शुक्रवार, 25 जुलाई 2025

ईसाई मिशनरी संस्थाओं में स्वैच्छिक इस्तीफे की आड़ में जबरन निष्कासन

 

ईसाई मिशनरी संस्थाओं में स्वैच्छिक इस्तीफे की आड़ में जबरन निष्कासन कर दिया जाता है. मिशनरी प्रबंधन की सॉफ्ट टर्मिनेशन रणनीति उजागर,दर्जनों कर्मचारियों को इस रणनीति के तहत नौकरी से बाहर कर देने की खबर......

पटना.राजधानी पटना में है मेडिकल मिशन सिस्टर्स द्वारा संचालित कुर्जी होली फैमिली अस्पताल.यहां कार्यरत कर्मी हलकान और परेशान हैं.यहां के कर्मी जानते हैं कि कभी भी यहां की प्रबंधन की मनमर्जी के शिकार होकर स्वैच्छिक इस्तीफे की आड़ में जबरन नौकरी से निष्कासन कर दिया जाएगा.यहां के अगस्टीन,वर्गीस,अशोक,सत्यनारायण आदि कर्मियों पर निष्कासन की कैची चल गई है.ये सबके सब ईसाई मिशनरी संस्था की प्रबंधक की ‘सॉफ्ट टर्मिनेशन रणनीति‘ के शिकार हो चुके हैं.

        जानकार लोगों का कहना है कि कुर्जी होली फैमिली अस्पताल की प्रबंधक ने तारा टोप्पों को जबरन नौकरी से निकालने के बाद काफी बवाल हुआ था,तब से कर्मचारियों को  प्रत्यक्ष रूप से नहीं निकाला जाता हैं.उनको मनोवैज्ञानिक दबाव डालकर उनसे इस्तीफा देने पर मजबूर कर दिया जाता है.यहां तक घरेलू जांच कमिटी गठित कर जबरन मानसिक प्रताड़ना देना शुरू कर दिया जाता है.उनसे कहा जाता है कि अगर इस्तीफा नहीं देते हैं तो आपको वेतन व अन्य सुविधाओं से वंचित कर दिया जाएगा. इस्तीफा देने से इनकार करने पर कानूनी कार्रवाई की धमकी दी जाती है. उनके लिए विदाई सम्मान या फेयरवेल कार्यक्रम नहीं होता है, भले ही उनकी सेवा अवधि लंबी क्यों न हो.


1. मलहम लगाना -शुरुआत में कर्मचारी को समझाया जाता है कि “आपके लिए यह बेहतर होगा”

2. दबाव में कहा जाता है – “इस्तीफा नहीं देंगे तो कानूनी कार्रवाई होगी”

3.धमकी - "3 माह का वेतन और अन्य लाभ नहीं मिलेंगे”

4. मजबूरी में इस्तीफा- "कर्मचारी को दिखाया जाता है कि बाहर का रास्ता ही विकल्प है"

5. कोई फेयरवेल नहीं -"वर्षों की सेवा के बावजूद कोई सार्वजनिक विदाई नहीं होती"

यह प्रबंधन की चालाकी है. स्वेच्छा से इस्तीफा दिया.यह दिखाने से संस्था कानूनी झंझट से बचती है.कर्मचारी न्याय की लड़ाई नहीं लड़ पाते क्योंकि दस्तावेजों में ‘इस्तीफा’ होता है यह नैतिक सवाल है कि क्या यह स्वैच्छिक इस्तीफा है या ढका-छिपा निष्कासन?सेवा करने वाले कर्मचारियों को इस तरह बाहर करना क्या क्रूरता नहीं? प्रासंगिक उदाहरण है कि यही नीति उप राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के साथ हाल में उपयोग में लाई गई..जैसे दूध में गिरी मक्खी को निकाल फेंकना..यह नीति केवल अस्पताल या मिशनरी संस्था नहीं, कई अन्य एनजीओ और संस्थानों में भी प्रचलित है.

मांगें

1. ऐसे संस्थानों में लेबर लॉ और मानवाधिकार आयोग की जांच हो

2. निकाले गए कर्मचारियों को न्याय व हर्जाना मिले

3. पारदर्शी टर्मिनेशन पॉलिसी अनिवार्य हो

4. धर्म आधारित संस्थाओं की जवाबदेही तय हो


आलोक कुमार


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