मंगलवार, 25 नवंबर 2025

विज्ञापन हटाने के निर्देश दिए


 
गोवा.गोवा में प्रस्तावित ‘टेल्स ऑफ कामसूत्र एंड क्रिसमस सेलिब्रेशन’ कार्यक्रम पर उठा विवाद केवल एक आयोजन का विरोध नहीं है, बल्कि यह उस सामाजिक चेतना का संकेत है जो धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक गरिमा और सार्वजनिक मर्यादा से जुड़े प्रश्नों पर बेहद सजग है.सोशल मीडिया पर जैसे ही इस कार्यक्रम का प्रचार सामने आया, समाज के विभिन्न वर्गों—सामाजिक संस्थाओं से लेकर धार्मिक संगठनों तक—ने इसकी तीखी प्रतिक्रिया दी.सार्वजनिक दबाव और शिकायतों के बाद गोवा पुलिस ने तुरंत हस्तक्षेप करते हुए आयोजन पर रोक लगा दी. विज्ञापन हटाने के निर्देश दिए गए और पूरे राज्य में सतर्कता बढ़ा दी गई.

    इस विवाद की जड़ केवल ‘कामसूत्र’ शब्द का प्रयोग नहीं है, बल्कि इसे क्रिसमस जैसे पवित्र पर्व के साथ जोड़कर प्रस्तुत करना है. शिकायतकर्ताओं को आपत्ति इसी बात से है कि धार्मिक उत्सव की आस्था और आध्यात्मिकता को बाजारू आकर्षण के साथ मिलाकर पेश किया गया. एनजीओ संस्थापक अरुण पांडे का तर्क है कि यह गोवा का सेक्स टूरिज्म के अड्डे की तरह प्रचारित करने की चाल है. वहीं, कैथोलिक एसोसिएशन ऑफ गोवा ने इसे न सिर्फ अनुचित बताया बल्कि समाज में यौन अपराधों को बढ़ावा देने वाली प्रवृत्ति करार दिया.

         सबसे प्रखर आवाज गोवा के आर्चबिशप व भारतीय कैथोलिक बिशप सम्मेलन के अध्यक्ष फिलिप नेरी कार्डिनल फेराओ की ओर से आई.उन्होंने इसे ईसा मसीह के जन्मोत्सव को अश्लीलता से जोड़ने की “गंभीर चूक” बताया और धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाला कदम कहा.उनकी प्रतिक्रिया, व्यापक कैथोलिक समाज की बेचैनी को अभिव्यक्त करती है.

    यह भी उल्लेखनीय है कि विरोध केवल धार्मिक संगठनों तक सीमित नहीं रहा. स्थानीय राजनीतिक इकाइयों और सामाजिक समूहों ने भी तीखी प्रतिक्रिया दी. कांग्रेस की सांता क्रूज़ यूनिट ने स्पष्ट कहा कि इस तरह के आयोजन गोवा की सांस्कृतिक छवि को धूमिल करते हैं. पर्यटन आधारित अर्थव्यवस्था वाले इस राज्य में संस्कृति और सामाजिक संवेदनशीलता के बीच संतुलन बनाए रखना हमेशा चुनौतीपूर्ण रहा है.ऐसे में किसी भी आयोजन का प्रचार यदि सामाजिक मानदंडों से टकराए, तो स्वाभाविक है कि विरोध तेज हो.

कार्यक्रम के पीछे ओशो से जुड़ा प्रचार ढांचा और ‘ध्यान’ तथा ‘वेलनेस’ के नाम पर विविध गतिविधियों का दावा था। लेकिन आयोजनकर्ताओं ने जिस तरह क्रिसमस को जोड़कर यह पैकेज तैयार किया, वह समाज को मंजूर नहीं हुआ। उनके मौन ने संदेह और बढ़ा दिया है.

इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि त्योहारों का व्यवसायीकरण अभी तक स्वीकार्य है जब वह सांस्कृतिक और धार्मिक भावनाओं के दायरे का सम्मान करें. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता महत्त्वपूर्ण है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि धार्मिक पहचान और सामाजिक मर्यादाओं की अनदेखी की जाए. गोवा पुलिस का हस्तक्षेप इसलिए समयोचित माना जाना चाहिए क्योंकि इससे संभावित तनाव और सामाजिक असंतोष को बढ़ने से रोका गया.

अंततः, यह घटना गोवा और देश दोनों के लिए एक संदेश छोड़ती है—कि आधुनिकता और आध्यात्मिकता के बीच किसी भी प्रकार की अवांछित संगति समाज में असंतोष पैदा कर सकती है. सांस्कृतिक संवेदना को समझे बिना आकर्षक शीर्षक गढ़ना रचनात्मकता नहीं, बल्कि लापरवाही है। त्योहार, आस्था और सामाजिक मूल्य—ये किसी भी मनोरंजन या व्यावसायिक महत्वाकांक्षा से कहीं ऊपर है.


