रविवार, 18 दिसंबर 2022

अपने "राष्ट्रीय हित" सच में रक्त रंजित आर्थिक लाभ के लिए इस आपदा को हवा देने में लगे


आज हम युद्ध वैश्विक अशांति के माहौल में जी रहे हैं. रूस और यूक्रेन के बीच करीब विगत 10 माह से विध्वंसकारी युद्ध चल रहा है.सैकड़ों और हजारों की तादाद में लोग मारे जा रहे हैं और लाखों की संख्या में लोग घर से बेघर हो रहे हैं. विभिन्न संपन्न देश कहीं ना कहीं इस मानव निर्मित आपदा में जूझते आ रहे हैं.कई तो अपने "राष्ट्रीय हित" सच में रक्त रंजित आर्थिक लाभ के लिए इस आपदा को हवा देने में लगे हैं,वहीं कुछ इसी मकसद से चुप रह कर तमाशा देख रहे हैं, इस आशा में कि हमें इससे क्या लाभ मिलेगा. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लोगों को तीसरे विश्व युद्ध के आसार नजर आ रहे हैं?

       विश्व स्तर पर ही क्यों, अलग-अलग देशों में अलग-अलग रूपों में अशांति व्याप्त है.धर्म,जाति, संस्कृति, विचारधारा और क्षेत्रवाद आदि के नाम पर ध्रुवीकरण का संकट गहराता जा रहा है.आम लोगों में एक- दूसरे के प्रति डर गहराता जा रहा है. डार्विन की वैज्ञानिक सोच समुदायों और व्यक्तियों के जीवन में, आधार मूल सिद्धांत के रूप में जड़ जमाता जा रहा है. इसके अनुसार - 'केवल सक्षम को जीने और बने रहने का अधिकार है'?

        इस उभर रही सोच का पूंजीवाद, उपभोक्तावाद, राष्ट्रवाद,साम्राज्यवाद के सहारे राजनैतिक और आर्थिक संस्थान और शक्तियों सचेत रूप से विस्तार कर रही है.इसका कुल नतीजा यह निकल रहा है कि आदमी, आदमी से डर रहा है. वह डर के माहौल में जीने को मजबूर है और उसी में घुट- घुट कर जी रहा है. यही डरा हुआ इंसान दिन -ब- दिन स्वकेंद्रित होता जा रहा है.                                                                        

        मानव निर्मित आपदाओं का प्रकृति मुखर प्रतिरोध करने लगी है. कहीं बेमौसम अति वृष्टि, कहीं पानी की कमी से अकाल और सूखे की वजह से मरने की स्थिति,प्राकृतिक आपदाओं, कर्ज के बोझ और सरकारी उपेक्षाओं के शिकार -सबसे जीवन को बनाए रखने वाले किसान आत्महत्या कर अपनी ही जीवन लीला समाप्त कर रहे हैं. अपने असीमित लाभ और क्षणिक खुशियों के लिए हमें हवा और पानी को दूषित करने के लिए से कोई गुरेज नहीं है.मामला जरूरत से ज्यादा चीजों के इस्तेमाल का हो या आतिशबाजी करने का या बेवजह बिजली पानी तथा ऊर्जा की खपत की बर्बादी का या फिर पराली जलाने का !जब हमारी सोच में 'मैं' सर्वोपरि तो हमें किसी अन्य की कोई चिंता नहीं - चाहे वे हमारे बच्चे -बच्चियां,उनके होने वाले बच्चे-बच्चियां यानी हमारी खुद की आने वाली पीढ़ियां ही क्यों न हों.                                            

         इस भयानक और डरावनी परिस्थिति में हम 'ख्रीस्त जयंती' ही मना रहे हैं. नवी इसायाह ने 740 ईसा पूर्व प्रभु येसु के आगमन की भविष्यवाणी करते हुए लिखा था -" अपूर्व परामर्शदाता! शक्तिशाली  ईश्वर, शाश्वत पिता, शांति का राजा'(इसा.9:5). आगे यही नबी अपनी पुस्तक के 34 वें अध्याय में लिखते हैं-  घबराए हुए लोगों से कहो- ढारस रखो,डरो मत. देखो तुम्हारा ईश्वर आ रहा है... वह स्वयं तुम्हें बचाने आ रहा है,'(इसा.35:4). आशावान बने रहो.तुम यह जानाे और विश्वास करो कि उन्हें प्रभु में तुम्हारी मुक्ति निकट है.                                                                

         नबी के माध्यम से प्रभु अपने इस वायदे से हमें आश्वासन देते हैं कि परिस्थितियां बदलेगी. संत याकूब अपने पत्र के पांचवें अध्याय में किसान का उदाहरण देते हुए सबका आह्वान करते हैं कि एक किसान की तरह, जो अपना कर्म करते हुए, बीज रोपण और धीरज के साथ समुचित वर्षा और समय पर फसल के तैयार होने की प्रतीक्षा करता है, हमें भी प्रभु येसु की शिक्षानुसार,अपना कर्म करते हुए  अपनी मुक्ति की प्रतीक्षा करनी चाहिए. शांति के राजा, प्रभु येसु की शिक्षा यही थी कि उनके शिष्य ईमानदारी और लगन से एक -दूसरे को प्यार और क्षमा देते हुए अपने आप में दूसरों में जीवन को मजबूत करें. प्रभु के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धा होगी कि हम प्रभु की जीवन शैली को अपनाए, उनके जीवन मूल्यों को जीयें  और न्याय, शांति ,प्रेम, क्षमा और सहभागिता का जीवन जीते हुए अपने परिवार और दुनिया में एक नये समाज के जड़ें को मजबूत करें.                                         

        हम सबको और प्रत्येक परिवार को बालक येसु की शांति और आशीर्वाद मिले.सब को नए वर्ष की शुभकामनाएं!आपका जीवन मंगलमय हो. 

     फादर पीयुस माइकल,ये.स. कुर्जी के पल्ली पुरोहित.


आलोक कुमार


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