कर्ज, कल्याण और कसौटी—पूर्व व वर्तमान सरकार के फर्क की पड़ताल
— आलोक कुमार
सरकार की कार्यशैली में वास्तविक अंतर क्या है। जैसे-जैसे वित्तीय दबाव सतह पर आ रहा है, यह स्पष्ट होता जा रहा है कि पिछली नीतियों के प्रभाव और वर्तमान फैसलों की दिशा—दोनों मिलकर राज्य की अर्थव्यवस्था की दिशा तय कर रहे हैं।
आज हालात ऐसे हैं कि सरकार को अपने नियमित दायित्वों के निर्वहन के लिए भी ऋण पर निर्भर होना पड़ रहा है। जून तक 12 हजार करोड़ रुपये के कर्ज की मांग और उसमें से 4 हजार करोड़ रुपये की तत्काल अपेक्षा इस वित्तीय दबाव का संकेत है। यह केवल प्रबंधन का हिस्सा नहीं, बल्कि एक मजबूरी की स्थिति को भी दर्शाता है।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि सामाजिक सुरक्षा पेंशन, जो सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी है, पिछले दो महीनों से लंबित है। सरकार अब मई में एक करोड़ से अधिक लाभार्थियों—बुजुर्गों, दिव्यांगों और विधवाओं—को एकमुश्त भुगतान करने की योजना बना रही है। यह कदम तात्कालिक राहत जरूर देगा, लेकिन इससे यह भी स्पष्ट होता है कि राज्य के वित्तीय प्रवाह में गंभीर बाधाएं हैं।
दरअसल, चुनाव से पहले पेंशन राशि को 400 रुपये से बढ़ाकर 1100 रुपये करना एक बड़ा राजनीतिक और सामाजिक फैसला था। इससे समाज के कमजोर वर्गों को राहत मिली, लेकिन इसके साथ ही हर महीने करीब 1150 करोड़ रुपये का अतिरिक्त वित्तीय बोझ भी जुड़ गया। इसी तरह महिला रोजगार योजना पर लगभग 15 हजार करोड़ रुपये का व्यय राज्य के खजाने पर अतिरिक्त दबाव डालता है। सवाल यह उठता है कि क्या इन योजनाओं की घोषणा के समय संसाधनों की दीर्घकालिक व्यवस्था सुनिश्चित की गई थी, या फिर ये फैसले तात्कालिक राजनीतिक लाभ के लिए लिए गए?
राज्य की कुल देनदारी अब 3.70 लाख करोड़ रुपये के पार पहुंच चुकी है और वर्ष के अंत तक इसके 4 लाख करोड़ रुपये से अधिक होने की संभावना है। हर वर्ष लगभग 40 हजार करोड़ रुपये केवल ब्याज भुगतान में खर्च हो रहे हैं—यानी प्रतिदिन 100 करोड़ रुपये से अधिक। ऐसे में विकास योजनाओं के लिए संसाधन जुटाना स्वाभाविक रूप से कठिन हो जाता है।
वर्तमान सरकार ने इस चुनौती से निपटने के लिए राजस्व बढ़ाने की दिशा में कुछ कदम उठाए हैं। संपत्ति कर वसूली को तेज करने और परिवहन कर संग्रह में सुधार के निर्देश दिए गए हैं। कई विभागों पर राजस्व वृद्धि का दबाव बनाना यह संकेत देता है कि सरकार अब केवल कर्ज पर निर्भर रहने के बजाय अपनी आय बढ़ाने का प्रयास कर रही है। हालांकि, इन प्रयासों के परिणाम सामने आने में समय लगेगा।इसके बावजूद जमीनी हकीकत वित्तीय प्रबंधन की कमजोरियों को उजागर करती है। वित्तीय वर्ष की शुरुआत में ही वेतन भुगतान में देरी, स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड योजना का अटकना और विकास कार्यों का ठप पड़ना यह दर्शाता है कि बजट प्रबंधन में गंभीर खामियां मौजूद हैं। यह स्थिति इस बात का भी संकेत है कि लोकलुभावन योजनाओं ने विकास के लिए निर्धारित संसाधनों पर असर डाला है।
पूर्व सरकार पर यह आरोप लगाना आसान है कि उसने बिना दीर्घकालिक रणनीति के खर्च बढ़ाया, जिससे आज की सरकार को संकट का सामना करना पड़ रहा है। लेकिन वर्तमान सरकार के लिए असली चुनौती आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़कर ठोस और टिकाऊ समाधान प्रस्तुत करना है। केवल कर्ज लेकर योजनाओं को चलाना दीर्घकालिक समाधान नहीं हो सकता।
यह समझना जरूरी है कि कर्ज लेना अपने आप में गलत नहीं है—यदि उसका उपयोग उत्पादक क्षेत्रों में निवेश के लिए किया जाए। लेकिन जब कर्ज का उपयोग मुख्यतः राजस्व व्यय, जैसे पेंशन और सब्सिडी, में होता है, तो यह भविष्य में और बड़े वित्तीय संकट को जन्म दे सकता है। इसलिए आवश्यक है कि कर्ज का एक बड़ा हिस्सा बुनियादी ढांचे, शिक्षा और रोजगार सृजन जैसे क्षेत्रों में लगाया जाए, जिससे राज्य की आय क्षमता बढ़े और कर्ज का बोझ कम हो।
अंततः, पूर्व और वर्तमान सरकार के बीच का अंतर आरोपों से नहीं, बल्कि नीतियों के ठोस परिणामों से तय होगा। जनता अब केवल घोषणाओं से संतुष्ट नहीं होगी, बल्कि पारदर्शी और प्रभावी शासन देखना चाहती है। बढ़ता कर्ज एक स्पष्ट चेतावनी है—यदि समय रहते संतुलित और दूरदर्शी कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में स्थिति और गंभीर हो सकती है।
सरकार के लिए यह केवल एक आर्थिक चुनौती नहीं, बल्कि भरोसे की भी कसौटी है—जहां उसे विकास और कल्याण के बीच संतुलन साधते हुए राज्य की आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित करनी होगी।
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