आलोक कुमार

सोमवार, 24 नवंबर 2025

फादर किनले शेरिंग, भूटान के पहले और अब तक के एकमात्र मूल-निवासी कैथोलिक पादरी

 


भूटान .भूटान, जहाँ सदियों से बौद्ध धर्म सांस्कृतिक आत्मा की तरह समाज को संचालित करता आया है, वहाँ कैथोलिक समुदाय की उपस्थिति भले ही अल्पसंख्या में हो—लेकिन इसकी आध्यात्मिक गूंज अत्यंत गहरी है.रोम में पोप के आध्यात्मिक नेतृत्व से जुड़ा यह समुदाय दार्जिलिंग (भारत) के धर्मप्रांत के अधिकार क्षेत्र में आता है, और 2015 के अनुमान के अनुसार भूटान में कुल कैथोलिकों की संख्या मात्र 1,200 है. लेकिन इस छोटे से समुदाय की धड़कन एक ऐसे व्यक्ति से जुड़ी है, जिसकी कहानी भूटान के धार्मिक-सामाजिक इतिहास में अपूर्व स्थान रखती है—फादर किनले शेरिंग, भूटान के पहले और अब तक के एकमात्र मूल-निवासी कैथोलिक पादरी.

     फादर शेरिंग की यात्रा एक साधारण धार्मिक कथा नहीं, बल्कि अंतरात्मा में उठी पुकार, सामाजिक दबावों से जूझते विश्वास, और आध्यात्मिक साहस की एक असाधारण दास्तान है। एक धर्मनिष्ठ बौद्ध परिवार में जन्मे और युवावस्था में उद्यमिता की राह पर बढ़ते हुए उन्होंने गुप्त रूप से ईसा मसीह की शिक्षाओं का अध्ययन शुरू किया—वह अध्ययन जो धीरे-धीरे उनके भीतर एक बेचैनी, एक अज्ञात खिंचाव और अंततः एक गहरी प्रतिबद्धता में बदल गया.

    स्वयं फादर शेरिंग बताते है-“मुझे अपने भीतर एक अथाह बेचैनी महसूस होती थी. लगता था कि कोई मुझे पुकार रहा है—कि मेरा जीवन एक पुरोहित के रूप में ईसा मसीह को समर्पित होना चाहिए.लेकिन पारिवारिक और व्यावसायिक दबावों के बीच अंतिम निर्णय लेना आसान नहीं था.”

     उनके जीवन का निर्णायक मोड़ 1986 में आया—और वह भी किसी धार्मिक सम्मेलन, किसी चर्च या किसी तीर्थ स्थल पर नहीं, बल्कि एक हवाई जहाज में. वहाँ उनकी मुलाकात हुई मदर टेरेसा से.वह क्षण केवल संयोग नहीं, बल्कि नियति की तरह था.मदर टेरेसा ने उन्हें देखा, सुना—और एक वाक्य में उनके भीतर की दबी पुकार को शब्द दे दिए:

“तुम्हारा एक आह्वान है.ईश्वभूटान, जहाँ सदियों से बौद्ध धर्म सांस्कृतिक आत्मा की तरह समाज को संचालित करता आया है, वहाँ कैथोलिक समुदाय की उपस्थिति भले ही अल्पसंख्या में हो—लेकिन इसकी आध्यात्मिक गूंज अत्यंत गहरी है. रोम में पोप के आध्यात्मिक नेतृत्व से जुड़ा यह समुदाय दार्जिलिंग (भारत) के धर्मप्रांत के अधिकार क्षेत्र में आता है, और 2015 के अनुमान के अनुसार भूटान में कुल कैथोलिकों की संख्या मात्र 1,200 है. लेकिन इस छोटे से समुदाय की धड़कन एक ऐसे व्यक्ति से जुड़ी है, जिसकी कहानी भूटान के धार्मिक-सामाजिक इतिहास में अपूर्व स्थान रखती है—फादर किनले शेरिंग, भूटान के पहले और अब तक के एकमात्र मूल-निवासी कैथोलिक पादरी.

फादर शेरिंग की यात्रा एक साधारण धार्मिक कथा नहीं, बल्कि अंतरात्मा में उठी पुकार, सामाजिक दबावों से जूझते विश्वास, और आध्यात्मिक साहस की एक असाधारण दास्तान है. एक धर्मनिष्ठ बौद्ध परिवार में जन्मे और युवावस्था में उद्यमिता की राह पर बढ़ते हुए उन्होंने गुप्त रूप से ईसा मसीह की शिक्षाओं का अध्ययन शुरू किया—वह अध्ययन जो धीरे-धीरे उनके भीतर एक बेचैनी, एक अज्ञात खिंचाव और अंततः एक गहरी प्रतिबद्धता में बदल गया.

स्वयं फादर शेरिंग बताते हैं—“मुझे अपने भीतर एक अथाह बेचैनी महसूस होती थी. लगता था कि कोई मुझे पुकार रहा है—कि मेरा जीवन एक पुरोहित के रूप में ईसा मसीह को समर्पित होना चाहिए. लेकिन पारिवारिक और व्यावसायिक दबावों के बीच अंतिम निर्णय लेना आसान नहीं था.”

उनके जीवन का निर्णायक मोड़ 1986 में आया—और वह भी किसी धार्मिक सम्मेलन, किसी चर्च या किसी तीर्थ स्थल पर नहीं, बल्कि एक हवाई जहाज में. वहाँ उनकी मुलाकात हुई मदर टेरेसा से. क्षण केवल संयोग नहीं, बल्कि नियति की तरह था. मदर टेरेसा ने उन्हें देखा, सुना—और एक वाक्य में उनके भीतर की दबी पुकार को शब्द दे दिए:

“तुम्हारा एक आह्वान है. ईश्वर के प्रति उदार बनो—वह तुम्हारे प्रति उदार होगा.”

