देकर साफ संकेत दे दिया है कि नेतृत्व चयन में संगठनात्मक क्षमता, कार्यकर्ता-जुड़ाव और अनुशासन सर्वोपरि है.
नितिन नबीन बिहार सरकार में सड़क निर्माण मंत्री हैं और भाजपा के वरिष्ठ नेता नवीन किशोर सिन्हा के पुत्र हैं. वे पांच बार के विधायक रह चुके हैं और मात्र 45 वर्ष की आयु में यह बड़ी जिम्मेदारी संभालने वाले नेताओं में शामिल हो गए हैं. तुलना करें तो अमित शाह जब राष्ट्रीय अध्यक्ष बने थे, तब उनकी उम्र 50 वर्ष थी—इस दृष्टि से यह फैसला भाजपा की युवा नेतृत्व पर बढ़ती भरोसेमंद रणनीति को दर्शाता है.
बिहार से राष्ट्रीय क्षितिज तक
बिहार की पूर्व उपमुख्यमंत्री और राज्य की पहली महिला उपमुख्यमंत्री रेणु देवी ने नितिन नबीन को बधाई देते हुए कहा कि बिहार के बेटे को यह जिम्मेदारी मिलना पूरे राज्य के लिए गर्व की बात है.यह बयान केवल औपचारिक शुभकामना नहीं, बल्कि उस राजनीतिक संदेश का संकेत है कि क्षेत्रीय नेतृत्व अब राष्ट्रीय भूमिका में निर्णायक बन रहा है.
निष्कर्ष
नितिन नबीन का उभार केवल एक व्यक्ति का राजनीतिक विस्तार नहीं है, बल्कि उस संगठनात्मक संस्कृति की जीत है, जो कार्यकर्ता से नेतृत्व तक की यात्रा को संभव बनाती है। भारतीय जनसंघ से भाजपा तक की परंपरा में यह नया अध्याय बताता है कि भाजपा में नेतृत्व बदलाव अचानक नहीं, बल्कि लंबे संगठनात्मक अभ्यास का परिणाम होता है.
यह नाम परंपरा और परिवर्तन—दोनों का संतुलित प्रतीक बनकर उभरता है.
आलोक कुमार
सोमवार, 19 जनवरी 2026
जब अख़बार चुप होते हैं, तो लोकतंत्र की आवाज़ धीमी पड़ती है
जब अख़बार चुप होते हैं, तो लोकतंत्र की आवाज़ धीमी पड़ती है
किसी शहर की पहचान केवल उसकी इमारतों, सड़कों या बाजारों से नहीं होती, बल्कि वहां की वैचारिक चेतना से भी होती है. हिंदी पत्रकारिता के लंबे इतिहास वाले शहरों में जब अख़बार बंद होते हैं, तो यह केवल एक व्यवसाय का अंत नहीं होता—यह समाज की स्मृति और संवाद की क्षमता पर भी असर डालता है.
पटना जैसे शहर, जहां पाटलिपुत्र टाइम्स, सर्चलाइट, आर्यावर्त, प्रदीप और इंडियन नेशन जैसे अख़बारों ने दशकों तक जनमत को दिशा दी, वहां एक-एक कर प्रिंट संस्थानों का बंद होना चिंता का विषय है.हाल के वर्षों में राष्ट्रीय सहारा (पटना संस्करण) के बंद होने की खबर ने इस पीड़ा को और गहरा किया है. यह घटना सिर्फ कर्मचारियों के भविष्य से जुड़ा सवाल नहीं उठाती, बल्कि यह भी पूछती है कि क्या हम स्थानीय पत्रकारिता के महत्व को भूलते जा रहे हैं.
प्रिंट मीडिया का संकट: कारण और संदर्भ
आज के डिजिटल युग में सूचना की गति तेज़ हुई है, लेकिन इसके साथ ही प्रिंट मीडिया पर दबाव भी बढ़ा है. विज्ञापन का बड़ा हिस्सा डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की ओर चला गया है. कागज, छपाई और वितरण की लागत बढ़ी है, जबकि पाठकों की आदतें बदल रही हैं.कई छोटे और मध्यम अख़बार इस बदलाव के साथ खुद को ढाल नहीं पाए.
इसके अलावा, प्रबंधन संबंधी चुनौतियां, आर्थिक असंतुलन और समय पर संसाधनों की उपलब्धता न होना भी इस संकट को गहराता है.जब संस्थान कमजोर होते हैं, तो उसका सीधा असर पत्रकारों, कर्मचारियों और पाठकों पर पड़ता है.
