सोमवार, 17 नवंबर 2025

लोगों के सुख-दुख में शरीक रहे और इसी की बदौलत तीसरे प्रयास में जनता ने उन्हें विधायक बनाकर सम्मान दिया

 लोगों के सुख-दुख में शरीक रहे और इसी की बदौलत तीसरे प्रयास में जनता ने उन्हें विधायक बनाकर सम्मान दिया


महिषी
 .महिषी विधानसभा क्षेत्र में इस बार का मुकाबला बेहद रोचक रहा. राजद (RJD) के प्रत्याशी डॉ. गौतम कृष्ण, जो क्षेत्र में अपनी प्रशासनिक पहचान और सादगी के कारण 'BDO साहब' के नाम से चर्चित हैं, ने जीत दर्ज कर ली है. उन्होंने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी जदयू (JDU) प्रत्याशी गूंजेश्वर शाह को 3740 वोटों के अंतर से पराजित किया.

सहरसा जिले के बिहार की राजनीति में संघर्ष, साहस और सामाजिक जुड़ाव की त्रिमूर्ति जब एक साथ चल पड़े, तो इतिहास लिखने में देर नहीं लगती. डॉ. गौतम कृष्ण की जीत इसी त्रिमूर्ति का चमकता हुआ प्रमाण है.महिषी विधानसभा सीट पर राजद की धमाकेदार वापसी ने न केवल वर्षों से जमे राजनीतिक समीकरणों को हिलाया है, बल्कि यह भी साबित कर दिया कि जनता बदलाव का मन बना चुकी थी—और इस बदलाव का चेहरा बने एक पूर्व प्रशासक, एक जनसेवक और संघर्षशील व्यक्तित्व.

      गौतम कृष्ण ने जब 08 सितंबर 2015 को बीडीओ की स्थिर सरकारी नौकरी से इस्तीफा देकर राजनीति की अनिश्चित राह चुनी, तब बहुतों ने उनके निर्णय को जोखिम बताया था.परंतु राजनीति उन्हीं के हाथों अपनी नई दिशा पाती है, जो जोखिम को अवसर में बदलने का माद्दा रखते हों.

      2015 में पहली हार, 2020 में बेहद करीबी पराजय—ये किसी भी साधारण व्यक्ति को पीछे धकेल सकती थीं. लेकिन गौतम कृष्ण का जज़्बा साधारण नहीं था. वे चुप नहीं बैठे; वे खेत-खलिहानों में गए, बाढ़ पीड़ितों के बीच पहुंचे, दुख-सुख में लोगों के साथ खड़े रहे.यही सतत जनसंपर्क उनके लिए वह पूंजी साबित हुआ, जिसने तीसरे प्रयास में जनता का विश्वास एकजुट कर दिया.

महिषी की जनता ने इस बार जात-पात और दलगत सीमाओं से ऊपर उठकर मतदान किया है.यह सिर्फ गौतम कृष्ण की जीत नहीं, यह उस राजनीतिक परिपक्वता की जीत है जिसकी लंबे समय से बिहार को जरूरत थी.जनता ने यह संकेत भी दिया है कि व्यक्तित्व और परिश्रम अब वंश और परंपरा पर भारी पड़ने लगे हैं.

हालाँकि, असली परीक्षा अब शुरू होती है.

     महिषी विधानसभा की नियति हर साल बाढ़, दो प्रखंडों की साझी त्रासदी, बढ़ती बेरोजगारी और लगातार पलायन जैसी चुनौतियों के कुचक्र में फंसी रही है. जनता उम्मीद लगाए बैठी है कि नया विधायक इन समस्याओं से जूझने के लिए केवल आश्वासन नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई की नई मिसाल पेश करेंगे.

         गौतम कृष्ण अपने पिता विष्णुदेव यादव की राजनीतिक विरासत और जनसेवा की परंपरा से आए हैं। परिवार में प्रशासनिक अनुभव भी है—पत्नी श्वेता कृष्ण स्वयं बीडीओ हैं.जनता को उम्मीद है कि इस अनुभव और जनसंपर्क का संगम क्षेत्र के विकास को तेज रफ्तार देगा.

       अंततः, यह जीत सिर्फ एक विधायक बनने की कहानी नहीं, बल्कि यह संदेश है कि संघर्ष व्यर्थ नहीं जाता, कि जनता सब देखती है, और सही समय पर सही व्यक्ति को सम्मान देना जानती है.

अब महिषी इंतजार कर रहा है—क्या डॉ. गौतम कृष्ण इस विश्वास को विकास की इबारत में बदल पाएंगे? इतिहास का पन्ना पलट चुका है; अब अगली पंक्ति लिखना उनके हाथ में है.यहां कुछ बिंदु हैं जो यह तय करने में मदद करेंगे कि बीडीओ पद बेहतर है या विधायक का पद. (डॉ. गौतम कृष्ण, बीडीओ से इस्तीफा करके विधायक बने) के संदर्भ में:

वेतन के हिसाब से

विधायक का मासिक वेतन (लगभग ₹1.6 लाख) और भत्ते मिलाकर “इन-हैंड” वेतन बहुत अधिक हो सकता है, तुलना में BDO की शुरुआत “इन-हैंड” सैलरी (~₹70,000) कम हो सकती है.

हालांकि, BDO में वरिष्ठता आने पर वेतन बढ़ने की गुंजाइश है, लेकिन विधायक का वेतन आमतौर पर बहुत बड़ा अवैध नहीं हो सकता (कम-ज्यादा एक तय स्तर तक ही).

जोखिम और अस्थिरता

विधायक का पद “चुनावी पद” है: जीतना पड़ेगा, चुनाव हर 5 साल में हो सकते हैं, और हर चुनाव में उनकी सीट सुरक्षित नहीं होती.

BDO का पद एक स्थिर सरकारी नौकरी है – नौकरी सुरक्षा अधिक, वेतन नियमित रूप से मिलता है, और सेवा अवधि के बाद पेंशन आदि मिलता है.

प्रभाव और शक्ति

विधायक होने से वे जनता के प्रतिनिधि बन जाते हैं: वे नीतियों में भाग ले सकते हैं, विकास परियोजनाओं का प्रस्ताव और नियंत्रण कर सकते हैं, और सामाजिक-राजनीतिक शक्ति होती है.

BDO भी विकास-प्रशासन में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, विशेष रूप से ब्लॉक स्तर पर विकास योजनाओं को लागू करने में, लेकिन राजनीतिक प्रतिनिधित्व और निर्णय-शक्ति शायद विधायक जितनी न हो.

लाभ और शैली (Lifestyle)

विधायक के पास विशेष सुविधाएँ हो सकती हैं, जैसे आवास, कार्यालय, स्टाफ, राजनीतिक नेटवर्क – यह जीवनशैली में एक “ऊंचा” स्तर ला सकता है.

BDO की नौकरी प्रशासनिक और तकनीकी होती है — नियमित काम, जिम्मेदारी, लेकिन शायद इतनी सार्वजनिक प्रतिष्ठा न हो जितनी एक विधायक को होती है.

लंबे समय का विचार

यदि कोई व्यक्ति चुनाव हार जाता है, तो विधायक का पद खोने का जोखिम है.

लेकिन BDO के रूप में वह निरंतर सेवा कर सकता है, प्रमोशन पा सकता है, और सेवानिवृत्ति के बाद पेंशन भी ले सकता है.

आलोक कुमार

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