यही वह क्षण था जिसने किनले शेरिंग को अंतिम निर्णय लेने का संबल दिया.

1995 में वे जेसुइट पादरी के रूप में अभिषिक्त हुए. वर्षों बाद वे दार्जिलिंग जेसुइट प्रांत के प्रांतीय सुपीरियर भी बने—ऐसा पद जिसे संभालना भूटान जैसे धार्मिक रूप से परंपरावादी देश के एक नव-धर्मांतरित व्यक्ति के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि ही नहीं, बल्कि साहस का प्रमाण भी है.

भूटान के लिए यह क्षण महज धार्मिक इतिहास की एक पंक्ति नहीं, बल्कि बहुलता, सहिष्णुता और व्यक्तिगत आस्था की स्वतंत्रता के सम्मान का प्रतीक है. एक बौद्ध राष्ट्र में एक कैथोलिक पादरी—वह भी मूल निवासी—का स्वागत एक नए सौहार्दपूर्ण अध्याय की शुरुआत था.

फादर किनले शेरिंग की कहानी हमें यह याद दिलाती है कि आस्था की हर यात्रा व्यक्तिगत होती है, जोखिमों से भरी होती है, लेकिन जब कोई सत्य हृदय से पुकारता है—तो उसकी प्रतिध्वनि दुनिया की सबसे शक्तिशाली ताकतों से भी गहरी होती है.

भूटान की शांत घाटियों में, हिमालय की ऊंचाइयों के बीच, कैथोलिक समुदाय भले ही छोटा हो—लेकिन उसे दिशा देने वाला उसका पुरोहित असाधारण रूप से विराट है.


आलोक कुमार


रविवार, 23 नवंबर 2025

बिहार का राजनीतिक तापमान कितना उबलने वाला है

 

पटना.बिहार की सियासी जमीन पर इन दिनों जो हलचल है, वह सिर्फ सत्ता परिवर्तन की नहीं, शासन-तरीकों की दिशा बदलने की चेतावनी भी है.भाकपा-माले की हाजीपुर में आयोजित श्रद्धांजलि सभा में महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य ने जिस स्पष्टता और कड़वाहट से बातें रखीं, वह यह बताने के लिए पर्याप्त है कि आने वाले समय में बिहार का राजनीतिक तापमान कितना उबलने वाला है.

    चुनाव के ठीक पहले 70 लाख नाम मतदाता सूची से गायब होना और 20–25 लाख नए नाम जोड़े जाना खुद में लोकतांत्रिक ढांचे की गंभीर विसंगति को उजागर करता है. दीपंकर का आरोप है कि यह सब एक संगठित साजिश की तरह हुआ—हर बूथ का संतुलन बदला गया, और इसके बाद जनता पर रुपये बिखेरकर चुनावी हवा को मोड़ा गया. यह आरोप चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल के साथ-साथ लोकतांत्रिक विश्वास को भी चोट पहुंचाता है.

   सबसे बड़ा संकेत यह है कि बिहार अब “नीतीश मॉडल” नहीं, बल्कि “यूपी मॉडल” के रास्ते पर धकेला जा रहा है. मुख्यमंत्री तो नीतीश हैं, पर गृह मंत्रालय किसी और के पास है—और उसके पीछे बुलडोजर की छाया स्पष्ट दिखती है.जिस तरह उत्तर प्रदेश में बुलडोजर कानून का प्रतीक बन गया, उसी की छाया बिहार पर डालने की चेतावनी दी जा रही है.सवाल यह है कि क्या यह बुलडोजर अपराधियों पर चलेगा, या फिर वही पुराना पैटर्न दोहराया जाएगा—जहां दलित, पिछड़े, और अल्पसंख्यक ही सबसे आसान निशाना बनते हैं?

    दुलारचंद यादव की हत्या और उपमुख्यमंत्री का “छाती पर बुलडोजर” वाला बयान यह संकेत देता है कि राजनीति फिर से भय और दमन की भाषा अपनाने की ओर लौट रही है। चुनावी मंचों पर किसानों से लेकर बेरोजगारों तक को बड़े-बड़े सपने दिखाए गए—उद्योग खोलने से लेकर बाढ़ समाधान तक—अब जनता हिसाब मांग रही है.

    मोदी के ‘गंगा’ वाले बयान पर दीपंकर का तंज भी राजनीतिक संदेश से भरा है। उन्होंने कहा—यह गंगा आस्था की नहीं, सत्ता की गंगा है, जिसे बंगाल की राजनीति में मोड़ने की तैयारी है. इसके समानांतर, श्रम कानूनों में बड़े बदलाव मजदूरों के अधिकारों पर सीधा हमला माने जा रहे हैं. आठ घंटे की जगह 12 घंटे काम, हड़ताल लगभग असंभव, नौकरी की कोई सुरक्षा नहीं—और इसे ‘सुधार’ के नाम पर परोसा जा रहा है.