पत्रकारिता और सामाजिक स्मृति
अख़बार केवल खबरें नहीं छापते; वे समय का दस्तावेज़ होते हैं.स्थानीय मुद्दे, जनआंदोलन, सांस्कृतिक बदलाव और आम लोगों की आवाज़—ये सब प्रिंट पत्रकारिता के माध्यम से ही स्थायी रूप से दर्ज होते हैं.जब कोई अख़बार बंद होता है, तो उसके साथ वर्षों की रिपोर्टिंग, अनुभव और सामाजिक संदर्भ भी धीरे-धीरे ओझल हो जाते हैं.
डिजिटल प्लेटफॉर्म्स त्वरित सूचना तो देते हैं, लेकिन गहराई, संदर्भ और स्थानीय संवेदनशीलता अक्सर प्रिंट मीडिया से ही आती है.यही कारण है कि प्रिंट पत्रकारिता का कमजोर होना लोकतांत्रिक संवाद के लिए एक चुनौती बनता जा रहा है.
पत्रकारों की भूमिका और भविष्य
इस बदलाव के दौर में पत्रकारों की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है.उन्हें केवल माध्यम बदलने की नहीं, बल्कि भरोसे, सत्य और गुणवत्ता को बनाए रखने की चुनौती का सामना करना पड़ता है.कई अनुभवी पत्रकार आज संक्रमण के दौर से गुजर रहे हैं—जहां उन्हें नए प्लेटफॉर्म्स, नई तकनीक और नई कार्यसंस्कृति के साथ खुद को जोड़ना पड़ रहा है.
यह समय निराशा का नहीं, बल्कि पुनर्निर्माण का भी हो सकता है—यदि नीति-निर्माता, पाठक और मीडिया संस्थान मिलकर गुणवत्तापूर्ण पत्रकारिता के महत्व को समझें.
आगे का रास्ता
स्थानीय और क्षेत्रीय पत्रकारिता को बचाने के लिए केवल भावनात्मक अपील पर्याप्त नहीं है। इसके लिए टिकाऊ व्यावसायिक मॉडल, डिजिटल-प्रिंट संतुलन, पाठकों की भागीदारी और संस्थागत पारदर्शिता जरूरी है। साथ ही, पाठकों को भी यह समझना होगा कि भरोसेमंद खबरें मुफ्त नहीं आतीं—उनके पीछे मेहनत, संसाधन और जिम्मेदारी होती है।
अख़बारों का चुप होना केवल एक माध्यम का मौन नहीं है; यह समाज के आत्मसंवाद का रुक जाना भी हो सकता है। इसलिए जरूरी है कि हम पत्रकारिता को केवल खबरों का स्रोत नहीं, बल्कि लोकतंत्र की बुनियाद के रूप में देखें और उसे जीवित रखने का साझा प्रयास करें।
आलोक कुमार
रविवार, 18 जनवरी 2026
नागपुर की रात: जब चोरी नहीं, आस्था पर आघात हुआ
नागपुर की रात: जब चोरी नहीं, आस्था पर आघात हुआ
यह घटना इसलिए भी अत्यंत गंभीर है क्योंकि यहाँ केवल संपत्ति की चोरी नहीं हुई, बल्कि उस पवित्र उपस्थिति का अपमान हुआ, जिसे कैथोलिक विश्वास में ईश्वर की जीवित उपस्थिति माना जाता है.भले ही प्रत्यक्ष अपवित्रता के प्रमाण न मिले हों, किंतु परमपवित्र यूखारिस्त का जबरन हटाया जाना स्वयं में एक गंभीर धार्मिक अपराध है—ऐसा अपराध, जिसकी पीड़ा किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं रहती.
इस संदर्भ में महाधर्माध्यक्ष एलियास गोंसाल्वेस का तात्कालिक पास्तोरल संदेश घटना की गंभीरता को और गहराई देता है. उनका संदेश स्पष्ट है—प्रतिशोध नहीं, प्रायश्चित; आक्रोश नहीं, आत्ममंथन.23 जनवरी को ‘तपस्या और प्रायश्चित दिवस’ घोषित कर उन्होंने यह संकेत दिया कि आस्था पर हुए हमले का उत्तर शांति, प्रार्थना और नैतिक दृढ़ता से दिया जाना चाहिए.
