गोवा.गोवा में प्रस्तावित ‘टेल्स ऑफ कामसूत्र एंड क्रिसमस सेलिब्रेशन’ कार्यक्रम पर उठा विवाद केवल एक आयोजन का विरोध नहीं है, बल्कि यह उस सामाजिक चेतना का संकेत है जो धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक गरिमा और सार्वजनिक मर्यादा से जुड़े प्रश्नों पर बेहद सजग है.सोशल मीडिया पर जैसे ही इस कार्यक्रम का प्रचार सामने आया, समाज के विभिन्न वर्गों—सामाजिक संस्थाओं से लेकर धार्मिक संगठनों तक—ने इसकी तीखी प्रतिक्रिया दी.सार्वजनिक दबाव और शिकायतों के बाद गोवा पुलिस ने तुरंत हस्तक्षेप करते हुए आयोजन पर रोक लगा दी. विज्ञापन हटाने के निर्देश दिए गए और पूरे राज्य में सतर्कता बढ़ा दी गई.
इस विवाद की जड़ केवल ‘कामसूत्र’ शब्द का प्रयोग नहीं है, बल्कि इसे क्रिसमस जैसे पवित्र पर्व के साथ जोड़कर प्रस्तुत करना है. शिकायतकर्ताओं को आपत्ति इसी बात से है कि धार्मिक उत्सव की आस्था और आध्यात्मिकता को बाजारू आकर्षण के साथ मिलाकर पेश किया गया. एनजीओ संस्थापक अरुण पांडे का तर्क है कि यह गोवा का सेक्स टूरिज्म के अड्डे की तरह प्रचारित करने की चाल है. वहीं, कैथोलिक एसोसिएशन ऑफ गोवा ने इसे न सिर्फ अनुचित बताया बल्कि समाज में यौन अपराधों को बढ़ावा देने वाली प्रवृत्ति करार दिया.
सबसे प्रखर आवाज गोवा के आर्चबिशप व भारतीय कैथोलिक बिशप सम्मेलन के अध्यक्ष फिलिप नेरी कार्डिनल फेराओ की ओर से आई.उन्होंने इसे ईसा मसीह के जन्मोत्सव को अश्लीलता से जोड़ने की “गंभीर चूक” बताया और धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाला कदम कहा.उनकी प्रतिक्रिया, व्यापक कैथोलिक समाज की बेचैनी को अभिव्यक्त करती है.
यह भी उल्लेखनीय है कि विरोध केवल धार्मिक संगठनों तक सीमित नहीं रहा. स्थानीय राजनीतिक इकाइयों और सामाजिक समूहों ने भी तीखी प्रतिक्रिया दी. कांग्रेस की सांता क्रूज़ यूनिट ने स्पष्ट कहा कि इस तरह के आयोजन गोवा की सांस्कृतिक छवि को धूमिल करते हैं. पर्यटन आधारित अर्थव्यवस्था वाले इस राज्य में संस्कृति और सामाजिक संवेदनशीलता के बीच संतुलन बनाए रखना हमेशा चुनौतीपूर्ण रहा है.ऐसे में किसी भी आयोजन का प्रचार यदि सामाजिक मानदंडों से टकराए, तो स्वाभाविक है कि विरोध तेज हो.
कार्यक्रम के पीछे ओशो से जुड़ा प्रचार ढांचा और ‘ध्यान’ तथा ‘वेलनेस’ के नाम पर विविध गतिविधियों का दावा था। लेकिन आयोजनकर्ताओं ने जिस तरह क्रिसमस को जोड़कर यह पैकेज तैयार किया, वह समाज को मंजूर नहीं हुआ। उनके मौन ने संदेह और बढ़ा दिया है.
इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि त्योहारों का व्यवसायीकरण अभी तक स्वीकार्य है जब वह सांस्कृतिक और धार्मिक भावनाओं के दायरे का सम्मान करें. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता महत्त्वपूर्ण है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि धार्मिक पहचान और सामाजिक मर्यादाओं की अनदेखी की जाए. गोवा पुलिस का हस्तक्षेप इसलिए समयोचित माना जाना चाहिए क्योंकि इससे संभावित तनाव और सामाजिक असंतोष को बढ़ने से रोका गया.
अंततः, यह घटना गोवा और देश दोनों के लिए एक संदेश छोड़ती है—कि आधुनिकता और आध्यात्मिकता के बीच किसी भी प्रकार की अवांछित संगति समाज में असंतोष पैदा कर सकती है. सांस्कृतिक संवेदना को समझे बिना आकर्षक शीर्षक गढ़ना रचनात्मकता नहीं, बल्कि लापरवाही है। त्योहार, आस्था और सामाजिक मूल्य—ये किसी भी मनोरंजन या व्यावसायिक महत्वाकांक्षा से कहीं ऊपर है.
आलोक कुमार

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