     हिडमा की हत्या का मुद्दा भी सभा में राजनीतिक रंग से भरा.दीपंकर के अनुसार यह केवल माओवादी नेता की मौत नहीं, बल्कि आदिवासी इलाकों में कॉर्पोरेट विस्तार—खासकर अडानी समूह—को रास्ता साफ करने की प्रक्रिया का हिस्सा है.उनकी बूढ़ी मां का इस्तेमाल कर ‘सरेंडर’ का दबाव बनाने का आरोप और फिर हत्या—ये बातें बस्तर की वेदना और अविश्वास को और गहरा करती हैं.

   साथ ही, गैर-भाजपा राज्यों के साथ केंद्र का टकराव, तमिलनाडु में बिलों को रोके रखने की प्रवृत्ति, और सुप्रीम कोर्ट के बदलते रुख को दीपंकर लोकतांत्रिक ढांचे पर हमला बताते हैं। उनका स्वर साफ था—जब अंग्रेजों को भगाया जा सकता है, तो आज की किसी भी तरह की तानाशाही का मुकाबला भी संभव है.

चुनाव में महिलाओं के इस्तेमाल का आरोप, दलित-पिछड़ों पर बढ़ते अत्याचारों की चेतावनी, और बुलडोजर-राज के उभार को रोकने का आह्वान इस सभा का मूल संदेश बनकर सामने आया। कामरेड विशेश्वर प्रसाद यादव को दी गई श्रद्धांजलि सिर्फ भावनात्मक क्षण नहीं थी—वह आने वाले संघर्षों की प्रस्तावना भी थी.

   बिहार की राजनीति एक नए मोड़ पर खड़ी है.अब सवाल यह नहीं कि सरकार किसकी है—सवाल यह है कि शासन कैसा होगा: कानून का, या बुलडोजर का? और इस सवाल का उत्तर आने वाले दिनों की राजनीति तय करेगी.


आलोक कुमार

शनिवार, 22 नवंबर 2025

महाबलीपुरम से चंपारण की ऐतिहासिक यात्रा शुरू

 

विश्व का सबसे विशाल शिवलिंग—महाबलीपुरम से चंपारण की ऐतिहासिक यात्रा शुरू

यह शिवलिंग तमिलनाडु के महाबलीपुरम स्थित पट्टिकाडू गांव में पिछले 10 वर्षों में तैयार किया गया है. इसे शनिवार को 96 पहियों वाले विशेष ट्रक पर कड़ी सुरक्षा के बीच सड़क मार्ग से रवाना किया गया है। रास्ते में कई राज्यों और प्रमुख शहरों में श्रद्धालु इस शिवलिंग के दर्शन भी कर सकेंगे.

चंपारण . तमिलनाडु के समुद्री तट पर बसे महाबलीपुरम से जब 33 फीट ऊँचा और 210 मीट्रिक टन वजनी शिवलिंग 96-चक्का ट्रेलर पर धीरे-धीरे आगे बढ़ा, तो यह सिर्फ पत्थर का कोई ढांचा नहीं था—यह भारतीय आस्था, शिल्पकला और धैर्य का विराट प्रतीक था. दस वर्षों की सतत साधना, अनगिनत हथौड़ों की गूंज और शिल्पकार लोकनाथ की टीम की अनथक मेहनत आखिरकार उस क्षण में फलित हुई, जब पूजा-अर्चना के बाद शिवलिंग को पूर्वी चंपारण के लिए रवाना किया गया.यह सिर्फ एक शिवलिंग नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक यात्रा है—भारत की मिट्टी, मार्ग, लोग और विश्वास, सब इसमें सम्मिलित हैं.

  बन रहा है दुनिया का सबसे बड़ा रामायण मंदिर — और अब पहुँच रहा है उसका ‘हृदय’.पूर्वी चंपारण के चकिया (जानकीनगर) में निर्माणाधीन विराट रामायण मंदिर अपने आप में एक अद्भुत संरचना बनकर उभर रहा है.1080 फीट लंबा, 540 फीट चौड़ा परिसर,18 शिखर, जिनमें मुख्य शिखर की ऊँचाई 270 फीट,कुल 22 मंदिरों का समुच्चय,चार विशाल आश्रम और अब — दुनिया का सबसे विशाल 33 फीट का शिवलिंग.

          महावीर मंदिर न्यास समिति के इस प्रोजेक्ट का सपना आचार्य किशोर कुणाल ने देखा था। आज उनके पुत्र सायण कुणाल उसी स्वप्न को जमीन दे रहे हैं, और इस परियोजना को समय पर पूरा करने के लिए दिन-रात पेचीदा तकनीकी और प्रशासनिक कार्यों को आगे बढ़ा रहे हैं.33 फीट शिवलिंग—भारतीय शिल्प का अद्भुत प्रतिमान,एक ही विशाल ग्रेनाइट पत्थर से निर्मित,वजन 210 मीट्रिक टन,निर्माण समय 10 वर्ष,लागत लगभग 3 करोड़ रुपये.