आज प्रश्न यह नहीं है कि चोर कौन थे, बल्कि यह है कि हम किस दिशा में बढ़ रहे हैं. क्या धार्मिक स्थलों की सुरक्षा केवल प्रशासन की जिम्मेदारी है, या समाज की सामूहिक चेतना भी इसके लिए उत्तरदायी है? यह घटना हमें याद दिलाती है कि आस्था की रक्षा तलवार से नहीं, सजगता, सम्मान और संवेदनशीलता से होती है.
नागपुर की यह पीड़ा केवल एक धर्मप्रांत की नहीं है. यह उस भारत की पीड़ा है, जो सदियों से धार्मिक सहअस्तित्व और परस्पर सम्मान की मिसाल रहा है. ऐसे समय में प्रार्थना केवल ईश्वर से संवाद नहीं, बल्कि अपने भीतर के मनुष्य से प्रश्न करने की प्रक्रिया भी बन जानी चाहिए.
आलोक कुमार
शनिवार, 17 जनवरी 2026
जब अख़बार बंद होते हैं, तो सिर्फ़ दफ़्तर नहीं
जब अख़बार बंद होते हैं, तो सिर्फ़ दफ़्तर नहीं—याददाश्तें भी ताले में बंद हो जाती हैं
सहारा समूह की आर्थिक मुश्किलें—विशेषकर कानूनी मामलों और निवेश योजनाओं से जुड़े विवाद—अब उसके मीडिया संस्थानों पर भी साफ़ दिखने लगी हैं। 2024–25 के दौरान पटना यूनिट में वेतन न मिलने, कामकाज ठप होने और कर्मचारियों की हड़ताल की खबरें आती रहीं। अब जब पूर्ण बंदी की स्थिति सामने है, तो इसका सबसे बड़ा असर उन पत्रकारों पर पड़ा है, जिन्होंने वर्षों तक ज़मीनी सच्चाइयों को सामने लाने का काम किया।
दर्जनों अनुभवी पत्रकार एक झटके में बेरोज़गार हो गए, लेकिन इस पर न तो बड़ी बहस हुई और न ही डिजिटल मंचों पर कोई खास हलचल दिखी। आज की मीडिया दुनिया क्लिक, ट्रेंड और एल्गोरिदम के इर्द-गिर्द घूम रही है, जबकि स्थानीय और क्षेत्रीय प्रिंट पत्रकारिता की मौत चुपचाप हो रही है। शायद इसी कारण यह संकट “सामाजिक स्मृति से मिटते जाने” जैसा महसूस होता है।
यह हालात केवल पटना या बिहार तक सीमित नहीं हैं। देशभर में छोटे और मध्यम अख़बार डिजिटल विज्ञापन शिफ्ट, बढ़ती लागत और बदलती पाठक आदतों के दबाव में संघर्ष कर रहे हैं। लेकिन इसके साथ जो ज़िम्मेदार, संदर्भयुक्त और ज़मीनी पत्रकारिता खत्म हो रही है, उसकी भरपाई कोई सोशल मीडिया ट्रेंड नहीं कर सकता।
आज ज़रूरत है कि इस ख़ामोशी को तोड़ा जाए। प्रभावित पत्रकारों के लिए संवाद, सहयोग और सामूहिक प्रयास खड़े हों। क्योंकि अगर अख़बार यूँ ही बंद होते रहे, तो सवाल सिर्फ़ रोज़गार का नहीं रहेगा—लोकतंत्र की स्मृति बचाने का भी होगा
आलोक कुमार
शुक्रवार, 16 जनवरी 2026
6 सांसद ऐसे हैं, सांसद निधि से एक रुपया भी खर्च नहीं किया
जब विकास के लिए पैसा मौजूद हो, लेकिन ज़मीन पर काम न दिखे—तो सवाल सिर्फ़ आंकड़ों का नहीं, जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही का होता है.
सांसद निधि: करोड़ों का बजट, लेकिन बिहार में क्यों उठे सवाल?
सांसद स्थानीय क्षेत्र विकास योजना (एमपीएलएडीएस) देश की उन महत्वपूर्ण योजनाओं में शामिल है, जिसके जरिए सांसद अपने-अपने क्षेत्र की ज़रूरतों के अनुसार विकास कार्य करा सकते हैं. इस योजना के तहत लोकसभा, राज्यसभा और मनोनीत सांसदों को हर साल ₹5 करोड़ (₹2.5 करोड़ की दो किस्तों में) की राशि मिलती है. यह पैसा सीधे सांसद को नहीं, बल्कि जिला कलेक्टर के माध्यम से स्वीकृत विकास कार्यों पर खर्च किया जाता है.
