इसी सांस्कृतिक-धार्मिक विरासत के हृदय में स्थित है कोट्टायम जिले का मनमट्टम, जो कंजिरापल्ली तालुका का शांत, लेकिन आध्यात्मिक रूप से समृद्ध इलाका है. यहां का सेंट जॉर्ज चर्च (सिरो-मालाबार) केवल एक पूजा का स्थान नहीं, बल्कि स्थानीय समुदाय की पहचान का स्तंभ है. यह चर्च पलाई डायोसिस के अंतर्गत आता है, जो रोमन विजयपुरम डायोसीस के क्षेत्राधिकार में स्थित एक महत्त्वपूर्ण कैथोलिक केंद्र है.
कैथोलिक रहस्यवाद में डूबे इन इलाकों की एक विशिष्ट पहचान है—सिरो-मालाबार और सिरो-मलंकरा कैथोलिक चर्चों की दोहरी परंपरा.दोनों चर्च वेटिकन से संबद्ध हैं और अपने-अपने मेजर आर्कबिशप के नेतृत्व में चलते हैं. 1930 में गीवर्गीस इवानियोज द्वारा स्थापित सिरो-मलंकरा चर्च और 1932 में पोप पायस XI द्वारा स्वीकृत इसकी हायरार्की इस बात का प्रमाण है कि केरल में ईसाई परंपराएं कितनी गहराई और अनुशासन से विकसित हुए हैं
लेकिन धर्म और परंपरा के इस समृद्ध कैनवास के बीच जीवन अपनी कठिन वास्तविकताओं के साथ खड़ा रहता है.
मनमट्टम के इस प्रतिष्ठित चर्च से जुड़े स्वर्गीय माइकल एन.एम. का परिवार हाल के दिनों में इसी जीवन-द्वंद्व का साक्षी बना.27 नवंबर 2025 को उनके पुत्र जोसेफ नजारक्कटिल की पुत्री का विवाह हुआ—एक ऐसा अवसर, जो किसी भी परिवार में उल्लास और एकजुटता का क्षण होता है.
लेकिन इसी खुशी पर कुछ ही दिनों बाद, 1 दिसंबर 2025 को, एक गहरा साया पड़ गया—माइकल एन.एम. के बड़े पुत्र जेवियर एन.एम. की पुत्रवधू शर्मी जोमोन का निधन हो गया.45 वर्ष की इस महिला ने कैंसर जैसे कठिन रोग से लंबी लड़ाई लड़ी थी.अपने पीछे वह एक पुत्र, एक पुत्री और एक विरल रिक्तता छोड़ गई, जिसे शब्दों में बांधना मुश्किल है.
कहते हैं—“विधि का विधान किसी के साथ पक्षपात नहीं करता.”
इस परिवार पर कुछ ही दिनों में खुशी और शोक दोनों आ खड़े हुए—एक ओर विवाह की मधुर ध्वनियां, दूसरी ओर असमय मृत्यु का क्रूर मौन.
जहां एक क्षण में घर आशीर्वादों से भर उठा, वहीं अगले ही क्षण दुख का पहाड़ टूट पड़ा.यह स्थिति उस अनिवार्य जीवनचक्र की याद दिलाती है, जिससे कोई भी परिवार, कोई भी समुदाय अछूता नहीं.
फिर भी ऐसी क्षणभंगुर परिस्थितियां अक्सर समाज और परिवार की संवेदनशीलता, एकजुटता और आध्यात्मिक मजबूती की परीक्षा लेती हैं—और कोट्टायम का यह पारिवारिक संस्मरण यह बताता है कि चाहे व्यक्तिगत जीवन हो या सामुदायिक, विश्वास और मानवीय सहानुभूति ही वह आधार हैं, जिन पर कठिन दिनों की छाया भी अंततः टिक नहीं पाती.
आलोक कुमार

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