   निर्माण स्थल: महाबलीपुरम के पट्टीकाडु गाँव.शिवलिंग को भक्तों और गांव वालों की उपस्थिति में परंपरागत पूजन के बाद रवाना किया गया। यह यात्रा महज भौगोलिक नहीं बल्कि आध्यात्मिक है—जिन राज्यों से शिवलिंग गुजरेगा, वहाँ स्वागत-पूजन की विशेष व्यवस्थाएँ होंगी।

अंदेशा है कि 25 दिनों में यह शिवलिंग चंपारण पहुँचेगा.शिवलिंग यात्रा—दक्षिण से उत्तर की आध्यात्मिक सेतु यात्रा मार्ग:

विशाल शिवलिंग को एक विशेष 96 चक्के वाले ट्रक पर लादकर महाबलीपुरम से बिहार के लिए रवाना किया गया. ये ट्रक कई राज्यों से होकर गुजरेगा. इस दौरान, श्रद्धालु कई शहरों में शिवलिंग के दर्शन कर सकेंगे. शिवलिंग का यात्रा मार्ग भी पहले से तया किया गया है. होसुर, होसाकोट, देवनाहाली, कुरनूल, हैदराबाद, निजामाबाद, अदिलाबाद, नागपुर, सीवनी, जबलपुर, मैहर, सतना, रीवा, मिर्जापुर, आरा, छपरा, मसरख, मोहम्मदपुर, केसरिया होते हुए ये अंत में चकिया स्थित विराट रामायण मंदिर परिसर पहुंचेगा।यह मार्ग एक तरह से भारत की सांस्कृतिक रेखा-चित्र जैसा है—दक्षिण की द्रविड़ शिल्प परंपरा से लेकर उत्तर भारत की श्री राम और शिव भक्ति तक.

   नए वर्ष में स्थापना—बिहार के लिए ऐतिहासिक क्षण.मंदिर प्रशासन के अनुसार, जनवरी–फरवरी 2026 में इस शिवलिंग की स्थापना हो सकती है। भारी उत्साह और राज्यव्यापी प्रतीक्षा पहले ही दिखने लगी है.यह सिर्फ बिहार का गर्व नहीं होगा, यह भारत का विश्व-मंच पर सांस्कृतिक परिचय बनेगा। जब कोई पूछेगा कि दुनिया का सबसे.विशाल मंदिर कौन-सा है—तो उत्तर होगा बिहार का विराट रामायण मंदिर.

    जब देश में मंदिर निर्माण और आध्यात्मिकता की चर्चा होती है, तो अक्सर उत्तर भारत ही विमर्श का केंद्र रहता रहा है। लेकिन इस शिवलिंग की यात्रा एक गहरा संदेश देती है—भारत की असली आत्मा उत्तर-दक्षिण, पूर्व-पश्चिम का भेद नहीं करती.यह शिवलिंग दक्षिण की शिल्प परंपरा और उत्तर की आस्था को जोड़ता हुआ एक सांस्कृतिक पुल है. और जब यह चकिया पहुँचेगा, तो संभव है कि यह केवल एक धार्मिक प्रतीक न रह जाए—यह बिहार के सांस्कृतिक पुनर्जागरण का आधारस्तंभ बन जाए.


आलोक कुमार

शुक्रवार, 21 नवंबर 2025

परिवारवाद सिर्फ किसी एक दल की समस्या नहीं है, यह भारतीय राजनीति की संरचनात्मक बीमारी है


पटना, (आलोक कुमार).बिहार की राजनीति में “परिवारवाद” पर उठती बहस कोई नई नहीं है, लेकिन ताज़ा घटनाक्रम ने इस पुराने विवाद को एक बार फिर से केंद्र में ला दिया है.विशेष रूप से इसलिए कि जिस एनडीए ने वर्षों तक कांग्रेस और राजद पर परिवारवाद का आरोप लगाकर राजनीतिक बढ़त लेने की कोशिश की, आज उसी गठबंधन के भीतर सत्ता और संगठन—दोनों जगह—विरासत की राजनीति का प्रभाव तेजी से उभर कर सामने आ रहा है.

     टीवी बहसों में एनडीए के प्रवक्ता लंबे समय तक कांग्रेस–राजद पर परिवारवादी राजनीति को लेकर तंज कसते रहे। न्यूज़ स्टूडियो में बैठे एंकर भी विज्ञापन-चालित TRP की दौड़ में इसी एजेंडे को हवा देते रहे. लेकिन आज जब परिदृश्य पलटा है, तो वही प्रश्न अब एनडीए के दरवाज़े पर दस्तक दे रहा है—और उतनी ही तीव्रता से, जितनी तीव्रता से कभी विपक्ष पर उठाया गया था.

      मीडिया बहस का केंद्र बिंदु अब एनडीए के भीतर मौजूद उन्हीं नेताओं के आसपास घूम रहा है जिनकी राजनीतिक पहचान पारिवारिक विरासत से ही उपजी है: एनडीए के ‘परिवारवाद’ का जीवंत दस्तावेज़

संतोष सुमन मांझी – पूर्व मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी के पुत्र, वर्तमान विधायक दीपांजलि मांझी के पति और ज्योति मांझी के दामाद.

सम्राट चौधरी – पूर्व मंत्री शकुनी चौधरी और पूर्व विधायक पार्वती देवी के पुत्र; आज बिहार के उपमुख्यमंत्री.

दीपक प्रकाश – उपेंद्र कुशवाहा और विधायक स्नेहलता के पुत्र.

श्रेयसी सिंह – दिग्विजय सिंह और पुतुल कुमारी की पुत्री.

रमा निषाद – पूर्व केंद्रीय मंत्री कैप्टन जय नारायण निषाद की पुत्रवधू और पूर्व सांसद अजय निषाद की पत्नी.