एमपीएलएडीएस का उद्देश्य साफ है—पेयजल, सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामुदायिक ढांचे जैसे ज़रूरी क्षेत्रों में टिकाऊ विकास. योजना में यह भी प्रावधान है कि एससी क्षेत्रों के लिए 15% और एसटी क्षेत्रों के लिए 7.5% राशि खर्च की जाए, वहीं दिव्यांगों के लिए ₹10 लाख तक की सिफारिश संभव है.
कोविड-19 के दौरान यह योजना अस्थायी रूप से निलंबित रही, लेकिन 2021-22 से इसे फिर बहाल कर दिया गया। इसके बावजूद बिहार से जुड़े आंकड़े अब सियासी बहस का कारण बन गए हैं.
बिहार के 6 सांसद और ‘शून्य खर्च’ का सवाल
18वीं लोकसभा के गठन को लगभग दो साल होने जा रहे हैं, लेकिन बिहार के 40 सांसदों में से 6 सांसद ऐसे हैं जिन्होंने अब तक सांसद निधि से एक रुपया भी खर्च नहीं किया. इन सांसदों में मीसा भारती, राजीव प्रताप रूड़ी, शांभवी चौधरी, राजीव रंजन सिंह, संजय जायसवाल और विवेक ठाकुर शामिल हैं.
आंकड़ों के मुताबिक, पिछले दो वर्षों में बिहार के सांसदों को कुल मिलाकर ₹9.80 करोड़ प्रति सांसद की राशि मिली, लेकिन कुल खर्च महज़ ₹137.69 करोड़ ही हो सका. वहीं, कई सांसदों ने बेहतर प्रदर्शन भी किया—जैसे अररिया से प्रदीप कुमार सिंह ने लगभग पूरी राशि खर्च कर सभी कार्य पूरे किए.
शांभवी चौधरी का पक्ष
समस्तीपुर से सांसद और देश की सबसे युवा लोकसभा सदस्य शांभवी चौधरी ने इस मुद्दे पर साफ कहा कि सांसद निधि का उपयोग उनका संवैधानिक अधिकार है, और वह किसी दबाव में जल्दबाज़ी में फंड खर्च नहीं करेंगी. उनके अनुसार, विकास कार्यों का चयन पार्टी और एनडीए कार्यकर्ताओं से विचार-विमर्श के बाद ही किया जाएगा, ताकि क्षेत्र को दीर्घकालिक लाभ मिले.
बहस का असली मुद्दा
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि एमपीएलएडीएस फंड का समयबद्ध और पारदर्शी उपयोग अब जनविश्वास से जुड़ा सवाल बन चुका है. जब कई क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं की कमी है, तब करोड़ों रुपये का अप्रयुक्त रहना स्वाभाविक रूप से जनता को सोचने पर मजबूर करता है.
आने वाले समय में यही देखा जाना बाकी है कि बिहार के ये सांसद सांसद निधि को किस दिशा में, किन प्राथमिकताओं के साथ और कितनी तेजी से ज़मीन पर उतारते हैं—क्योंकि विकास सिर्फ़ घोषणा से नहीं, अमल से दिखाई देता है.
आलोक कुमार
हमारी पहली इच्छा
हमारी Wishlist और भविष्य की दिशा
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गुरुवार, 15 जनवरी 2026
संत फ्रांसिस ऑफ असीसी की 800वीं पुण्यतिथि
“जब दुनिया थक जाए, तब आशा की तीर्थयात्रा शुरू होती है”
जयंती वर्ष 2025 का समापन और संत फ्रांसिस का नया आध्यात्मिक आह्वान
अभी-अभी “आशा के तीर्थयात्री” (Pilgrims of Hope)—कैथोलिक चर्च के जयंती वर्ष 2025—का औपचारिक समापन हुआ है.यह वही पवित्र वर्ष था, जिसकी घोषणा पोप फ्रांसिस ने ऐसे समय में की थी, जब दुनिया युद्ध, महामारी, जलवायु संकट और सामाजिक विभाजन से जूझ रही थी. इस जयंती वर्ष ने मानवता को एक सीधा संदेश दिया—निराशा के अंधकार में भी आशा की लौ बुझनी नहीं चाहिए.
