पटना. ईसाई जगत में प्रतीक्षा, तैयारी और आशा का पवित्र मौसम—आगमनकाल —रविवार से आरंभ हो गया है. क्रिसमस से चार सप्ताह पूर्व मनाया जाने वाला यह काल केवल उत्सवों की शुरुआत नहीं, बल्कि
प्रभु यीशु के जन्म से जुड़ी आध्यात्मिक तैयारी का समय माना जाता है.
इस वर्ष आगमनकाल के प्रथम रविवार 30 नवंबर का मुख्य विषय ‘आशा का संदेश’ रहा.परंपरा के अनुसार दूसरा सप्ताह विश्वास, तीसरा सप्ताह आनंद, और चौथा सप्ताह शांति व प्रेम का संदेश लेकर आता है—वही प्रेम जो क्रिसमस की रात प्रभु यीशु के आगमन के रूप में जगत पर बरसा था.
आगमनकाल को प्रतीकात्मक रूप से दर्शाने वाली कैंडल्स का रंग भी गहरा धार्मिक अर्थ समेटे रहता है. प्रथम, द्वितीय और चौथे सप्ताह में बैंगनी रंग की कैंडल जलाई जाती है, जो प्रार्थना, प्रायश्चित और आध्यात्मिक गंभीरता का प्रतीक है.यह पछतावे से आत्मशुद्धि और तैयारी की ओर बढ़ने का रंग है. जबकि तीसरे सप्ताह में जलने वाली गुलाबी या गुलाबी रंग की कैंडल आनंद, उमंग और आशा के उजाले का उद्घोष करती है—यह बताती है कि अब मन पश्चाताप से उत्सव की ओर बढ़ रहा है.
आगमनकाल के आरंभ के साथ ही देशभर के चर्चों और आराधना स्थलों में विशेष मिस्सा, प्रार्थना और धर्म विधियां संपन्न हुईं. पटना शहर के 11 प्रमुख गिरजाघरों में भी आगमनकाल के प्रथम रविवार को विशेष मिस्सा अनुष्ठान आयोजित किए गए। इसी के साथ क्रिसमस गैदरिंग, मिलन समारोह, मेले और कार्निवल की भी शुरुआत हो गई है.
समुदाय की तैयारियाँ घर-घर तक फैलने लगती हैं—कहीं कैरोल के स्वर गूंजते हैं, वहीं नए कपड़ों की खरीदारी होती है, तो कहीं रिश्तेदारों और मित्रों के लिए उपहार चुने जाते हैं. केक और बेकरी ऑर्डरों की भागदौड़ भी इसी दिन से शुरू हो जाती है.
इन सबके बीच आगमनकाल हमें याद दिलाता है कि क्रिसमस केवल बाहरी उत्सव का दिन नहीं, बल्कि आत्मा की आंतरिक रोशनी को जगाने का अवसर है—आशा, विश्वास, आनंद और प्रेम के मार्ग पर चलने का निमंत्रण.
आलोक कुमार

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