विजय चौधरी – पूर्व विधायक जगदीश प्रसाद चौधरी के पुत्र.

अशोक चौधरी – पूर्व मंत्री महावीर चौधरी के पुत्र तथा वर्तमान सांसद शांभवी चौधरी के पिता.

नितिन नवीन – पूर्व विधायक नवीन किशोर सिन्हा के पुत्र.

सुनील कुमार – पूर्व मंत्री चंद्रिका राम के पुत्र और पूर्व विधायक अनिल कुमार के भाई.

लेसी सिंह – समता पार्टी के पूर्व जिला अध्यक्ष भूटन सिंह की पत्नी.

मीडिया का प्रश्न — परिवारवाद का विरोध या परिवारवाद का पुनर संस्करण?

सबसे अधिक चर्चा उस कथन की हो रही है जिसमें नेताओं की नई पीढ़ी “ईश्वर की शपथ” लेकर यह दावा करती है कि वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के “स्नेह व आशीर्वाद” से बिहार को परिवारवाद से मुक्त करेंगे.

लेकिन यही वह क्षण है जो मीडिया को कटाक्ष का अवसर देता है:

“परिवारवाद के विरोध का इतना बड़ा दावा, और राजनीतिक विरासत की नींव पर खड़ी पूरी फेहरिस्त—क्या यह विरोध वचन है या व्यंग्य?”

टेलीविज़न स्टूडियो में अब बहस का केंद्र यही द्वैधता है.

एंकर जो कभी विपक्ष के परिवारवाद पर लंबे मोनोलॉग पढ़ते थे, आज असहज होकर वही प्रश्न सत्ता पक्ष से पूछने को मजबूर हैं.

प्रवक्ता जो दूसरों के परिवारवाद को लोकतंत्र के लिए ‘घातक’ बताते थे, अब या तो रक्षात्मक मुद्रा में हैं या विषय से भटकाने की कोशिश में.

राजनीतिक संदेश का उल्टा असर

नारा था—“परिवारवाद मुक्त राजनीति.”

लेकिन दृश्य है—“परिवारवाद में लिपटी राजनीतिक व्यवस्था.”

यह विरोधाभास ही मीडिया की सबसे बड़ी कहानी बन गया है.

समापन—बड़ी बहस का निष्कर्ष

परिवारवाद सिर्फ किसी एक दल की समस्या नहीं है, यह भारतीय राजनीति की संरचनात्मक बीमारी है.

लेकिन जब वही दल, जो इस बीमारी के सबसे बड़े आलोचक थे, अपने भीतर उसी प्रवृत्ति को आश्रय देते हैं, तो राजनीतिक नैतिकता का प्रश्न और तीखा होकर उठता है.

बिहार की राजनीति में यह बहस आने वाले दिनों में सिर्फ और तीव्र होगी—क्योंकि जनता अब केवल नारे नहीं, बल्कि नैरेटिव और वास्तविकताओं के बीच का अंतर देखने लगी है.

आलोक कुमार

गुरुवार, 20 नवंबर 2025

जेडीयू, बीजेपी और सहयोगी दलों के बीच जिम्मेदारियों का बंटवारा

 

पटना .बिहार की राजनीतिक दिशा एक बार फिर स्पष्ट होती दिखाई दे रही है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नए मंत्रिमंडल ने आकार ले लिया है और विभागों का ब्योरा यह संकेत देता है कि सत्ता-साझेदारी का संतुलन, अनुभव का उपयोग और राजनीतिक संदेश—तीनों को केंद्र में रखा गया है.जेडीयू, बीजेपी और सहयोगी दलों के बीच जिम्मेदारियों का बंटवारा आने वाले दिनों की प्रशासनिक प्राथमिकताओं को भी रेखांकित करता है.

      सबसे पहले स्वयं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सामान्य प्रशासन, गृह, कैबिनेट सचिवालय और निगरानी जैसे अहम विभाग अपने पास रखकर यह साफ कर दिया है कि शासन की धुरी अभी भी उन्हीं के हाथ में है. इसके साथ ही निर्वाचन और वे सभी विभाग जो किसी अन्य को आवंटित नहीं हैं, यह दिखाता है कि वे प्रशासनिक नियंत्रण को केंद्रीकृत रखना चाहते हैं.

    दो उपमुख्यमंत्रियों—सम्राट चौधरी और विजय कुमार सिन्हा—को सौंपे गए विभाग स्पष्ट रूप से बीजेपी की प्राथमिकता और ताकत दोनों को इंगित करते हैं.सम्राट चौधरी को वित्त और वाणिज्य-कर जैसे निर्णायक आर्थिक विभाग सौंपे गए हैं, जो राजकोषीय अनुशासन और आर्थिक प्रबंधन पर उनकी भूमिका को मजबूत बनाएंगे. वहीं विजय कुमार सिन्हा को कृषि और खान-भूतत्व दिए जाने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था की नब्ज पर बीजेपी की पकड़ बढ़ाने की कोशिश साफ दिखती है.