हर 25 वर्षों में आने वाला यह विशेष कैथोलिक वर्ष 24 दिसंबर 2024 को आरंभ हुआ था और 6 जनवरी 2026, प्रभु प्रकाश महापर्व के दिन, इसका समापन हुआ.यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं था, बल्कि एक वैश्विक नैतिक पुकार थी—कि हर व्यक्ति अपने जीवन में आशा को पुनर्जीवित करे और उसे दूसरों तक पहुँचाए.
जयंती के बाद भी अनुग्रह का द्वार खुला
जयंती वर्ष के समापन के साथ ही पोप लियो XIV ने कलीसिया को एक और आध्यात्मिक उपहार दिया है. उन्होंने संत फ्रांसिस ऑफ असीसी की 800वीं पुण्यतिथि की स्मृति में “संत फ्रांसिस का विशेष वर्ष” घोषित किया है, जो जनवरी 2027 तक चलेगा.यह फ्रांसिस्कन जयंती वर्ष केवल स्मृति का समय नहीं, बल्कि वास्तविक आध्यात्मिक नवीनीकरण का अवसर है. 10 जनवरी को पवित्र सीन की अपोस्टोलिक पेनिटेंशरी द्वारा जारी निर्णय के अनुसार, विश्वासी इस अवधि में सामान्य शर्तों—साकारमेन्टल कन्फेशन,यूखरिस्त में सहभागिता पोप की मनोकामनाओं के लिए प्रार्थना के साथ पूर्ण क्षमा (Plenary Indulgence) प्राप्त कर सकते हैं. इसके लिए उन्हें किसी भी फ्रांसिस्कन मठ या संत फ्रांसिस को समर्पित तीर्थस्थल की यात्रा करनी होगी.
जो चल नहीं सकते, उनके लिए भी रास्ता खुला है
इस निर्णय की मानवीय संवेदनशीलता उल्लेखनीय है.वृद्ध, रोगी और वे लोग जो गंभीर कारणों से अपने घर से बाहर नहीं जा सकते, वे भी आध्यात्मिक रूप से इस जयंती में सहभागी होकर—अपनी प्रार्थनाएँ, पीड़ा और कष्ट ईश्वर को अर्पित करके—पूर्ण क्षमा प्राप्त कर सकते हैं. यह संदेश स्पष्ट है: ईश्वर का अनुग्रह दूरी या असमर्थता से बंधा नहीं है.
हिंसा और अविश्वास के समय में संत फ्रांसिस की पुकार
निर्णय में आज की दुनिया का यथार्थ चित्रण भी किया गया है—“जब आभासी वास्तविक को प्रभावित कर रहा है, सामाजिक हिंसा सामान्य हो गई है और शांति दिन-ब-दिन दूर होती जा रही है…”ऐसे समय में संत फ्रांसिस का जीवन हमें फिर से आमंत्रित करता है—अस्सीसी के उस गरीब पुरुष की तरह जीने के लिए, जिसने मसीह को अपने जीवन का केंद्र बनाया.
पोप लियो XIV ने फ्रांसिस्कन फैमिली कॉन्फ्रेंस के नाम अपने पत्र में लिखा कि आज के युग में, जो अंतहीन युद्धों, विभाजनों और भय से भरा है, संत फ्रांसिस की वाणी इसलिए प्रासंगिक है क्योंकि वह तकनीकी समाधान नहीं, बल्कि शांति के वास्तविक स्रोत की ओर संकेत करती है.उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि—“ईश्वर के साथ शांति, लोगों के बीच शांति और सृष्टि के साथ शांति—ये तीनों एक ही सार्वभौमिक मेल-मिलाप के अविभाज्य आयाम हैं.”
आशा की यात्रा जारी है
जयंती वर्ष भले ही समाप्त हो गया हो, लेकिन उसका संदेश अभी जीवित है। संत फ्रांसिस का यह विशेष वर्ष कलीसिया और विश्व को याद दिलाता है कि सच्ची शांति न तो शक्ति से आती है, न ही प्रभुत्व से—वह आती है विनम्रता, करुणा और विश्वास से.आज, जब दुनिया थक चुकी है, यही समय है कि हम फिर से तीर्थयात्री बनें—आशा के, शांति के और मानवता के.
आलोक कुमार
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कौवाकोल.नवादा जिले के प्रखंड कौवाकोल के आदर्श उत्क्रमित मध्य विद्यालय, सोखोदेवरा में बाल संसद का गठन किया गया है.यहां बिहार वाटर डेवलपमेंट स...
