पटना. 26 नवंबर—भारतीय लोकतंत्र का वह दिन, जब देश ने अपने भविष्य की दिशा स्वयं तय की.1949 में इसी तारीख को संविधान सभा ने भारत के संविधान को अंगीकार किया था, और एक दशक पहले सरकार ने इसे संविधान दिवस के रूप में स्थापित कर नई पीढ़ी को संविधान की आत्मा से जोड़ने का महत्वपूर्ण प्रयास किया.यह दिन केवल इतिहास का स्मरण नहीं, बल्कि नागरिक चेतना के पुनर्जागरण का अवसर है.
हमारा संविधान केवल कानूनी दस्तावेज नहीं, बल्कि भारत की सामूहिक आकांक्षाओं का जीवंत ग्रंथ है. यही वह शक्ति है जिसने सामाजिक पृष्ठभूमि को पार करते हुए एक साधारण परिवार के व्यक्ति को प्रधानमंत्री पद तक पहुंचने का अवसर दिया.लोकतंत्र की यह समावेशी क्षमता तब और भी स्पष्ट होती है जब देश के सर्वोच्च पद पर पहुंचने वाला व्यक्ति संसद की सीढ़ियों पर नतमस्तक होकर संस्थाओं के प्रति सम्मान व्यक्त करता है—यह दृश्य संविधान की आत्मा का ही विस्तार है.
संविधान दिवस पर देश उन महान विभूतियों को नमन करता है, जिन्होंने संविधान के निर्माण में अपनी बुद्धि, दूरदृष्टि और तपस्या समर्पित की.डॉ. राजेंद्र प्रसाद, डॉ. भीमराव अम्बेडकर और संविधान सभा की प्रतिष्ठित महिला सदस्यों ने इस दस्तावेज को न केवल कानूनी ढांचा दिया, बल्कि इसे मानवीय संवेदनाओं से भी आलोकित किया.संविधान के 60 वर्ष पूरे होने पर गुजरात में निकाली गई ‘संविधान गौरव यात्रा’ और संविधान के 75 वर्ष पूरे होने पर आयोजित विशेष सत्र—ये सभी पहले दर्शाती हैं कि राष्ट्र अपने मूल्यों के प्रति जागरूक और कृतज्ञ है.
इस वर्ष का संविधान दिवस इसलिए भी विशेष है क्योंकि यह सरदार पटेल और भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती का साक्षी है. देश का एकीकरण सरदार पटेल की अद्भुत राजनीतिक दूरदृष्टि का परिणाम था, जिसने बाद में जम्मू-कश्मीर में धारा 370 हटाने जैसे साहसिक निर्णयों को भी प्रेरित किया. वहीं भगवान बिरसा मुंडा का संघर्ष आज भी न्याय, गरिमा और जनजातीय सशक्तिकरण की दिशा में प्रकाशस्तंभ बना हुआ है. वंदे मातरम् की 150वीं वर्षगांठ और गुरु तेग बहादुर जी की 350वीं शहादत वर्षगांठ हमें हमारी सांस्कृतिक दृढ़ता और आध्यात्मिक विरासत की याद दिलाती है.
संविधान केवल अधिकारों का संग्रह नहीं; यह कर्तव्यों का भी आग्रह करता है. आर्टिकल 51 A में उल्लिखित मौलिक कर्तव्य नागरिकों को यह स्मरण कराते हैं कि अधिकार तभी सार्थक बनते हैं जब कर्तव्य भावनात्मक और व्यवहारिक रूप से अंगीकृत किए जाएं। महात्मा गांधी भी यही कहते थे—कर्तव्य का ईमानदार निर्वहन ही अधिकारों की सबसे सशक्त गारंटी है।
सदी के 25 वर्ष बीत चुके हैं। अब 2047 के अमृत काल और 2049 के संविधान शताब्दी वर्ष की ओर बढ़ते भारत के लिए कर्तव्यनिष्ठ नागरिक ही परिवर्तन के वाहक बन सकते हैं. आने वाले देशों की नीतियों और निर्णय ही नई पीढ़ियों के भाग्य का निर्माण करेंगे। विकसित भारत का सपना केवल सरकार से नहीं, नागरिकों की सक्रिय भागीदारी और जिम्मेदारी से ही पूर्ण होगा.
मतदान का अधिकार भी इसी सहभागिता का सबसे बड़ा उपकरण है। हर 26 नवंबर को फर्स्ट-टाइम वोटर्स का सम्मान—यह विचार न केवल अभिनव है, बल्कि लोकतंत्र को नई ऊर्जा देने वाला कदम भी है. यदि हर स्कूल और कॉलेज इसे परंपरा बना लें तो लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति युवा पीढ़ी में गर्व और जिम्मेदारी का भाव स्वाभाविक रूप से विकसित होगा.
अंततः, संविधान दिवस केवल रस्म का दिन नहीं—यह आत्मावलोकन का क्षण है। यह दिन हमें स्मरण करता है कि राष्ट्रनिर्माण कोई दूरस्थ लक्ष्य नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक की नैतिक जिम्मेदारी है. जब हम कर्तव्य को प्रधानता देंगे, तब ही हमारा हर कार्य संविधान की शक्ति बढ़ेगी और भारत को एक सशक्त, समृद्ध और विकसित राष्ट्र बनाने में हमारा योगदान सार्थक साबित होगा.
आलोक कुमार
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