     जेडीयू के वरिष्ठ नेताओं में विजय कुमार चौधरी को जल संसाधन और संसदीय कार्य सौंपा गया है—दो ऐसे विभाग, जो नीति निर्माण और क्रियान्वयन के बीच पुल का काम करते हैं.बिजेंद्र प्रसाद यादव को ऊर्जा और योजना जैसे विभाग देकर पार्टी ने उन्हें विकास-ढांचे का चेहरा बनाने की कोशिश की है. श्रवण कुमार और अशोक चौधरी को ग्रामीण क्षेत्रों से जुड़े विभाग देने से नीतीश मॉडल की मूल भूमि—ग्रामीण विकास—को मजबूती मिलती है.

    भाजपा के मंगल पांडेय को स्वास्थ्य और विधि की अतिरिक्त जिम्मेदारी सौंपकर केंद्र और राज्य के तालमेल को सुदृढ़ करने की कोशिश झलकती है. नितिन नवीन को पथ निर्माण और नगर विकास जैसे भारी-भरकम विभाग दिए जाने से शहरी बुनियादी ढांचे पर अधिक फोकस का संकेत मिलता है.

           वहीं उद्योग, पंचायती राज जैसे विभाग रामकृपाल यादव को देकर बीजेपी ने जमीनी राजनीतिक अनुभव को प्रशासनिक जिम्मेदारी से जोड़ने का प्रयास किया है. सुशील कुमार सुमन के पास लघु जल संसाधन और मो. जामा खान के पास अल्पसंख्यक कल्याण का विभाग—ये दोनों क्षेत्र सामाजिक संतुलन की राजनीति को रेखांकित करते हैं.

         सहयोगी दलों को भी बराबर की भूमिका देने की कोशिश साफ दिखती है. लोजपा (रामविलास) के संजय कुमार को श्रम संसाधन और विज्ञान-प्रौद्योगिकी, जबकि संजय कुमार सिंह को पर्यावरण व जलवायु परिवर्तन जैसे संवेदनशील विभाग सौंपे गए हैं.

       सुरक्षा, सेवा और संवर्धन के व्यापक दायरे में भाजपा की श्रेयसी सिंह (पर्यटन व खेल), डॉ. दिलीप कुमार जायसवाल (आपदा प्रबंधन) और दीपक प्रकाश (सहकारिता) जैसे नाम यह बताते हैं कि पार्टी नई पीढ़ी और अनुभवी टीम को साथ लेकर चलना चाहती है.

     कुल मिलाकर यह मंत्रिमंडल न केवल राजनीतिक समीकरणों का संतुलन प्रस्तुत करता है, बल्कि प्रशासनिक प्राथमिकताओं की रोडमैप भी स्पष्ट करता है.आने वाले दिनों में वास्तविक परीक्षा इस बात की होगी कि ये विभागीय वितरण बिहार की जमीन पर कितने असरदार परिणाम दे पाते हैं.

आलोक कुमार

बिहार का सत्ता-चक्र: नीतीश कुमार का दसवां अवतार

 बिहार का सत्ता-चक्र: नीतीश कुमार का दसवां अवतार


पटना. लोक नायक जयप्रकाश नारायण के आंदोलन की धुंधली छाया में जन्मे बिहार के राजनीतिक परिदृश्य ने एक बार फिर अपनी चक्रीयता का प्रमाण दिया है. वह दौर जब लालू प्रसाद यादव अधिवक्ता की वकालत छोड़कर जननायक बने, नीतीश कुमार इंजीनियरिंग की डिग्री को सत्ता की कुर्सी पर चढ़ने का हुनर सीख चुके थे. आज, पटना इंजीनियरिंग कॉलेज के उत्तीर्ण छात्र नीतीश कुमार न केवल 'कुर्सी बचाने के इंजीनियर' सिद्ध हुए हैं, बल्कि बिहार के इतिहास में सबसे अधिक दफा शपथ लेने वाले मुख्यमंत्री के रूप में अमर हो चुके हैं.

     2025 विधानसभा चुनावों के बाद राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की जीत के साथ ही नीतीश कुमार 10वीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने जा रहे हैं—एक ऐसा क्षण जो बिहार की राजनीति की अस्थिरता और स्थिरता के द्वंद्व को उजागर करता है.बिहार में मुख्यमंत्री पद की शुरुआत स्वतंत्र भारत के नवजात लोकतंत्र के साथ ही हुई. 1947 में, जब भारत गणराज्य बना, तो बिहार का पहला मुख्यमंत्री श्री कृष्ण सिन्हा बने. वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के दिग्गज नेता थे और 20 जुलाई 1947 से 31 जनवरी 1961 तक—करीब 13 वर्षों की लंबी अवधि—इस पद पर आसीन रहे. यह बिहार का स्वर्णिम दौर था, जब राज्य की नींव पड़ी और विकास की आधारशिला रखी गई.

     श्री कृष्ण सिन्हा के बाद द्वीप नारायण ज्हा ने 1 फरवरी 1961 से 18 फरवरी 1961 तक संक्षिप्त कार्यकाल संभाला, लेकिन जल्द ही अनुचंद्र प्रसाद हेगड़े (18 फरवरी 1961 से 2 अक्टूबर 1963) और फिर श्री कृष्ण सिन्हा का दूसरा कार्यकाल (2 अक्टूबर 1963 से 31 जनवरी 1968) आया.इन शुरुआती वर्षों में बिहार की सत्ता कांग्रेस के एकछत्र वर्चस्व में रही, जो स्वतंत्रता संग्राम की विरासत को आगे बढ़ा रही थी.1960 के दशक के अंत तक राजनीतिक अस्थिरता ने दस्तक दे दी.

