धन्य माता एलिस्वा वाकायिल: भारतीय नारी शक्ति और समर्पण का अमर प्रतीक
कोच्चि.कोच्चि के वल्लारपदम महागिरजाघर में आयोजित ऐतिहासिक समारोह में जब पोप लियो XIV के विशेष प्रतिनिधि और मलेशिया के पेनांग के बिशप कार्डिनल सेबेस्टियन फ्रांसिस ने आधिकारिक तौर पर मदर एलिस्वा को धन्य घोषित किया. कार्डिनल ने पोप द्वारा जारी घोषणा पत्र लैटिन भाषा में पढ़ा. वेरापोली आर्चडायसिस के मेट्रोपॉलिटन जोसेफ कलाथिपरम्बिल ने अपने प्रार्थना-प्रार्थना में कहा, "मदर एलिस्वा का पवित्र, साहसी और अटूट विश्वास और प्रेम का जीवन अनेक लोगों के लिए प्रेरणादायक रहेगा.
पेनांग के महाधर्माध्यक्ष कार्डिनल सेबेस्टियन फ्रांसिस ने ईशसेविका मदर एलिस्वा वाकायिल को “धन्य” घोषित किया, तो यह केवल कैथोलिक समुदाय के लिए ही नहीं, बल्कि भारत के समग्र सामाजिक-शैक्षिक इतिहास के लिए भी एक गौरवपूर्ण क्षण बन गया। 1831 में जन्मी और 1913 में देह त्यागने वाली मदर एलिस्वा का जीवन सेवा, त्याग और महिला सशक्तिकरण की एक जीवंत मिसाल है।
मदर एलिस्वा वाकायिल ने न केवल भारत में पहला आदिवासी धर्मबहनों का धर्मसमाज टीओसीडी (Teresian Carmelite Sisters of the Third Order Discalced) की स्थापना की, बल्कि केरल में लड़कियों के लिए पहला कॉन्वेंट स्कूल भी खोला — एक ऐसा कदम जिसने 19वीं सदी के केरल में शिक्षा की दिशा बदल दी। जब समाज में महिलाओं की शिक्षा को संकीर्ण दृष्टि से देखा जाता था, तब उन्होंने उस बंधन को तोड़ते हुए ज्ञान और आत्मनिर्भरता का दीप जलाया।
उनकी पहल से शुरू हुआ यह आंदोलन आज भी “तेरेसियन कार्मेलाइट्स धर्मसमाज” के माध्यम से हजारों युवतियों के जीवन को दिशा दे रहा है। उनके दान और भक्तिमय जीवन की परिणति अब “धन्य” के रूप में हुई है — यह उस तप, समर्पण और करुणा का सम्मान है जो उन्होंने समाज के वंचितों के लिए दिखाया।
इस ऐतिहासिक अवसर पर मुंबई आर्चडायसिस के एमेरिटस कार्डिनल ओसवाल्ड ग्रेसियस ने धन्य माता एलिस्वा की प्रतिमा का अनावरण किया और उनके अवशेषों को वेदी पर स्थापित किया गया। इस समारोह में भारतीय कैथोलिक बिशप सम्मेलन (CBCI) के अध्यक्ष मार एंड्रयूज थजाथ, केआरएलसीबीसी के अध्यक्ष आर्चडायसिस वर्गीज चक्कलकल और आर्चडायसिस जोसेफ कलाथिपरम्बिल सहित अनेक वरिष्ठ धर्मगुरुओं की उपस्थिति ने इस क्षण को ऐतिहासिक बना दिया।
एलिस्वा के जीवन का हर अध्याय प्रेरणा देता है। 20 वर्ष की आयु में पति की असामयिक मृत्यु के बाद उन्होंने सांसारिक जीवन से विरक्त होकर प्रार्थना और सेवा को अपना जीवन-मार्ग बनाया। उन्होंने न केवल शिक्षा, बल्कि करुणा और समानता के मूल्य को समाज में स्थापित किया।
ईसाई परंपरा में संत घोषित किए जाने की प्रक्रिया चार चरणों से गुजरती है – ईश्वर की सेविका, आदरणीय, धन्य और अंततः संत। 2008 में उन्हें “ईश्वर की सेविका” घोषित किया गया, 2023 में “आदरणीय” और अब 2025 में “धन्य” का सम्मान प्राप्त हुआ है। अब यदि उनकी मध्यस्थता से एक और सत्यापित चमत्कार सिद्ध होता है, तो वह केरल की पांचवीं संत घोषित की जाएगी — एक ऐसी मील का पत्थर जो भारतीय नारी शक्ति की आध्यात्मिक ऊंचाई को विश्व के पटल पर और दृढ़ करेगा।
केरल में अब तक चार संत घोषित हो चुके हैं — सिस्टर अल्फोंसा, फादर कुरियाकोस चावरा, सिस्टर यूफ्रेसिया और मरियम थ्रेसिया। इस सूची में एलिस्वा वाकायिल का नाम जोड़ना, राज्य की धार्मिक विरासत और भारत की आध्यात्मिक चेतना दोनों के लिए सम्मान की बात है।
धन्य माता एलिस्वा वाकायिल का जीवन हमें याद दिलाता है कि सच्चा धर्म केवल प्रार्थना में नहीं, बल्कि सेवा, शिक्षा और समानता के प्रसार में निहित है। उनकी विरासत आज भी यह सिखाती है — “जहाँ प्रेम और सेवा है, वहीं ईश्वर का वास है।”
आलोक कुमार