     1968 में सतीश प्रसाद सिंह ने मात्र 5 दिनों (28 जनवरी से 1 फरवरी) का सबसे छोटा कार्यकाल संभाला, जो बिहार की नाजुक सत्ता-गतिशीलता का प्रतीक था. इसके बाद हरिहर सिंह (22 फरवरी 1967 से 28 जनवरी 1968), भोला पासवान शास्त्री (29 जनवरी 1968 से 26 फरवरी 1969; और फिर 4 अप्रैल 1969 से 22 जून 1969), राम लखन सिंह यादव (22 जून 1969 से 29 जून 1969), दरोगा प्रसाद राय (29 जून 1969 से 22 दिसंबर 1970), भोला पासवान शास्त्री का दूसरा कार्यकाल (29 दिसंबर 1970 से 4 जून 1971), और बिंदेश्वरी दूबे (4 जून 1971 से 24 जनवरी 1972) जैसे नाम आए. यह दौर था जब राज्य राष्ट्रपति शासन के अधीन आठ बार चला—सबसे अधिक अस्थिरता का प्रमाण.

    1970 के दशक में जनता पार्टी के उदय के साथ राजनीति में परिवर्तन आया. कर्पूरी ठाकुर (20 दिसंबर 1970 से 2 जून 1971 और फिर 24 जून 1977 से 1 अप्रैल 1979) ने पिछड़े वर्गों के उत्थान की नींव रखी. अब्दुल गफूर (2 जून 1971 से 11 जनवरी 1972), राम लखन सिंह यादव का दूसरा कार्यकाल (2 जून 1977 से 24 जून 1977), और जगन्नाथ मिश्र (11 फरवरी 1972 से 19 मार्च 1975; 14 अप्रैल 1980 से 14 अगस्त 1983; और 14 मार्च 1989 से 10 मार्च 1990) जैसे नेताओं ने सत्ता संभाली. इंदिरा गांधी के आपातकाल के बाद 1977 का जनता पार्टी सरकार बिहार में भी आई, लेकिन जल्द ही विघटित हो गई.

     1980 के दशक में कांग्रेस की वापसी हुई, लेकिन लालू प्रसाद यादव के उदय ने सब बदल दिया. जगन्नाथ मिश्र के बाद चंद्रशेखर सिंह (8 मार्च 1985 से 12 मार्च 1985), बिंदेश्वरी दुबे का दूसरा कार्यकाल (12 मार्च 1985 से 13 फरवरी 1988), और जगन्नाथ मिश्र का तीसरा कार्यकाल आया.

     फिर 10 मार्च 1990 को लालू प्रसाद यादव बने—वह चाणक्य जैसे रणनीतिकार जो जनता दल के बैनर तले बिहार को 1997 तक हांकते रहे.लालू के कार्यकाल (10 मार्च 1990 से 28 मार्च 1995; 4 अप्रैल 1995 से 25 जुलाई 1997) में सामाजिक न्याय की लहर चली, लेकिन भ्रष्टाचार के आरोपों ने उनकी छवि धूमिल की. इसके बाद राबड़ी देवी (25 जुलाई 1997 से 11 फरवरी 2000; 11 मार्च 2000 से 6 मार्च 2005) बिहार की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं, जो लालू की अनुपस्थिति में राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) की सरकार चला रही थी.

    21वीं सदी में नीतीश कुमार का युग शुरू हुआ.जनता दल (यूनाइटेड) के नेता नीतीश ने पहली बार 3 मार्च 2000 से 11 अप्रैल 2000 तक संक्षिप्त कार्यकाल संभाला.फिर 24 नवंबर 2005 से 20 मई 2014 तक लंबा शासन किया, जिसमें विकास की गति पकड़ी. 22 फरवरी 2015 से 26 जुलाई 2017, 27 जुलाई 2017 से 2 मई 2018 (महागठबंधन के साथ), 19 मई 2018 से 16 नवंबर 2020, 20 फरवरी 2021 से 9 अगस्त 2022, 12 अगस्त 2022 से 28 जनवरी 2024, और 28 जनवरी 2024 से नवंबर 2025 तक—ये उनके नौ कार्यकाल हैं.

     अब 2025 चुनावों के बाद 10वां शपथ ग्रहण. कुल मिलाकर, नीतीश के 18 वर्षों से अधिक का कार्यकाल बिहार को सड़कों, पुलों और शिक्षा से जोड़ता है, लेकिन गठबंधन-धोखे की राजनीति ने उनकी छवि को 'पलटू राम' का रूप दे दिया।बिहार की यह सत्ता-यात्रा—1947 से शुरू होकर आज के 10वें मुख्यमंत्री तक—एक सबक है: लोकतंत्र में स्थिरता दुर्लभ है, लेकिन परिवर्तन अपरिहार्य। जयप्रकाश नारायण का सपना आज भी अधूरा है, क्योंकि कुर्सी की होड़ में विकास की गति कभी तेज, कभी सुस्त। नीतीश कुमार का दसवां अवतार क्या बिहार को नई दिशा देगा, या फिर वही पुराना चक्र? समय ही उत्तर देगा.

आलोक कुमार

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